Friday, October 17, 2025

गांव के साप्ताहिक बाजार


भूली बिसरी यादे    1 गॉंव के साप्ताहिक बाजार
       एक समय मे गॉंव का साप्ताहिक बाजार यानी हर सप्ताह आने वाला उत्सव हुआ करता था।
     उस दिन किसान अपने मजदूरों को साप्ताहिक भुगतान करता।छोटे छोटे व्यापारी भी अपने मजदूरों का भुगतान करते। किसान खेत बाडी में उगाई गई सब्जी भाजी को बेचने के लिए या तो बाजार लेकर जाता या छोटे छोटे व्यापारियों को बेच देता। 
       कोई कपड़ा खरीदना हो तो बाजार के दिन की प्रतीक्षा। बच्चे को कोई किताब - कॉपी खरीदना हो तो बाजार की प्रतीक्षा। समोसा खाना हो तो बाजार की प्रतीक्षा। किराना का सामान खत्म हो गया तो बाजार की प्रतीक्षा। सब्जी भाजी खत्म हो गई तो बाजार की प्रतीक्षा। कपड़े धुलना हो तो बाजार के पहले दिन की प्रतीक्षा। बाल बनाना हो तो बाजार के दिन की प्रतीक्षा। किसी काम का आश्वासन देना हो तो बाजार के दिन तक का। उधारी चुकाने के आश्वासन के लिए बाजार का दिन। जूता चप्पल खरीदना हो या रिपेयर करवाना हो तो बाजार तक कि प्रतीक्षा। बच्चे को मिठाई खाना हो तो बाजार के दिन का आश्वासन।
           60 वर्ष पूर्व तक गांव में बाजार के दिन तक के लिए कई धड़कने अलग अलग कारणों से इच्छा पूर्ति के लिए धड़कती रहती। यदि उस दिन इच्छा पूरी नहीं हुई तो फिर सात दिनों तक अगले बाजार के दिन तक के लिए धड़कनों को पुनः धड़कने का काम मिल जाता।
      बाजार का दिन कुछ लोगो के लिए अरमान पूरे होने का दिन होता। कुछ लोगो के लिए जिम्मेदारी पूरी करने की चिंता का सबब
होता।
       सुबह सात बजे से बाजार के दिन नाई आकर चौक पर अपनी बैठक लगा लेता। एक बोरे का टुकड़ा बिछा कर , उस पर अपना वस्तुरा, कैची, कंघा, लाइफ बॉय साबुन, कभी ब्रश होता तो ठीक है। सामने किसी पड़ोस के घर से लाया हुआ पानी का कनस्तर। बस इतनी पूंजी में अपनी दुकान सजा लेता। नाई की बैठक सजते तक एक दो ग्राहक भी जुट जाते। कुछ ग्राहक जो सामान्यतया मजदूर होते या सीमांत किसान, वे नगद देकर बाल बनवाते। पर बड़े किसान जिनकी गांव में   दो चार की ही संख्या, होती वार्षिक अनाज देते। वे बिरित के ग्राहक कहलाते । बिरित यह शब्द संभवतया। व्रत यानी प्रतिज्ञा का अपभ्रंश रहा होगा। साल भर का अनाज देकर नाई साल भर परिवार के बाल बनाने के लिए अनुबंधित हो जाता था। 
            नाईयो को गांव पुश्तैनी तरीके से आंबतित होते थे। जिन गावो में पिता बाल काटता था । लड़का भी उस गाँव के लोगों के बाल काटता था। नाइ केवल बाल काटता था, ऐसा नहीं, तो वह शादी, ब्याह, पूजा पाठ, मृत कर्म में भी हाथ बटाता। यह भी आय का एक साधन होता। परंतु इसके कोई रेट तय नही होता था। मेजबान अपनी हैसियत के अनुसार जो दे दे। चूंकि उसका काम जगह जगह जाकर बाल बनाना होता, तो उसको उस इलाके में हो रही घटनाओं की भी अच्छी जानकारी होती। बाल काटने के लिए लाइन में लगे लोगों की फुरसतिया बातचीत से भी उसको कई जानकारियां मिल जाती। इस प्रकार की जानकारियों से सुसज्ज नाई चलता फिरता इलाके का इनसाइक्लोपीडिया होता। उसकी इसी जानकारी के कारण नाई वैवाहिक संबंध बनाने में मध्यस्थ की भूमिका अच्छी तरह निभाता था। उसकी जानकारी को विश्वसनीय माना जाता। जिन नाइयों के गावँ निश्चित नहीं होते वे बाजार में सुबह से अपनी बैठक लगा लेते। बाजार जानेवाले कुछ ग्रामीण बाजार में घुसने का पहले बाल बना लेते। इस प्रकार नाइ का ग्राम की सामाजिक व्यवस्था में भी  महत्व
पूर्ण स्थान  होता।
    हाँ तो नाई को लेकर इतनी लंबी बात के बाद यह बताना लाजमी है कि बाजार जाने की तैयारी की शुरुवात बाल बनाने से ही होती।
     अब पुनः बाजार की ओर रुख करते हैं। बाजार यानी केवल खरीद फरोख्त का दिन नही होता,  तो यह  मिलने जुलने का महत्वपूर्ण स्थान होता। आसपास के गांवों के मित्रो रिश्तेदारों के साथ सामाजिक संबंधों के नवीनीकरण का स्थान होता बाजार। बाजार में लगभग आठ दस मील दूर के गांवों से लोग आते। उस समय पैदल आना जाना होता , इक्का दुक्का लोगो के पास सायकल होती। कुछ लोग बैल गाड़ी से भी आते। रिश्तेदारी, यार दोस्ति भी इन्ही गांवो तक सीमित होती। बाजार में इन सब रिश्तेदारों से और यार दोस्तोँ से मिलना हो जाता।  बाजार के दिन बाजार केंद्र के गांव में कुछ घरों में मेहमान भी दिखाई देते। लोग सुबह से घर से निकल कर रिश्तेदार के यहां पहुंच जाते। वहां से दोपहर का भोजन कर बाजार जाते। बाजार में मिलने वाले मित्रो के साथ हाफ चाय पीना और उसके बाद सिंगल पान खाना, यानी कि केवल घूमने के लिए बाजार जाने वालों के तहरीफ़ का यही समापन होता।
     बाजार के दिन गांव के सुने रास्ते पर लोगो का आना जाना बढ़ जाता। धुली हुई सफेद शर्ट, धोती और टोपी में सज कर लोग निकलते। घर से निकलने के पहले बालो पर तेल तो लगता ही था । पर चेहरे पर तेल चुपड़ना भी संवरने का अटूट भाग होता। यह ग्राम सुलभ मेकअप था। कुछ लोग चप्पल पहने होते पर अधिकांश नंगे पांव ही होते। महिलाएं भी बाजार जाती। धुले हुए कपड़े बड़ी लाल बिंदी, मांग में बड़ा सिंदूर, कुछ के नाखून ताजे नेल पॉलिश लगे भी होते। हाँ, यह लाल बिंदी आज की जैसी रेडिमेड चिपकने वाली नही होती। महिलाएं पहले बिंदी के आकार का मेन लगाती। उसपर सिंदूर। बाजार के दिन सिंदूर लंबे समय तक लगा रहे , इसका यह इंतजाम होता। लो भाई, अब तो मेन क्या होता है, यह भी बताना पड़ेगा। शहद के छत्ते से शहद निकालने के बाद बचा हुआ अवशेष मेन कहलाता है।........ यही अधिकतम सजना संवरना होता।
     बाजार यह ग्रामपंचायत के लिए आय का साधन भी होता।
दुकानों से दुकान की साइज के हिसाब से टैक्स तय होता था। जिसे पंचायत का ठेकेदार वसूल करता था। जिस पंचायत के अधीन बाजार होता उसे सम्पन्न पंचायत माना जाता।
       बाजार यह प्रेमी प्रेमिकाओं के मिलन का स्थल भी होता। अलग अलग गॉंव में रहने वाले प्रेमी युगल के लिए बाजार के बहाने मिलने का अवसर मिलता। प्रेमी अपनी प्रेमिका को माला फुंदरी से लेकर प्लास्टिक के रंग बिरंगे सस्ते चप्पल भी उपहार में देता। प्रेममिलन का अंत भजिया या समोसे या चना पोहा के नाश्ते के साथ होता। अंत मे पान बनवाकर प्रेमी चुपचाप प्रेमिका के मुह में डाल देता। पान से रेंज होठों को देख कर सहेलियों को चुहलबाजी का विषय भी मिल जाता।
          तीजा के त्योहार में बाजार की रौनक बढ़ जाती। मायके आनेवाली लड़कियों की चेहरे की रौनक और बात बात में खिल खिलाना, यह साबित करता था कि ससुराल से मुक्ति और मायके आजादी का ये भरपूर आनंद ले रही हैं।
             गॉंव के ये बाजार अब भी लगते है। परंतु समय के साथ साथ बाजार का सामाजिक संबंधों  और सरोकारों का मिट्टी से उपजा सोंधा पन समाप्त होता जा रहा है। बाजार खरीद फरोख्त के औपचारिक साधन भर होते जा रहे हैं।
      



       
    




 

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