Monday, October 20, 2025

श्री हनुमत चरित्र

                                 💐 💐श्री हनुमत चरित्र💐💐
                       
    
            जब मैं  श्री हनुमंत जी के विषय में विचार करता हूं तो मेरा भी अपना एक दृष्टिकोण है। भगवान श्री राम  युग नायक है। पुरुषोत्तम है।  और युगों युगों तक आदर्श बने रहेंगे। उनकी गाथाओं को विद्वान पुरुषों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।  हनुमान जी सामान्य जन के नायक है। सामान्य व्यक्ति को भी हनुमानजी अपने से लगते हैं। उनके साथ अपना दुख दर्द बांटने में चाहे वह भक्त हो चाहे ना हो कोई भी संकोच नहीं करता। यहां तक की छोटे बच्चे भी बड़े श्रद्धा पूर्वक हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए दिखाई देंगे। चाहे कोई परीक्षा हो, कोई प्रतियोगिता हो या खेल हो सब जगह सफलता की प्राप्ति के लिए वह हनुमान जी को एक नारियल चढ़ाते हुए जरूर दिखाई देंगे। यही हनुमानजी की विशेषता है। सबको वे सहज उपलब्ध लगते हैं। दूसरी बात, श्री रामजी की हम भक्ति तो कर सकते है, पर रामत्व का अनुकरण कठिन ही नही तो लगभग असंभव है। परंतु हनुमानजी की भक्ति भी सहज है और उनके गुणों का अनुकरण भी कुछ कठिन हो सकता है पर असंभव नही।
         तुलसीदास जी हनुमान जी के गुणो का वर्णन करते हुए कहते हैं वह वे अतुलित बल धाम है, विद्यावान है, गुनी है, ज्ञान के सागर हैं और चतुर है। सामान्य व्यक्ति के लिए शारीरिक सुख यानी निरोगी काया है। प्रत्येक व्यक्ति बलवान बना रहना चाहता है, कम से कम स्वस्थ तो बना ही रहना चाहता है। विद्या यह पढ़कर, सुनकर, देख कर, या सतसंग से प्राप्त होती है, प्रत्येक व्यक्ति विद्यावान भी होना चाहता है। गुनी का अर्थ लोक व्यवहार में कुशल होने से है। विद्या का विवेक सम्मत उपयोग ही ज्ञान है। चतुर व्यक्ति उचित निर्णय लेने की क्षमता रखता है। इसमें से प्रत्येक गुण को मनुष्य चाहे तो स्वयं में विकसित कर सकता है।शायद यही कारण है कि श्री राम के नाम के पहले श्री लगना स्वाभाविक लगता है।   हनुमानजी को रामभक्त, रामदूत, पवन सूत, वीर, महावीर तो कहना स्वाभाविक लगता है। पर उनके नाम के पहले श्री लगाना यह प्रचलित भी नही है और स्वाभाविक भी नहीं लगता। इसी मूल विचार को ध्यान में रख कर मेरे जैसा सामान्य व्यक्ति भी हनुमानजी पर अपने विचार रखने का दुस्साहस कर पाया है। 
                मेरे विचारों को लिपिबद्ध करने एक और महत्वपूर्ण कारण है, कि श्री हनुमानजी के चरित्र की विशेषताओं को स्वयं में विकसित करना असंभव नही है। इन विशेषताओं को जो व्यक्ति स्वयं में विकसित कर लेगा, उसके जीवन मे सफलताएं उसके चरणों मे होंगी। श्री हनुमान जी के चरित्र का लौकिक और परा लौकिक दोनो प्रकार का महत्व है।
                                       1***** कुशल संप्रेषक****
                 महर्षि वाल्मीकि हनुमानजी को  एक और विशेषण  से संबोधित करते है। "उवाच हनुमान् वाक्यम सुग्रीवं वाक्यकोविदः  अर्थात वाक्यकोविद (बातचीत करने में कुशल ) हनुमान जी सुग्रीव से बोले।"  इस वाक्यकोविद शब्द का प्रयोग हनुमानजी के लिए क्यों किया गया यह आगे और स्पष्ट होता है।
           सुग्रीव के आदेश से हनुमानजी के किष्किंधा पर्वत पर श्री राम और लक्ष्मण जी के आने का प्रयोजन जानने हेतु दोनो से भेंट करते है। प्रारंभिक बातचीत  की समाप्ति के बाद वाल्मीकि हनुमानजी के लिए कहते है "वाक्यज्ञो वाक्यकुशलः (अर्थात, शब्दों के मर्म को समझने वाले और कुशलता पूर्वक बात करने वाले  )  हनुमानजी।" वस्तुतः हनुमानजी ने अनेक अवसरों पर कुशल संप्रेषक की भूमिका का सफलता पूर्वक निर्वहन किया है।
           श्री राम और लक्ष्मण जी के किष्किंधा पर्वत पर पहुंचने पर  भयग्रस्त सुग्रीव श्री राम और लक्ष्मण जी को बाली के भेजे हुए शत्रु समझ बैठता है। सुग्रीव बाली से पराजित होने के बाद जिस प्रकार का जीवन बिता रहा है उसका हर क्षण भयभीत रहना स्वाभाविक है। सुग्रीव श्रीराम और लक्ष्मण के विषय में जानना भी चाहते हैं, पर यह भी चाहते हैं कि सुग्रीव के हृदय का संशय श्री राम को ज्ञात भी ना हो और  श्री राम से शत्रुता भी ना हो।  यह कार्य करने के लिए सुग्रीव अपने मंत्री श्री हनुमान जी का चयन करते हैं। सुग्रीव बाली से इतने भयभीत है की वे हनुमान जी से कहते हैं तुमको अगर जरा भी शक हुआ तो मुझे इशारा भर कर देना "पठये बाली होइ मन मैला भागो तुरत तजियों यह शैला।" ( मैं तुरंत यह पर्वत छोड़कर चला जाऊंगा") हनुमान जी श्री राम और लक्ष्मण जी से पंपा सरोवर के पास मिलते हैं, वह भी ब्राह्मण के वेश में। सुग्रीव संशय ग्रस्त होकर पूर्वाग्रह के साथ श्री राम के विषय में विचार करता है, वहीं हनुमान जी  बिना किसी पूर्वाग्रह के बिना किसी संदेह के श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी से मिलते हैं। हनुमान जी जानते हैं की पूर्वाग्रह रखकर किसी व्यक्ति के विषय में विचार करने से सही निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता। पहले दृष्टि में ही हनुमान जी समझ लेते हैं कि जिस प्रकार का इन दोनों का व्यक्तित्व है वह कभी भी बाली के या किसी भी अन्य के आदेश पर यहां नहीं आ सकते। इनका अपना स्वतंत्र तथा गरिमामय व्यक्तित्व है।                            इसलिए बातचीत के शुरुआत में ही हनुमान जी श्री रामचंद्र जी एवं लक्ष्मण जी को प्रणाम करते हैं। दोनों भाइयों की प्रशंसा में कहते हैं आप दोनों पराक्रमी राजश्री और देवताओं के समान प्रभावशाली, यशस्वी तपस्वी और कठोर व्रत का पालन करने वाले हो।  शत्रुओं को नष्ट करने की शक्ति आप दोनों में है। आप मे देवताओ के योग्य राज भोगने की शक्ति है। कहीं आप लोग देव लोक से तो नही आये? इस प्रकार प्रारंभिक भेंट में ही श्री राम और लक्ष्मण जी की बड़ी कुशलता के साथ वस्तुनिष्ठ प्रशंसा करते हुए उनके किष्किंधा पर्वत पर आने का कारण पूछते हैं। श्री राम चन्द्रजी लक्ष्मणजी से कहते हैं लक्ष्मण तुम "बात के मर्म को समझने वाले"  हनुमान जी से बात करो। परंतु श्री रामचंद्र जी यहीं नहीं रुकते, लक्ष्मण को सावधान करने के उद्देश्य से आगे हनुमान जी के वाक्चातुर्य की विशेषता का वर्णन करते हुए अपरोक्ष रूप से लक्ष्मण को वार्तालाप कौशल्य की सिख  देते हैं। श्री रामचंद्र जी लक्ष्मण जी के सामने हनुमान जी के वाक्चातुर्य का इस प्रकार विश्लेषण करते हैं --
   वे लक्ष्मण से कहते हैं, लक्ष्मण
  1 जो वेद का ज्ञाता है वही इतनी सुंदर भाषा में वार्तालाप कर सकता है।
  2  निश्चय ही इन्होंने व्याकरण का कई बार अध्ययन किया है इसलिए उनके मुंह से कोई अशुद्धि नहीं निकली है।
  3  संभाषण के समय इनके मुख, नेत्र, ललाट ,भौंह या किसी भी अंग से कोई दोष प्रकट नहीं हुआ है।
  4  हनुमान ने थोड़े शब्दों में परंतु स्पष्टता के साथ अपना अभिप्राय प्रतुत किया है।
  5  बातचीत में कहीं पर भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया है जो कर्ण कटु हो!
  6  हृदय के भाव को  मध्य स्वर में  व्यक्त किया है, उनका स्वर ना तो बहुत तीव्र था ना ही बहुत धीमा।
   7  इनकी भाषा संस्कार संपन्न है, उच्चारण शास्त्रशुद्ध  है, और बिना रुके बात रखने की क्षमता है।
   8  बातचीत करते समय  हृदय, कंठ  और तालु का ऐसा समन्वय था की बातचीत को सुनकर मन प्रसन्न हो जावे। वध करने के लिए तैयार शत्रु का हृदय भी ऐसी वाणी से बदल सकता है।
           आगे श्री राम कहते हैं कि जिसके पास वार्तालाप  का ऐसा कौशल  हो उसके मनोरथ तो केवल बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं।
            श्री रामचंद्र जी ने ऊपर श्री हनुमान जी के वार्तालाप कौशल की जो विशेषताएं बताई हैं वह वास्तव में वार्तालाप कौशल का संक्षिप्त में किंतु संपूर्ण दर्शन है।
          लक्षण जी अपना परिचय देते हुए हनुमान जी से कहते हैं की हम दशरथ पुत्र है। वनवास से लेकर माता सीता के अपहरण तक की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए लक्ष्मण जी बताते हैं कि सबको शरण देने वाले शरणागत  वत्सल श्री राम किस प्रकार सुग्रीव के शरण में आए हैं । आगे लक्ष्मण जी निवेदन करते हैं की  राजा सुग्रीव ने उन पर कृपा करनी चाहिए।
         हनुमान जी किसी प्रकार श्री राम और लक्ष्मण को कम नहीं आंकते हैं और न ही दिखाना चाहते। क्योंकि यदि मैत्री होना है तो बराबरी के स्तर पर ही होगी। इसीलिए श्री हनुमान जी कहते हैं वीर राजकुमारों महाराज सुग्रीव को भी आप जैसे बुद्धिमान और क्रोध विजयी जितेंद्र पुरुषों के मैत्री की आवश्यकता थी।  राजा सुग्रीव स्वयं राज्य से भ्रष्ट है।  उनकी स्त्री का भी बाली ने अपहरण कर लिया है। (जैसा श्री रामजी के साथ हुआ।) इसलिए सुग्रीव बाली से अत्यंत भयभीत होकर यहां एकांतवास कर रहे हैं। सुग्रीव स्वयं माता सीता का पता लगाने में आपके साथ रहेंगे। श्री हनुमान जी की विवेक युक्त बात सुनकर लक्ष्मण समझ गए की जितनी आवश्यकता श्री राम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव की है उतनी आवश्यकता सुग्रीव को राम और लक्ष्मण की है।  यह सब कहते हुए श्री हनुमान जी की जैसी प्रभावशाली शारीरिक भाषा थी, उसको पहचान कर लक्षमण श्री राम जी से कहते हैं, भैया  पवनसुत हनुमान जी झूठ नहीं बोल रहे हैं। वार्ता करते हुए स्वयं को विश्वसनीय सिद्ध करवा लेने की अद्भुत क्षमता हनुमानजी में है।
              2*****दूसरे के सन्मान का प्रबंधन शिष्टाचार पूर्ण व्यावहार*******
       श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी ना केवल अयोध्या के महाराज दशरथ के पुत्र हैं। वनवास के बाद वे राजगद्दी पर विराजे जाएंगे, यह भी निश्चित है। हनुमानजी यह भी जानते हैं की श्री रामचंद्र जी अलौकिक पुरुष हैं। इधर सुग्रीव राजा है और हनुमान जी उनके मंत्री हैं। निष्काषित राजा होने के बावजुद भी सूग्रीव की अपनी सेना है। अपना सामर्थ्य है , बल है। हनुमान जी के मन में बड़ा सवाल है की सुग्रीव को श्री रामचंद्र जी से मिलने के लिए यहां लाया जाए या रामचंद्र जी को लेकर सुग्रीव के पास जाया जाए। लौकिक मर्यादा में सुग्रीव राजा है और रामचंद्र जी सुग्रीव से मित्रता करने के लिए ही आए हैं। अतः श्री राम का सुग्रीव के पास जाना उचित जान पड़ता है। परंतु श्री रामचंद्र जी, जैसा कि पहले कहा गया है, अयोध्या के होने वाले राजा हैं और अलौकिक पुरुष भी। श्री हनुमान जी इस समस्या से बाहर आने के लिए अनोखा मार्ग  निकालते हैं। वह श्री राम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव के पास तो लेकर जाते हैं, परंतु अपने कंधों पर लेकर जाते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता।  इस प्रकार सूझबूझ के साथ श्री रामचंद्र जी और सुग्रीव दोनो की मर्यादा और सम्मान को को बनाए रखते हैं। 
         हनुमान जी किस प्रकार व्यक्ति को पहचान कर  उनके स्वभाव के अनुसार व्यवहार करते हैं। इस विषय में श्री वाल्मीकि जी का लिखा यह प्रसंग महत्वपूर्ण है। सुग्रीव के पास पहुंचने पर हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के बैठने लिए तो साल के पत्तों का आसान बना कर देते हैं, परंतु लक्ष्मण जी जो शेषनाग के अवतार हैं, के लिए चंदन के पत्तों का आसन बनाकर देते हैं। चंदन भुजंगों को प्रिय है।
               कुल मिलाकर सुग्रीव और श्री रामचंद्र के मित्रता करने के लिए हनुमानजी सभी उपायों का प्रयोग करते हैं।  और कहीं पर भी लक्ष्मण जी को भी उपेक्षित नहीं रखते। इस प्रकार अंत मे आपस मे मित्रता करा दने में सफल हो जाते हैं। 
                 3 **** मर्यादायुक्त किन्तु स्पष्ट बातचीत की कला में  दक्ष***
        इधर श्री रामचंद्र जी बाली का वध कर सुग्रीव को राज्य सौंप कर अपना वादा पूरा कर देते हैं। सुग्रीव का राज्याभिषेक भी हो जाता है। उस समय वर्षा ऋतु होने के कारण माता सीता के खोज का अभियान प्रारंभ करना ठीक नहीं था। सुग्रीव श्रीराम को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि जैसे ही वर्षा ऋतु समाप्त हो जाएगी और शरद ऋतु प्रारंभ हो जाएगी वे सारे वानर यूथपतियों को माता सीता की खोज में लगा देंगे। राज्य मिलते ही सुग्रीव का कुछ समय तो राज्य को व्यवस्थित करने में लगा। परंतु उससे अधिक समय सुरा सुंदरियों के उपभोग में बीत रहा था। 
          अब  शरद ऋतु प्रारंभ होने को थी, परंतु माता सीता के खोज के अभियान के लिए सुग्रीव के द्वारा कोई पहल नहीं दिखाई दे रही थी। हनुमान जी की श्री सुग्रीव और श्री रामचंद्र जी के बीच मैत्री कराने के लिए बड़ी भूमिका थी। इसीलिए सुग्रीव अपने वचन का पालन करें इसकी चिंता भी हनुमान जी को ही अधिक थी। सुग्रीव राजा थे और हनुमानजी उनके मंत्री थे। हनुमानजी और सुग्रीव के बीच राजा और मंत्री का सम्बंध होने के कारण हनुमान जी को उस मर्यादा का भी विचार करना पड़ता था। साथ ही सुग्रीव के द्वारा राम को दिया गया वचन भी पूरा करवाना था।
         हनुमान जी उचित समय देखकर सुग्रीव से मिलते हैं। महर्षि वाल्मीकि हनुमान जी की इस इस समय की बातचीत की प्रवीणता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अपने युक्ति युक्त किंतु मनोरम वचनों के द्वारा हनुमानजी सुग्रीव को प्रसन्न कर सुग्रीव से सत्य, अर्थ, नीति से युक्त और सुदृढ़ निश्चय के साथ प्रेम भरे वचन कहते हैं।
          हनुमान कहते हैं महाराज सुग्रीव आपने कुल परंपरा से आई हुई लक्ष्मी का संवर्धन किया है। राज्य का काम भी व्यवस्थित कर लिया है। किंतु अभी मित्रों का कार्य शेष रह गया है, उसे पूर्ण करना चाहिए। राजन, आप सदाचार से संपन्न और धर्म के मार्ग पर स्थित है। आपने मित्र के कार्य को सफल बनाने के लिए जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचित रूप से पूर्ण कीजिए। 
         पहले तो सुग्रीव को बड़ी बुद्धिमानी के साथ बड़ा बताने की कोशिश करते हैं, पर आगे कहते हैं, राजन, परम बुद्धिमान श्री राम को स्वाभाविक रूप से कार्य की सिद्धि के लिए जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन होने के कारण संकोचवश कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आगे हनुमान जी अपने ढंग से राम के उपकार का उल्लेख करते हुए कहते हैं, आप तो उनका भी कार्य करते हैं जिन्होंने आप पर कोई उपकार नहीं किया है, फिर रामचंद्र जी ने तो बाली को मार कर आप पर बड़ा उपकार किया हुआ है। 
       इतना कह कर आगे हनुमान जी श्री राम की शक्ति का  वर्णन कर अपरोक्ष रूप से सुग्रीव को सावधान भी कर देते हैं। वे कहते हैं इसमें कोई संदेह नहीं की दशरथ कुमार भगवान श्री राम अपने बाणों से समस्त देवताओं, असुरों और बड़े-बड़े नागों को भी अपने वश में कर सकते हैं, ( तुम्हारी क्या बिसात है)तो भी वे आपके द्वारा की गई प्रतिज्ञा को पूर्ण करने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। 
      देवता, दानव, गंधर्व, असुर, मरुदगन और यक्ष भी श्री राम को हानि नहीं पहुंचा सकते। फिर राक्षसों की बिसात ही क्या है। सुग्रीव ने इसके बाद वानर यूथपतियों को किष्किंधा में सेना सहित आने का आदेश दिया।
                           4  ****दूसरों के क्रोध का प्रबंधन****
        इधर मंत्री हनुमान जी राजा सुग्रीव को उनका मित्र धर्म का स्मरण कराते हैं। उधर श्री रामचंद्र जी सुग्रीव के द्वारा किए जाने वाले विलंब को देखकर लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं की सुग्रीव की राजधानी में जाकर सुग्रीव को भय  दिखा कर उसको मेरे साथ की हुई प्रतिज्ञा की याद दिलाना। लक्ष्मण जी अपने भाई श्रीरामजी की सीताजी के विरह से उत्पन्न व्याकुलता के कारण वैसे ही व्यथित हैं। राम की आज्ञा होने पर क्रोध से भरे हुए वे किष्किंधा में सुग्रीव के  महल तक जाते है। अपने धनुष को उठाकर सुग्रीव को ललकारते हैं। उनका क्रोध देखकर और अपनी गलती को महसूस कर सुग्रीव भय से कांपने लगते हैं। हनुमान जी से सलाह कर श्री लक्ष्मण जी के क्रोध को कम करने के लिए पहले अंगद को भेजते हैं। अंगद यह बाली का पुत्र है और स्मरण रहे बाली ने मरते समय अंगद को श्री रामचंद्र जी को सौंप दिया था। इसलिए श्री राम और लक्ष्मण जी के मन में अंगद के प्रति स्नेह भी है और दया का भाव भी।  इसी पृष्ठभूमि के कारण हनुमान जी पहले अंगद को लक्ष्मण जी के पास भेजने की सलाह देते हैं। लक्ष्मण जी के सामने अंगद बड़े भयपूर्ण भाव से हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।  अंगद को देखते ही लक्ष्मण जी ने एक हाथ उठाकर उसे अभय दान दे दिया। अंगद ने विनय पूर्वक श्री लक्ष्मण जी से क्रोध शांत करने हेतु प्रार्थना की। श्री लक्ष्मण जी का क्रोध थोड़ा शांत हुआ।  उसके बाद बाली की पत्नी तारा को लक्ष्मण जी के पास भेजा । तारा के प्रति भी श्री राम और लक्ष्मण के मन में दया का भाव है, दूसरे महिला होने के कारण लक्ष्मण जी को महिला के साथ कि बात की मर्यादा का पालन भी करना है। तारा ने नाना प्रकार के मधुर वचनों से श्री लक्ष्मण जी को शांत किया।  अंगद और तारा के मिलने के बाद लक्ष्मण जी का क्रोध बहुत हद तक शांत हो गया था।
                यदि किसी व्यक्ति को प्रसन्न करना है तो उसके प्रिय व्यक्ति का गुण गान करो । लक्ष्मणजी के लिए श्रीरामजी से प्रिय कौन हो सकते है? अतएव हनुमानजी लक्षमण  से  मिलते हैं तो प्रभु श्री राम का यशोगान करते है। हनुमानजी लक्ष्मणजी को लेकर सुग्रीव के महल में जाते है। हनुमानजी सीधे सुग्रीव के शयन कक्ष में लक्ष्मण जी  को लेकर जाते है।  वनवासी, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लक्षण जी को सीधे शयन कक्ष मे लेकर जाने का क्या औचित्य था? लक्ष्मणजी तो शेषनाग के अवतार हैं। किसी के पलंग पर साधारण सांप भी दिख जाए तो आदमी काम और अय्याशी भूल जाएगा! पहले अपने प्राणों की चिंता करेगा। सुग्रीव जो अय्याशी में डूबा होने के कारण अपने कर्तव्य को भूल गया, उसके लिए इससे अच्छी सिख क्या होसकती है।
          उसके बाद सुग्रीव ने जाकर श्री लक्ष्मण जी से क्षमा मांगी और अपने द्वारा किए गए प्रयासों के विषय में सूचना दी। लक्ष्मण जी सुग्रीव को क्षमा करते हुए उसे साथ लेकर श्री रामचंद्र जी के पास गए। इस प्रकार श्री हनुमान जी ने श्री लक्ष्मण जी के क्रोधका प्रबंधन उचित व्यक्तियों को उचित समय पर भेज कर किया। 
        किसी भी व्यक्ति के क्रोध के प्रबंधन का सबसे अच्छा तरीका यही होता है।
                            5    ****टीम भावना ****
        अब सुग्रीव सीता माता की खोज की योजना में लग जाते है। सभी वानर युथो को किष्किंधा आने का आदेश देते हैं। अलग अलग वानर युथो को अलग अलग दिशा में माता सीता की खोज के लिए भेजते है। संभावना यही अधिक थी कि माता सीता को लंकापति रावण ही अपहरण कर ले गया होगा। इसीलिये दक्षिण की ओर बालिपुत्र वीर अंगद के नेतृत्व में एक दल भेजा जाता है। इस दल में रीछपति जामवंत और महावीर हनुमानजी भी हैं। 
                वानरों का यह खोजी समूह अंगद के नेतृत्व में दक्षिण की ओर जाता है। आगे चलकर  दक्षिण के सघन और निर्जन  वनों से निकलता हुआ यह दल भूख प्यास से त्रस्त  हो जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब असफलता के कारण सामूहिक आत्महत्या करने की ईच्छा भी  उनके मन में आ जाती है। इस समय संपाती नमक गिद्ध उनकी सहायता करता है। और उन्हें सीता माता का पता बताते हुए कहता है कि माता सीता को रावण अपहरण कर अपने राज्य लंका में ले गाया है।   परंतु उस स्थान  अर्थात लंका पहुंचने के लिए 100 योजन के सागर को पार करना पड़ेगा।  जो एक असंभव सा कार्य था।
                अंगद सभी वानर यूथपतियों से पूछता है की कौन इस इस समुद्र को पार कर सकता है? वानर वीरों ने अलग अलग जवाब दिया। वानर वीर गज ने कहा 10  योजन तक तक छलांग लगा सकता है। वीर शरभ कहते हैं मैं 30 योजन तक छलांग लगा सकता हूं।  वीर ऋषभ ने कहा वह 40 योजन तक छलांग लगा सकता है। तेजस्वी गंधमादन 50 योजन तक छलांग लगाने की बात कहते हैं। वानर वीर मयंद 60 योजन तक,  तो महा तेजस्वी द्विविद ने 70 योजन दूरी तक छलांग लगाने की अपनी शक्ति बताई।  स्वयं दलपति अंगद कहते हैं कि मैं समुद्र तो पार कर लूंगा, परंतु वापसी के विषय में कुछ सुनिश्चित नहीं कह सकता। 
           इस इस पूरी बातचीत में हनुमान जी मौन रहते हैं ।  साधारणतया  यह देखा जाता है की जिनके पास थोड़ी भी ताकत रहती है, वे अपनी ताकत का वर्णन कर लेना चाहते है, परंतु जो वास्तव में शक्तिशाली है और योग्य है वह अपनी ताकत का वर्णन स्वयं नहीं करता, वह प्रतीक्षा करता है की कोई अन्य उसकी शक्ति का आंकलन करें तो ही वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेगा। एक तो यह निराभिमानी शक्तिशाली की पहिचान है। दूसरे टीम के अन्य सदस्यों को भी अपनी शक्ति के विषय मे अपनी बात रखने काअवसर देने का हेतु इस व्यवहार के पीछे है।
            हनुमान जी अन्य वानर वीरों की तरह अपनी शक्ति का वर्णन नहीं करते, वरन मौन रहते हैं। सबसे वरिष्ठ रीछपति  जामवंत  हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण दिलाते हैं--
 "कहहि रिछपति सुनु हनुमाना , का चुप साधि रहेउ बलवाना।
पवन तनय बल पवन समाना, बुद्धि विवेक बिग्यान निधाना।।"
( हनुमान सुनो बलवान होकर भी तुमने यह चुप्पी क्यों साथ रखी है। तुम पवन पुत्र हो और पवन के समान  ही बलवान भी।  बुद्धि, विवेक और विज्ञान के तुम निधान हो।)
             यह सुनकर हनुमानजी समुद्र लांघने  के लिए उद्यत हो जाते हैं। स्वयं को पर्वताकार कर लेते हैं।
         सामान्यतया अपनी शक्ति को बातों के द्वारा प्रदर्शित न करने वाले हनुमान जी समय की नजाकत को पहचानते हैं। ऐसे सामूहिक अवसाद के समय अपनी टीम में उत्साह का संचार करना आवश्यक हो जाता है । हनुमान जी  वानरों के बीच से उठकर खड़े हो गए। संपूर्ण शरीर रोमांचित हो उठा। हनुमान जी ने बड़े बूढ़े वानरों को प्रणाम करते हुए अपनी टीम में उत्साह का संचार करते हुए कहा, मैं शीघ्र वेग से चलने वाले शीघ्रगामी महात्मा वायु का औरस पुत्र हूं और छलांग लगाने में उन्हीं के समान हूं। महाराज गरुड़ में, मुझ में या वायु देवता में ही समुद्र को लांघ कर जाने की शक्ति है। इसके अलावा और इस कार्य को कोई नहीं कर सकता।
     वज्रधारी इंद्र अथवा स्वयंभू ब्रह्मा जी के हाथ से भी मैं बलपूर्वक अमृत छीन कर ला सकता हूं। 
            श्री हनुमान जी जब यह गर्जना कर रहे थे तब संपूर्ण वानर यूथ अत्यंत हर्ष से भरकर आश्चर्य से उनकी ओर देख रहे थे। इन बातों को सुनकर वानर रीछपति  जामवंत को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे बोले वीर केसरी पुत्र तुमने अपने बंधुओं का महान शोक नष्ट कर दिया है। यही परिणाम हनुमान चाहते भी थे। हनुमानजी अपनी प्रशंसा में उक्त बातें नही कहते, वरण हारी हुई मानसिकता वाली अपनी टीम में उत्साह के जागरण के लिए अपनी शक्ति का परिचय देते है। आगे टीम भावना का परिचय देते हुए हनुमान जी वरिष्ठ योद्धा जामवंत से पूछते है, अब मुझे क्या करना है, आप ही बताओ। जामवंत कहते हैं कि तुम केवल माता सीता का पता लगा कर आओ। आगे की लीला तो स्वयं श्रीराम करेंगे। ****
            जामवंत की बात को विनम्रता पूर्वक स्वीकार करते हुए अभियान पर जाने के पूर्व अपने सभी साथियों से कहते हैं, मैं शीघ्र वापस आऊंगा तब तक आप लोग यहां मूल फल खाकर मेरी प्रतीक्षा करना। इसके बाद टीम के सारे सदस्यों को सर झुकाकर प्रणाम करते हैं। मानो वे उनकी शुभकामनाएं और आशीर्वाद लेकर जा रहे हैं।  इस प्रकार हनुमान सारे सदस्यों को मन से अपने अभियान के साथ जोड़ लेते हैं। यह भी सामूहिक रूप से सबको अपने अभियान से मानसिक रूप से जोड़े रखने की एक कला है। यह तो हुई बल और विनम्रता के संयोजन की बात और इसके आगे श्री हनुमान जी अपने अभियान पर निकलने के पहले श्री रामचंद्र जी को अपने हृदय में धारण करते हैं  "चले हरषि हियँ धरी रघुनाथा"। जब लक्ष्य की प्राप्ति में निकले व्यक्ति में बुद्धि, बल, विनम्रता के साथ भक्ति का भाव होतो लक्ष्य प्राप्ति में सफलता निश्चित है। और भक्ति का भाव अहंकार को समाप्त कर देता है।
                  हनुमान जी महेंद्र गिरी पर्वत पर चढ़ जाते हैं। ईश्वर को, अपने पिता पवन देव को और माता अंजना माई को प्रणाम करते हैं।  हनुमान जी को शंका रहती  है कि अभी भी वानर युथ मेरे इस अभियान की सफलता पर पूर्ण विश्वास कर रहे हैं या नहीं, इसलिए वे वानर युथों को संबोधित करते हुए और उनमे विश्वास का भाव जागृत करते हुए कहते हैं, मैं किसी प्रकार से सीता माता का पता लगाऊंगा। वह लंका में होगी तो लंका से ले आऊंगा, स्वर्ग में होगी तो मैं वहां से खोज कर लाऊंगा। परंतु सीता माता का पता लगा कर ही आऊंगा। यदि इसके बाद भी जानकी माता का पता न लगा पाऊं तो लंका को उखाड़कर रावण सहित यहां ले आऊंगा। आप सब लोग निश्चिंत रहें। ऐसा कह कर टीम के सदस्यों के मन मे अभियान की सफलता में थोड़ा बहुत संशय बचा होगा तो उसे भी दूर कर देते हैं। 
                                  6****पहला अवरोध मैनाक पर्वत****
            समुद्र पार कर लंका में प्रवेश करते तक हनुमान जी को चार प्रकार के  अवरोधों का सामना करना पड़ा। चारों ही अवरोधों की प्रकृति और प्रकार अलग-अलग थे। स्वाभाविक रूप से इन अवरोधों को हटाने में हनुमान जी को अलग-अलग प्रकार के उपाय करने पड़े।
               प्रथम अवरोध मैनाक पर्वत के रूप में आता है। यह मित्रता पूर्ण और सुविधापूर्ण अवरोध है। मनुष्य के जीवन में भी लक्ष्य की प्राप्ति में इस प्रकार के अवरोध कभी सुख के रूप में कभी सुविधा के रूप में और कभी आलस्य के रूप में आते रहते हैं। समुद्र के ऊपर श्री राम के पूर्वजों का बड़ा ऋण रहा है। श्री राम के पूर्वज महाराज सगर के कारण सागर का अस्तित्व है। इसीलिए सागर यह विचार करता है कि हनुमान जी श्री रामचंद्र के दूत है, मुझे उनके पूर्वजों का ऋण चुकाने का यही अवसर प्राप्त  हुआ है। मैं श्री हनुमान जी को कुछ देर तक यहां विश्राम करने के लिए व्यवस्था  कर दूं। वे मैनाक पर्वत से निवेदन करते हैं की तुम हनुमान जी को विश्राम के लिए आमंत्रित करो। मैनाक पर्वत समुद्र की इच्छा को पूरा करने हेतु श्री हनुमान जी को अत्यंत आदर पूर्वक विश्राम करने हेतु आमंत्रित करता है। मैनाक पर्वत हनुमान जी से निवेदन करता है की आप वानरों में श्रेष्ठ हैं, फिर श्री राम जी के दूत हैं। सागर के ऊपर श्री राम के पूर्वजों का बड़ा उपकार रहा है और मेरे ऊपर भी आपके पिता महात्मा पवन देव का बड़ा उपकार है। जब इंद्र ने सारे पर्वतों के पंखों को काट दिया था, तब महात्मा पवन ने मुझे धक्का देकर खारे समुद्र में डुबो दिया।  जिससे मेरे पंख आज भी सुरक्षित हैं।  मेरा आपसे निवेदन है की मेरा आतिथ्य स्वीकार कर मुझे भी अनुग्रहित करें।  श्री हनुमान जी ने मैनाक पर्वत से कहा पर्वत राज आपके आतिथ्य से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं।  परंतु मेरा कार्य शीघ्रता का है और मैंने वानरों को वचन दिया है कि बिना कहीं रुके सीता जी का पता लगा कर आऊंगा। श्री गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में हनुमान जी कहते हैं "रामकाज कीन्हे बीनू मोहे कहां विश्राम।" इस प्रकार कहकर श्री हनुमान जी मैनाक पर्वत को प्रेम और आदर के साथ छूकर और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ऐसा करके उन्होंने अवरोध के रूप में आए हुए मित्रवत मैनाक पर्वत को पूरे सम्मान के साथ विश्राम से मना कर अपने लक्ष्य प्राप्ति में अवरोध नहीं बनने दिया, साथ ही मैनाक पर्वत को दसादर छूकर और प्रणाम कर आभार भी व्यक्त करने से भी नहीं चूकते।
                     7  *****दूसरा अवरोध, नागों की माता सुरसा****
             लक्ष्य की प्राप्ति में हनुमान जी के मार्ग में दूसरा अवरोध सुरसा के रूप में प्रस्तुत होता है। सुरसा नाग माता है। देवताओं ने जब हनुमान जी को समुद्र पार करते देखा तो उनके मन में विचार आया कि जिस कठिन काम के लिए हनुमान जी जा रहे हैं। वे उस काम के योग्य है या नहीं इसकी परीक्षा तो ले ली जाए।  देवताओं ने नागमाता सुरसा से कहा कि तुम राक्षसी का रूप लेकर हनुमान जी के वायु मार्ग में जाकर उनको खाने की की कोशिश करो। यदि तुम सफल हो गई तो हनुमान जी वापस चले जाएंगे। यदि हनुमान जी ने तुम्हारे मुंह में जाकर भी निकलने में सफलता प्राप्त कर ली तो हनुमान जी अपने कार्य की सिद्धि के लिए योग्य हैं और वह आगे बढ़ जाएंगे। हनुमान जी वायु मार्ग से जा रहे थे तभी सुरसा ने उनको ललकार कर कहा कि देवताओं ने मुझे तुम्हें अपने मुंह में प्रवेश कराने के लिए भेजा है। इसीलिए तुम मेरे मुख में स्वयं हो कर समा जाओ। अन्यथा मुझे बल प्रयोग करना पड़ेगा। हनुमान जी ने पहले तो निवेदन किया की मैं श्री राम जी की भार्या माता सीता को खोजने के लिए निकला हूं, यह बहुत ही महत्वपूर्ण काम है। इस पुण्य कार्य में तो आपको सहयोग करना चाहिए, यदि सहयोग न भी करना चाहो तो मैं श्री रामचंद्र जी का कार्य पूरा करने के बाद वापस आऊंगा तब मुझे अपना भक्ष्य बना लेना। परंतु सुरसा नहीं मानी उसने अपना मुंह बड़ा किया। हनुमान जी ने भी अपना शरीर उतना ही विशाल कर लिया।  सुरसा लगातार अपना मुंह बड़ा करते जा रही थी और हनुमान जी भी अपना शरीर बड़ा करते जा रहे थे। जब सुरसा ने अपना मुख सौ योजन  तक बढ़ा लिया तो बुद्धिमान हनुमान ने लघु रूप धारण कर लिया और सुरसा के मुंह में घुसकर धीरे से बाहर आ गए। अपने सामान्य रूप में आकर उन्होंने सुरसा से कहा की माता अब प्रतिज्ञा पूरी हो गई। मैं तुम्हारे मुंह में प्रवेश करके बाहर भी आ गया। सुरसा के पेट से बाहर निकलकर हनुमानजी सिर नवाकर बिदा मांगते है इस पर सुरसा कहती है
 "मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा ,बुधि बल मरमु तोर मैं पावा " । आगे सुरसा से रामकाज में सफल होने का आशीर्वाद लेकर हनुमानजी अपने अभियान में आगे बढ़ते है।
         यदि हनुमान जी चाहते तो सिंहनी राक्षसी की तरह सुरसा को भी मार सकते थे। परंतु एक परीक्षक के साथ भद्रता पूर्ण व्यवहार करना और परीक्षा में  उत्तीर्ण होकर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना, इस बात को हनुमान जी ने ध्यान में रखकर सुरसा को मारने की कोशिश नहीं की। वरन सुरसा की परीक्षा में  खरे उतरे।  बल का कहां और कितना उपयोग करना चाहिए , इसके लिए बल के धाम हनुमान जी हमेशा अपने विवेक का युक्तियुक्त उपयोग करते हैं। दूसरी परीक्षक के सामने उससे बड़ा बनना मर्यादा के विरुद्ध है। इसीलिए कुछ देर तो हनुमान जी के सुरसा के मुंह से बड़ा बनने की कोशिश करते है। परंतु उसके बाद तुरंत लघु रूप धारण कर लेते हैं। एक परीक्षार्थी के लिए आवश्यक है कि वह परीक्षक से छोटा बना रहे ।परंतु यह बात भी वही लागू होती है जहां परीक्षक सद्भाव पूर्वक परीक्षा लेता है। हमारे जीवन में भी अनेक परीक्षाएं और परीक्षक अनेक रूपों में आते हैं। चाहे वह माता-पिता हो, चाहे वह गुरु जन, चाहे व्यवसाय में साथ काम करने वाले लोग हो, चाहे हमारा बॉस हो ये सब जब परीक्षा लेते हैं तो हमें कई बार गलतफहमी हो जाती है की या तो मुझे नीचा दिखाया जा रहा है, या असंतुष्टि का भाव प्रकट हो रहा है। ऐसे समय में विवेक बुद्धि के साथ निर्णय लेकर अपने वरिष्ठों के द्वारा ली जा रही परीक्षा के लिए लघु रूप धारण करके अर्थात छोटा बन कर सफलता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। 
                   8     ****तीसरा अवरोध सिहिंका के रूप में ****
          लक्ष्य प्राप्ति में तीसरा अवरोध सिंहिका राक्षसी के रूप में आता है। सिहिंका कश्यप ऋषि की पत्नी दिति की पुत्री थी। कश्यप ऋषि के दो पत्नियां थी। एक से असुर पैदा हुए और दूसरी से सुर पैदा हुए । ऋषि के यहां पैदा होने के बावजूद भी सिहंका राक्षसी थी। उसकी विशेषता थी कि वह सीधा अपने शिकार पर हमला नहीं करती थी। उसकी छाया को पकड़ लेती थी और छाया को पकड़ लेने के मात्र से शिकार पकड़ में आ जाता था। सागर को पार करते हुए हनुमान जी की गति अचानक कम होने लगी, उन्होंने आसपास देखा, पर उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया, जो उन्हें खींच रहा हो। हनुमान जी ताड गए की यह ऐसी शक्ति है जो परोक्ष रूप से आक्रमण कर रही है। और मेरे अभियान में बाधा उत्पन्न कर रही है। हनुमान जी ने ध्यान लगा कर सिंहिंका को पहचान लिया और उसके ऊपर आक्रमण कर उसके प्राण हर लिए। 
      जो परोक्ष रूप से आक्रमण करे उसे कपट कहा जाता है। कपट करने की प्रेरणा ईर्ष्या से प्राप्त होती है। ईर्ष्या का भाव हमारे लक्ष्य प्राप्ति में बड़ी बाधा होता है। यह सच है हमारे अंदर की ईर्ष्या का भाव हमारे लक्ष्य की प्राप्ति में बड़ी बाधा है परंतु हमारे अंदर ईर्ष्या का भाव है यह हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते। ईर्ष्या के प्रतिफल के रूप में हम कपट भी कर लेते हैं, परंतु उसको भी हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते। अपने अंदर के ईर्ष्या भाव को वही जान सकता है और जानने के बाद नष्ट भी कर सकता है, जो श्री हनुमान जी की तरह सम भाव के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है।
                श्री हनुमान जी इस प्रकार तीन अवरोधों  को पार कर लंका की भूमि पर पहुंच जाते हैं। अब तक तो उन्होंने विशाल रूप धारण कर समुद्र पार किया था। 
                             9 ****चौथा अवरोध लंकिनी****

                हनुमान जी लंका में पहुंचकर देखते हैं कि अनेक प्रकार के वृक्ष फलों से लदे हुए हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह वर्णन इसलिए किया की वानर को यदि फलदार वृक्ष दिख जाए तो सबसे पहले वह फल खाने का काम करता है फिर आगे दूसरा कोई और कार्य करता है। परंतु हनुमान जी उस समय फल नहीं खाते।  हनुमान जी लंका का अवलोकन करने हेतु एक ऊंचे पर्वत पर  कूद कर चढ़ जाते हैं। वहां से लंका का निरीक्षण करते हैं। वे देखते हैं बड़े-बड़े भवन लंका में है। हजारों की संख्या में सैनिक चारों ओर से लंका की सुरक्षा में लगे हुए हैं लंका के चारों और सुंदर परकोटा बना हुआ है, जिसमें सैनिक पहरा दे रहे हैं। उनकी आंखे चुरा कर परकोटे में प्रवेश करना बहुत कठिन है। अब  वे निश्चय करते हैं कि सूक्ष्म रूप धारण करके ही लंका में प्रवेश किया जा सकता है। वे लघु रूप धारण कर परकोटे में प्रवेश करते हैं।
            लंका की सुरक्षा का भार लंकिनी नामक एक राक्षसी के ऊपर रहता है। लंकिनी के आंख से बचकर कोई भी परकोटे में प्रवेश नहीं कर सकता था। लंकिनी का भी एक इतिहास है। रावण ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से लंका को मांगा तो ब्रह्मा जी ने रावण को लंका दे दी। अब रावण ने लंका की सुरक्षा के लिए लंकिनी को भी मांग लिया।  लंकिनी के ऊपर ब्रह्मलोक के सुरक्षा का भार था। परंतु श्राप के कारण उसे पृथ्वी पर आना ही था।  ब्रह्मा जी ने रावण को लंकिनी को ले जाने की अनुमति दे दी।  लंकिनी ने ब्रह्मा जी से पूछा की भगवान इस श्राप से मुझे मुक्ति कब मिलेगी, तो ब्रह्मा जी ने कहा की जब कभी तुम्हारा किसी ऐसे बलवान वानर से मुकाबला होगा जिसके मुक्के मात्र से तुम्हारे मुंह से खून निकलने लगेगा, तो समझ जाना रावण का अंत आ गया है और तुम उसी समय शापमुक्त हो जाओगी।
           हनुमान जी जैसे ही ,परकोटे में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं  उनके सूक्ष्म स्वरूप के बावजूद लंकिनी की दृष्टि से वह बच नहीं पाते। लंकिनी हनुमान जी को ललकारती है, मेरे रहते तुम परकोटे में कैसे प्रवेश कर रहे हो? मैं लंका की सुरक्षा की अधिष्ठात्री देवी हुँ। तू मेरे मेरी अहवेलना करके लंका में प्रवेश कर रहा है। अब तो तू स्वयं को मरा हुआ जान। हनुमान जी अब पर्वत आकार लेकर लंकिनी के सामने खड़े होकर कहते हैं, देवी मैं तो केवल लंका के दर्शन कर लेना चाहता हूं।  मैं दर्शन करके वापस आ जाऊंगा। लंकिनी कहती है तू कैसे प्रवेश करेगा? यदि प्रवेश करना है तो पहले मेरा सामना करना पड़ेगा। ऐसा कह कर लंकिनी हनुमान जी को एक थप्पड़ मारती है। हनुमान जी क्षण भर सोचते हैं कि एक तो यह नारी है, दूसरे मूल रूप से राक्षसी नहीं है। तीसरे जो कुछ कर रही है यह उसका कर्त्तव्य है । ऐसे में इसके प्राण लेना ठीक नहीं है। उन्होंने ने शक्ति संचय कर एक घुसा लंकिनी को मार दिया। लंकिनी भूमि पर गिर पड़ी और उसके मुंह से खून निकलने लगा।  मुंह से खून निकलते देख लंकिनी को ब्रह्मा जी की बात स्मरण हो आई। वह उठी और हनुमान जी से हाथ जोड़कर कहती है, वीर हनुमान तुम निर्भीक होकर लंका में प्रवेश करो और अपना कार्य संपन्न कर वापस आओ। यह मेरा सौभाग्य है की आज मुझे साक्षात श्री रामचंद्र जी के दूत का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी के अनुसार अब रावण का अंत निश्चित है।
           इस अवरोध को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी ने मजबूरी में बनी राक्षसी लंकिनी का वध नहीं किया और घूंसा मारकर उसकी उसकी पूर्व जन्म की स्मृति को ताजा भर कर दिया।
                  10***मित्रता की युक्तियुक्त पहल*****
             अब श्री हनुमान जी लंकिनी से निपटने के बाद लंका की ओर सूक्ष्म रूप धरकर प्रवेश करते हैं। वह अनेक महलों में जाते हैं और सीता जी का पता लगाने का प्रयास करते हैं, परंतु उन्हें कहीं पर सीताजी का पता नहीं लग पाया। यहां तक कि हनुमान जी रावण के महल में, कुंभकरण के महल में, मेघनाथ के महल में, औरअन्य राक्षस सेनापतियों के महल में जाकर देखते हैं, परंतु सीता जी का कोई सुराग नहीं मिलता। इस प्रकार एक-एक  महल को देखते हुए आगे बढ़ते है। एक महल में उन्हें एक मंदिर बना हुआ दिखाई देता है। इसके आगे साफ सुथरा तुलसी का चौरा  है।  वहीं एक दीपक भी जल रहा है।  इसका मतलब इस महल में प्रतिदिन ईश्वर की पूजा की जाती है। यहां रहने वाला व्यक्ति निश्चित थी सात्विक प्रवृत्ति का होगा। हनुमान जी यह विचार कर ही रहे थे कि महल के अंदर से एक व्यक्ति राम नाम लेते हुए निकल रहा था। हनुमान जी विचार करते हैं की यह व्यक्ति तो सज्जन दिखाई दे रहा है। रात भर घूमने के बाद, सारे प्रयास करने के बाद भी सीता जी का पता नहीं लग पाने से थके हुए श्री हनुमान जी को यह एक महत्वपूर्ण सूत्र दिखाई दिया। हनुमान जी विचार करते हैं अच्छा यह होगा कि मैं स्वयं आगे बढ़कर उनसे परिचय प्राप्त कर लूं और बातचीत शुरू करुं। सज्जन व्यक्ति से स्वयं होकर बात करने से कोई हानि नहीं होती है, कुछ लाभ ही होगा। हनुमान जी तुरंत सूक्ष्म रूप छोड़कर ब्राह्मण के वेश में खड़े होकर महल से निकल रहे विभीषण को आवाज देते हैं। विभीषण आवाज सुनकर ब्राह्मण को पूछते हैं, हे ब्राह्मण आप अपनी कथा सुनाओ। अर्थात अपना परिचय दो। आपको देखकर मेरे मन में आपके प्रति स्नेह उमड़ रहा है। आप कौन हैं? क्या आप राम के दूत हैं या स्वयं राम है।
           अब तक चतुर हनुमानजी समझ जाते हैं की यह व्यक्ति विश्वास करने के योग्य है। और निश्चित रूप से सीता माता की खोज में इससे सहायता मिल सकती है। यदि आपको किसी व्यक्ति से सहायता चाहिए तो उसके साथ बिना किसी छल के वास्तविकता को सामने रख देना चाहिए।  हनुमान जी यही करते हैं, उन्होंने विभीषण को अब तक की श्री रामचंद्र जी की कथा सुना दी, और अपना पूरा परिचय दे दिया।
           विभीषण कहते हैं मैं तो यहां राक्षसों के बीच कैसे रहता हूं मैं ही जानता हूं। मैं भी श्री हरि की कृपा चाहता हूं। परंतु एक तो मेरा यह शरीर राक्षस कुल का है।  इस शरीर से कोई साधना बनती नहीं है।  न हीं मेरे मन में श्री राम के प्रति अगाध भक्ति है। इसीलिए मुझे संदेह है कि मुझे  ईश्वर की कृपा प्राप्त हो सकेगी।  फिर भी एक आशा बंधी है, क्योंकि बिना हरि की कृपा के संत लोग नहीं मिलते हैं, आज आपसे भेंट हो गई। 
            हनुमान जी कहते हैं विभीषण सुनो, प्रभु हमेशा अपने सेवकों पर प्रेम करते हैं।  मुझे ही देख लो मैं कौन सा कुलीन हूं? मैं तो वानर जाति का हूं, चंचल स्वभाव का हूं, सभी प्रकार नीच हूं। जो कोई सुबह हमारा नाम भी ले ले तो उसे खाना तक नसीब नहीं होगा।  मेरे जैसे अधम पर भी प्रभु ने कृपा की है। ऐसा कहते हुए हनुमान जी के नेत्रों में भक्ति भाव का जल भर आया।  हनुमान जी जानते हैं की मित्रता बराबरी के स्तर पर होती है।  इसीलिए वह विभीषण की इस हीन भावना को, कि वह राक्षस कूल में पैदा हुआ है इसलिए अयोग्य है, इसे दूर करने के लिए स्वयं को भी बहुत छोटा और निम्न कुल का होना बताते हैं। यही हनुमान जी की संप्रेषण की विशेषताएं है।  हनुमान जी और आगे बढ़कर विभीषण से कहते हैं "सुनो भाई!" भाई  कह कर विभीषण को भाई तो बना लेते हैं, परंतु उसके आगे कहते हैं कि मैं मां जानकी को देखना चाहता हूं, अर्थात यह भाई का रिश्ता हनुमान जी ने जोड़ा और वह भी मां जानकी के पुत्र के रूप में। अभी तक तो विभीषण इस दुविधा में था की रावण उसका भाई है उसको छोड़कर वह कैसे जा सकता है।  परंतु हनुमान जी ने यह भाई का रिश्ता, वह भी जान की मां के पुत्र के रूप में जोड़कर अब विभीषण को भाई का विकल्प भी दे दिया। हनुमान जी ने इस प्रकार अपनी व्यवहार कुशलता और संप्रेषण के कौशल के द्वारा श्री रामचंद्र जी के लिए एक नया और महत्वपूर्ण सहयोगी विभीषण के रूप में  बना लिया।  विभीषण ने मां जानकी का पता बता दिया और किस प्रकार जाना है यह भी बता दिया। श्री हनुमान जी पुनः मूषक रूप धरकर अशोक वन की ओर प्रस्थान कर गए।
        11********** माता सीता को विश्वास में लेना****************
                   अशोक वन में पहुंचकर हनुमान जी मां जानकी को अत्यंत दुखी अवस्था में देखते हैं। मां जानकी श्री राम के वियोग में कमजोर हो गई है, उन्होंने खाना पीना भी छोड़ दिया है। मां जानकी विलाप करते हुए अपने जीवन के अंत की कामना करती है। इसी  समय रावण वहां आता है और सीता जी से कहता है तुम एक बार तो मेरी ओर देखो मेरी सारी रानियां मंदोदरी सहित तुम्हारे चरणों में दासी के रूप में प्रस्तुत कर दूंगा। माता सीता को श्री रामचंद्र जी पर पूरा विश्वास है और उनके चरणों में संपूर्ण निष्ठा है। इसलिए तृन की वोट लेकर रावण से निर्भय होकर कहती है। तुम तो एक जुगनू के समान हो और भगवान श्री राम सूर्य के समान है। तुम्हारी श्री राम से कहां तुलना? उनके एक बाण मात्र से तुम नष्ट हो जाओगे। सीता जी के इन शब्दों से अपमानित हुए रावण का अहंकार और क्रोध जाग उठा। वह वह नंगी तलवार लेकर सीता जी को मारने दौड़ा। आगे बढ़ कर सुशील और गुणी मंदोदरी ने रावण को रोक लिया। रावण साथ आये राक्षसियों को कहता है, सीता जी को किसी भी तरह से, चाहे भय से ही क्यो न हो मनाने की कोशिश करो। सीता जी को कहता है कि यदि तुम एक महीने में मेरी बात को नहीं मानोगी तो मैं इस तलवार से तुम्हारा सिर अलग कर दूंगा। सीता जी कहती है श्री राम के अलावा मेरे गले में और किसी का हाथ नहीं पहुंच सकता या तो श्री राम जी का हाथ पहुंचेगा या इस तलवार  की धार। रावण माता जानकी को चेतावनी देकर अपने घर की ओर चला गया। माता सीता पुनः विलाप करने लगी।
         इस प्रकार नाना विधि रावण से प्रताड़ित एवं श्री राम जी के विरह में दुखी माता सीता के लिए हनुमान जी का सीधा सामने जाना संभवतया सीता जी के लिए सँशय का करण बन सकता है। राक्षस तो अनेक रूप लेकर विचरण करते रहते हैं। हनुमान जी विचार करते हैं की मैं अचानक माता के सामने प्रकट हो जाऊं तो वानर जानकर संभव है मुझ पर विश्वास ना करें। दूसरे वे सीधे माता के पास जाते हैं तो हो सकता है की रावण के सैनिक और सीता माता पहरा दे रही राक्षसियों को संशय ना हो जाए। इसीलिए सीधे माता के सामने जाने से पहले वे वह श्री रामचंद्र जी की गाथा का धीमी आवाज में गान करते हैं। किस प्रकार महाराजा दशरथ के पुत्र को जो युवराज घोषित होने वाले थे,  उनको वनवास मिला और किस प्रकार माता सीता का रावण ने हरण किया। यह सुनकर सीता माता उस अशोक वृक्ष को ध्यान से देखने लगी। हनुमानजी उस वृक्ष से श्री रामचंद्र जी के द्वारा दी गई अंगूठी को माता के सामने डाल देते हैं। सीता जी राम नाम अंकित अंगूठी को देखकर उसे पहचान गई। उनके हृदय में हर्ष विषाद का मिला-जुला भाव आने लगा। जब किसी व्यक्ति को कोई प्रिय चीज अचानक मिल जाए तो उसे संदेह होने लगता है। सीता जी भी विचार करती हैं कहीं यह राक्षसों की माया तो नहीं है। परंतु उनका विश्वास कहता है की माया से श्री रामचंद्र जी की अंगूठी को बनाया नहीं जा सकता। इसी समय हनुमान जी श्री रामचंद्र जी का गुणगान करने लगते हैं। श्री राम की कर्ण मधुर कथा को सुनकर सीता जी प्रसन्न हो जाती हैं। और कहती हैं, भाई तुम कौन हो, सामने आ जाओ।  तब हनुमान जी उनके निकट आकर खड़े हो जाते हैं। 
              वानर को देखकर माता सीता मुंह फेर लेती है। उन्हें आश्चर्य भी होता है। हनुमान जी कहते हैं माता जानकी! मैं करुणा निधान की शपथ लेकर कहता हूं की मैं राम का दूत हूं। माता! यह अंगूठी मैंने ही लाई है, जिसे श्री रामचंद्र जी ने निशानी के रूप में मुझे दिया था। सीता माता अपना संन्देह दूर करने के लिए पूछती है, यह वानर और मनुष्य की संगति कैसे हो गई? तब श्री हनुमान जी पूरी कथा को कहते हैं। श्रीराम और लक्ष्मण जी के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं। हनुमान जी की पूरी बात सुनने के बाद सीता जी के मन में विश्वास जाग गया। वह कहती हैं, हनुमान तुम तो विरह के सागर में डूबती हुई मेरे जैसे के लिए जहाज के समान हो। श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण कुशल तो है? करुणा निधान  राम मेरे प्रति इतने कठोर कैसे हो गए? वह तो स्वभाव से ही सेवक को सुख देने वाले हैं, क्या कभी मेरी याद भी करते हैं? मैं उनको कब आंख भर कर देख पाऊंगी? हे ईश्वर, हे स्वामी आपने तो मुझे भूला ही दिया! हनुमान जी सीता जी को विरह में व्याकुल देखकर अपनी बात रखते हैं। हनुमान जी जानते हैं की विरह में व्याकुल व्यक्ति को यदि धीरज दिलाना है तो उसे यह विश्वास दिलाना बहुत आवश्यक है की सामने वाला व्यक्ति आपसे भी अधिक बिरह में व्याकुल है।  श्री हनुमान जी कहते हैं माता प्रभु अपने अनुज सहित कुशल हैं।( कुशलता को बहुत संक्षेप में कहकर) आगे कहते हैं परंतु आपके विरह में दुखी हैं। माता! अपना मन छोटा मत करिए श्री रामचंद्र जी के हृदय में आपके प्रति आपसे दूना प्रेम है। ऐसा कहते हुए हनुमान जी के आंखों से अश्रु निकल पड़े। हनुमान जी आगे श्री रामचंद्र का संदेश सुनाते हुए कहते हैं कि श्रीरामचंद्र जी ने कहा है "सीते तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नए कोपल अग्नि के सामान लगते हैं। रात्रि कालरात्रि बन गई है। चंद्रमा सूर्य के समान धधक रहा है।  कमल बाणो के समान हो गए हैं। मेघ भी मानो खौलता तेल बरसा रहे हैं। वायु के झोंके जहरीले लगने लगे है।  हे प्रिया मैं अपनी बात अपना दुख किसी से कह भी तो नहीं पाता।  मेरा मन तो सदा तेरे पास ही रहता है। यह सुनकर सीता के जी के हृदय में श्री रामचंद्र जी के प्रति इतना प्रेम भर गया कि उन्हें अपनी सुधि नहीं रही।  आगे हनुमान जी श्री रामचंद्र जी की वीरता का वर्णन करते हुए माता सीता को विश्वास दिलाते हैं कि श्री रामचंद्र जी शीघ्र ही यहां आएंगे। हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के वीरता का बखान करते हुए कहते हैं कि मैं मनुष्य असुरों और देवताओं में भी किसी को ऐसा नहीं देखा जो भगवान श्री राम के बाणों की वर्षा के समक्ष टिक पाए। उनके बाणो से सारे राक्षसों का नाश होगा, और श्रीराम आपको अपने साथ लेकर जाएंगे। जब व्यक्ति दुखी होता है तो उसके मन में कई संशय उत्पन्न होते हैं।  माता पूछती है कि मुझे संशय है तुम जैसे वानरों को लेकर श्री राम जी राक्षसों का सामना कैसे करेंगे?  तब श्री हनुमान जी ने अपना भूधराकार शरीर दिखाया।  इतना ही नहीं तो वह कहते हैं प्रभु की कृपा से केवल मैं ही नहीं तो मेरे जैसे सभी वानर इतने ही बलवान है। अब सीता माता को विश्वास हो गया। वे हनुमानजी को अनेक आशीष देने लगी।
             हनुमान जी माता सीता से कहते हैं, मां अब  मुझे बहुत भूख लगी है मुझे इस बगीचे के फल खाने की आज्ञा दीजिए। सीता जी सावधान करते हुए कहती है, यहां पर बड़े-बड़े राक्षस इस बगीचे की रक्षा कर रहे हैं। हनुमान जी कहते हैं मां यदि आपकी आज्ञा हो तो मुझे इन सबका कोई भय नहीं है। 
          हनुमान जी को उस समय भी फल दिखे थे जब वे समुद्र पार कर लंका के किनारे खड़े थे। परन्तु उस समय उनको फल खाने की इच्छा नहीं हुई । जब उन्होंने सीता जी का खोज का काम पुरा कर लिया तब वे फल की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। इसका मतलब ये है की जब तक आप अपने उद्देश्य में सफल ना हो जाए तब तक उसके फल की इच्छा भी नहीं करनी  चाहिए।  हां उद्देश्य पुरा हो जाए तो फल की इच्छा स्वाभाविक है।
           12******सफल दूत की तरह शत्रु की शक्ति का आंकलन करना और शत्रु पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना***********
        हनुमान जी ने माता सीता का पता तो लगा लिया परंतु एक दूत के लिए मुख्य कार्य करने के बाद भी कुछ और कार्य होता है जिनका संपादित करना बहुत आवश्यक होता है। श्री हनुमान जी विचार करते हैं कि माता सीता का पता तो लग गया परंतु अभी शत्रु की शक्ति का आंकलन करना शेष रह गया है। इसके चार ही उपाय हैं शाम दाम भेद और दंड।  राक्षसों के लिए शाम नीति का उपयोग करना व्यर्थ है। यह लंका तो सोने की है। यहां विपुल धन है, आतएव दाम का प्रयोग का विचार करना भी ठीक नहीं है।  यह सब के सब बलशाली है इसलिए  भेद नीति भी यहां लागू नहीं हो सकती। ऐसी दशा में पराक्रम दिखाकर शत्रु को उकसाकर उसे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए बाध्य करना ही उचित होगा।  शत्रु की शक्ति का ज्ञान होने के बाद ही माता सीता को मुक्त कराने का अभियान सूचारू रूप से प्रारंभ किया जा सकता है। इस  प्रकार अच्छा योजक केवल मुख्य कार्य को ही नहीं करता तो वह अन्य पूरक कार्यों को भी पूरा कर मुख्य कार्य की सफलता को सूनिश्चित करता है, यही हनुमान जी भी करते हैं।
           इस सुंदर उपबन को देखकर हनुमान जी अगली योजना बना लेते हैं। उनके लिए तो फल खाना एक बहाना था, इसी बहाने उन्होंने उस उपवन के अनेक  वृक्षो को तोड़ कर गिरा दिया। उस बगीचे के रक्षकों ने उस बंदर को वृक्ष गिराते और उपवन को उजाड़ते देख, उस पर आक्रमण किया। उन रक्षकों को तो हनुमान जी ने क्षण दो क्षण में ही निपटा दिया। कुछ को तो मसल मसल कर मार डाला। यह समाचार रावण के पास पहुंचा, तो रावण ने अपनी किंकर जाति के लड़ाकू राक्षसों की सेना को भेजा। यह सेना  भी हनुमानजी से हार गई। उसके बाद रावण ने क्रम से प्रहस्त्र पुत्र जाम्बुमाली को, उसके बाद अपने मंत्री पुत्रों को, और बाद मे अपने वीर पुत्र अक्षय कुमार को भेजा। परंतु उनमें से कोई भी श्री हनुमान जी को जीत नहीं पाया। रावण पुत्र अक्षय कुमार को भी हनुमानजी ने मार  डाला । पुत्र वध से क्रोधित रावण ने बड़े पुत्र महाबली मेघनाथ को सेना के साथ भेजा। मेघनाथ  रथ पर हनुमान जी ने एक बड़े वृक्ष को फेंक दिया। मेघनाथ का रथ टूट गया। अब दोनों आपस में लड़ने लगे। हनुमान जी ने एक घूंसा मारा और पेड़ पर चढ़ गए। मेघनाथ ने सारे दाँव अपना लिए परंतु पवन पुत्र को जीत नहीं पाए। अंत में मेघनाथ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं। ब्रह्मास्त्र स्वयं ब्रह्मा के द्वारा दिया गया अमोघ अस्त्र है। परंतु इधर हनुमान जी को भी ब्रह्माजी का यह वरदान प्राप्त था की वह किसी भी दैवी अस्त्र से वध्य नहीं होंगे। परंतु ब्रह्मास्त्र चूंकि ब्रह्मा के द्वारा दिया गया अमोघ अस्त्र था, यदि हनुमान जी ब्रह्मास्त्र की महिमा को नहीं मानते तो सामान्य जन में भी ब्रह्मा जी की महिमा कम हो जाती। इसके पहले भी पौराणिक घटनाओ में अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है की जिन राक्षसों और कुछ मुनियो ने भी आशीष रूप में प्राप्त दैवी शक्तियों के प्रयोग दैवी शक्तियों के विरुद्ध किया उसके परिणाम अच्छे  नही रहे । महर्षि विश्वामित्र भी इसके एक उदाहरण है। इसलिए हनुमान जी ने ब्रह्मास्त्र की शक्ति का सम्मान किया। एक उत्तम व्यक्ति को बल के साथ-साथ लोक नियमों का भी ध्यान रखना पड़ता है। अतएव ब्रह्मास्त्र  लगते ही बेहोश होकर गिर पड़े। परंतु गिरते गिरते भी सैकड़ो राक्षसों का नाश कर दिया। अब पुनह हनुमान जी विचार करते हैं कि वे ब्रह्मास्त्र से घिरे हुऎ हैं तो उनके ऊपर ब्रह्मा जी की कृपा बनी रहेगी। इसी प्रकार इंद्र की कृपा भी बनी रहेगी। पवनसूत  होने कारण वायुदेव की कृपा तो है ही। ऐसा सकारात्मक विचार कर हनुमान जी निश्चिंत हो गए। इंद्रजीत मेघनाथ हनुमान जी को नागपाश से बांध कर रावण के दरबार मे ले गए। 
         जिस वानर ने रावण के बलवान सैनिकों को मार डाला उसके पुत्र को मार डाला ऐसे वानर को देखने के लिए वहां राक्षसों की भीड़ इकट्ठा हो गई। हनुमान जी ने रावण के दरबार को देखा। उस विशाल दरबार में बड़े-बड़े रथी, महाराथी, यक्ष, और देवता रावण के सामने सिर झुकाकर  खड़े थे। उस वैभव को देखकर भी हनुमान जी प्रभावित नहीं हुए। पहले तो रावण एक वानर को देखकर दुर्वचन कहता हुआ हंसने लगा।  परंतु जैसे उसे अपने पुत्र की मृत्यु का दुखद स्मरण हुआ तो हनुमान से पूछता हैं वानर तू कौन है? तूने किसके बल पर वन को उजाड़ दिया है। क्या तूने मेरा यश नहीं सुना है?  हनुमान जी उत्तर देते हुए श्री राम के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं,  रावण सुन  जिनके बल से ब्रह्मा विष्णु और महेश अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। जिन्होंने शिवजी का धनुष तोड़कर राजाओं के गर्व को तोड़ दिया।  जिन्होंने खर दूषण त्रिशिरा और बाली का वध कर दिया और जिनकी पत्नी को तुम चोरी से हर कर ले  लाए हो, मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी का दूत हूं।
        हनुमान जी चाहते तो अपने परिचय में शुरुआत में ही जैसा कि सब लोग करते हैं, अपने परिचय में माता अंजनी या पिता वीर केसरी या परमवीर पवन का  उल्लेख कर सकते थे। पर उन्होंने ऐसा ना करके श्री राम जी के गुणो का उल्लेख करते हुए सीधे राम जी के नाम से अपना परिचय दिया। व्यक्ति स्वयं अपना परिचय किस संदर्भों के साथ देता है इसका सीधा प्रभाव सामने वाले व्यक्ति पर पड़ता है, इस  मानोविज्ञान को श्री हनुमान जी अच्छी तरह जानते हैं। 
            उसके बाद यह भी बताते हैं की रावण मैं तुमसे अपरिचित नहीं हूं, मैं जानता हूं तुमने सहस्त्रबाहू के साथ और बाली के साथ युद्ध करके कितना यश प्राप्त किया?   (रावण को सहस्त्रबाहु और बाली दें युद्ध में हराया था) व्यंग को सुनकर रावण खिसिया कर हंस दिया। हनुमान जी ने रावण को उसकी हार का इतिहास याद करा कर फिर दूसरा मनोवैज्ञानिक आक्रमण किया।
         आगे हनुमान जी बगीचे को उजाड़ने के कारण को बताते हुऎ कहते हैं मुझे तो भूख लगी थी इसीलिए मैने फल तोड़ कर खायें। मैं तो वानर हूं वृक्षों को तोड़ना और विनाश करना यह तो मेरा स्वाभाविक गुण है और जहां तक राक्षसों के को मारने का प्रश्न है, पहले तो उन्होंने मुझे मारा एसलिए मैने उनको मारा। तुम्हारे पुत्र ने मुझे बांधकर लाया है,  इसमें भी मुझे कोई लज्जा नहीं है क्योंकी मैं तो प्रभु के कार्य से यहां आया हूं। इस पूरे प्रसंग में पहले तो हनुमान जी यह बता देते हैं की मैं वानर हूं ईसलिए फल खाना और वृक्षों को तोड़ना तो मेरा स्वाभाव है।  परोक्ष रूप से हनुमान जी रावण को यह बताना चाहते हैं कि मेरा स्वाभाव वश किया हुआ कार्य यदि अपराध है, तो तुम तो मूझसे बड़े अपराधी हो, जो ज्ञानी होते हुऎ भी और उच्च ऋषि कुल में उत्पन्न होने के बाद भी माता सीता का हरण करने का अपराध तुमने किया है। दूसरी बात जो रावण को समझा देना चाहते हैं की 'आपका पुत्र मुझे बांधकर यहां तक लाया है' , इस गलतफहमी में ना रहना, मैं तो केवल प्रभु की इच्छा के करण यहां तक लाया गया हूं।
        हनुमान जी कई प्रकार से रावण को समझाते हैं कि श्री रामचंद्र जी की महिमा अपार है, तुम्हारा हित इसी में है की माता सीता को श्री रामचंद्र जी को ससम्मान सौंप दो। परंतु अहंकारी रावण हनुमान की बात को अनसुना करके हनुमान जी को मृत्यु दंड देने की आज्ञा करते हैं।  विभीषण के हस्तक्षेप के बाद रावण हनुमान जी के पुंछ में आग लगाकर उन्हें पूँछहीन कर वापस अपने मालिक के पास भेजने के लिए आज्ञा देते हैं। जिससे पूछहीन वानर को देखकर उनका मालिक घबरा जाए। श्री हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा बांधकर उस पर घी  लगाने का काम लंकावासी करते हैं। परंतु हनुमान जी की पूछ तो बढ़ती ही जाती है। यहां तक कि लंका के निवासियों का घी भी समाप्त हो जाता है।  हनुमान जी के पूछ को आग लगाकर लंकावासी आनंद मानाते हैं।  परंतु हनुमान जी 'आपदा को अवसर में बदलने का' गुर खूब जानते हैं। हनुमानजी लंका के महलों  के ऊपर कूद कूद कर अपनी पुंछ की आग से लंका के महलों को जला देते हैं। इसके बाद वे वापस माता सीता के पास आते हैं। 
     हनुमान जी अशोक वन में वृक्षों को तोड़ते हैं और राक्षसों को युद्ध के लिए  उकसाते हैं वह सब योजना पूर्वक करते हैं। जिसकी परीणीती हमें लंका के दहन में दिखाई देती है।
          लंकावासी रावण को अजेय मानते हैं। हनुमान जी लंका दहन के बाद  संपूर्ण लंका वासी  मनोवैज्ञानिक  दबाव में आ जाते है। शत्रु को मानसिक दबाव में रखना यह युद्ध पूर्व की निति का महत्वपूर्ण भाग है और उसको हनुमान जी कुशलता पूर्वक पुरा करते हैं। यहां तक की रावण की पत्नी मांदोदरी भी लंका दहन के बाद रावण को समझाने के लिए मजबूर हो जाती है। रावण के अजेयता  पर न केवल लंकावासियों को वरन स्वयं मंदोदरी को भी अब शंका होने लगी।
                इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के बाद हनुमान जी माता सीता को पुरी तरह आश्वस्त करते हैं कि श्री रामचंद्र जी उनको सकुशल वापस लेकर  जाएंगे इसमे कोई शंका नही है।  माता सीता से स्मृतिचिन्ह लेकर वापस निकल चलते हैं।
           13 ****** एक आदर्श योद्धा की तरह स्वयं की प्रशंसा न करना और प्रशंसा किए जाने पर अहंकार में ना आना*********
           सामान्य रूप से किसी बड़ी सफलता के बाद अपने अभियान के समय सहयोग करने वालों को और सहानुभूति रखने वालों को भुला देना सामान्य बात है। परंतु हनुमान जी लंका से वापसी के समय मैंनाक पर्वत को  छूकर प्रणाम करते हैं। वैसे देखा जाए तो हनुमान जी के इस अभियान में मैनाक पर्वत ने केवल आराम करने कहा था, फिर भी हनुमान जी उस सहानुभूति को भी स्मरण रखते हैं, और वापसी में मैंनाक  पर्वत का धन्यवाद करना नहीं भूलते। यह कृतज्ञता का भाव व्यक्तित्व को अहंकार मुक्त करता है।
            हनुमान जी अपने कार्य को सफलतापूर्वक पुरा कर समुद्र के किनारे अपने साथियों के पास वापस आते हैं। उनके  तेज को, हर्ष और गर्जना को देखकर साथी वानर समझ गए कि हनुमान जी अपना कार्य पुरा करके वापस आ गए हैं। अब तो पूरी टीम को  जीवनदान मिल गया।  सबका अति प्रसन्न होना स्वाभाविक था।
           सभी वानरों वीरों ने फलादि से हनुमान जी का स्वागत किया। हनुमान जी ने वहां उपस्थित वरिष्ठ वानर वीर जामवंत और अंगद को प्रणाम किया। हनुमान जी ने सूचित किया कि माता सीता का पता लगाकर आया हूं। वह अशोक वाटिका में है। इसके बाद सभी वानर वीर महेंद्र पर्वत पर एकत्रित हुए जहां टीम के नेता अंगद उच्च स्थान पर बैठकर हनुमान जी से पूरे अभियान के विषय में जानकारी लेने लगे। यहां यहां यह ध्यान देने योग्य और सीखने योग्य बात है की किसी बड़ी से बड़ी सफलता के बाद भी अपने टीम के नेता को ही उच्च स्थान अर्थात सम्मान का स्थान देना चाहिए।
      हनुमान जी ने अपने साथियों को समुद्र पार करते समय आई हुई कठिनाइयों का वर्णन किया कि किस प्रकार सीता जी को खोजा और किस प्रकार लंका में आग लगाई। यह सारा वर्णन करने के बाद हनुमान जी अपने अभियान की सफलता का श्रेय भगवान श्री राम और अपनी टीम को देते हुए कहते हैं, श्री रामचंद्र जी की कृपा और आप लोगों के प्रभाव से मैंने सुग्रीव के कार्य की सिद्धि के लिए सब कुछ किया। सफलता का श्रेय पूरी टीम को देकर टीम भावना को बनाये रखने  का यह उत्कृष्ट उदाहरण है।
              किष्किंधा पहुंचकर श्री सुग्रीव से सभी वानर मिलते हैं और श्री हनुमान जी के सफलता की कहानी बताते हैं। यहां भी श्री हनुमान जी अपने मुंह से सफलता की कोई बात सुग्रीव से नहीं कहते। सुग्रीव सबको साथ लेकर श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी के पास जाते हैं।  श्री जामवंत जी श्री रामचंद्र जी को आदर पूर्वक कहते हैं कि  जहां आपका आशीर्वाद हो वहां सभी कार्य सफलतापूर्वक निपट जाते हैं। आगे श्री हनुमान जी के विषय में कहते हैं कि हनुमान जी ने जो कुछ किया उसकी प्रशंसा हजारों मुख से भी नहीं की जा सकती। ऐसा कह कर हनुमान जी के द्वारा सफलता पूर्वक किए गए अभियान की सारी बातें जामवंत बताते हैं।
               जामवंत जी द्वारा सुना गए हनुमान जी के चरित्र को सुनकर श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया।  और उत्सुक हो माता सीता का हाल पूछने लगे। श्री हनुमान जी ने अशोक वाटिका में माता श्री सीता के  दुख पूर्ण स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है, शब्दों में बताने से आपके दुख ही बढ़ेंगे। हनुमान जी निवेदन करते हैं प्रभु तुरंत चलिए और अपनी भुजाओं से राक्षसों का नाश कर सीता जी को ले आइये।
            श्री रामचंद्र जी माता सीता का हाल सुनने के बाद हनुमान जी को कहते हैं तुम्हारे जैसा मेरे लिए कोई उपकारी नहीं है।  मैं उस उपकार का बदला कैसे चुकाऊ। मैं अब तुझसे उऋण नहीं हो सकता। ऐसा करते हुए श्री रामचंद्र जी हनुमान जी की ओर प्रेमाश्रु भरे नेत्रों से लगातार निहार रहे हैं । श्री रामजी का  शरीर पुलकित हो उठा है। 
      स्वयं श्री रामचंद्र जी द्वारा हनुमान जी को हृदय से लगा लेना,  उनको सबसे बड़ा उपकारी बताना,  मैं कभी इस उपकार का से उऋण नहीं हो सकता ऐसा कहना, किसी के लिए भी इससे बड़ी गर्व की बात क्या होगी।  किसी भी व्यक्ति का अहंकार तब जागृत होता है, जब या तो वह बड़ी सफलता प्राप्त करता है, या तब जब वह स्वयं को ज्ञानी समझता है,  और तब जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति  उसकी प्रशंसा करने लगे। जामवंत जी हनुमान जी के सफलता की कहानी बड़े गर्व से कहते हैं और स्वयं श्री रामचंद्र जी जिसकी प्रशंसा करते नहीं थकते  हैं, ऐसे में अहंकार का  आ जाना  स्वाभाविक बात है।  इस बात को श्री हनुमान जी जैसे गुणी व्यक्ति अच्छी तरह जानते हैं।  जब भी अहंकार आक्रमण करने लगे तो उसका एक ही उपाय है कि ईश्वर के सामने झुक जाइए, विनीत हो जाइए, समर्पित हो जाइए, और सफलता का सारा श्रेय प्रभु को दे दो। श्री हनुमान जी यही करते हैं।  श्री रामचंद्र जी के चरणों को पकड़ कर नतमस्तक हो जाते है (मानो बार-बार विनती कर रहे प्रभु अहंकार से मेरी रक्षा करो! मेरी रक्षा करो!!)।  श्री रामचंद्र जी बार-बार हनुमान जी को अपने चरणों से उठाने का यत्न करते हैं परंतु हनुमान जी है कि श्री रामचंद्र जी के चरणों से उठना नहीं चाहते। श्री रामचंद्र जी बार-बार प्रयत्न करने के बाद श्री हनुमान जी को उठाकर अपने हृदय से लगाते हैं,  और निकट बैठा लेते हैं। श्री रामचंद्र जी पूछते हैं हनुमान तुमने रावण की इतनी सुरक्षित लंका को किस तरह जलाया? हनुमान जी बड़ी सरलता पूर्वक कहते हैं भगवान वानर का इतना ही  पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर सहज चला जाता है।  बस इसी विधि से मैंने समुद्र को भी पर किया और लंका को भी जला डाला।  प्रभु इसमें तो मेरी कोई बढाई नही है। मैं तो केवल अपने जन्मजात गुण के कारण एक डाल से दूसरे डाल पर कूद रहा था। बाकी सब कुछ जो हुआ उसमें मेरी कोई प्रभुता नहीं है। यह तो सब आपका ही प्रताप है। अंत में हनुमान जी निवेदन करते हैं कि हे प्रभु यदि सचमुच आप प्रसन्न है तो केवल मुझे अपनी निश्चल भक्ति दे दीजिए।  श्री रामचंद्र जी ने  एवं अस्तु कह कर आशीर्वाद दिया। श्री हनुमानजी जैसी आत्ममुग्धताविहीन स्थिति कठिन साधना के बाद ही प्राप्त हो सकती है।
     14 ************ हनुमान जी द्वारा अजेय लंका का वर्णन, साथ ही श्री रामचंद्र जी को विजय के लिए आश्वस्त करना **************
        श्री वाल्मीकि जी युद्ध पूर्व का वर्णन करते हुए लिखते हैं, श्री रामचंद्र जी सुग्रीव को आश्वस्त करते हैं की समुद्र को पार कराने के लिए मैं सक्षम हूं। ऐसा कहते हुए श्री रामचंद्र जी हनुमान जी से पूछते हैं, हनुमान तुमने लंका को अच्छी तरह से देखा है। उसकी सुरक्षा की क्या-क्या व्यवस्था है उस संबंध में मुझे कहो। 
           हनुमान जी अजेय लंका का वर्णन करते हुए कहते हैं कि किस प्रकार लंका के मजबूत दुर्ग बने हुए हैं, वहां कितनी विशाल सेना है,वह सेना लंका की सुरक्षा के लिए कितनी सचेत रहती है, रावण के तेज से प्रभावित लंकावासी उसके प्रति कैसा स्नेह रखते हैं। लंका की समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र किनारा कितना भयंकर है, उस लंकापुरी की चारदीवारी के चार दरवाजे किस प्रकार मजबूत है और सैनिकों के द्वारा सुरक्षित हैं, लंकापुरी किस प्रकार चारों ओर खाइयों से सुरक्षित है, रावण किस प्रकार हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहता है, कठिन समय मे भी धीर और गंभीर बना रहता है, यह लंकापुरी देवताओं के लिए भी दुर्गम  है। इस प्रकार लंका का और उसकी सुरक्षा का सही-सही वर्णन हनुमान जी करते हैं और एक सहायक का यही कर्तव्य भी है कि वह स्वामी को सत्य बात कहे।
            लंकापुरी का ऐसा अद्भुत वर्णन करने के बाद हनुमान जी श्री रामचंद्र जी को  आश्वस्त करते हुए कहते हैं, प्रभु इस अचूक  सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद मैंने तो उन सब अवरोधों को तोड़ डाला।   परकोटे को धराशाही कर दिया और वहां की विशाल सेना के एक हिस्से को समाप्त कर दिया।  प्रभु हम लोग एक बार समुद्र पार कर लेवे तो लंका वानरों द्वारा नष्ट हुई समझिए।
        यहां पर आगे हनुमान जी अपने वानर वीर अंगद द्विविध मैंद जामवन और सेनापति नल नील का उल्लेख करते हुए कहते हैं, प्रभु यह सारे वीर भी मेरे ही जैसे बलवान है अंगद सहित हम सब वीर ही लंका पहुंचकर लंका को तहस-नहस कर सकते हैं और माता सीता को वापस ला सकते हैं। इस प्रकार हनुमान जी श्री रामचंद्र जी को आश्वस्त तो करते हैं साथ ही अपने साथी वानर वीरो के बल का वर्णन करते हुए उन्हें भी अपने ही जैसा बलवान कह कर कर टीम भावना को बनाए रखते हैं।
    15**********हनुमानजी का व्यक्ति को परखने का अद्भुत गुण  ***********
                महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं, रावण के भाई विभीषण  रावण को युक्तियुक्त और धर्म युक्त बात कह कर माता सीता को श्री रामचंद्र जी को सादर सौंपने  की सलाह देते हैं। रावण विभीषण की बात को तो नहीं मानता और विभीषण को कड़वे वचन कह कर अपमानित  कर देता है। विभीषण दुखी होकर श्री रामचंद्र जी के शरण में आने के लिए समुद्र के उस किनारे पर पहुंचते हैं जहां श्री रामचंद्र जी अपनी सेना के साथ अपस्थित हैं। विभीषण वानर रक्षकों को बताते हैं की वे रावण के भाई विभीषण है। किस प्रकार उन्होंने रावण को उसके हित में उचित  सलाह दी कि माता सीता को सादर श्री रामचंद्र जी को लौटा दिया जाए। रावण ने मेरी बात को तो माना ही नहीं। मुझे दास की तरह अपमानित किया। अब मैं अपने स्त्री पुत्रों को छोड़कर श्री रघुनाथ जी के शरण में आया हूं।  हे वानरों आप शीघ्र श्री रामचंद्र जी के पास जाकर उनसे कहो की शरणार्थी विभीषण श्री रामचंद्र जी के शरण में आया है।
           श्री विभीषण को और उनके साथ आये चार शस्त्रधारी रक्षको को देखकर और उनकी बातें सुनकर वानर मंत्रियों के मस्तिष्क में नाना प्रकार के विचार और संदेह आते हैं।
               महाराज सुग्रीव प्रभु श्रीराम से  कहते है, हमारे शत्रु रावण  की सेना में रहा हुआ कोई व्यक्ति अब आपकी सेना में आना चाहता है।  जो स्वयं को रावण का भाई बता रहा है। राक्षस लोग स्वभाव से मायावी होते है। उनके किसी बात पर विश्वास नहीं किया सकता। उसे रावण द्वारा भेजा हुआ ही माना जाना चाहिए , जो कभी भी अवसर देखकर हमें धोखा दे सकता है।  पहले तो किसी गुप्तचर द्वारा ठीक से पता लगाया जाए।  यदि मेरी माने तो अभी तो उसे बंदी बना लेना है  ही उचित होगा। श्रीराम सुग्रीव की युक्तियुक्त बात सुनकर अन्य वानर मंत्रियो से उनकी भी राय पूछते हैं।
           अंगद कहते हैं , अभीअभी हमारे पास आया हुआ शत्रु है। इस पर पूरा विश्वास करना ठीक नही होगा। कुछ लोग अपनी वास्तविक मंशा को छुपा लेते हैं। मौका मिलते ही प्रहार कर देते हैं। अतएव गुण दोषो का ठीक से विचार कर लेना चाहिए।
           मंत्री शरभ कहते हैं कि गुप्तचर भेजकर पहले सही जानकारी ले लेनी चाहिए।
             चतुर जमवान ने कहा रावण बड़ा पापी है। विभीषण उसी के पास से आ रहा है वास्तव में यह ना तो आने का समय है ना ही स्थान। इसलिए इसके विषय में सशंक रहना ही ठीक रहेगा।
          मंत्री मयंद अपनी बात रखते हुए कहते हैं, यह यह रावण का छोटा भाई ही तो है।  इससे मधुर व्यवहार के साथ धीरे-धीरे सब बातें पूछ लेना चाहिए।
       अंत में सचिवों में श्रेष्ठ शास्त्रों के ज्ञान जनित संस्कार युक्त हनुमान जी कहते हैं प्रभु मैं जो भी कहूंगा वह बुद्धिमत्ता के अभिमान के कारण नहीं कहूंगा अथवा किसी कामना से भी नहीं कहूंगा। मैं कार्य की गुरुता को समझ कर यथार्थ कहूंगा। जहां तक गुण दोष की परीक्षा लेने की बात है हमारे लिए अभी संभव नहीं है।
      उसे किसी काम में लगाकर उसकी परीक्षा  लेना मुझे सदोश ही प्रतीत होता है ।
           गुप्तचर नियुक्त करने की बात है तो वैसा करने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता। जो दूर रहता है जिसका वृतांत ज्ञात नहीं है, उसी के लिए गुप्तचर नियुक्त किया जाता है। जो स्वयं सामने ने खड़ा है और और स्पष्ट रूप से अपने विषय में कह रहा है उसके लिए गुप्तचर की क्या आवश्यकता है?
         जहां तक देशकाल का प्रश्न है मेरी बुद्धि के अनुसार यही उत्तम देश और काल है। विभीषण एक दुष्ट पुरुष के पास से चलकर श्रेष्ठ पुरुष के पास आया है। उसने दोनों के दोष और गुणो का विवेचन भी किया है। इसका आगमन सुविचारित है। 
          किसी मंत्री ने कहा है की अपरिचित पुरुषों द्वारा पूछताछ की जाए। जिसने स्वयं के बारे में सब कुछ बता दिया है उससे अपरिचित व्यक्ति पूछताछ करें तो सामने वाले का स्वच्छ मन भी कलुषित हो जाएगा। (हम एक संभावित मित्र को खो देंगे।) यद्यपि दूसरे के मन को समझ लेना संभव नही है, तो भी बातचीत में कहीं दुर्भाव दिखाई नहीं  देता। मुख प्रसन्न है।  इसलिए मुझे कोई संदेह नहीं है। दुष्ट पुरुष कभी भी निशंक हो कर सामने नहीं आ सकता। इसकी वाणी में. भी दोष नहीं है। कोई कितना भी छुपाये मन  का दोष शरीर पर (शारीरिक भाषा केरूप में) दिखाई देता है। विभीषण के आने का कारण भी स्पष्ट है। आपके द्वारा किए गए सत्कार्य, रावण का मिथ्याचार,  बाली का वध,  सुग्रीव का राज्याभिषेक यह सब सुनकर और समझ कर वह यहां आया है।  उसको विश्वास है की श्री राम उसकी रक्षा भी करेंगे और राज्य भी दिलाएंगे। (हनुमानजी द्वारा विभीषण को लंका का राज्य देने की बात कहना,ब हनुमानजी की श्री राम को कूटनीतिक सलाह थी, जिसके बाद किसी भी हालत में विभीषण का रामचंद्रजी का साथ छोड़ने का विचार करना भी संभव नही था।)  इन्हीं सब कारणों से विभीषण को साथ रखना  उचित जान पड़ता है। अंत में प्रभु! उचित अनुचित का निर्णय आपको ही करना है।
         श्री रामचंद्रजी विभीषण को न केवल अपने साथी के रूप में स्वीकार करते हैं, आगे उनका लंकापति के रूप में राज्याभिषेक भी कर देते हैं।
             16 ********** भरोसेमंद महावीर हनुमान**********
          महर्षि वाल्मिकी कहते हैं कि रावण के पराक्रमी भाइयों और पुत्रों का युद्ध में संहार हो जाने के पश्चात रावण का व्यथित होना और उद्वेलित होना  स्वाभाविक था। विभीषण, देवांतक त्रिशिरा, और महा पराक्रमी अतिकाय के मारे जाने के कारण रावण की शक्ति क्षीण हो गई थी। अपने मृत भाइयों और पुत्रों के स्मरण से  रावण की आंखों से अश्रु निकल रहे थे। ऐसे समय में रावण पुत्र इंद्रजीत रावण को दुख और  हताशा से बाहर निकालने के लिए कहता है, राक्षस राज! जब तक इंद्रजीत जीवित है तब तक आप चिंता और मोह में न पड़ीए। मेरे बाणों से घायल होकर कोई भी समरांगण में अपनी रक्षा नहीं कर पाएगा। मेरे बाणों से राम और लक्ष्मण भी बच नहीं पाएंगे। ऐसा कहकर रावण पुत्र मेघनाथ ने युद्ध भूमि में जाने के लिए रावण की आज्ञा प्राप्त कर ली।
        युद्ध भूमि में इंद्रजीत ने नाना प्रकार के दैवी अस्त्रों का प्रयोग कर वानर सेना में हाहाकार मचा दिया, वानरों के शरीर क्षत विक्षत  हो गए। वानरों द्वारा फेके गए चट्टानों, और वृक्षों का इंद्रजीत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वानर सेना के सैनिक लगातार इंद्रजीत के अग्नि तुल्य तेजस्वी बाणो घायल हुए जा रहे थे। वानर सेनापति गंधमादन को तीखे बाणों से घायल कर वीर नल को भी घायल कर दिया। सेनापति मयंद को और गज को भी  युद्ध स्थल में अपने बाणो से बिंध दिया।  जाम्बवंत और नील भी इंद्रजीत के बाणों के प्रहार से घायल होने से बच नहीं पाए। इंद्रजीत ने वरदान में पाए हुए शस्त्रों से सुग्रीव, ऋषभ, अंगद, और द्विविद् को भी घायल कर दिया। अपने बाणों से वानर यूथपतियों को घायल कर इंद्रजीत अब गदाओं और सुवर्ण कांति के बाणों की वर्षा श्री राम और लक्ष्मण जी पर करता है। श्रीरामजी और लक्ष्मण को भी घायल हुआ देख कर विज्योन्मत्त हो जाता है। रावण को जीत का समाचार सुनाने समरांगण से वापस हो जाता है।
         इधर हनुमान जी और विभीषण चिंतित हो जाते हैं ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से67 करोड़ वानर मारे जाते हैं। इन सब के बीच हनुमानजी और विभीषण जामवंत को ढूंढते हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र जामवंत स्वाभाविक वृद्धावस्था से युक्त थे। शरीर में बाण धंसे हुए थे।  उन्हें देखकर विभीषण उनके पास गए और पूछने लगे तात आप जीवित तो है?  विभीषण की आवाज सुनकर जामवंत बोले मैं बाणों से बिंधा हुआ हूं। आंखें खोलकर देख भी नहीं पा रहा हूं। केवल आवाज से पहचान रहा हूं। परंतु उत्तम व्रत के पालक विभीषण यह तो बताओ की माता अंजनी और पवन देव के पुत्र जीवित तो है? जामवंत का यह प्रश्न सुनकर विभीषण ने पूछा ऋक्ष राज आप दोनों राजकुमारों को छोड़कर केवल पवन कुमार हनुमान को ही क्यों पूछ रहे हैं? आपने ना तो अंगद न सुग्रीव ना ही श्री राम पर भी ऐसा  स्नेहा दिखाया है, जैसा आप प्रेम हनुमान जी के प्रति दिखा रहे हैं। जामवंत कहते हैं राक्षस राज सुनो मैं पवन कुमार को इसीलिए पूछता हूं क्योंकि यदि वीरवर हनुमान जीवित हैं तो यह मरी हुई सेना भी जीवित है, ऐसा समझना चाहिए। यदि हनुमान जी के प्राण निकल गए हैं, तो हम लोग जीते हुए भी मृतक के समान हैं। यदि वायु के समान वेगशाली पराक्रमी पवन कुमार हनुमान जीवित है तो हम सब की भी जीने की आशा की जा सकती है। इसी समय हनुमान जी ने आकर जामवंत को विनीत भाव से पैर पड़कर प्रणाम किया। हनुमान जी की आवाज सुनकर जामवंत जी को नया जीवन मिल गया, और उन्होंने महा तेजस्वी हनुमान से कहा वानर शिरोमणि आओ, संपूर्ण वानरों की रक्षा करो।
           जो सेना के सबसे वरिष्ठ नेता का इतने कठिन समय मे भी विश्वास जीत सके, वही तो हनुमान है। जो अपने साथियों के बीच इतनी विश्वसनीयता अर्जित कर ले उसकी सफलता निश्चित है।
       और अंत मे ---
                हनुमानजी ने सुग्रीव को राजपद दिलवा दिया, विभीषण को लंकेश बना दिया, माता सीता का पता लगाकर सारे वानरों के प्राणों का रक्षण ही नहीं की तो श्री रामचंद्र जी को अनुग्रहित भी कर दिया, श्री लक्ष्मण जी को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया। परंतु स्वयं के लिए जो सुग्रीव का मंत्री पद था, उसको भी त्याग दिया और श्री रामचंद्र जी की निष्काम भक्ति में लग गए। ऐसा व्यक्ति ही जो दूसरों की समस्या के समाधान के लिए तो पूरे शिद्दत से लग जाता है, परंतु स्वयं के लिए कुछ नहीं करता, अपनी टीम का अघोषित नेता होता है और और इतना ही नहीं तो जन-जन में भी इतना लोकप्रिय और पूज्य हो जाता है कि आराध्य से अधिक स्वयं आराधक के मंदिर और पूजा स्थान बन जाते हैं।
  💐💐 प्रभु रुद्रा की कृपा से कहे गए दो शब्द श्री हनुमान जी को सादर समर्पित💐💐💐



        
               




            

     










भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन

भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन
          1965 तक कार, टेलीफोन, बंगला यह अमीर होने की तीन निशानियां थी। टेलीफोन के लिए नंबर लगाने के बाद भी बरसो इंतजार करना पड़ता।  अब बैंक लोन के कारण और आर्थिक परिस्थितियों में आये बदलाव के कारण मध्यम वर्गीय परिवार भी इन सुविधाओं का सहजता के साथ उपभोग कर रहे हैं। लैंडलाइन टेलीफोन तो अब कालातीत हो गए हैं।
          मैंने स्वयं 1973 तक यदा कदा ही इसका उपयोग किया होगा। 
1973 में नौकरी मिलने के बाद कार्यालय के टेलीफोन का उपयोग करने में धीरे धीरे सहज होने लगा। कार्यालय में भी केवल बॉस के केबिन में टेलीफोन हुआ करता था। मेरा एक मित्र टेलीफोन डिपार्टमेंट में ही काम करता था। वह कभी कभी बॉस के टेलीफोन पर मुझे 0काल करता। बॉस का प्यून हाल में आकर बताता। बॉस के केबिन में जाकर टेलीफोन पर बात करने में शुरुआत में  भय और संकोच का भाव बना रहता। एक तो बॉस के पास खडे रहकर बात करना , दूसरा नया नया टेलीफोन के उपयोग की घटना। कई बार यह होता कि बोलने वाले हिस्से को कान के पास लगा लेता।
         डायल यह शब्द टेलीफोन के नंबर घुमाने के लिए उपयोग में आता। एक चक्र पर 0        9 तक नंबर होते टेलीफोन नम्बर के हिसाब से उतने बार उन नम्बर को चक्र में घूमना पड़ता। उसके बाद पियानो टाइप के बटन आने लगे। परंतु डॉयल यह शब्द प्रयोग जारी था। बॉस के टेलीफोन पर इनकमिंग काल तो सुन सकते थे। परन्तु बाहर फोन नही कर सकते थे । टेलीफोन में ताला लगा होता था। केवल आफिस यूज के लिए ही आउट गोइंग काल कर सकते थे। कुछ लोगों ने इसका भी मार्ग निकाल लिया था। ताला लगे होने के बावजूद ट्रिन बार को पेरियाडीकली दबाने से  भी फोन लग जाता । वह तकनीक कुछ लोगों को ही आती, क्योंकि उसमें अभ्यास की जरूरत होती। इसी तकनीक से बॉस के न रहने पर लॉक होने के बावजूद टेलीफोन का आउट गोइंग उपयोग कर ही लेते।
         आज तो टेलीफोन डिपार्टमेंट के लोगो का वह महत्व नही रहा, आज के दो दशक पूर्व तक इनका बहुत महत्व हुआ करता था। उसके तीन कारण थे।पहला तो दूर संवाद का यही एकमात्र माध्यम था। दूसरे टेलीफोन का उपयोग उच्च व्ययसाई वर्ग के लोग व्यापारिक बातचीत के लिए करते थे। तीसरा उस समय शहर के बाहर फोन करना मतलब ट्रंक काल करना होता था । पहले स्थानीय एक्सचेंज में ट्रंक काल बुक करना पड़ता था। एक्सचेंज वाले  आपकी बात कब कराएंगे यह निश्चित नही था। दिन भर घर मे टेलीफोन के सामने बैठना पड़ता था। कई बार दिन भर भी काल मेच्योर नही होता था। जब काल आजाता तो उसे ट्रंक काल मैच्योर हो गया कहते। इन सब कठिनाइयों के बीच स्वाभाविक रूप से टेलीफोन में काम करने वालों का बड़ा महत्व था। विशेषकर व्यापारियों को बहुत जरूरत होती।
          इसके बाद के समय मे घर के टेलीफोन से ही ट्रंक काल करने की सुविधा आ गई। जन जन तक इस सुविधा अप्रोअचबल बनाने का काम किया स एस टी डी बूथ ने। खासकर उन मजदूरों के लिए जो बाहर कमाने जाते, उन्हें गांव में रह रहे माता पिता से हप्ते पंद्रह दिन में एक बार बात करने का अवसर मिल जाता।
          टेलीफोन के साथ इंटरनेट भी जुड़ गया, निजी टेलीफोन कंपनियों के आने के बाद टेलीफोन का कनेक्शन आसानी से मिलने लगा । इंटरनेट कनेक्शन लेने पर टेलीफोन का फ्री आफर आने लगा।
देखते ही देखते जिस टेलीफोन के कनेक्शन के लिए वर्षो इंतजार करना पड़ता, और जो अभिजात्यता की निशानी बन गया था, वह अब सर्व साधारण की उपयोगिता बन गई। 
            मोबाइल क्रांति ने तो इसे इतिहास की वस्तु बना दिया।
        
             


भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन
          1965 तक कार, टेलीफोन, बंगला यह अमीर होने की तीन निशानियां थी। टेलीफोन के लिए नंबर लगाने के बाद भी बरसो इंतजार करना पड़ता।  अब बैंक लोन के कारण और आर्थिक परिस्थितियों में आये बदलाव के कारण मध्यम वर्गीय परिवार भी इन सुविधाओं का सहजता के साथ उपभोग कर रहे हैं। लैंडलाइन टेलीफोन तो अब कालातीत हो गए हैं।
          मैंने स्वयं 1973 तक यदा कदा ही इसका उपयोग किया होगा। 
1973 में नौकरी मिलने के बाद कार्यालय के टेलीफोन का उपयोग करने में धीरे धीरे सहज होने लगा। कार्यालय में भी केवल बॉस के केबिन में टेलीफोन हुआ करता था। मेरा एक मित्र टेलीफोन डिपार्टमेंट में ही काम करता था। वह कभी कभी बॉस के टेलीफोन पर मुझे 0काल करता। बॉस का प्यून हाल में आकर बताता। बॉस के केबिन में जाकर टेलीफोन पर बात करने में शुरुआत में  भय और संकोच का भाव बना रहता। एक तो बॉस के पास खडे रहकर बात करना , दूसरा नया नया टेलीफोन के उपयोग की घटना। कई बार यह होता कि बोलने वाले हिस्से को कान के पास लगा लेता।
         डायल यह शब्द टेलीफोन के नंबर घुमाने के लिए उपयोग में आता। एक चक्र पर 0        9 तक नंबर होते टेलीफोन नम्बर के हिसाब से उतने बार उन नम्बर को चक्र में घूमना पड़ता। उसके बाद पियानो टाइप के बटन आने लगे। परंतु डॉयल यह शब्द प्रयोग जारी था। बॉस के टेलीफोन पर इनकमिंग काल तो सुन सकते थे। परन्तु बाहर फोन नही कर सकते थे । टेलीफोन में ताला लगा होता था। केवल आफिस यूज के लिए ही आउट गोइंग काल कर सकते थे। कुछ लोगों ने इसका भी मार्ग निकाल लिया था। ताला लगे होने के बावजूद ट्रिन बार को पेरियाडीकली दबाने से  भी फोन लग जाता । वह तकनीक कुछ लोगों को ही आती, क्योंकि उसमें अभ्यास की जरूरत होती। इसी तकनीक से बॉस के न रहने पर लॉक होने के बावजूद टेलीफोन का आउट गोइंग उपयोग कर ही लेते।
         आज तो टेलीफोन डिपार्टमेंट के लोगो का वह महत्व नही रहा, आज के दो दशक पूर्व तक इनका बहुत महत्व हुआ करता था। उसके तीन कारण थे।पहला तो दूर संवाद का यही एकमात्र माध्यम था। दूसरे टेलीफोन का उपयोग उच्च व्ययसाई वर्ग के लोग व्यापारिक बातचीत के लिए करते थे। तीसरा उस समय शहर के बाहर फोन करना मतलब ट्रंक काल करना होता था । पहले स्थानीय एक्सचेंज में ट्रंक काल बुक करना पड़ता था। एक्सचेंज वाले  आपकी बात कब कराएंगे यह निश्चित नही था। दिन भर घर मे टेलीफोन के सामने बैठना पड़ता था। कई बार दिन भर भी काल मेच्योर नही होता था। जब काल आजाता तो उसे ट्रंक काल मैच्योर हो गया कहते। इन सब कठिनाइयों के बीच स्वाभाविक रूप से टेलीफोन में काम करने वालों का बड़ा महत्व था। विशेषकर व्यापारियों को बहुत जरूरत होती।
          इसके बाद के समय मे घर के टेलीफोन से ही ट्रंक काल करने की सुविधा आ गई। जन जन तक इस सुविधा अप्रोअचबल बनाने का काम किया स एस टी डी बूथ ने। खासकर उन मजदूरों के लिए जो बाहर कमाने जाते, उन्हें गांव में रह रहे माता पिता से हप्ते पंद्रह दिन में एक बार बात करने का अवसर मिल जाता।
          टेलीफोन के साथ इंटरनेट भी जुड़ गया, निजी टेलीफोन कंपनियों के आने के बाद टेलीफोन का कनेक्शन आसानी से मिलने लगा । इंटरनेट कनेक्शन लेने पर टेलीफोन का फ्री आफर आने लगा।
देखते ही देखते जिस टेलीफोन के कनेक्शन के लिए वर्षो इंतजार करना पड़ता, और जो अभिजात्यता की निशानी बन गया था, वह अब सर्व साधारण की उपयोगिता बन गई। 
            मोबाइल क्रांति ने तो इसे इतिहास की वस्तु बना दिया।
        
             


Friday, October 17, 2025

गांव के साप्ताहिक बाजार


भूली बिसरी यादे    1 गॉंव के साप्ताहिक बाजार
       एक समय मे गॉंव का साप्ताहिक बाजार यानी हर सप्ताह आने वाला उत्सव हुआ करता था।
     उस दिन किसान अपने मजदूरों को साप्ताहिक भुगतान करता।छोटे छोटे व्यापारी भी अपने मजदूरों का भुगतान करते। किसान खेत बाडी में उगाई गई सब्जी भाजी को बेचने के लिए या तो बाजार लेकर जाता या छोटे छोटे व्यापारियों को बेच देता। 
       कोई कपड़ा खरीदना हो तो बाजार के दिन की प्रतीक्षा। बच्चे को कोई किताब - कॉपी खरीदना हो तो बाजार की प्रतीक्षा। समोसा खाना हो तो बाजार की प्रतीक्षा। किराना का सामान खत्म हो गया तो बाजार की प्रतीक्षा। सब्जी भाजी खत्म हो गई तो बाजार की प्रतीक्षा। कपड़े धुलना हो तो बाजार के पहले दिन की प्रतीक्षा। बाल बनाना हो तो बाजार के दिन की प्रतीक्षा। किसी काम का आश्वासन देना हो तो बाजार के दिन तक का। उधारी चुकाने के आश्वासन के लिए बाजार का दिन। जूता चप्पल खरीदना हो या रिपेयर करवाना हो तो बाजार तक कि प्रतीक्षा। बच्चे को मिठाई खाना हो तो बाजार के दिन का आश्वासन।
           60 वर्ष पूर्व तक गांव में बाजार के दिन तक के लिए कई धड़कने अलग अलग कारणों से इच्छा पूर्ति के लिए धड़कती रहती। यदि उस दिन इच्छा पूरी नहीं हुई तो फिर सात दिनों तक अगले बाजार के दिन तक के लिए धड़कनों को पुनः धड़कने का काम मिल जाता।
      बाजार का दिन कुछ लोगो के लिए अरमान पूरे होने का दिन होता। कुछ लोगो के लिए जिम्मेदारी पूरी करने की चिंता का सबब
होता।
       सुबह सात बजे से बाजार के दिन नाई आकर चौक पर अपनी बैठक लगा लेता। एक बोरे का टुकड़ा बिछा कर , उस पर अपना वस्तुरा, कैची, कंघा, लाइफ बॉय साबुन, कभी ब्रश होता तो ठीक है। सामने किसी पड़ोस के घर से लाया हुआ पानी का कनस्तर। बस इतनी पूंजी में अपनी दुकान सजा लेता। नाई की बैठक सजते तक एक दो ग्राहक भी जुट जाते। कुछ ग्राहक जो सामान्यतया मजदूर होते या सीमांत किसान, वे नगद देकर बाल बनवाते। पर बड़े किसान जिनकी गांव में   दो चार की ही संख्या, होती वार्षिक अनाज देते। वे बिरित के ग्राहक कहलाते । बिरित यह शब्द संभवतया। व्रत यानी प्रतिज्ञा का अपभ्रंश रहा होगा। साल भर का अनाज देकर नाई साल भर परिवार के बाल बनाने के लिए अनुबंधित हो जाता था। 
            नाईयो को गांव पुश्तैनी तरीके से आंबतित होते थे। जिन गावो में पिता बाल काटता था । लड़का भी उस गाँव के लोगों के बाल काटता था। नाइ केवल बाल काटता था, ऐसा नहीं, तो वह शादी, ब्याह, पूजा पाठ, मृत कर्म में भी हाथ बटाता। यह भी आय का एक साधन होता। परंतु इसके कोई रेट तय नही होता था। मेजबान अपनी हैसियत के अनुसार जो दे दे। चूंकि उसका काम जगह जगह जाकर बाल बनाना होता, तो उसको उस इलाके में हो रही घटनाओं की भी अच्छी जानकारी होती। बाल काटने के लिए लाइन में लगे लोगों की फुरसतिया बातचीत से भी उसको कई जानकारियां मिल जाती। इस प्रकार की जानकारियों से सुसज्ज नाई चलता फिरता इलाके का इनसाइक्लोपीडिया होता। उसकी इसी जानकारी के कारण नाई वैवाहिक संबंध बनाने में मध्यस्थ की भूमिका अच्छी तरह निभाता था। उसकी जानकारी को विश्वसनीय माना जाता। जिन नाइयों के गावँ निश्चित नहीं होते वे बाजार में सुबह से अपनी बैठक लगा लेते। बाजार जानेवाले कुछ ग्रामीण बाजार में घुसने का पहले बाल बना लेते। इस प्रकार नाइ का ग्राम की सामाजिक व्यवस्था में भी  महत्व
पूर्ण स्थान  होता।
    हाँ तो नाई को लेकर इतनी लंबी बात के बाद यह बताना लाजमी है कि बाजार जाने की तैयारी की शुरुवात बाल बनाने से ही होती।
     अब पुनः बाजार की ओर रुख करते हैं। बाजार यानी केवल खरीद फरोख्त का दिन नही होता,  तो यह  मिलने जुलने का महत्वपूर्ण स्थान होता। आसपास के गांवों के मित्रो रिश्तेदारों के साथ सामाजिक संबंधों के नवीनीकरण का स्थान होता बाजार। बाजार में लगभग आठ दस मील दूर के गांवों से लोग आते। उस समय पैदल आना जाना होता , इक्का दुक्का लोगो के पास सायकल होती। कुछ लोग बैल गाड़ी से भी आते। रिश्तेदारी, यार दोस्ति भी इन्ही गांवो तक सीमित होती। बाजार में इन सब रिश्तेदारों से और यार दोस्तोँ से मिलना हो जाता।  बाजार के दिन बाजार केंद्र के गांव में कुछ घरों में मेहमान भी दिखाई देते। लोग सुबह से घर से निकल कर रिश्तेदार के यहां पहुंच जाते। वहां से दोपहर का भोजन कर बाजार जाते। बाजार में मिलने वाले मित्रो के साथ हाफ चाय पीना और उसके बाद सिंगल पान खाना, यानी कि केवल घूमने के लिए बाजार जाने वालों के तहरीफ़ का यही समापन होता।
     बाजार के दिन गांव के सुने रास्ते पर लोगो का आना जाना बढ़ जाता। धुली हुई सफेद शर्ट, धोती और टोपी में सज कर लोग निकलते। घर से निकलने के पहले बालो पर तेल तो लगता ही था । पर चेहरे पर तेल चुपड़ना भी संवरने का अटूट भाग होता। यह ग्राम सुलभ मेकअप था। कुछ लोग चप्पल पहने होते पर अधिकांश नंगे पांव ही होते। महिलाएं भी बाजार जाती। धुले हुए कपड़े बड़ी लाल बिंदी, मांग में बड़ा सिंदूर, कुछ के नाखून ताजे नेल पॉलिश लगे भी होते। हाँ, यह लाल बिंदी आज की जैसी रेडिमेड चिपकने वाली नही होती। महिलाएं पहले बिंदी के आकार का मेन लगाती। उसपर सिंदूर। बाजार के दिन सिंदूर लंबे समय तक लगा रहे , इसका यह इंतजाम होता। लो भाई, अब तो मेन क्या होता है, यह भी बताना पड़ेगा। शहद के छत्ते से शहद निकालने के बाद बचा हुआ अवशेष मेन कहलाता है।........ यही अधिकतम सजना संवरना होता।
     बाजार यह ग्रामपंचायत के लिए आय का साधन भी होता।
दुकानों से दुकान की साइज के हिसाब से टैक्स तय होता था। जिसे पंचायत का ठेकेदार वसूल करता था। जिस पंचायत के अधीन बाजार होता उसे सम्पन्न पंचायत माना जाता।
       बाजार यह प्रेमी प्रेमिकाओं के मिलन का स्थल भी होता। अलग अलग गॉंव में रहने वाले प्रेमी युगल के लिए बाजार के बहाने मिलने का अवसर मिलता। प्रेमी अपनी प्रेमिका को माला फुंदरी से लेकर प्लास्टिक के रंग बिरंगे सस्ते चप्पल भी उपहार में देता। प्रेममिलन का अंत भजिया या समोसे या चना पोहा के नाश्ते के साथ होता। अंत मे पान बनवाकर प्रेमी चुपचाप प्रेमिका के मुह में डाल देता। पान से रेंज होठों को देख कर सहेलियों को चुहलबाजी का विषय भी मिल जाता।
          तीजा के त्योहार में बाजार की रौनक बढ़ जाती। मायके आनेवाली लड़कियों की चेहरे की रौनक और बात बात में खिल खिलाना, यह साबित करता था कि ससुराल से मुक्ति और मायके आजादी का ये भरपूर आनंद ले रही हैं।
             गॉंव के ये बाजार अब भी लगते है। परंतु समय के साथ साथ बाजार का सामाजिक संबंधों  और सरोकारों का मिट्टी से उपजा सोंधा पन समाप्त होता जा रहा है। बाजार खरीद फरोख्त के औपचारिक साधन भर होते जा रहे हैं।
      



       
    




 

भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन

भुली बिसरी यादे 6 अब इतिहास बनता टेलीफोन यानी लैंडलाइन वाला फोन
          1965 तक कार, टेलीफोन, बंगला यह अमीर होने की तीन निशानियां थी। टेलीफोन के लिए नंबर लगाने के बाद भी बरसो इंतजार करना पड़ता।  अब बैंक लोन के कारण और आर्थिक परिस्थितियों में आये बदलाव के कारण मध्यम वर्गीय परिवार भी इन सुविधाओं का सहजता के साथ उपभोग कर रहे हैं। लैंडलाइन टेलीफोन तो अब कालातीत हो गए हैं।
          मैंने स्वयं 1973 तक यदा कदा ही इसका उपयोग किया होगा। 
1973 में नौकरी मिलने के बाद कार्यालय के टेलीफोन का उपयोग करने में धीरे धीरे सहज होने लगा। कार्यालय में भी केवल बॉस के केबिन में टेलीफोन हुआ करता था। मेरा एक मित्र टेलीफोन डिपार्टमेंट में ही काम करता था। वह कभी कभी बॉस के टेलीफोन पर मुझे 0काल करता। बॉस का प्यून हाल में आकर बताता। बॉस के केबिन में जाकर टेलीफोन पर बात करने में शुरुआत में  भय और संकोच का भाव बना रहता। एक तो बॉस के पास खडे रहकर बात करना , दूसरा नया नया टेलीफोन के उपयोग की घटना। कई बार यह होता कि बोलने वाले हिस्से को कान के पास लगा लेता।
         डायल यह शब्द टेलीफोन के नंबर घुमाने के लिए उपयोग में आता। एक चक्र पर 0        9 तक नंबर होते टेलीफोन नम्बर के हिसाब से उतने बार उन नम्बर को चक्र में घूमना पड़ता। उसके बाद पियानो टाइप के बटन आने लगे। परंतु डॉयल यह शब्द प्रयोग जारी था। बॉस के टेलीफोन पर इनकमिंग काल तो सुन सकते थे। परन्तु बाहर फोन नही कर सकते थे । टेलीफोन में ताला लगा होता था। केवल आफिस यूज के लिए ही आउट गोइंग काल कर सकते थे। कुछ लोगों ने इसका भी मार्ग निकाल लिया था। ताला लगे होने के बावजूद ट्रिन बार को पेरियाडीकली दबाने से  भी फोन लग जाता । वह तकनीक कुछ लोगों को ही आती, क्योंकि उसमें अभ्यास की जरूरत होती। इसी तकनीक से बॉस के न रहने पर लॉक होने के बावजूद टेलीफोन का आउट गोइंग उपयोग कर ही लेते।
         आज तो टेलीफोन डिपार्टमेंट के लोगो का वह महत्व नही रहा, आज के दो दशक पूर्व तक इनका बहुत महत्व हुआ करता था। उसके तीन कारण थे।पहला तो दूर संवाद का यही एकमात्र माध्यम था। दूसरे टेलीफोन का उपयोग उच्च व्ययसाई वर्ग के लोग व्यापारिक बातचीत के लिए करते थे। तीसरा उस समय शहर के बाहर फोन करना मतलब ट्रंक काल करना होता था । पहले स्थानीय एक्सचेंज में ट्रंक काल बुक करना पड़ता था। एक्सचेंज वाले  आपकी बात कब कराएंगे यह निश्चित नही था। दिन भर घर मे टेलीफोन के सामने बैठना पड़ता था। कई बार दिन भर भी काल मेच्योर नही होता था। जब काल आजाता तो उसे ट्रंक काल मैच्योर हो गया कहते। इन सब कठिनाइयों के बीच स्वाभाविक रूप से टेलीफोन में काम करने वालों का बड़ा महत्व था। विशेषकर व्यापारियों को बहुत जरूरत होती।
          इसके बाद के समय मे घर के टेलीफोन से ही ट्रंक काल करने की सुविधा आ गई। जन जन तक इस सुविधा अप्रोअचबल बनाने का काम किया स एस टी डी बूथ ने। खासकर उन मजदूरों के लिए जो बाहर कमाने जाते, उन्हें गांव में रह रहे माता पिता से हप्ते पंद्रह दिन में एक बार बात करने का अवसर मिल जाता।
          टेलीफोन के साथ इंटरनेट भी जुड़ गया, निजी टेलीफोन कंपनियों के आने के बाद टेलीफोन का कनेक्शन आसानी से मिलने लगा । इंटरनेट कनेक्शन लेने पर टेलीफोन का फ्री आफर आने लगा।
देखते ही देखते जिस टेलीफोन के कनेक्शन के लिए वर्षो इंतजार करना पड़ता, और जो अभिजात्यता की निशानी बन गया था, वह अब सर्व साधारण की उपयोगिता बन गई। 
            मोबाइल क्रांति ने तो इसे इतिहास की वस्तु बना दिया।
        
             


कीन्हेकर का इतिहास

                         **श्रीराम जयराम जैजैराम**
       अपने हिन्दूसमाज में बहुत प्राचीन समय से ही कुल अथवा वंश की मान्यता रही है। भगवान राम इक्ष्वाकुवंश से थे।जब माता कैकई ने राजा दशरथ से दो बार मांगे, 1राम को चौदह वर्ष का वनवास तथा 2भरत को अयोध्या का राज्यसिंहासन । तब राजा दशरथ बहुत व्याकुल एवं विचलित मनोदशा में थे। यह देखकर राम ने अपने पिता से कहा कि इक्ष्वाकुवंश की यह प्रथा रही है कि "प्राण जाए पर वचन न जाई" इसीलिए मै सहर्ष वन में जाने को तैयार हूं। पिता से उन्होंने कहा कि आप चिंता न कीजिये, मैं अवश्य ही आपने जो वचन माता कैकई को दिया है उसका मैं पालन करूँगा। क्योंकि इक्ष्वाकुवंश की यह रीत रही है।
                 प्रत्येक सुविज्ञ भारतीय अपने वंश या कुल पर गौरव महसूस करता ही है। हम जिस वंश के वंशज है, वह किन्हेकर वंश के नाम से प्रचलित हुआ। हमारा गोत्र कौण्डिन्य है। विदर्भ में कौण्डिन्य ऋषि हुए, जिन्होंने रुक्मिणी हरण में भगवान कृष्ण की मदत की थी। यह स्थान अमरावती के पास कौनडण्यपुर के नाम से स्थित है।
         हमारे दादा भास्कर कीन्हेकर खानदेश अर्थात वर्तमान में कर्नाटक से लगा हुआ महाराष्ट्र प्रदेश का भाग है, से आये थे। शायद उस समय मुस्लिम नवाबों के अत्याचार से पीड़ित हुए बहुत से परिवार उस काल मे वहां से नागपुर में रोजी रोटी के लिए आकर बसे। 
       भास्कर राव कीन्हेकर को तीन पुत्र एवं एक पुत्री ऐसे चार बच्चे हुए । हमारे बड़े पिताजी देवीदास , पिताजी कृष्णराव, व एक चाचा थे,जो बचपन मे ही मृत्यु को प्राप्त हुए। हमारे दादाजी का स्वर्गवास उस समय हुआ जब हमारे बड़े पिताजी व पिताजी किशोरावस्था में ही थे। दादाजी के मृत्यु के पश्चात हमारी दादी ने सम्पन्न परिवारों 0के यहाँ भोजन बना कर परिवार का भरण पोषण, बच्चो की शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था बखूबी निभाई। बड़े पिताजी ने जब मेंट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तब हाई कोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील के पास अर्जनवीस का काम करने लगे, तथा बाद में उनकी आय भी अच्छी होने लगी। हमारे पिताजी
(2) छोटे होने के कारण अपनी पढ़ाई में लगे रहे।
            हमारे बड़े पिताजी हाई कोर्ट में अर्जनवीस का काम करते हुयेअर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ होते गये, तथा अनेक जजों के संपर्क में रहे, तथा उनका अत्यंत विश्वास भी अर्जित किया। लगभग 40,45 वर्ष की अवस्था तक यह उनका कार्य चलता रहा। इस बीच महाल नागपुर वर्तमान संघ बिल्डिंग के पास ही एक मकान खरीद लिया। इस मकान के बाजू में ही अण्णासाहेब देशपांडे का मकान लगा हुआ था। वे भी खानदेश से यहाँ आये थे। बड़े पिताजी का विवाह वर्धा के एक परिवार खलत्कर की लड़की से हुआ। उससे उनको दो पुत्रियां हुई। बड़ी पुत्री का नाम कुसुम व छोटी पुत्री का नाम पुष्पा था।
                 हमारे पिताजी पढ़ने में अत्यंत होशियार थे। वे मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उनकी इच्छा के अनुसार बाद में पुणे के राबर्टसन मेडिकल कॉलेज में अगली शिक्षा के लिए भर्ती हुए।लेकिन जल्द ही कुछ महीनों के बाद उन्होंने वह कालेज छोड़ दिया। उस समय लोकमान्य तिलक का स्वदेशी आंदोलन जोरो से प्रारंभ हुआ था। तथा युवाओं को आव्हान किया गया था कि वे सरकारी कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दें, और सरकारी नौकरी छोड़ी। तथा कॉलेज भी छोड़ा। उस समय अनेक  युवाओं ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और कॉलेज भी छोड़ा। शायद यही कारण था कि पिताजी सरकारी कॉलेज छोड़कर पूना से नागपुर आ गये। पिताजी का विवाह अण्णासाहेब देशपांडे की सबसे छोटी बहन कमला से हुआ। जो बाद में कमलाबाई के नाम से जानि जाने लगी। विवाह के पश्चात शायद पिताजी को अपने दायित्व का बोध हुआ होगा। वे कहीं नौकरी के प्रयत्न में रहे। इसी बीच हमारे एक रिश्तेदार दिनकर राव कोठेकर ने बड़े पिताजी से बातचीत में कहा कि क्या कृष्णराव हमारे जमीदारी में मैनेजर का कार्य करेंगे क्या? बड़े पिताजी जिनको हम आबाजी कहते  थे,अपने भाई कृष्णराव से सलाह मशविरा कर इस नौकरी के लिए तैयार हो गए। श्री कोठेकर की जमीदारी में पौसेरा, मनेरी,कनकी,ननसरी, गांव थे, जो बालाघाट जिले में थे। (3) उनका मुख्य निवास मनेरी ग्राम में ही था।
           हमारे पिताजी इस जमीदारी में मैनेजर की नौकरी के लिए हमारी माताजी कमलाबाई को लेकर नागपुर से मनेरी आ गए। मनेरी ग्राम ब्लॉक मुख्यालय लांजी से पांच किलोमीटर के अंतर पर था। नागपुर से लांजी जाने के लिए नागपुर कलकत्ता रेलवे मार्ग पर गोंदिया रेलवे स्टेशन के पश्चात  आमगांव नामक एक छोटा से स्टेशन था।  वहीं से लांजी जाना पड़ता था। उस समय आवागमन का साधन केवल बैल गाड़ी ही थी।
            मैने पूर्व में ही कहा था कि हमारी एक बुआ थी, वह कोठीवान खानदान में ब्याही गई थी। मैने उन्हें देखा तो नही था , परन्तु उनका एक ही लड़का था, जो दादा कोठीवान के नाम से प्रसिद्ध था। तथा उसकी उम्र हमारे मां के बराबर थी। इसीलिये इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि हमारी बुआ की उम्र हमारे बड़े पिताजी, आबाजी कीन्हेकर से भी अधिक होगी। कोठीवान परिवार हमारे घर से लगभग एक किलोमीटर दूर तुलसीबाग रोड पर प्रायमरी स्कूल के पास ही रहता था। यहां उनका खुद का मकान था। जो काफी बड़ा था, दो मंजिला था। सामने का एक भाग एक सुनार को किराए पर दिया था। दादा कोठीवान के दो चचेरे भाई थे। जो उसी मोहल्ले में अपने अपने खुद के मकान में रहते थे। दादा कोठीवान एक नकलाकार के रूप में  विदर्भ में बहुत प्रसिद्ध थे। उनकी एक नक्कल तांगेवाला उस समय बहुत प्रसिद्ध थी। उन्हें इसके लिए शासन के द्वारा सम्मानित किया गया था। विशेषकर गणेशोत्सव के समय विदर्भ के विभिन्न शहरों में उनकी नक्कल की कार्यक्रम की बड़ी मांग रहती थी। उनका विवाह वर्धा के प्रसिद्ध वकील श्री मनोहरपंत देशपांडे की पुत्री के साथ हुआ था। उन्हें दो पुत्र मदन एवं मोहन थे, तथा तीन पुत्रियां थी। बड़ा पुत्र मदन कोठीवान सरकारी नौकरी में था। तथा मोहन कोठीवान मराठी फिल्मों में सहायक कलाकार की भूमिकाएं किया करता था। इसीलिए वह नागपुर छोड़कर मुम्बई में स्थायिक हुआ था। दादा कोठीवान ने आज के बच्छराज व्यास चौक के पास ही बाकर रोड पर स्टेशनरी की दुकान प्रारम्भ की थी।
 (4)
               दादा कोठीवान की एक लड़की जो सब बच्चों में बड़ी थी,इसीलिए उसे सब माई कहते थे। उसका वास्तविक नाम मुझे  मालूम नही है। उसका विवाह जबलपुर निवासी अगस्ती परिवार में हुआ था। उसके पति श्रीअगस्ती कोऑपरेटिव सोसाइटी में ऑडिटर थे। वे एक बार लांजी भी आये थे। दादा कोठीवान की दूसरी लड़की को नलु कहते थे, उसका विवाह आंबेकर परिवार में  हुआ था। उनके पति आंबेकर की उनके घर के बिल्कुल समीप  ही तुल्सीबाग रोड़ पर महाल में स्टेशनरी की दुकान थी। श्री गोविंद राव  शिल्लेदार बिलासपुर की तीसरी नंबर की बहन भी इसी आंबेकर परिवार में ब्याही गई थी। उनके पति आंबेकर मजिस्ट्रेट थे।
       पूर्व में मैने कहा था कि हमारे बड़े मामा अण्णासाहेब देशपांडे हमारे बड़े पिताजी के मकान के लगे हुए मकान में ही रहते थे। सबसे बड़े मामा अण्णासाहेब, उसके बाद उनसे छोटे अप्पा मामा, उसके बाद भाऊ मामा, उसके बाद तात्या मामा, और सबसे छोटे मामा बाबू मामा थे। अण्णा मामा, अप्पा मामा और बाबू मामा नागपुर में ही रहते थे। भाऊ मामा भुसावल में तथा तात्या मामा नाशिक में रहते थे। अण्णा मामा को मैंने देखा नही था। उनका निधन मेरे जन्म के पूर्व ही हो गया था। परंतु बड़ी मामी जिन्हें अक्का कहते थे ,को दीर्घ जीवन प्राप्त हुआ। चि. भास्कर के जन्म के समय वह लगभग तीन चार महीने लांजी में रही थी। उन्हें दो लड़के तथा चार लड़कियां थी। सबसे बड़े जयंत, उनके बाद प्रभाकर तथा बहिने विमला ताई, छबूताई, उषा एवं बनमाला थी। सभी बहने नागपुर में ही ब्याही गई थी। तात्या मामा को तीन लड़के, 1 अंतु दादा ये रायपुर में pwd कार्यालय बहुत वर्ष तक शंकर नगर  में सुपरिन्टेन्डेन्ट के पद पर थे। उसके बाद वे ट्रांसफर होकर भोपाल गए ,तथा वहीं पर स्थायीक हुए।
     (5)    दूसरे नम्बर के पुत्र बालूदादा नागपुर में ही स्थाईक हुए थे। वे a g आफिस में अकाउंटेंट थे। सबसे छोटे लड़के पद्माकर भोंदू दादा भी सरकारी नौकरी में  मध्यप्रदेश में रहे और वहीं स्थाईक हुए।अप्पा मामा की एक  लड़की थी, जिसको सुशी ताई कहते थे। वह धंतोली नागपुर के पिंगले परिवार में ब्याही गई थी। संघ के प्रसिद्ध कार्यकर्ता   श्री मोरोपंत पिंगले के बड़े भाई जो एक बड़े सरकारी अधिकारी थे उनके साथ ही सुशी ताई का विवाह हुआ था। भाऊ मामा की एक लड़की थी, उसके पति पोस्ट आफिस में कार्यरत थे। तात्या मामा को एक लड़का और एक लड़की थी। लड़का नाशिक में जहां सिक्के बनते थे उस कारखाने में नौकरी करते थे। बाद में वे मुम्बई में स्थायीक हुए। बाबू मामा हलदारपुरा में चिटनीस पार्क के पास  उनका मकान था। उनके  पड़ोस में ही उनकी ससुराल भी थी। वे नगरनिगम स्कूल में स्कूल इंस्पेक्टर थे। उनके तीन लड़के व दो पुत्रियां थी। बड़ा लड़का श्याम मेरे ही उम्र का था, जो मेट्रिक के बाद इम्पीरियल बैंक में नौकरी में  लगा। यही बैंक आगे चलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया हुई । दूसरा लड़का श्याम कनेरा बैंक में तथा तीसरा लड़का अनिल किसी सरकारी कार्यालय में  नौकरी में था। बड़ी लड़की ग्वालियर में ब्याही गई थी। तथा छोटी लडकी , जिसको छोटी कहते थे, देशपांडे को ब्याही गई थी। श्री देशपांडे पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी में  थे।  अपने बालासाहेब देशमुख के साथ  निकट का परिचय था। क्योंकि वे भी अमरावती में नौकरी कर पूरा जीवन बिताया। 
        हमारी मां वगैरह तीन बहने थी। सबसे बड़ी सुंदरी मौसी थी, जो नाना साहब उद्गीरकर को ब्याही गई थी। श्री नानासाहेब उद्गीरकर अकोला महाराष्ट्र के निवासी थे। तथा वहां टाटा की डालडा फैक्टरी में कार्य रात थे। उन्हें तीन लड़कियां व चार लड़के थे। (6) सबसे बड़ी लड़की चम्पूताई अकोला में ही पुरंदरे को ब्याही गई थी। उसके बाद कुसुम ताई श्री भैयाजी पट्टलवार को ब्याही गई थी। सिंधुताई श्री वामोरकर को ब्याही गई थी जो रेलवे में कार्यरत  थे। भैयाजी पट्टलवार अपना गॉंव काटोल छोड़ने के बाद रेडियो स्टेशन में नागपुर में बाँसुरी वादक कलाकार के रूप में कार्य करने लगे थे।  सबसे छोटी लड़की मंदा ताई शिक्षक थी, जो विनायक राव जोशी को ब्याही गई थी। जोशी नागपुर यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे। 
         बबूताई जिसको हम बबू मावशी के नाम से जानते थे, वह धंतोली नागपुर में रहती  थी। वह देशपांडे परिवार में ब्याही गई थी। परंतु उनके पति का देहांत बहुत कम उम्र में हुआ था। वे वकालत करते थे । उनका एक लड़का था, पति के देहांत के  एक वर्ष के पश्चात लड़के का भी देहांत होगया। वैसे उनका जीवन बहुत दुख पूर्ण था। परंतु उन्होंने अपने आप को सम्हालकर टीचर्स की ट्रेनिंग  की। नागपुर मे ही एक प्राइवेट स्कूल में सीताबर्डी में शिक्षिका की  नौकरी करने लगी। वे धंतोली नागपुर में मुले के बंगले में जहां तीन चार किरायेदार और भी थे, किराये से रहने लगी। उनकी विशेषता यह थी कि वे बहुत सामाजिक थी। मोहल्ले में सबसे प्रेममय संपर्क रखती थी। घर मालक मुले साहब भी उनका खूब सम्मान करते थे। उनके ससुराल से उनके भतीजे मुंशी, चाबुक्सवार आदि भी वहाँ पढ़ने के लिए रहते थे। सुदंरी मावशी के लड़के भास्कर,  लड़की मंदा  भी वहीं उनके यहां  रहकर अपनी पढ़ाई की। उनके शोक ग्रस्त जीवन मे उन्हें कभी अकेलापन महसूस नही हुआ। वे मोहल्ले में एक अति मिलनसार के रूप में प्रख्यात थी। तथा सबके अच्छे बुरे समय मे अपनी सेवाएं भी देती थी। वह सब जगह मावशी के नाम से प्रसिद्ध थीं। उनके पड़ोस में ही एक वैद्य परिवार रहता था। उन्ही के भांजे श्री विनायकराव बर्डे के साथ  चि. निर्मला हमारी बहन का विवाह सम्पन्न हुआ था। 
          बड़ी मावशी सुंदरी के दो लड़के 1 मधुकर 2 भास्कर । बड़े लड़के मधुकर ने पढ़ाई कर शिक्षक की नौकरी की व छोटे लड़के भास्कर को पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी मिली। मधु दादा जठार पेठ अकोला में स्थायिक हुए।
   (7) तथा भास्कर दादा ने शेगॉंव में ही  नौकरी का पूरा समय व्यतीत किया, सेवा निवृत्ति के बाद  वे भी अकोला में स्थायिक हुए। सिंधुताई अमरावती में  स्थायिक हुई क्योंकि उनके पति श्री वामोरकर बडनेरा, मूर्तिजापुर व अमरावती में ही अपना सेवा कार्य पूर्ण कर सेवा निवृत्त हुए तथा वहीं स्थायिक हुए। मंदाताई बड़ी मावशी की सबसे छोटी लड़की थी, जो श्री विनायकराव जोशी को जो नागपुर के ही निवासी थे को ब्याही गई। परंतु उनको कोई लड़के बच्चे नही हुए।मंदाताई बाबू मावशी के यहां नागपुर में पढ़कर ही ट्रेनिंग प्राप्त कर तिलक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। उसके पति नागपुर यूनिवर्सिटी में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे।
       बाबू मावशी ने अपने प्रारंभिक जीवन मे  भयंकर दुख सहन किया। परंतु बाद में अपने दुखों को भूलकर एक ऐसा आदर्श जीवन जिया कि पासपड़ोस के छोटे बड़े सभी परिवारों के साथ  स्नेहिल संबंध रखते हुए सबके सुख दुख में सदैव साथ देती रही। इसीलिए वह "जगत मावशी" के रूप में प्रसिद्ध हुई। उनकी मृत्यु के पश्चात वहां के प्रसिद्ध मराठी पेपर तरुण भारत ने उनके बारे में एक काफी लंबा लेख छापा था। 
           हमारे बड़े पिताजी श्री देवीदास भास्कर कीन्हेकर का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। क्योंकि हमारे आजोबा भास्कर राव का निधन बहुत कम उम्र में हुआ था। इसके पूर्व मैने उल्लेख किया है कि हमारी आजी ने प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवारों के यहां रोटी बनाने का कार्य प्रारंभ किया था। वह जैसे तैसे अपने बच्चों का पालन पोषण कर  शिक्षण करती रही। जब हमारे बड़े पिताजी जिनको हम आबाजी कहते थे, व समाज मे भी इसी नाम से प्रसिद्ध हुए, ने मेट्रिक की पढ़ाई के पश्चात वे जिला कोर्ट में  एक प्रसिद्ध वकील के सहयोग से अर्जनवीस का कार्य करने लगे। इस कार्य को वे बहुत ही कुशलता पूर्वक सम्पन्न करने लगे। इस कारण कोर्ट में  अन्य वकीलों से और जजों से उनका संपर्क दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। इससे उनकी धाक सब पर जमने लगी। उनका व्यवहार भी सबसे प्रेमपूर्वक रहता था।
(8)वे बहुत मिलनसार थे। लगभग 45 वर्ष  की उम्र तक उनका यह कार्य उत्तम ढंग से चलता रहा।
             रिश्तेदारों के अलावा भी उनका कुछ परिवारों से  घनिष्ठ संबंध था। एक परिवार श्री कोठेकर का था। वे लांजी (बालाघाट जिला) के समीप मनेरी के जमीदारी के मालिक थे।दूसरे भैया साहेब चावजी थे । जो प्रारम्भ में लांजी पुलिस स्टेशन में सबइंस्पेक्टर रहे। बाद में वे तरक्की करते हुए नागपुर के  डी आई जी पोस्ट तक पहुंच गए, तथा सेवानिवृत्ति के बाद नागपुर में ही तुल्सीबाग महाल में रहने लगे। हम लोग जब भी नागपुर जाते थे तो उनके यहां एक दिन अवश्य व्यतीत करते थे। हम भैया साहब की पत्नी को आत्याबाई कहते थे। अपने खास रिश्तेदारों जैसा ही उनका हमारे परिवार से स्नेहिल संबंध था। अपने अरविंद राव जोशी की आत्या बाई जोशी लका मकान उनके मकान के ठीक पीछवाड़े था। तीसरे माहुरकर परिवार था, जिनसे घनिष्ठ संबंध था। उनकी लीथों प्रेस थी। उनके यहां भी हमारा आना जाना होता था। वे रंगारी जाती के थे। हम उन्हें काका ही कहा करते थे। उनके यहां कोई पर्व उत्सव हो तो हम खाना खाने जाते थे। वे भी एक सम्पन्न व्यक्ति थे। उनके तीन पुत्र थे। दोनों बड़े पुत्र लिथो प्रेस में ही काम करते थे। छोटा पुत्र प्रोफेसर था। उनका मकान बच्छराज व्यास चौक के पास चितार नाम की गली थी, वहां पर था। इसी गली में परम पूज्य गोवलकर गुरुजी का भी मकान था। 
        श्री आबाजी (बड़े पिताजी) बाद में अर्जनवीस का काम छोड़कर उन्होंने बड़कस चौक, वर्तमान में बच्छराज व्यास चौक के पास ही बाकर रोड पर एक स्टेशनरी का दुकान प्रारम्भ किया। बहुत साल तक वह दुकान रही। बाद में उस दुकान को दादा कोठीवान को बेच दी थी। श्री आबाजी का अनेक ब्राह्मण परिवारों में संबंध होने के कारण वे लड़कियों का विवाह संबंध भी जोड़ने का काम  निस्वार्थ समाज सेवा समझ कर करते थे।
         (9)उनका जीवन बहुत संयमित और नियमित था। संध्या को घूमने जाना उनकी उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी। घूमते समय एक दो परिवार से वे मिलते ही रहते थे। हम बहुधा वर्ष में एक बार नागपुर जाते ही थे। तथा एक माह वहां रहकर सभी रिश्तेदारों के यहां एक दो दिन रहते थे। इस प्रकार सभी रिश्तेदारों से अत्यंत निकट का प्रेम संबंध बना रहता था। कभी अकोला महाराष्ट्र में उद्गीरकर मावशी बड़ी मावशी के यहां हो आते थे। 
         श्री आबाजी हम बच्चों को बहुत चाहते थे। अपनी दुकान से हम लोगों के लिए बहुधा खिलौने लाकर देते थे। वे कभी किसी रिश्ते दार के यहां जाते तो हम बच्चो को जरूर ले जाते थे।
      पूर्व में मैंने लिखा है की हमारे पूज्य पिताजी श्री कृष्णराव किन्हें कर किस परिस्थितियों में मनेरी के जमीदार  श्री दिनकर राव कोठे कर के यहां मैनेजर की नौकरी को स्वीकार किया था। श्री कोठेकर एक प्रतिष्ठित जमीदार के रूप में लांजी क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। उनकी पत्नी सौ बनू ताई कोठेकर बालाघाट के प्रासिद्ध वकील नारायण राव  केलकर की पुत्री थी। उनको एक पुत्र श्री मधुकर कोठेकर  तीन पुत्रिया क्रम शह सरलाताई, सुमन ताई व शांता थी। सरला ताई एक डॉक्टर को ब्याही गई थी, जो नागपुर के ही निवासी थे। सुमन ताई श्री वैध परिवार में ब्याही गई थी, वह भी नागपुर के ही निवासी थे। तथा छोटी पुत्री शांता धंतोली नागपुर के सोमलवार परिवार मैं ब्याही गई थी। श्री कोठेकर के जमीदारी में मनेरी लांजी से 5 किलोमीटर दुर गांव, पौसेरा लांजी से लगभग 4 किमी दुर, नन्सरी ग्राम माहाराष्ट्र में लांजी का सीमावर्ती ग्राम था तथा बालाघाट के समीप कनकी ग्राम सम्मीलित थे। बालाघाट में स्टेशन रोड पर ही उनका एक बड़ा बंगला था। इनकी जमीदारी का मुख्यलय  मनेरी ग्राम ही था।
             इनके जमीदारी में दो बहनों की मालकीयत थी। बड़ी बहन चटकी बाई को कोई वारसान नहीं थे। ईसलिए उन्होंने दिनकर राव कोठेकर को दत्तक लिया था। (10)तथा चटकी बाई के मृत्यु के बाद श्री दिनकर राव कोठेकर ये संपूर्ण जमीदारी के मालिक बने। चटकी बाई की छोटी बहन वाईकर परिवार में ब्याही गई थी। बंटवारे में छोटी बहन को करनजा  आमगांव के पास, ददिया बालाघाट के पास, तथा वारासिवनी के पास ये एक गांव इनकी जमीदारी में सम्मीलित थे। वाईकर परिवार में तीन भाई थे तथा माता जी की मृत्यु के पश्चात तीनों भाई में जमीदरी का बटवारा हुआ था।
              मनेरी में एक हनुमान मंदिर था। उसके उसके पुजारी नागपुर के देशकर थे। उनके मृत्यु के पश्चात उनकी पत्नी जो मारुति वाली बाई के  नाम से प्रसिद्ध थी, वहां रहती थी। मनेरी में 9 दिन रामनवमी  का उत्सव बड़े शान से मनाया जाता था। आसपास के गांव से बड़ी संख्या में लोग जत्रा के रूप में एकत्रित होते थे।  राम नवमी के समय श्री कोठेकर परिवार नागपुर से आकर वहां 10 -12 दिन तक  रहते थे। उनके अन्य परिचित व रिश्तेदार भी उपस्थित  रहकर इस उत्सव में भाग लेते थे।  हमारा परिवार भी उस उत्सव में श्री कोठेकर के निमंत्रण पर वहां उपस्थित रहता था। गर्मी के दिनों में कोठेकर परिवार एक महीने के लिए नागपुर से आकर मनेरी में रहते थे। हमारा परिवार भी उस समय  पांच छह दिन उनके साथ रहता था। श्री कोठेकर के बच्चे हमारे पिताजी को मामा मानते थे। उनकी नौकरी  छोड़ने के बाद भी अंत समय तक हमारे परिवार से बहुत ही घनिष्ठ संबंध था। हम श्री कोठेकर की पत्नी को आत्या बाई कह कर पुकारते थे। आत्या बाई का मुझ पर विशेष प्रेम था। इसीलिए जब वे गर्मी में वहां आते, तब पौसेरा, बालाघाट, कनकी में अपने साथ (11)मुझे लेजाते थे। कनकी में एक आम का बड़ा बगीचा था। वहां अनेक प्रकार के आम के वृक्ष थे।
           हमारे पिताजी सुदृढ़ शरीर के और गौर वर्ण के  ऊंचे पूरे थे। वे हॉकी के भी अच्छे खिलाड़ी थे। उनको मराठी, हिंदी, बंगाली भाषा का अच्छा ज्ञान था।  लगभग 3 वर्ष के पश्चात मनेरी जमीदारी की नौकरी छोड़कर वे लांजी  के एक नीमटोला  मोहल्ले में रहने लगे। यहां आकर बटाई में खेती करते तथा वन विभाग में लकड़ी आदि के ठेके लेते। इस प्रकार उनका जीवन निर्वाह होने लगा।  वे लिखे पढ़े होने के करण जिले से कोई भी जिले का बड़ा अफसर जब लांजी आता तो उन्हें मिलने व चर्चा के लिए  बुला लिया जाता। मेरा व बड़े भैया का जन्म लांजी  निमटोला में ही हुआ। 
      पिताजी बाद में डिस्ट्रिकट काउंसिल के सदस्य चुने गए।  न्याय पंचायत के भी एक सदस्य थे। डिस्ट्रिकट काउंसिल के सदस्य के नाते उन्हें लांजी क्षेत्र के स्कूलों  का दौरा निरीक्षण करना पड़ता था।   वे इस कार्य को बड़ी दक्षता व ईमानदारी से निभाते थे। वे अनुशासन प्रिय थे, इसीलिए वे  कोई भी गलत कार्य करने वाले पर बहुत नाराज होते थे। एक बार तहसीलदार ने गांव के ही एक किसान के लगान न देने का करण बताते हुऎ उस किसान की बैल जोड़ी जब्त कर ली। किसान हमारे पिताजी से मिला और अपना कष्ट  बताया। उसके पास लगान पटाने की रसीद थी । पिताजी किसान को लेकर सीधे जिले के कलेक्टर से मिले। व तहसीलदार की शिकायत दर्ज की।  कलेक्टर ने जांच की और तहसीलदार के गलती पर उसे वारनिंग दी।  तहसीलदार पिताजी से माफी मांगने लगा।
            हम लोग पढ़ने के लिए गोंदिया शहर गए।  मैं बड़े भैया और एक बहन तथा मां  के साथ गए । व  रेलटोली में श्री दातार के घर में किराए से रहने लगे।  उस समय मैं सातवी कक्षा में वहां म्युनीसीपल हाई स्कूल मैं प्रवेश लिया। (12) बड़े भैया ने लांजी में ही सातवी कक्षा पास कर ली थी। उनको अस्थमा की शिकायत थी। वह क्रॉनिक हो गया था। अतएव उनकी पढ़ाई बंद  करना पड़ा। परंतु फिर भी  वहां एक माहाराष्ट्रीयन ब्राहमन श्री  लिमये  टेलरिंग का काम करते थे। वहां उनसे टेलरींग सिखने के लिए भैया जाने लगे।  गोंदिया में मंझले भाई जयंत का जन्म हुआ। उस समय मैं आठवीं कक्षा में था। वहां के सरकारी लेडी हॉस्पिटल में मां को भरती करना पड़ा। एक माह तक हॉस्पिटल में मां भारती रही। मां  उस समय बहुत कमजोर हो गई थी।  इसीलिए हमारी बड़ी मौसी सुंदरा बाई उदगिरकर को उसके सेवा सुश्रुसा के लिए वहां बुलवा लिया गया। वह लगभग तीन माह तक वहां रही।  पिताजी लांजी में ही रहते व वहां का अपना काम धाम संभालते।  बीच बीच में वे गोंदिया आते रहते। इस बीच पिताजी ने अपनी सुषुप्त इच्छा डॉक्टर बनने की गोंदिया में पुरी की। गोंदिया में रेलवे में एक विभागीय इंजीनियर श्री नायडू साहब थे, वे होमियोपैथिक के प्रैक्टिशनर थे।  उनकी बड़ी ख्याति थी। अनेक दुर के शहरों से पेशेंट उनके पास चिकित्सा के लिए आते थे। उनकी पहचान श्री काका साहब जोगलेकर (आनंद देशपांडे के आजोबा) से थी। उनके कारण पिताजी का डॉक्टर नायडू से घनिष्ठ परिचय हुआ।  एक दिन उन्होंने अपनी व्यथा उनसे कही। कैसे डॉक्टर होने के लिए पूना गए ,व  वापस आ गए। यह उन्होंने  डॉक्टर नायडू को बताया।  डॉक्टर नायडू ने अपने होमियोपेथी  के ग्रंथ उन्हें पढ़ने के लिए दिये।  कुछ ग्रंथ  उनके बतायेनुसार बाहर से भी मंगवाए थे। ( 13) ग्रंथों का सतत अभ्यास कर पिताजी ने लांजी में ही होमियोपैथी की प्रैक्टिस शुरू की। जल्दही अनेक लोग उनसे दवा लेने आते व स्वास्थ्य लाभ कर प्रसन्न होते। वे फीस नही लेते थे । एक पेटी में दान इच्छानुसार देने के लिए कहते। उनके हाथ मे यश होने के कारण अनेक कठिन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति रोग रहित हुए, यह मैने प्रत्यक्ष अनुभव किया।
              लांजी में शिवरात्रि की बहुत बड़ी यात्रा भरती थी। उस समय मिडिल स्कूल के मैदान में तीन दिन टूर्नामेंट आयोजित किया जाता। बालाघाट, गोंदिया, तुमसर की टीमें वहां आती थी। हॉकी, फुटबाल व कबड्डी के मैच होते। 
                 इस टूर्नामेंट का आयोजन लांजी के प्रतिष्ठित व्यक्ति और सरकारी अधिकारी मिलकर करते थे। एक समिति बनाई गई, जिसमे पिताजी भी उसके सदस्य थे। यह टूर्नामेंट सिविल और विद्यार्थी दोनों के लिए आयोजित होता था।
                  पिताजी स्वयं अपने हाथ से चरखे के द्वारा सूत कताई करते व वहीं के गरेवाल समाज के द्वारा अपने खादी के कपड़े तैयार करवाते थे। 
               वे नियमित भगवत गीता पढ़ते। उन्होंने लोकमान्य तिलक की  गीता रहस्य ग्रंथ का अच्छा अध्ययन किया था। बालाघाट जिले में वे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे।
         (14 )   उन्होंने उन्होंने अपने कृतित्व से 25 एकड़ खेती की जमीन, एवं एक राइस मील खरीदी थी। जनवरी 50 में लांजी में प्लेग का प्रकोप हुआ। लांजी के एक मोहल्ले सुंदर टोला में प्लेग  ज्यादा फैला था।  पिताजी अपने होमियोपैथिक औषधि से चिकित्सा करते । प्रतिदिन 8:00  से 12:00 बजे तक वहां रह कर मरीजों  की निशुल्क सेवा करते।  यह सेवा कार्य लगभग एक माह  चला। उन्हें इसके बाद बुखार ने आ घेरा। डॉक्टर चौधरी का औषधि उपचार चलता रहा। परन्तु उन्हें कोई आराम नहीं  हुआ।  आखिर बुखार ने डबल निमोनिया का रूप ले लिया।  व उनकी हालत गंभीर होती गई। अंत में एक दिन बहुत ही ताबियत बिगड़ी। डॉक्टर चौधरी तथा श्री झोलुजी भार्गव  जो आयुर्वेद के जानकार वैद्य थे, दिन भर बैठे रहे। अचानक रात में उन्होंने कहा रघुपति राघव राजाराम भजन गाने के लिए सब उपस्थित लोगों को कहा। वे भी भजन गाने लगे। भजन के बाद पंडित गौरिकान्त मिश्रा जी को भगवत गीता का 11वां अध्याय पढ़ने के लिए कहा। अध्याय समाप्त होते ही वे बेहोश हो गए। तथा आधा घंटा पश्चात उनके प्राण निकल गए। उस समय घर मे गांव के तीस चालीस लोग उपस्थित रहें। मृत्यु के पूर्व हमारे गांव के प्रतिष्ठित बुजुर्ग व्यक्ति श्री जेठू महाजन ने पित्तजी से कहा कि बच्चों और बाई को कुछ कहो। उन्होंने कहा कि वह परमेश्वर सबका  ठीक ही करेगा। 
        हमारी माताजी ने पिताजी के पश्चात  घर की जिम्मेदारी सम्हाली। उस समय मैं सोलह वर्ष का तथा बड़े भैया वसंतराव 19 वर्ष के थे। उसके बाद मैं दो वर्ष 11वीं व कालेज में नागपुर में शिक्षा ग्रहण किया। व लांजी वापस आया। कुछ दिन खेती और राइस मिल का काम सम्हाला।(15)  उसके बाद में लांजी में ही मुझे शिक्षक की नौकरी करना पड़ा। 
          हमारी माताजी का स्वभाव थोड़ा तेज था। वे क्रानिक अस्थमा से ग्रसित थी। इसीलिए हर हफ्ते अस्थमा के अटेक आया करते थे। फिर भी वे भोजन आदि, तथा घर के और काम किया करती। घर मे कोई व्यक्ति आने पर चाय पिलाना अथवा भोजन के समय कोई आया तो उसे भोजन खिलाना यह उनके स्वभाव में था। गांव के लोग भी विशेषकर गरीब लोग कोई वस्तु या अचार वगैरह मांगने आते तो वह सहर्ष उन्हें देती, किसी को खाली हाथ नही जाने देती। घर मे छह नौकर व तीन बाईयां सदैव काम में रहती। उनसे भी उसका व्यवहार बड़े प्रेम का रहता। 
           गोंदिया जब हम पढ़ने के लिए गए थे, तब सन 1948 में गांधीजी का वध हुआ था। बड़े भैया उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय और नियमित स्वयंसेवक थे। उस समय सत्याग्रह के रूप में कुछ कार्य करने का निश्चय किया गया। क्योंकि उस समय संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध सरकार के द्वारा लगाया गया था। अधिकारियों ने निश्चित किया कि विरोध में आधी रात को शहर भर पाम्पलेट दीवारों में चिपकाएंगे। पाम्पलेट नागपुर से लाने के लिए तीन स्वयंसेवक प्रतिदिन नागपुर जाते। व पहेट को चार बजे ट्रैन से पाम्पलेट लेकर गोंदिया आते। उस समय हमारी माताजी स्वयंसेवक के लिए बेसन भात बनाकर खिलाती। उसके पश्चात वे और अन्य स्वयंसेवक शहर में पाम्पलेट चिपकाने का कार्य किया जाता। स्वयंसेवकों में हमारे बड़े भैया भी सम्मिलित होते थे। 
        (16)     हमारे यहां वर्ष में प्रायः सभी त्यौहार  धूमधाम से  मनाए जाते। विशेषकर नवरात्रि व महालक्ष्मी का त्योहार। भोजन के लिए अतिविशिष्ट व्यक्ति लगभग 30, 40 की संख्या में उपस्थित रहते। वर्ष में एक बार किसी प्रवचनकर्ता का रामायण का कार्यक्रम आयोजित किया जाता। यह लगभग तीन दिन चलता। 
         इस प्रकार हमारी माताजी स्वास्थ्य से कमजोर होने पर भी सभी कार्यों को बड़े उत्साह से सम्पन्न करती। बड़े भैया की शादी होने के बाद लगभग4,5 साल पश्चात उनका स्वर्गवास हुआ। उस समय वे नागपुर के मेडिकल कॉलेज में भर्ती थी। उनकी अंतिम क्रिया विधि नागपुर तथा रामटेक में सम्पन्न हुई। 
         हमारे बड़े भैया वसंतराव का जन्म 29 फरवरी 1931 में लांजी के निमटोला ग्राम में हुआ। वे जब  नौ वर्ष के हुए, उन्हें अस्थमा (दमा) का अटैक आया। तब से वे सतत अस्थमा से पीड़ित रहे। उनकी प्राथमिक व मिडिल की शिक्षा लांजी में ही हुई। परंतु अस्थमा के कारण आगे की पढ़ाई नही कर सके। 7वी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही हम लोग माताजी के साथ अगली पढ़ाई के लिए गोंदिया गए। उस समय मैं छठवी कक्षा पास कर चुका था।  7वी में म्युनिसिपल हाई स्कूल गोंदिया में प्रवेश लिया। वहां हम रेलटोली में रेलवे स्टेशन के पास ही दातार, जो पोस्टल डिपार्टमेंट में कार्यरत थे, उनके मकान में किराए से रहने लगे। बड़े भैया को पिताजी ने टेलरिंग का काम सीखने के लिए श्री लिमये जी के टेलरिंग शॉप में प्रतिदिन जाने की व्यवस्था की।
         ( 17)
                 हम लोग इसी वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में, जो रेल टोली में ही एक प्राइमरी स्कूल के मैदान में लगती थी, वहां प्रतिदिन शाम को जाते थे।  हमारे बड़े भैया बाद में संघ के नियमित व सक्रिय स्वयंसेवक बने।  मैं नियमित रूप से शाखा नहीं जा पाता था, क्योंकि मुझे फुटबॉल और हॉकी खेलने का बहुत शौक था।  इसीलिए मैं हॉकी अथवा फुटबॉल खेलने रेलवे ग्राउंड में खेलने जाया करता था। गोंदिया में रेलवे में बंगाली कर्मचारीयों की बहुत बड़ी संख्या थी, इसीलिए वे लोग वहां की रेलवे लाइब्रेरी में बहुत शानदार दुर्गोत्सव मनाते थे।  दुर्गा जी की मूर्ति बनाने के लिए कोलकोता से तीन चार कलाकार आते थे। इस समय बड़े भैया रोज  उनकी कलाकारी देखने वहां प्रतिदिन जाया करते। व काफी समय वहां व्यतीत करते थे।  दुर्गा जी की मूर्ति तैयार करने में लगभग एक माह लगता था। वह वहां बैठकर निरीक्षण करते कि मूर्ति निर्माण कैसे की जाती है। इस प्रकार उन्होंने मूर्ति बनाना सीख लिया।
              पिताजी की मृत्यु 1950 में हुई। इसलिए हमें गोंदिया छोड़ना पड़ा। व लांजी वापस आ गए। पिताजी की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण खेती आदि की जिम्मेदारी बड़े भैया संभालते थे। उस समय उनकी उम्र 19 वर्ष की और मैं 16 वर्ष का था। गोंदिया से आने के बाद में अगली पढ़ाई अर्थात ग्यारहवीं व कॉलेज के 2 वर्ष नागपुर में जाकर की। 3 वर्ष के बाद मैं लांजी आया तथा 2 वर्ष बड़े भैया के काम में साथ दिया करता।  उसके बाद मुझे लांजी में ही शिक्षक की नौकरी का आदेश मिला और अपनी ड्यूटी पर नियमित जाने लगा। यह अगस्त 1954 की बात थी।
         (18)बड़े भैया ने अपना काम संभालते हुये वहीँ हमारे मोहल्ले निमटोला में संघ की शाखा प्रारम्भ की। और एक अच्छी नियमित चलने वाली शाखा बनी। लगभग प्रतिदिन 25 से 35 बाल एवं तरुण स्वयं सेवक उस शाखा में नियमित उपास्थित रहते थे। बाद में लांजी मुख्य बस्ती में भी संघ की शाखा प्रारम्भ हुई। 
      इस प्रकार संघ के अच्छे एवं जिम्मेदार स्वयंसेवक के रूप में बड़े भैया का नाम प्रसिद्ध हुआ। आमगांव महाराष्ट्र जो लांजी से 22 की मि दूर था, वहां से वरिष्ठ कार्यकर्ता शाखा का निरीक्षण करने महीने में एक बार हमेशा आते थे व मार्गदर्शन भी करते थे। समय बीतने के साथ  लांजी की शाखा की ख्याति बालाघाट जो हमारा जिला मुख्यालय था, पहुंची। वहां के संघ अधिकारी भी लांजी में दौरा करने लगे।  आपातकाल के समय वे  मीसा में जेल भी गए। बालाघाट जिले में जब जनसंघ की पहली बार राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापना हुई तो बालाघाट के साथ ही लांजी, बैहर, कटंगी, वारासिवनी, परसवाड़ा विधान सभा क्षेत्रों में भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई थी। उसमे जनसंघ के विस्तार में बड़े भैया ने बहुत परिश्रम किया था। उन्हें 1982 में जनसंघ (भाजपा ) की तरफ  से लांजी विधान सभा का प्रत्याशी बनाया गया था। उस चुनाव में वे केवल 1900 मतों से पराजित हुए थे। वे 15 वर्ष तक लांजी ग्राम पंचायत के सरपंच भी निर्वाचित हुए थे।
      उन्हें तीन पुत्र उमेश लक्ष्मीकांत एवं रविन्द्र हुए। पुत्रियां क्रमशः शीला कुमुद सुषमा एवं ज्योति हुए । अस्थामा के कारण अंतिम पांच वर्ष बड़े कठिनाई एवं कष्ट के व्यतीत हुए। उनका हृदयाघात होने से सन 1989 में उनका स्वर्गवास हुआ।
                  लेखक बलवंत कीन्हेकर, लांजी, जिला बालाघाट म. प्र.