Monday, October 20, 2025

भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन

भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन
          1965 तक कार, टेलीफोन, बंगला यह अमीर होने की तीन निशानियां थी। टेलीफोन के लिए नंबर लगाने के बाद भी बरसो इंतजार करना पड़ता।  अब बैंक लोन के कारण और आर्थिक परिस्थितियों में आये बदलाव के कारण मध्यम वर्गीय परिवार भी इन सुविधाओं का सहजता के साथ उपभोग कर रहे हैं। लैंडलाइन टेलीफोन तो अब कालातीत हो गए हैं।
          मैंने स्वयं 1973 तक यदा कदा ही इसका उपयोग किया होगा। 
1973 में नौकरी मिलने के बाद कार्यालय के टेलीफोन का उपयोग करने में धीरे धीरे सहज होने लगा। कार्यालय में भी केवल बॉस के केबिन में टेलीफोन हुआ करता था। मेरा एक मित्र टेलीफोन डिपार्टमेंट में ही काम करता था। वह कभी कभी बॉस के टेलीफोन पर मुझे 0काल करता। बॉस का प्यून हाल में आकर बताता। बॉस के केबिन में जाकर टेलीफोन पर बात करने में शुरुआत में  भय और संकोच का भाव बना रहता। एक तो बॉस के पास खडे रहकर बात करना , दूसरा नया नया टेलीफोन के उपयोग की घटना। कई बार यह होता कि बोलने वाले हिस्से को कान के पास लगा लेता।
         डायल यह शब्द टेलीफोन के नंबर घुमाने के लिए उपयोग में आता। एक चक्र पर 0        9 तक नंबर होते टेलीफोन नम्बर के हिसाब से उतने बार उन नम्बर को चक्र में घूमना पड़ता। उसके बाद पियानो टाइप के बटन आने लगे। परंतु डॉयल यह शब्द प्रयोग जारी था। बॉस के टेलीफोन पर इनकमिंग काल तो सुन सकते थे। परन्तु बाहर फोन नही कर सकते थे । टेलीफोन में ताला लगा होता था। केवल आफिस यूज के लिए ही आउट गोइंग काल कर सकते थे। कुछ लोगों ने इसका भी मार्ग निकाल लिया था। ताला लगे होने के बावजूद ट्रिन बार को पेरियाडीकली दबाने से  भी फोन लग जाता । वह तकनीक कुछ लोगों को ही आती, क्योंकि उसमें अभ्यास की जरूरत होती। इसी तकनीक से बॉस के न रहने पर लॉक होने के बावजूद टेलीफोन का आउट गोइंग उपयोग कर ही लेते।
         आज तो टेलीफोन डिपार्टमेंट के लोगो का वह महत्व नही रहा, आज के दो दशक पूर्व तक इनका बहुत महत्व हुआ करता था। उसके तीन कारण थे।पहला तो दूर संवाद का यही एकमात्र माध्यम था। दूसरे टेलीफोन का उपयोग उच्च व्ययसाई वर्ग के लोग व्यापारिक बातचीत के लिए करते थे। तीसरा उस समय शहर के बाहर फोन करना मतलब ट्रंक काल करना होता था । पहले स्थानीय एक्सचेंज में ट्रंक काल बुक करना पड़ता था। एक्सचेंज वाले  आपकी बात कब कराएंगे यह निश्चित नही था। दिन भर घर मे टेलीफोन के सामने बैठना पड़ता था। कई बार दिन भर भी काल मेच्योर नही होता था। जब काल आजाता तो उसे ट्रंक काल मैच्योर हो गया कहते। इन सब कठिनाइयों के बीच स्वाभाविक रूप से टेलीफोन में काम करने वालों का बड़ा महत्व था। विशेषकर व्यापारियों को बहुत जरूरत होती।
          इसके बाद के समय मे घर के टेलीफोन से ही ट्रंक काल करने की सुविधा आ गई। जन जन तक इस सुविधा अप्रोअचबल बनाने का काम किया स एस टी डी बूथ ने। खासकर उन मजदूरों के लिए जो बाहर कमाने जाते, उन्हें गांव में रह रहे माता पिता से हप्ते पंद्रह दिन में एक बार बात करने का अवसर मिल जाता।
          टेलीफोन के साथ इंटरनेट भी जुड़ गया, निजी टेलीफोन कंपनियों के आने के बाद टेलीफोन का कनेक्शन आसानी से मिलने लगा । इंटरनेट कनेक्शन लेने पर टेलीफोन का फ्री आफर आने लगा।
देखते ही देखते जिस टेलीफोन के कनेक्शन के लिए वर्षो इंतजार करना पड़ता, और जो अभिजात्यता की निशानी बन गया था, वह अब सर्व साधारण की उपयोगिता बन गई। 
            मोबाइल क्रांति ने तो इसे इतिहास की वस्तु बना दिया।
        
             


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