भूली बिसरी यादे 4 कबड्डी
कबड्डी यह कभी मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में एक लोकप्रिय सामूहिक खेल रहा। इसका इतिहास 4000 साल पुराना बताया जाता है।अब क्रिकेट की लोकप्रियता कबड्डी पर भारी पड़ गई है। मोहल्ले, गली यहां तक कि आंगन में भी आसानी से खेला जा सकने वाला यह खेल अब ''जनसामान्य'' के खेल का खिताब खो चुका है। एशियाड खेलों में इस खेल को शाम्मिल कर लिए जाने के बाद भी इसकी लोकप्रियता स्थापित नही हो पाई। अब यह खेल प्रोफेशनल खिलाड़ियों तक सीमित हो गया।
आइये पचास साल पहले इसकी कितनी लोकप्रियता थी, इसका जायजा लेते है। प्राइमरी स्कूल से लेकर महाविद्यालय तक कबड्डी के प्रतियोगिताएं होती रहती थी। गांवो की टीम में बड़ी आयु के लोग भी होते थे। इसलिए यह खेल सभी आयु वर्गों के लोगों के बीच लोकप्रिय था। दूसरे इसकी प्रैक्टिस के लिए कोई संसाधन नहीं लगता। 20 बाई 30 फीट वाले मैदान में यह खेल आराम से खेला जा सकता था। सभी प्रतियोगिताएं या प्रैक्टिस सामान्य मिट्टी के मैदान में होती थी, आज के जैसे गद्दे पर कबड्डी खेलने की कोई अंतरराष्ट्रीय प्रथा भी नहीं थी। मोहल्ले की कबड्डी में तो केवल मध्य रेखा खींच कर कबडडी खेलना शुरू हो जाता। यहां तक कि गांवों में घर के सामने के बड़े आंगन में भी कबड्डी खेल लेते।
गांवो के लिए कम से कम व्यय का खेल कबड्डी ही था। दिसंबर की छुट्टियों में दस बारह ग्रामो की टीमें एक स्थान पर कबड्डी प्रतियोगिता में भाग लेने आती। प्रतियोगिता में कुर्सियां नजदीक के स्कूल से आ जाती। निर्णायक भी आसपास के स्कूल के शिक्षक ही होते। व्यय के नाम पर केवल खिलाड़ियों के लिए संतरा पिपरमेंट की व्यवस्था करनी पड़ती। निर्णायकों के लिए चाय की व्यवस्था का मतलब होता बिना दूध की गुड़ की चाय। परंतु जीत और हार की खुशी और गम, और खेलने का उत्साह किसी ओलम्पिक से कम नही रहता। निर्णायक के निर्णय को चुनौती भी दी जाती। जिसके लिए आयोजन समिति के मेंबर ही सुनवाई करते। समिति का स्कूल के ब्लैकबोर्ड पर नाम लिख दिया जाता। उसपर बकायदा समिति के सदस्यों, अध्यक्ष, सचिव का नाम लिखा होता । समिति का कार्यकाल उतना ही रहता जब तक कि ब्लैकबोर्ड में उसका नाम मिट नही जाता। सेमिफाइनल तक पहुंचने वाली टीम अपने गांवो में सेमीफाइनल में पहुंचने की सूचना भेज देती। फाइनल होते तक दोनों टीम के गांव से पच्चीस तीस लोग ढोलक मंजीरा लेकर पहुंच जाते। और टीम को बाजे गाजे के साथ अपने गांव में लेकर जाते । गांव में पहुंच कर गांव के लोग इकट्ठा होकर स्वागत करते। गांव के लिए यह एक पर्व ही होता और चर्चा के लिए आठ दस रोज चलने वाला विषय भी मिल जाता। स्कूल में विद्यार्थी इन्ही गावों से आते। तो स्कूल में भी यह एक दो दिन चर्चा का विषय बना रहता।। उस काल मे भी गॉंव के लोग समय समय पर अपनी आर्थिक औकात में रहकर भी आनंद मनाने का कोई न कोई कारण ढूंढ निकालते उसमे एक कबड्डी भी था।
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