Sunday, June 7, 2026

कृष्णराव एक स्केच

काश ! उन्हे देख पाता...**कृष्णराव एक स्केच

(एक सामान्य व्यक्ति की असामान्य गाथा) 

      हमारा लांजी का घर लांजी की मुख्य बस्ती से हटकर बसे लांजी के ही एक भाग नीमटोला में स्थित हैं। लांजी के तीन वार्डों का एक मोहल्ला, यह नीमटोला व्यावहारिक रूप से एक छोटे से अलग गांव जैसा ही हैं। इसी गांव में एक सम्पन्न किसान रहा करते थे, जिनका नाम था, जेठु महाजन। सम्भवतया ग्राम पंचायत के निर्माण काल से ही ये नीमटोला से ग्राम पंचायत का वार्ड मेंबर का प्रतिनिधित्व किया करते थे। सांवला रंग, ऊंचा, पहलवानी शरीर, कई बार कोसे का फेटा भी बांधते थे। सम्पन्न किसान के साथ वे वैद्य भी थे। आयुर्वेदिक दवा व नाड़ी का अच्छा ज्ञान था। स्वभाव से सरल थे पर
अक्खड़ एवं गुढ़ राजनीति के तेज-तर्रार खिलाड़ी थे। राजनितिक दांव पेंच में वे कृष्णराव के निकटतम सहयोगी रहे। जरूरत पड़ी तो मसल पावर का उपयोग करने से भी नहीं हिचकते। कृष्णराव के सहयोगी होने के कारण वे कृष्णराव के व्यक्तित्व से प्रभावित थे, अतएव कृष्णराव के जीवन के संस्मरण स्वाभाविक ग्रामीण अतिरंजिता के साथ सुनाते रहते थे। ऐसे समय वे यह सिद्ध करने में कभी न ही चूकते कि कृष्णराव जैसे सधे हुऐ सफल राजनीतिज्ञ के वे ही एक मात्र विश्वसनीय एवं निकटतम सहयोगी थे। यह सिद्ध करते हुए वे स्वयम् को गौरवान्वित अनुभव करते।
            वे अकसर कहा करते थे महाराज (कृष्णराव) की जिले की राजनीति में बड़ी धाक थी। क्षेत्र के बड़े-बड़े मालगुजार व सरकारी कर्मचारी उनसे सलाह लेने आते। जिले के अफसर जब भी दौरे पर आते तो महाराज को मिले बगैर नहीं जाते। छोटे-मोटे कर्मचारी तो महाराज के सामने बैठने की हिम्मत भी नही करते। और जेठू महाजन के पास प्रत्येक विशेषण को सिद्ध करने के लिए कोई न कोई संस्मरण जुबान पर रहता ।
              पूर्वाटोला नामक गाँव जो लांजी के पूर्व में स्थित था, वहां के मालगुजार थे श्री याज्ञिक। उन्हें  कृष्णराव की इस बात पर गर्व था कि वे अकेले मराठी व्यक्ति थे पूरे जिले में, जो न तो सरकारी नौकरी में आये थे, न ही मालगुजार के रूप में स्थापित थे, वरन अपने बलबूते पर अपनी बुद्धिमानी व मेहनत के कारण राजनीती,
व्यवसाय  एवं खेती बाड़ी के इस ऊंचे मुकाम पर पहुंचे। याग्निक जैसे सहज व्यक्ति की यह प्रशंसा उनके अतंर्मन से एक स्वजातीय व्यक्ति कृष्णराव की सफलता कि लिये  निकली भावना थी।
            क्षेत्र के अनेक विद्यार्थियों को कृष्णराव ने गणित व अंग्रेजी की ट्यूशन पढ़ाई थी।उनके विद्यार्थियों के शब्दों  कृष्णराव जैसे पढ़ाने वाले वे एक ही थे। एक होमियोपेथिक डाक्टर की प्रेक्टिस भी कृष्णराव किया करते थे। उनके निधन के १५-२० वर्ष बाद भी लोगों के मुख से उनकी एक सफल एवं सेवा भावी होमियोपेथ होने की अनेक कहानियां सुनने को मिलती।
         हमारा एक घरेलू नौकर था, जो कृष्णराव के समय से काम करता था। उसके मुख से कृष्णराव के व्यक्तित्व का अलग पहलू सुनने को मिलता। उसकी बातों से पता चलता कि कृष्णराव के घर पर कई बार क्षेत्र के गणमान्य नागरिक इक‌ट्ठा होते व रातभर ताश पत्ती का खेल चला करता। सुबह नौकर को उन लोगों से इनाम भी प्राप्त होता। साथ यह नौकर यह भी बताने से नहीं चूकता कि महाराज हमेशा जीतते ही रहते थे। और जब लोग उनके व्यक्तित्व की, सिद्धांत निष्ठ जीवन की बात करते, अपने हाथ से काते हुए सूत की और उससे बने खादी के वस्त्रों की बात करते तो उनका हृदय सृद्धा से भर उठता। बिना जूते चप्पल चलने की आदत उनकी सरलता एवं उसूलों की अलग पहचान थी।
         कृष्णराव के निधन के १६ वर्षों के बाद की घटना हैं। मैंने लांजी से ही मेट्रीक पास किया था। आगे कालेज की पढ़ाई के लिये बाहर जाना था। बालाघाट से बी.एस सी. करने का तय हुआ। बालाघाट जिला केन्द्र होने के कारण व सरकारी पालीटेकनीक कालेज, साइंस कालेज व फारेस्ट ट्रेनिंग सेंटर होने कारण निश्चित रूप से बड़ा शहर था। यद्यपि मैं कभी बालाघाट नही गया था, परन्तु यहां के कोर्ट, वकीलों की जिरह, कलेक्टर आफिस व कालेज की भव्यता का वर्णन गांव के लोगों से सुनता रहता था। 
             जुलाई के माह से बरसात प्रारंभ हो चुकी होती हैं। लांजी से बालाघाट की दूरी 65 कि.मी. हैं बीच में बिना ब्रिज की तीन नदियाँ नाव से पार करनी होती और तीन बार बस बदलना पड़ता । इस सारी अवरोध पूर्ण प्रक्रिया व मिट्टी मुरम की रोड़ होने के कारण लांजी से बालाघाट पहुंचने में अर्थात् ६५ किमी. की दूरी पार करने में सात घंटे लग जाते। बालाघाट में पढ़ने जाने के अधिक उत्साह बालाघाट देखने का था। जुलाई माह के प्रथम सप्ताह में बालाघाट के लिये रवाना हो गये सुबह सात बजे की पहली बस से यात्रा प्रांरभ की व दोपहर दो बजे बालाघाट पहुंचे। प्रांरभ के १५-२० दिन रहने की व्यवस्था एक संस्था के कार्यालय में थी। उस बीच स्थाई रूप से रहने के एक कमरा देखना था।
                       एक दो दिन में कालेज एडमिशन की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद कमरा ढूंढ़ने का अभियान शुरू हुआ। यह बहुत मुश्किल काम हैं, यह मुझे बाद में समझ आया। बिना पहिचान मकान मिलना बहुत कठिन था। हमें एक सेवानिवृत्त अधिकारी श्री गोस्वामी के मकान के विषय में पता चला। हम लोग (मैं व मेरा होने वाला रूम पार्टनर) गोस्वामी जी से मिलने गये। गोस्वामी जी ने हमारा नाम व गांव पूछा मैंने अपना नाम व गांव बताया। किन्हेकर सुनते ही अचानक उनके चेहरे के भाव परिवर्तित हो गये। उन्होंने पूछा क्या कृष्णराव के पुत्र हो मैंने हां में सिर हिला दिया। गोस्वामी जी ने कमरा दिखाया पर किराया अधिक था। उन्होंने मन के भावों को पढ़ लिया। पूछा कितना किराया दे सकते हो? हमने जो किराया बताया उसमें उन्होंने हाँ कर दिया। दूसरे दिन हम लोग समान लेकर आ गये। देखा तो कमरा साफ था। उसमें एक टेबल, कुर्सी दो खाट रखे थे। उतने में गोस्वामीजी भी आ गये उन्होंने स्वयम् के द्वारा लिखित गीता के हिन्दी अनुवाद की पुस्तक मुझे दी। प्रथम पृष्ठ पर उस किताब पर गोस्वामी जो ने लिखा था स्व. कृष्णराव को सादर समर्पित । किताब देते हुए उन्होंने बताया कि कृष्णराव ने गीता का कर्म योग अपने जीवन में उतारा था। मैंने उनसे अपने जीवन में बहुत कुछ सीखा है। यह सब बताते हुए उनके चेहरे पर कृष्णराव के प्रति गहरे आदर के भाव झलक रहे थे।
               मैंने इसकी चर्चा अपने दोनों बड़े भाइयों से की। जो कृष्णराव के सभी मित्रों एवं जान-पहचान के लोगों को जानते थे। परन्तु वे भी गोस्वामी जी से अपरिचित थे। मैं आज सोच रहा हूं बालाघाट जैसे बड़ी जगह में रहने वाला सरकारी अधिकारी ६० कि.मी. दूर गांव में रहने वाले एक किसान से क्यों कर इतना प्रभावित था?
               कृष्णराव के विषय में समाज के प्रबुद्ध एवं सम्पन्न नागारिकों से लेकर उनके नौकर चाकर एवं गाँव के गरीब अनपढ़ लोगों के उदगार, अनुभव एवं भावना कृष्णराव के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व की पहचान कराते। एक दिन हमारे पुराने दो नौकर चिलम में तम्बाकु भरकर कश लेकर चैन से बात कर रहे थे। वे आपस में एक दूसरे से कृष्णराव के विषय में ही बतिया रहे थे। बातचीत में एक नौकर बोलने लगा कि यदि बड़े महाराज (कृष्णराव) इतनी कम उम्र में नहीं मरते तो अब तक आधा निमटोला खरीद लेते। कृष्णराव के सफलता की यह सरल गवाही आज भी मेरे कानों में बसी हैं। यद्यपि उस समय में बहुत छोटा था। आश्चर्य की बात है कि मेरी माताजी जो स्वभाव से ही अल्पभाषी थी, पिताजी के विषय में अधिक नहीं बताती थी। केवल कभी कभार इतना कहती थी कि वे सुबह पांच बजे से जंगल की रसीद काटने काम शुरू करते तो रात तक वे काम में लगे रहते। माँ को हमेशा इस बात का गिला रहा कि इस परिवार ने बहुत कष्टों में संघर्षों के बीच दिन बिताए पर जब अच्छा समय आया तो उसका उपभोग करने के लिए जीवन साथी नहीं रहा। 
              अपने गाँव के लोगों व कृष्णराव के मित्रों से ग्रामीण किस्सा गोई के रूप में टुकड़े-टुकड़े में मिली जानकारी श्रुति स्मृति के आधार पर मेरे जेहन में बसी थी। इसके साथ-साथ बड़े भाइयों के द्वारा भी कभी-कभी  पिताजी कृष्णराव के विषय में कई संस्मरण सुनने को मिलते थे। मुझे बार-बार ऐसा लगता था कृष्णराव के विलक्षण व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विषय में कुछ लिपि बद्ध किया जाये।
        मैं कृष्णराव का सबसे छोटा पुत्र हूं। छह भाई बहनों में सबसे छोटा। मेरे जन्म के कुछ दिन पूर्व ही कृष्णराव का निधन हो गया था। अतएव पिता के नाते मेरे मन में कृष्णराव की कोई भावनात्मक छबि नहीं रही। परन्तु अत्यंत कठिन एवं विपरित परिस्थितियों में भी जीवन की विभिन्न उँचाईयों को छूने वाले सफल व्यक्ति के रूप में कृष्णराव का व्यक्तित्व मुझे पुत्र होने के पूर्वाग्रह के बिना हमेशा प्रभावित करता रहा। यह भी एक आश्चर्य की बात थी कि चाहे गाँव के लोग हो, चाहे मेरे दोनों बड़े भाई मुझे ही कृ‌ष्णाराव के विषय में अपने संस्मरण सुनाते। सम्भवत इसका एक कारण यह भी रहा हो कि, चूंकि मेरा जन्म पिताजी के निधन के बाद हुआ, इसीलिए इन सब लोगों की सहानुभूति मेरे साथ रही हो। इसीलिए कृष्णराव के विषय में मुझे ही ये सब लोग अधिक जानकारी देते रहते हो। पुनः मैं इस बात को कहना चाहता हूं कि मैं जो कुछ लिख रहा हूं वह शुद्ध श्रुति स्मृति के आधार पर लिख रहा हुं, कोई अन्य साक्ष्य या दस्तावेज नहीं हैं,  जिसकों में आधार बना संकू, सिवाय कृष्णराव एक फोटो के जो हमारे गांव के मकान के बड़े दालान में दीवाल पर लगा है। जिसको रात दिन देखकर तो कभी बाल सुलभ मन से बात कर के बहुत कुछ समझ पाया उनके विषय मे।
           पुराने नागपुर का महाल इलाका, संकरी गलियाँ, गलियों के दोनों ओर बने अधपक्के मकान, मकानों के सामने बहता गंदी नालियों का पानी। सी. पी. एंड बरार की राजधानी नागपुर का यह निम्न माध्यम वर्ग के लोगों का यह इलाका था। जहां कारकून, छोटे छोटे  धंधा करनेवाले,  कुछ छोटे कलाकार,  पूजापाठ करने वाले ब्राह्मणों, मिल में काम करने वाले अल्प वेतन भोगियों का यह क्षेत्र था।  पर आर्थिक कठीनाईयो के बावजूद पूरे आत्म सम्मान के साथ  जीने की कला , और बुद्धि विलास इनके  स्वभाव में था। भोजन भरपेट मिले या न मिले पर नैतिक, धार्मिक, और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ जीने वाला यही समाज था।  लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व इसी परिवेश में भास्कर राव कीन्हेकर का परिवार महाल में रहता था। एक पीढ़ी पहले किन्हेकर कर्नाटक से लगे खानदेश से नागपुर आये थे। खानदेश में मुस्लिम शासन था। उनके आत्याचारों से त्रस्त हो कर विदर्भ के कई शहरों में ब्राह्मण परिवार आकर बसे थे। उन्ही के वंशजों में भास्करराव,  उनकी पत्नी तीन लड़के , और एक लड़की का यह भरा पूरा परिवार  था। सबसे बड़ा पुत्र अभी छोटा ही था कि भास्कर राव का निधन हो गया। भास्कर राव की पत्नी ने कुछ सम्पन्न ब्राह्मण परिवारों में भोजन बनाने का काम कर अपने चार बच्चों का पालनपोषण और पढ़ाई की। मंझला पुत्र बीमारी का कम गरीबी का अधिक शिकार होकर अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। माँ ने बड़े भाई देवीदास को उस काल मे इतनी गरीबी के बावजूद मेट्रिक तक पढ़ाई कराई। देवीदास मेट्रिक के बाद एक बड़े वकील के यहां अर्जनवीसी का काम बड़ी सफलता पूर्वक करने लगे। उनके अन्य वकीलों, जजों और सरकारी अधिकारियों के साथ अच्छे तालुकात थे। अब परिवार की हालत पटरी पर आगई थी। छोटा भाई कृष्णराव पड़ाई  में तेज था। बचपन से अल्पभाषि परन्तु स्वाभिमानी स्वभाव के कृष्णराव ने प्रायमरी  एवं मिडिल की परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास की। मेट्रिक के बाद कृष्णराव नागपुर के प्रसिद्ध मारीस कालेज में पढ़ने गये। पढ़ाई में तेज कृष्णराव को मारीस कालेज में प्रोफेसर जोगलेकर का सान्निध्य प्राप्त हुआ। घर की हालात दो समय के भोजन पानी तक के लिए तो ठीक थी पर कालेज की पढ़ाई का खर्च भारी पड़ रहा था। प्रो. जोगलेकर ने कृष्णराव में निहित विशेषताओं को परखा और उन्हें अपना मार्गदर्शन देते रहे। जोगलेकर एक सिद्धांत प्रिय, अनुशासन के साथ एवं सरल जीवन यापन करने वाले प्राध्यापक थे। उस समय देश में राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी। जोगलेकर की भी दृष्टि राजनीतिक गतिविधियों पर बनी रहती। तिलक के भाषणों एवं लेखों से प्रभावित जोगलेकर धीरे धीरे स्वतंत्रता आंदोलन के समीप आते गये। कृष्णराव भी अपने इस प्रिय एवं आदरणीय प्रोफेसर के साथ राजनीति पर घंटों बाते करते। अंग्रेजी राज, स्वतंत्रता, तिलक एवं महात्मा गांधी के विषय में और उनके आंदोलन के विषय पर सार्थक बातचीत व बहस होती। विद्यार्थी कृष्णराव की भी धीरे-धीरे राजनीति में रूचि बढ़ती जा रही थी। परंतु परिवारिक आर्थिक परिस्थितियों एवं महाविद्यालय की पढ़ाई के कारण राजनीति में अपनी सीमाओं को कृष्णराव समझ रहे थे। राजनीति में रूचि के बावजूद वे पड़ाई में एकाग्र रहे व मारीस कालेज से इंटर साइंस की परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास की। आगे किस क्षेत्र में पढ़ाई करना यह अहम सवाल था।
               युवा कृष्णराव को स्वयम् की बुद्धि पर विश्वास था। उनकी इच्छा थी कि आगे डाक्टरी की पढ़ाई की जावे। परन्तु यह इच्छा पूरी होती कैसे? परिवार की हालत ऐसी नही थी कि कृष्णराव की डाक्टरी की पढ़ाई का व्यय बड़े भाई उठा सके। शायद बड़े भाई के लिए यह व्यय जीवन भर की संचित पूंजी से भी पूरा करना सम्भव नहीं था। यह वह काल था जब नाते रिश्तेदारों के पास भी इतनी बड़ी धनराशि की व्यवस्था होना सम्भव नहीं था। फिर भी कुछ रिश्तेदारों व कुछ मित्र परिवारों से यह धनराशि उधारी के रूप में मिल जाये यह प्रयास भी कृष्णराव ने किया, हालांकि यह उनके स्वाभिमानी स्वभाव के प्रतिकूल था। परन्तु उन्हें इस प्रयास में भी सफलता नहीं मिली।
             कृष्णराव का मन मायूस हो गया, पर दिमाग उतनी ही तेजी से काम कर रहा था। असफलता यह शब्द उनके शब्दकोष में नहीं था। अब कृष्णराव ने अंतिम हथियार प्रयोग करने का निश्चय किया। यद्यपि यह जोखिम भरा प्रयोग था। क्योंकि इसके बाद उनके पास खुद के दो हाथों के अलावा कुछ भी बचने वाला नही था। उन्होंने अपने बाड़े भाई से निवेदन किया कि पैतृक मकान के उनके आधे हिस्से के बदले उन्हें आवश्यक धन राशि दे दे।
       यद्यपि बड़े भाई के पास भी इतनी धनराशि नहीं थी। फिर भी  जमापूंजी तथा कुछ राशि परिचितों से उधार लेकर कृष्णराव के लिए बड़े भाई ने कुछ व्यवस्था कर दी। कृष्णराव इस राशि को लेकर पुणे डाक्टरी पढ़ने के लिए रवाना हो गये।
                  पुणे पहुंचकर उन्होंने कालेज में डाक्टरी के लिए प्रवेश ले लिया। कालेज के निकट रहने के लिए कम किराये का कोई कमरा मिलना सम्भव नहीं था। अतएवं कालेज से तीन मील दूर शहर के बाहर एक कमरा किराए पर लिया। कमरा क्या था एक छप्पर को कमरानुमा बना दिया गया था। खुद अपने हाथ से खाना बनाना पड़ता क्योंकि होटल में भोजन बहुत महंगा था। डाक्टर बनने की इच्छा इतनी तीव्र थी कि परछीनुमा कच्चे कमरे में रहने, हाथ से खाना बनाने व तीन मील पैदल आने जाने के बाद भी अपनी पढ़ाई में इतने एकाग्र थे कि उन्हें अपने कष्टों की कोई अनुभूति नहीं होती। साथ मे कुछ ट्यूशन भी करते। कुल मिलाकर सबकुछ ठीक चल रहा था, योजना के अनुसार । पर ईश्वर का विधान कुछ और था।
            वह १९२० के आसपास का काल था। देश का राजनीतिक वातावरण तो गर्म था ही। मन में राजनीति की भावभूमि तो प्रो. जोगलेकर के साथ रहते-रहते बन ही गई थी। फिर भी उस समय राजनीति में सक्रियता नहीं थी। परन्तु इन दो वर्षों में राजनीतिक माहौल और गर्म हो चुका था। एक ओर विप्लव कारियों की गतिविधियां बढ़ गई थी और दूसरी ओर कांग्रेस का आजादी का आंदोलन तीव्रतर होता जा रहा था। कृष्णराव तिलक से प्रभावित थे ही। दूसरे पुणे तिलक की कर्मस्थली भी थी। स्वाभाविक रूप से पुणे का राजनीतिक वातावरण अधिक गरम था। राजनीति के क्षितिज पर महात्मा गांधी का नाम बड़ी तेजी से ऊपर उठ रहा था। कृष्णराव इस राजनीतिक वातावरण से अछूते नहीं रह सकें। नागपुर में युवा मन में दबे राजनीति के बीज पुणे की राजनीतिक गरमी से धीरे-धीर अंकुरित होने लगे थे।  कालेज के विद्यार्थियों का एक समूह धीरे-धीरे आजादी के आंदोलन में सक्रिय हेने लगा था। इन सक्रिय विद्यार्थियों में कृष्णराव भी थे। अब राजनीति का रंग शैने शैने गहराता जा रहा था। यह एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां आदमी कब पूरा रंग जाता हैं उसकों समझ नहीं आता। कृष्णराव के साथ भी ऐसा ही हुआ। विद्यार्थियों के बीच आजादी की चर्चा, बहसों एवं तकरीरों से प्रारंभ हुई राजनीतिक सक्रियता ने कब कृष्णराव को कांग्रेस का कार्यकर्ता बना दिया एवं आजादी की लड़ाई में वे सहभागी वन गये यह कहना कठिन हैं। अब कृष्णराव एक ऐसे रास्तों पर आगे बढ़ रहे थे जो जोखिम भरा था। जिस कमरे में वे रहते थे उस कमरे के मकान मालिक तक यह बात पहुंची। सुधी मकान मालिक ने पुत्रवत कृष्णराव को समझाने की कोशिश की कि इस आजादी के लड़ाई के मार्ग को छोड़ दें व अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें। कुछ मित्रों ने भी समझाने का प्रयास किया। परन्तु कृष्णराव का राजनीतिक अभियान जिद में बदल चुका था। अपनी जिद पर आने पर कृष्णराव किसी की भी नही सुनते थे। अब अपने शुभचिंतकों की सलाह मानना भी उनके लिए सम्भव नही था।
      अंत में वही हुआ जिसका भय था। उस समय कांग्रेस ने युवको को कॉलेज छोड़ने और नौकरी छोड़ने कर कांग्रेस के आंदोलन को मजबूत करने का आव्हान किया। कृष्णराव ने स्वयमेव होकर कालेज छोड़ने का निश्चय कर लिया। कालेज छोड़ने के पीछे एक कारण अग्रेजों के प्रति दिनोंदिन बढ़ता घृणा का भाव भी था। कालेज छोड़ने के बाद पुणे में रहना उनके लिए सम्भव नही था। न तो पुणे में घर था न कोई पारिवारिक या रिश्तेदारी का आधार था, ना ठौर। पास में इतना धन भी नही था कि बिना धन पैदा किये पुणे में रहा जा सके।
             अब कृष्णराव के पास नागपुर वापस आने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। डाक्टर बनने के अपने सपने को अपने हाथों चकनाचूर कर यह हतभाग युवा भारी मन से नागपुर आ गया। नये खून के जिस जोश के साथ पुणे कालेज में आजादी की लड़ाई का सिपाही बनने का जूनून पैदा हुआ था। वह जुनुन नागपुर की कड़वी जमीनी हकीकत के कारण ठंडा पड़ गया। फिर भी अंग्रेजों के प्रति कड़वाहट ज्यों की त्यों थी। इसीलिए तो नागपुर पहुंचकर उस समय के इंटर साइंस पास कृष्णराव ने सरकारी नौकरी नही करने की कसम खा ली। इस प्रतिज्ञा के साथ कृष्णराव ने अपने जीवन यापन का सरकारी नौकरी का एक आयाम अपने हाथों बंद कर दिया।
            नागपुर पहुंच कर अब सरकारी नौकरी के अलावा कुछ न कुछ करना जरूरी था। एक दो छोटे-छोटे व्यवसाय पर विचार भी हुआ। पर पूंजी के अभाव में व्यवसाय का विचार त्यागना पड़ा। चूंकि सरकारी नौकरी नहीं करना था अतः आगे की पढ़ाई भी बेमानी लगने लगी। अब एक ही पर्याय बचा था कि कोई निजि नौकरी करना। छोटी-छोटी नौकरियां कर अपनी गाड़ी को अनमने मन से ढकेलने में लगे रहे। इसी बीच कृष्णराव का विवाह पड़ोस में ही रहने वाले नाना साहेब देशपांडे की छोटी बहन कमला के साथ हो गया।अब पारिवारिक जिम्मेदारियां भी बढ़ गई। परन्तु आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण एवं छोटा भाई होने के कारण भी परिवार में बड़े भाई का वर्चस्व तो चलता ही था वहां तक तो ठीक था। परन्तु घर परिवार के अदंरूनी निर्णयों में भी कृष्णराव व उनकी पत्नी के विचार तक न पूछे जाना कही कृष्णराव के गहरे तक दुखी कर जाता। उस समय इंटर साइंस पास युवक को सामान्य कम पढ़े लिखे लोगों की जैसी नौकरी करनी पड़ती, दूसरे घर के लोग भी उनकी पढ़ाई की कोई कदर नहीं करते, तो इस का प्रभाव उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी पड़ रहा था। इन्हीं सब परिस्थितियों के बीच जीवन का पहिया मंथर गति से आगे बढ़ रहा था मान अपमान, गरीबी और उलाहनों के उबड़ खाबड़ रास्तों के बीच। 
           नागपुर में किन्हेकर परिवार का परिचित का परिवार था कोठेकर का। कोठेकर की बालाघाट जिले में अलग-अलग स्थानों पर बड़ी जमीदारीयां थी। उस काल में कोठेकर बालाघाट जिले के बड़े जमींदारों में गिने जाते थे। कोठेकर परिवार का अधिकांश समय नागपुर में ही बीतता। बीच-बीच में जमीदारी का काम देखने बालाघाट जिले में आते। जमींदार की पत्नी का नाम था बनुताई। बनुताई कृष्णराव की मानी हुई बहन थी। कृष्णराव पर बनुताई का विशेष अनुग्रह भी था। यद्यपि दोनों परिवार में आर्थिक असमानता की बड़ी खाई थी, परन्तु उस काल की यह विशेषता थी कि समाज में धन से अधिक सम्बंधों का महत्व हुआ करता था। दोनों परिवारों ने इच्छित अनिच्छित परिस्थितियों के बीच भी उन सम्बंधों को दूसरी पीढ़ी तक बनाये रखा। बनुताई राजसी व्यक्तित्व की, सुघड़ नाकनक्श एवं गौरवर्णीय महिला थी। सम्पन्नता पूरे व्यक्तित्व से झलकती थी, पर बातों और व्यवहार में नहीं। बनुताई को अपने माने हुये भाई कृष्णराव की अवस्था मालूम थी। उन्हें भी अपनी जमीदारी की देखरेख के लिए एक विश्वसनीय व्यक्ति चाहिए था। एक दिन बनुताई ने बातचीत में यह प्रस्ताव सहज रूप से रखा। बनुताई भी कृष्णराव के स्वाभिमानी स्वभाव से परिचित थी। इसलिए बातचीत में इस बात का पूरा ध्यान रखा कि कृष्णराव इसे एहसान न माने।
वरन बातचीत में बनुताई ने यह जताने की कोशिश की कि कोठेकर परिवार को कृष्णराव जैसे पढ़े लिखे व्यक्ति की जमीदारी सम्हालने के लिए अधिक आवश्यकता है। कृष्णराव ने प्रस्ताव को सुना। विचार करने के बाद बताता हूं यह कहकर प्रस्ताव पर अर्धविराम लगा दिया। कृष्णराव घर आये। प्रस्ताव में अच्छे वेतन की गुंजाइश तो थी। परन्तु जमीदारी का मुख्यालय बालाघाट जिले के सुदूर स्थान मनेरी ग्राम में था जहां परिवार के साथ रहकर पूरी जमीदारी की व्यवस्था देखना था। आमगांव रेल्वे स्टेशन जो केवल पेसेंजर का स्टाप था, से 19, 20 मिल दूर कच्ची सड़क पर बसा गांव था मनेरी। जहां न पढ़ाई की कोई सुविधा थी न अस्पताल या डाक्टर। नागपुर व पुणे जैसे शहरों में रहने वाले कृष्णराव के लिये मनेरी जैसे गांव में रहने का निर्णय लेना कठिन था। दूसरे अपने ही अत्यंत परिचित के यहां नौकरी करना कृष्णराव जैसे स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए असहज लगना स्वाभाविक था। इधर नागपुर में जीवन कड़ी परीक्षा से गुजर रहा था। रिश्तेदारों व परिचितों की बदली नजर कृष्णराव परिवार के लिए असहनीय होती जा रही थी। उधर जमीदार परिवार भी धीरे-धीरे कृष्णराव को मानसिक रूप से जमींदारी के काम के लिए तैयार करने में लगा रहा। क्योंकि जमीदारी के खेती के काम के अलावा, सरकारी काम, कोर्ट कचहरी के काम, जमींदारी का हिसाब-किताब, अलग-अलग गांवों में तैनात जमींदारी के मुलाजिमों पर नजर रखना आदि ऐसे काम थे जिसके लिए कृष्णराव से बेहतर कोई व्यक्ति नहीं हो सकता था। जमींदार परिवार के आग्रह में कृष्णराव को नागपुर की परिस्थितियों से मुक्ति का मार्ग दिखाई दे रहा था। अंततः निम्न मध्यम परिवार का वह युवक जिसने मन में कभी डाक्टर बनने का सपना संजोया था, परिस्थितियों के भंवरजाल में उलझकर नागपुर से 120 कि.मी. दूर अनजान एवं नागपुर या पुणे की तुलना में निर्जन स्थान मनेरी में जाने के लिए मजबूर हो गया। मनेरी जाने की तैयारिया प्रारम्भ हो गई।
               इन सभी निर्णयों को लेने में कृष्णराव के प्राध्यापक जोगलेकर का बहुत मनोवैज्ञानिक सहयोग भी रहा। जोगलेककर के लिए गोंदिया का इलाका परिचित था, जोगलेकर का वह स्थाई निवास भी था। जहां से मनेरी ५० कि.मी. दूर है। खैर! शुभ घड़ी देखकर अंततः मनेरी जाने की तिथि भी निश्चित हो गई, मनेरी पहुंचने के लिए नागपुर से आमगांव की १०० मील की दूरी रेल से पार करनी होती व आमगांव से मनेरी की २० मिल की दूरी बैलगाड़ी से पार करनी होगी।
            रात को नागपुर से निकलने वाली पेसेंजर गाड़ी से निकलना निश्चित हुआ । नागपुर से निकलने के लिए भौतिक तैयारी कम करनी थी, मानसिक तैयारी अधिक करनी था। दो-दो जोड़ी कपड़े टीन की पेटी में रख लिए गये। एक जोड़ी कपड़ा शरीर पर पहना हुआ था ही। ओढ़ने बिछाने के लिए एक एक चादर, कम्बल रख लिए। कुछ खाने का सामान भी साथ था। एक टिन की छोटी पेटी, एक छोटा गठरी नुमा विस्तर और एक छोटा थैला, कुल तीन सामान के साथ तैयार हो गये कृष्णराव दम्पत्ति मनेरी जाने के लिए। परिवार के चारों सदस्य अर्थात बड़े भाई देवीदास व उनकी पत्नी, छोटे भाई कृष्णराव व उनकी पत्नी सशरीर घर में उपस्थित तो थे, मगर मन कही कुछ और सोच रहा था। बचपने से साथ रहने वाला छोटा भाई अब सम्भवतया हमेशा के लिए बाहर जा रहा है इसकी टीस बड़े भाई देवीदास के दिल को कचोट रही थी या भाई के लिए ऐसा कुछ न कर पाने की कि भाई यही नागपुर में रह सके, आत्मग्लानी मन में रही होगी। जो भी हो देवीदास भाई के इस निर्णय से असहमति तो नहीं दिखा पाये पर सहमत भी नहीं हो पा रहे थे। देवीदास की पत्नी के सामने घर में ब्याह कर आई देवरानी कमला के लिए उनके मन मे इस अल्पकाल में बहुत स्नेह बन चुका था। उसे चिंता थी कि दोनों देवर-देवरानी के जाने के बाद घर के सुनेपन का वह कैसे सामना करेगी। कृष्णराव का जीवन का अब तक का महत्वपूर्ण भाग नागपुर ही बीता था, अपने मित्रों परिचितों, शहर की गली, सड़कों और अपने ही दरवाजे से विदाई लेते कृष्णराव के मन का विचलित हो जाना स्वाभाविक था।
           परिचित मुसलमान तांगे वाला ठीक समय पर दरवाजे के बाहर खड़ा होकर भोपू बजाकर आने की सूचना देने लगा। भोपू की आवाज सुन कर किन्हेकर परिवार के चारों सदस्य अपने-अपने विचारों के झंझावत से बाहर आये। दोनों भाइयों ने एक दूसरे को देखा, मूक भाषा में क्षणभर में सारी बाते कह ली व सून ली। कृष्णराव झुककर बड़े भाई प्रणाम करने लगे। बड़े भाई ने मन ही मन अनजान और विजन स्थान की ओर प्रस्थान करते छोटे भाई के लिए भगवान से आशीर्वाद मांगा। दोनों भाइयों की आंखें नम थी,बड़े मुशकिल से अश्रुओं को बाहर आने से रोक रहे थे। जेठानी ने पैर छूते देवरानी को कुछ हिदायते दी, कुछ सावधानियां बताई। कमलाबाई अभी-अभी कुछ दिन पहले तो इस घर में व्याह कर आई थी, इस थोड़े समय में ही जेठ-जेठानी को अपना मान लिया था, इतने शीघ्र उनसे बिदाई का समय भी आ गया, विदाई की वेदना के कारण और अपरिचित स्थान पर अनिश्चित भविष्य के साथ प्रस्थान कि चिंता के कारण दोनों देवरानी जेठानी के आंखों से अबतक व बमुश्किल थमी अश्रुधारा पूरे वेग से निकल पड़ी। तांगेवाले ने स्वभाव के अनुसार फिर से भोपू बजाया। कृष्णराव नम आंखों से एवं उनके पीछे कमलाबाई हिचकियां लेते हुए बाहर आई व तांगे पर दोनों बैठ गये।
                    तांगे वाले ने छत पर छड़ी की रस्सी मारकर घोड़े को चलने का इशारा किया, तांगा रेल्वे स्टेशन की ओर भागने लगा। तांगेवाले के मन में अभी वह उत्साह नहीं था जो पुणे की गाड़ी में कृष्णराव को छोड़ते समय था। वह भी यह जानता था कि कृष्णराव किन परिस्थितियों में नागपुर छोड़कर एक छोटे से गांव में अपनी किस्मत अजमाने जा रहे है। फिर भी तांगेवाला अपनी आदत के मुताबिक रास्ते भर बोलता रहा पर अनुपस्थित दिमाग से। वह तो भला हो कि घोड़ा स्वभाव वश रेल्वे स्टेशन पर रूक गया। अब तांगेवाला भी वर्तमान में आ गया। बिना बात किये उसने एक पेटी व गठरी तांगे से उतार कृष्णराव के हाथ में दे दी। कमलाबाई कृष्णराव के पोछे थैला हाथ में रखे चलने को तैयार हो गई। वाचाल तांगे वाले का मन भी इस क्षण भारी हो गया। तांगेवाला केवल इतना कह पाया भाई ध्यान से जाना अनजानी जगह है, लम्बा सफर है, जनाना साथ में हैं। इतना कहकर तांगेवाले ने मुंह मोड़ लिया कि कहीं कृष्णराव दम्पति उसकी अश्रु भरी आंखे को न देख ले। वह अपने तांगे की ओर तेज गति से चल दिया और कृष्णराव दम्पत्ति प्लेटफार्म की ओर।
                      नागपुर रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़ी नागपुर झारसुगड़ा पेसेंजर गाड़ी के जनरल कम्पार्टमेंट में जाकर कृष्णराव दम्पत्ति ने अपनी जगह बनाली। सामान्य से अधिक ऊंचाई, गोरा रंग ऊंचा भाल प्रदेश कुल मिलाकर सुदर्शन व्यक्तित्व था कृष्णराव था। आने वाले अनजान कल की चिंता के कारण मस्तक पर रह रहकर दिखाई दे रही थी हल्की चिंता की रेखाएं। पर चमकती आंखों में आत्मविश्वास की कमी नहीं थी। सफेद शर्ट, धोती पर काला कोट व काली गोल टोपी पहने कृष्णराव के घनी काली मूंछों के नीचे होंठ कुछ बोलने के प्रयास में कभी-कभी हिलते से महसूस हो रहे थे। शायद अपनी पत्नी से कुछ बात करना चाहते हो, पर स्वभाव से अल्पभाषी कृष्णराव अपनी चिंताओं को पत्नी के सामने उजगार कर उसे और व्यथित नहीं करना चाहते थे। कृष्णराव के बगल में थोड़ा हटकर सिकुड़ी बैठी थी उनकी पत्नी कमलाबाई।
           सामान्य नाक नक्श पर साफ सुथरी मराठी साड़ी पहनी, हाथ में कांच की चुड़िया, कानों में बालियां, सोने के आभूषण के नाम पर पतला सा मंगल सूत्र पहनी, सामान्य ऊंचाई की, सिर पर पल्लू रखी हुई कमलाबाई के पास दो ही विकल्प थे, पहला या तो भविष्य की चिंता करे, अपने पति द्वारा अचानक लिये जाने वाले निर्णयों से पैदा होने वाली अस्थिरता से उसका चिंतित होना स्वाभाविक था। दूसरा विकल्प था कि अपने पति पर पूरा विश्वास कर उसके द्वारा लिए गये निर्णयों पर उसके साथ खड़ी रहे। जीवन में उसने दूसरे विकल्प को ही चुना। जीवनभर न केवल पति के द्वारा लिये गये निर्णयों पर भरोसा रखा, वरन् जीवनभर साथ देने का संकल्प भी हर परिस्थिति में पूरी ईमानदारी से निभाया।
         कितनी भी परेशानी हो- चिंता हो, निद्रा देवी की कृपा से आदमी की सारी चिंताए कुछ समय के लिए क्यों न हो, दूर हो ही जाती हैं। कृष्णराव दम्पत्ति पर भी निद्रादेवी ने कृपा कर दी। बीच में कमलाबाई की नींद खुली तो थोड़ी ठंड का एहसास होते ही उसने थैले से एक चादर निकालकर पति पर धीरे से ओढ़ा दी। प्रतिदिन के स्वभाव के अनुसार सुबह ४.३० बजे कमलाबाई की नींद खुल गई। उसके प्रातः कालीन कार्यक्रमों से निपटते तक पांच बजे कृष्णराव की भी नींद खुल गई। कमलाबाई ने पति के ऊपर ओढ़ाई चादर को थैले में डालकर एक बार अपनी पेटी व गठरी को देखा। कृष्णराव समझ गये पत्नी उतरने की तैयारी कर रही हैं। उन्होंने फिर भी समझाया कि अभी आमगाँव रेल्वे स्टेशन आने में आधा घंटा बाकी है। पर कमलाबाई के सावधान मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं आया। अंततः आमगांव का रेल्वे स्टेशन आ ही गया।
             आमगांव के इस छोटे से रेल्वे स्टेशन पर पेसेंजर गाड़ी एक मिनट रूकती हैं। दोनों पति-पत्नी अपना सामान लेकर शीघ्रता पूर्वक उतर गये। इस रेल्वे स्टेशन का मतलब सीमेंट की चादर से ढका एक बड़ा कमरा उसी कमरे का एक एक्सटेंसन था यात्रियों के रूकने का स्थान याने लकड़ियों के खम्बों के सहारे टिकी सीमेंट की चादर की छत मात्र। खैर, वहां कृष्णराव को रूकना नही था। उन्हें लेने के लिये जो बैलगाड़ी मनेरी से आनेवानी थी वह रेल्वे स्टेशन के बाहर ही मिलनी थी। कृष्णराव सपत्नीक प्लेटफार्म पर बिना रूके स्टेशन के बाहर आ गये । बाहर एक चाय की टपरी थी। वही बैठकर मनेरी से आनेवाली बैलगाड़ी की प्रतीक्षा करनी थी। सामने काली चट्टानों से बनी पहाड़ी तथा आस-पास के आम व पलास के पेड़ स्टेशन की वीरानी को और घनीभूत कर रहे थे। बीच-बीच में पक्षियों का प्रातःकालीन कलरव इस वीरानी को तोड़ने का असफल प्रयास कर रहा था। कृष्णराव ने यह जानते हुए भी कि उनकी पत्नी कमलाबाई उस टपरी पर चाय नहीं पियेगी, चाय के लिए पूछा, कमलाबाई ने जैसी कि अपेक्षा थी, टपरी पर चाय पीने से मना कर दिया। कृष्णराव ने अकेले ही चाय पी। 
         थोड़ी देर में ही बैलगाड़ी आ गई। उस वीरान जगह में गाड़ीवान व कृष्णराव दोनों को एक दूसरे को पहचानने में देर नहीं लगी। फिर भी कृष्णराव ने सुनिश्चित करने के लिए गाड़ीवान से पूछ ही लिया कि क्या मनेरी से आये हो? गाड़ीवान के हां में सिर हिलाते ही कृष्णराव ने खुद के विषय में भी बता दिया। ऊंचे सफेद बैलों को गाड़ी से खोलते हुए सांवले गठीले मेहनती शरीर के गाड़ीवान ने कृष्णराव को कहा कि बैलों को दस मिनट पैरा (धान का चारा) खाकर आराम करने देता हूं। फिर हम लोग चलेंगे। ग्रामीण काल गणना में दस मिनट का अर्थ होता हैं आधा घंटा, आधे घंटे बाद फिर गाड़ीवान ने बैलों को गाड़ी में बांधा, बैलों के पीठ पर प्यार से हाथ घुमाया, कृष्णराव के सामान को बैलगाड़ी के सामने के हिस्से में रखा। कृष्णराव व उनकी पत्नी गाड़ी में रखी घास के उपर बीछी छोटी दरी पर बैठ गये। आगे बीस मील का लम्बा सफर बैलगाड़ी से ही तय करना था। दोनों पति-पत्नी रास्ते में पड़ने वाले पलाश के पेड़ों, बबूल के कटीले वृक्षों के समूहों को व टूकड़े-टूकड़े में दिखाई देती छोटी-छोटी पहाड़ियों, और बीच में पड़ने वाले नदी नालों को
देखते। कहीं तालाब से पानी भरती ग्रामीण महिलायें, कहीं घास की खोज में चराहगाह की ओर जाती गायों का समूह, सब कुछ नया था दोनों के लिए। यह नया पन मन को रम्यता से भर तो देता था। परन्तु दूसरी ओर यह वीरानापन मन को चिंतित भी कर देता था। फिर भी कृष्णराव गाड़ीवान से रास्ते भर बीच-बीच में बात करते रहे। मनेरी में स्वयं के रहने की व्यवस्था के सम्बन्ध में पूछताछ की। जमींदारी के अतंर्गत आनेवाले गांवों की। वहां आने जाने के साधन की भी जानकारी लेते रहे। खेती बाड़ी के कार्य की व जमींदार के यहां सामान्य रूप से चलने वाले कार्य की जानकारी लेते रहे।  कृष्णराव ने इन दो ढाई घंटों में गाड़ीवान से इतनी जानकारी प्राप्त कर ली कि अपने ऊपर आने वाली जिम्मेदारियों का एक खाका उनके मस्तिष्क में बन गया।  तीन चार घंटे बीतते-बीतते बैलगाड़ी लांजी पहुंच गई। लांजी ब्लाक सेंटर था एवं अभी तक रास्ते में पड़े सभी गांवों से बड़ा था। इसी लांजी के अंतिम छोर का  हिस्सा था नीमटोला। नीमटोला में भी जमींदार की बड़ी खेती बाड़ी होने के कारण यहां जमींदार का बड़ा बाड़ा था। गाड़ीवान ने इस बाडे में थोड़ी देर विराम के लिए गाड़ी रोकी। कृष्णराव की पत्नी ने यहां अपने हाथ से चाय बनाई व दोनों ने चाय पी। कृष्णराव ने इस थोड़े समय में बाड़े का जायजा लिया। जमींदार द्वारा नीमटोला में नियुक्त मुखतार से हल्की फुल्की मगर काम की जानकारी प्राप्त की। आधे घंटे बाद कृष्णराव पत्नी सहित फिर बैलगाड़ी में बैठ गये, मनेरी जाने के लिये। उस समय कृष्णराव के मन में कही हल्का आभास भी नही था कि नीमटोला का यह अस्थाई विराम भविष्य में जीवन का स्थाई पड़ाव बनने वाला हैं।
            अभी तक बैलगाड़ी जिस रास्ते से आमगाँव से लांजी तक आई उसे अनमने ढंग से सही पर रास्ता तो कहा जा सकता था। परन्तु नीमटोला से मनेरी का रास्ता रास्ता था ही नही, बैलगाड़ीयों एवं लोगों के आने-जाने के कारण स्वाभाविक रूप से बना उबड़-खाबड़ थल मार्ग था या जल मार्ग यह कहना कठिन था। परन्तु आश्चर्य, बैल व गाड़ीवान उस मार्ग पर भी बड़े आत्म विश्वास से आगे बढ़ रहे थे। प्राणियों में हो चाहे मनुष्य में प्रकृति के अनुसार ढल जाने की अद्भुत क्षमता होती हैं। एक ढेड़ घंटे में हिलती-डुलती बैलगाड़ी मनेरी में जमीदार के भव्य आवास के सामने खड़ी हो गई। इसी आवास को जमीदार बाड़ा कहा जाता हैं। इसी बाड़े के एक हिस्से में कृष्णराव की रहने की व्यवस्था थी। जमीदार की पत्नी ने लगभग एक माह के लिए अनाज व किराना आदि की व्यवस्था कर दी थी। क्योंकि मनेरी जैसे छोटे गांव में किराने की सभी चीजें उपलब्ध नही होती थी।
               अब शुरू हुआ मनेरी का वास्वविक जीवनक्रम एवं साथ शुरू हुआ जिम्मेदारियों से भरा जीवन, वह भी नागपुर के जीवन से बिलकुल अलग। उनकी जिम्मेदारी की प्राथमिकता थी मनेरी ग्राम में स्थित जमीदार की दूर-दूर तक फैली खेतीबाड़ी, तालाब, और अमराई आदि व्यवस्थित करना। दूसरी बड़ी जिम्मेदारी थी, बालाघाट जिले में तीन-चार स्थानों पर फैली जमीदारी का प्रबंधन। इसके साथ जमीदारी का सारा हिसाब-किताव रखना व जमींदारी से सम्बंधित सरकारी मामलों को निपटाना जो स्थानीय पटवारी से लेकर ब्लाक सेंटर लांजी एवं जिला तहसील केन्द्र बालाघाट तक सम्बंधित होते थे। इसके अलावा निकटतम मण्डी गोंदिया एवं जमींदार के निवास स्थान नागपुर तक भी आना जाना होना था।
                  धान की खेती करना अपने आप में बड़ा श्रमसाध्य कार्य हैं। भरी बरसात मे  भिगते हुए खेतों पर खड़े रहना, घुटने भर कीचड़ में घुमना, सांप, बिच्छु जैसे जहरीले प्राणियों से बिना भयखाये कीचड़ घास पानी में रहना यह धान की खेती करने के लिए रोजमर्रा की दिनचर्या होती हैं। कृष्णराव जो नागपुर के जीवन के आदि थे। उनके लिए यह भय व एवं कष्टपूर्ण अनुभव था। परन्तु उन्हेंने अपने कर्तव्य पालन के मार्ग पर ना तो नागपुर की सुविधा पूर्ण दिनचर्या को ना अपनी पढ़ाई के अभिमान को आने दिया। अल्प समय में ही वे इस जीवनक्रम में रच-बस गये थे। शुरूवाती दौर में गाँव के निवासियों को भी विश्वास नहीं था कि नागपुर से आया यह युवक एवं उसकी पत्नी गांव की कठिन परिस्थतियों को आत्मसात कर पाएंगे। इन्हीं कारणों से स्वयं जमीदार भी तो अपना अधिकांश समय नागपुर में ही बिताते थे। गांव वाले जानते थे की बीच-बीच में नागपुर से जमीदारी के प्रबंधन हेतु लाये गये पहले के लोग किस तरह कुछ ही दिनों में नागपुर वापस चले गये। परन्तु कृष्णराव उनमें से नहीं थे एक तो जिस काम को हाथ में लिया उसमें डूब जाना उनके स्वभाव में था। दूसरे अब पुनः नागपुर वापस जाना उनके लिए व्यावहारिक भी नहीं था। कृष्णराव ने बहुत शीघ्र खेती की बारिकीयां सिख ली। यही नहीं तो शहरी होने के आवरण को उतारकर गांव के अनपढ़ सीधे-साधे लोगों के बीच उनका समाजिक सम्बंध भी सुदृढ़ होता गया। उन्होने गांव के आर्थिक, समाजिक एवं सांस्कृतिक ताने-बाने का बहुत नजदीक से अवलोकन किया। कृष्णराव की पत्नी कमलाबाई भी इस ग्रामीण वातावरण में समरस होने लगी। गांव के कुछ परिवारों के यहां आना जाना शुरू हुआ। कृष्णराव के उपर केवल खेती की जिम्मेदारी नही थी तो जमीदारी की इस खेती से बहुत बड़ी मात्रा में उत्पन्न होने वाली उपज को उपयुक्त बाजार में ठीक दाम में बेचने की जिम्मेदारी भी थी। इस हेतु उन्होंने लांजी, बालाघाट, वारासिवनी एवं गोंदिया के मण्डीयों का अध्ययन किया। साथ ही ग्रामीण परिवेश में विद्यमान खरीदी बिक्री के तंत्र को बहुत अच्छी तरह समझा। कृष्णराव किसी भी हालत में बहन की उस कसौटी पर खरे उतरना चाहते थे, जिस विश्वास पर बहन के कहने पर जमींदारी की इतनी बड़ी जिम्मेदारी, उनपर सौंपी थी। इस में कोई शक नहीं था कि कृष्णराव की मेहनत, बुद्धि एवं ईमानदारी के कारण शुरूवाती दौर में ही जमीदार का कृष्णराव ने पूरा विश्वास हासिल कर लिया था।
               कृष्णराव की दिनचर्या केवल मनेरी की खेती तक सीमित नही थी, तो जमींदारी से सम्बंधित सरकारी एवं न्यायालयीन मामलों के लिए उन्हें लांजी और बालाघाट के अफसरों से बारबार मिलकर मामलों का जमींदार के पक्ष में निदान निकालना पड़ता था। यह भी सद्ययुवा कृष्णराव के लिए नया अनुभव था। परन्तु उसकाल में इंटर पास होना भी बहुत बड़ी काबिलियत थी। इन सरकारी काम काजों के निदान में कृष्णराव का पढ़ा लिखा होना बहुत काम आता। कृष्णराव ने सरकारी काम काज के नियम कानूनों एवं न्यायालयीन कार्य पद्धति को अपने इन्हीं अनुभवों के साथ जानना एवं समझना प्रारंभ कर दिया। कुल मिलाकर कठोर, कष्ट साध्य, एवं अभावों से ग्रस्त ग्रामीण जीवन ने कृष्णराव एवं उनकी पत्नी के अदंर किसी भी परिस्थितियों में जीने की ताकत और हौसला पैदा कर दिया जो उनके जीवन की भावी सफलता की बुनियाद थी। आरे-धीरे अनुभवों के साथ बढ़ते बुद्धि कौशल के कारण जमीदारी के सरकारी कामों को शीघ्र निपटाने में उन्हें महारत हासिल होने लगा। इन अनुभवों का लाभ न केवल जमीदार को तो आस-पास के बड़े किसानों, छोटे-छोटे तालुकेदारों को भी होने लगा। जिसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे कृष्णराव मनेरी के आस-पास के गांवों में एक पढ़े लिखे, समझदार एवं समस्या को सुलझाने वाले व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होने लगे। जमींदार के प्रतिनिधि होने का रूतबा तो साथ में था ही। अपनी मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए कृष्णराव अब वर्तमान वातावरण में एक रस होते गये। उपर से थोड़े कठोर व अल्पभाषी कृष्णराव अदंर से उतने ही नरम व दयालु भी थे।  जमीदार का प्रतिनिधि होने के कारण उन्हें बंदूक चलाने का लाइसेंस प्राप्त था। बंदूक चलाने में वे नौसिखिए थे। एक बार बंदूक चलाते-चलाते एक बंदर को गलती से गोली लग गई। बंदर घायल हो गया। घायल बंदर को नौकरों की सहायता से ग्रामीण पशुचिकित्सक के पास तक ले गये। परन्तु बंदर को बचा नहीं पायें। इस घटना ने कृष्णराव को विचलित कर दिया कि उन्होंने भविष्य में बंदूक न चलाने का निर्णय लिया। जबकि उसकाल एवं परिवेश में बंदूक चलाना एक अभिजात्यता थी तथा ऊंची विलासिता पूर्ण जीवन की एक पहचान थी। परन्तु तथाकथित विलासिता एवं अभिजात्यता से दूर रहना, सिद्धांतप्रिय कृष्णराव के लिए कठिन नहीं था। सम्भवतया अल्पभाषी एवं उपर से कठोर दिखने वाले कृष्णराव का व्यापक होता सामाजिक दायरा उनके स्वभाव के इसी आंतरिक करूणा का परिणाम था।
         अब जीवन में स्थाईत्व आ रहा था एवं समरसता भी आ रही थी। इसी बीच कृष्णराव के घर मे पहली संतान ने पुत्र के रूप में जन्म लिया। घर किलकारियों से भर उठा। घर में अनाज, सब्जी भाजी एवं मजदूरों का मोल नाम मात्र था। छोटे से गांव में कोई व्यय भी नही था। निर्व्यसनी कृष्णराव अपने वेतन का बहुत बड़ा भाग बचा लेते थे। वेतन भी उन्हें अच्छा मिलाता था। उस काल में जब शिक्षिक का वेतन केवल २० रू था तो कृष्णराव का वेतन 70 रू मासिक था। कृष्णराव की पत्नी जीवन में आये स्थाइत्व से निश्चिंत थी। कृष्णराव ने इन दो वर्षों की बचत से पत्नी के लिए दो सोने की चुड़िया व मंगलसूत्र भी बना लिये थे। कुछ नगद धन राशि भी जमा कर ली थी। केवल मनेरी में ही नहीं तो आस-पास के गांवों के प्रतिष्ठित परिवारों में भी कृष्णराव को मान-सम्मान प्राप्त हो रहा था। एक व्यक्ति के जीवन में यदि भौतिक सुखों के साथ, सामाजिक सम्मान भी जुड़ जावे तो यह सोने में सुहागा हो जाता हैं। नागपुर के दुर्दिन अब इतिहास के पन्ने बन चुके थे। मनुष्य की यही ताकत एवं कमजोरी भी है कि वह अपने भूतकाल के सुख-दुखों को भूल सकता है व वर्तमान को ही शाश्वत मानता है तथा भविष्य को अपने मु‌ट्ठी में बंद समझने की भूल भी करता है। भविष्य में बनने बिगड़ने वाली तस्वीरों को कोई नही जान सकता। फिर भी भविष्य की खुबसूरत तस्वीर का विचार भी मनुष्य को आभासी सुख तो प्रदान करता ही हैं।
           जमीदार परिवार वर्ष में दो बार नागपुर से मनेरी रहने के लिए आता। सामान्यताः एक माह मनेरी में ही आवास रहता। जमीदारी के हिसाब-किताब को भी वे देखते। इन प्रवासों के दौरान जमीदार परिवार कृष्णराव की बढ़ती सामाजिक प्रतिष्ठा का अनुभव करता। साथ ही कृष्णराव को ठंची उठती आर्थिक परिस्थिति एवं जीवन स्तर को भी जमीदार परिवार देख रहा था। यद्यपि यह भी सच था कि कृष्णराव के कार्यभार लेने के बाद जमीदारी की व्यवस्था में सुधार आया था। फिर भी नागपुर से उठाकर लाये एक गरीब युवक की यह उन्नति कहीं न कहीं जमीदार परिवार को खटकती थी। दूसरी बात कृष्णराव स्वभाव से स्वाभिमानी थे। ऊंचा सिर कर चलने की आदत, तनकर बैठने की स्वाभाव , लम्बे-लम्बे डग भर कर चलना मितभाषिता आदि कृष्णराव की ऐसी आदतें थी जिसके चलते उनकी बाडी लेगंवेज से ही स्वाभिमान एवं आत्म विश्वास झलकता था। जमीदार परिवार ने कृष्णराव पर एहसान तो किये थे। पर वे कृष्णराव पर जितना एहसान किया उससे अधिक उन्हें झुके देखना चाहते थे। जो कृष्णराव के लिए सम्भव नही था। हालाकि कृष्णराव न्यूनतम मर्यादाओं का पालन अवश्य करते। कृष्णराव की पत्नी व जमीदार की पत्नी में मानी हुई ननद-भाभी का सम्बंध था। जो स्वाभाविक रूप से कभी-कभी थोड़े कड़वाहतु में बदल जाता था। जमीदार परिवार के मनेरी आवास के समय पड़ने वाले किसी त्यौहार के अवसर पर कमलाबाई ने नई सोने की चुड़ियां व मंगलसूत्र पहन लिया। जमीदार की पत्नी ने यह देखा तो तत्काल उलाहना देते हुए कहा लगता हैं कृष्णराव ने बहुत सोना जमा कर दिया तुम्हारे लिए। ऐसी वक्रोक्तियां कई बार सुनने को मिलती। एक बार कृष्णराव को लांजी अपने मराठी मित्र परिवार के घर पत्नी के साथ जाना था। उस समय आने-जाने का साधन छकड़ा ही था। कृष्णराव के जाने के लिए नौकर ने बड़े बैलों की जोडी बैलगाड़ी में बांधी। छोटे या बड़े बैलों का खाचर में बांधना भी गांव में स्टेटस होता हैं। जमींदार ने देखा तो नौकर से कह दिया बड़े बैलों को छकड़े में ले जाने की जरूरत नही, छोटे बैल लेकर जाओं। कृष्णराव इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। जीवन के गणीतीय समीकरण भी कितने सरल होते है फिर भी मनुष्य अपने भावावेशों के कारण उन्हें समझ नही पाता जब समझता हैं तब तक देर हो चुकी होती हैं। अहम के साथ भी सरल समीकरण है जब कोई अपने अहम को संतुष्ट करता हैं, तो दूसरी ओर किसी का अहम आहत भी होता हैं, हमे अपने अहम की संतुष्टी का ध्यान तो रहता है पर दूसरे के भी अहम के होने का भास हमें नहीं रहता। कृष्णराव ने ऐसी अनेक छोटी-बड़ी घटनाओं को देखकर समझ लिया कि दोनों परिवारों के बीच अपरोक्ष रूप से पनप रही कड़वाहट कभी भी मर्यादाओं का अतिक्रमण कर सकती हैं। जमीदार परिवार के द्वारा कठिन समय में किए एहसान को कृष्णराव भूले नहीं थे।
           उनके मन में जमीदार के प्रति कृतज्ञता का गहरा भाव था। इसीलिए वे दोनों परिवारों के सम्बंधों को बिगड़ने नही देना चाहते थे। इसके लिए जमींदार की नौकरी भी छोड़नी पड़े तो छोड़ सकते थे। पर्याप्त विचार करने के बाद अतंतः कृष्णराव ने नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया। यह निर्णय लेना कृष्णराव केलिए बहुत सी गम्भीर कठिनाइयां पैदा करने वाला था। पहला अपनी पत्नी को जो नागपुर छोड़कर परिस्थिति के अनिवार्यता के कारण इन दो  वर्षों में मनेरी के ग्रामीण जीवन में समरस हो गई थी, इतने शीघ्र फिर नये संघर्ष के लिये राजी करना। दूसरे स्वंय कृष्णराव के लिए भी, खुद को एक अनजान भविष्य की ओर ठकेलना एक विचारणीय प्रश्न था। अब तो पत्नी के साथ एक बच्चे की भी जिम्मेदारी थी। इतने अच्छे वेतन की नौकरी छोड़कर इस ग्रामीण परिवेश में इतनी आय का नया स्त्रोत कहां से बनेगा? फिर जमीदार परिवार को अपने निर्णय से अवगत कराना, भावनात्मक रूप से बहुत असहज काम था। कुछ भी हो, जमींदार ने न केवल उन्हें छाया दी थी वरन पूरी जमीदारी का सम्पूर्ण जिम्मेदारी सौंपकर विश्वास भी किया था। फिर जमीदार की पत्नी जो कृष्णराव की मानी हुई बहन थी का स्नेह भी इस निर्णय के आड़े आ रहा था। प्रश्न अनेक थे। कठिनाईयां भी बहुत थी। परन्तु अपने हाथों अपना घोंसला बनाना फिर उसे स्वंय तोड़ देना व नये नीड़ के निर्माण में जुट जाना कृष्णराव को फितरत में था। वे अपने निर्णय से उत्पन्न होने वाली असामान्य परिस्थितियों से परिचित थे, भविष्य में उत्पन्न होने वाली कठिन परिस्थितियों का सामना करना भी उन्हें मंजूर था। परन्तु वे अपने हो लोगों के साथ सम्बंधों को बिगाड़‌ना भी नही चाहते थे व मर्यादा के बाहर झुककर अपने स्वाभिमान को दांव पर भी नहीं लगा सकते थे।
          नौकरी छोड़ने के बाद मनेरी जैसे १००-२०२ घरों के गांव में कोई भविष्य दिखाई नहीं दे रहा था। नागपुर वापस जाने का प्रश्न ही नही था। कृष्णराव की नजर लांजी पर थी। जो एक बड़ा ब्लाक सेंटर था। वनोपज का बड़ा केन्द्र था। वनोपज के व्यापार की असीम सम्भावनायें थी। चांवल के उत्पाद‌कों की बड़ी मण्डी थी। पर अव्यवस्थित वाजार व्यवस्था थी। लांजी के चांवल की गोंदिया व नागपुर की मण्डी में बहुत मांग थी। लांजी के सबसे निकट की बड़ी मण्डी गोंदिया एवं बालाघाट थी। पर दोनों मण्डियों को जोड़ने वाले रास्ते पर तीन-तीन नदियां पड़ती, जिस पर बरसात के दिनों में आवागमन पर विराम लग जाता।
       इसके बावजूद चांवल के इस बड़े उत्पादक क्षेत्र के केन्द्र लांजी का चांवल के व्यापार के संदर्भ में महत्व कम नहीं हो जाता था। बालाघाट जिले की राजनिति का भी महत्वपूर्ण केन्द्र लांजी था। लांजी में मिडिल स्कूल भी था। (उस काल में 20,25 मील पर एक मिडिल स्कूल हुआ करता था। सामान्यतया धान-चावल एवं वनोपज का व्यवसाय दस-बारह अग्रवाल परिवारों के हाथ में था। अर्थात् इनका एकाधिकार था। ये क्षेत्र के सम्मानित परिवारों में, गिने जाते थे। जमीदार की नौकरी के दौरान कृष्णराव का लांजी बार-बार आना-जाना होता था। जिससे लांजी के बहुत से सम्भ्रांत परिवारों से कृष्णराव के आत्मीय सम्बंध बन गये थे। माथ-साथ सरकारी मुलाजिमो से भी अच्छा खासा परिचय हो गया था। दूर तक की सम्भावनाओं को अपनी विशिष्ट दृष्टि से पहचानने वाले कृष्णराव ने लांजी में व्यापार को सम्भावनायें देखी। इस निर्णय में जमीदार की उपज को अधिक-अधिक दाम दिलाने के लिये चावल के बाजार की गई गहरी छानबीन का अनुभव भी सहायक सिद्ध हुआ। अतंतः मनेरी की स्थाई सुविधापूर्ण जिंदगी को छोड़कर लांजी में चांवल के धंधे में किस्मत अजमाने का कठोर फैसला कृष्णराव ने ले लिया। 
              अब दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि इसकी सूचना जमीदार परिवार को कैसे देना। इस हेतु वे नागपुर जमीदार परिवार से मिलने निकल पड़े। जमींदार परिवार से मिलकर उन्हें समझाने का प्रयास किया कि बच्चों के भविष्य की दृष्टि से लांजी में मुकाम बनाने का उन्होंने निर्णय ले लिया है। साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि वे मनेरी से केवल पांच मील दूर जा रहे हैं. वक्त जरूरत पर मनेरी आ जा भी सकते हैं। फिर लांजी के नीमटोला ग्राम में भी तो जमीदारी की बड़ी खेती बाड़ी हैं, उसकी भी बीच-बीच में चिंता कर लिया करेंगें। जमींदार परिवार को भी सम्भवतया इस परिस्थिति का हल्का अंदाज था। उन्हें इस बात का संतोष था कि कृष्णराव लांजी में मुकाम बना रहे हैं। जो उनकी जमीदारी का भाग था। अतएव एक विश्वासनीय व्यक्ति कर्मचारी के रूप में न हो तो भी हितैषी के रूप में तो जमींदारी के नजदीक रहेगा। इन्हीं विषयों पर बात चल रही थी कि जमीदार की पत्नी ने ने पूछ लिया कि लांजी में रहोगें कहां? कृष्णराव ने इस विषय पर अभी तक निर्णय नहीं लिया था, अतएव कोई ठोस जवाब नहीं दे पाये। जमींदार की पत्नी ने फिर अपने भाई के प्रति स्नेह के कारण या जमीदारी के जुड़े स्वार्थ के कारण एक अमूल्य सहयोग का प्रस्ताव रखा। बहन ने कहा कि अभी तत्काल रहने के स्थान की चिंता करने की आवश्यकता नहीं, हमारा नीमटोला का बाड़ा खाली पड़ा है, केवल एक मुखतार रहता है, वहाँ कृष्णराव अपने परिवार के साथ रह सकते हैं। उस बाड़े से लगी एकड़ों में फैली जमीदार की कृषि भूमि थी। कृष्णराव के बाड़े में रहने से उस लम्बी चौडी खेती पर कृष्णराव का ध्यान रहेगा, शायद यह भाव भी जमीदार के मन में रहा होगा। जो भी हो कृष्णराव की एक बड़ी समस्या का समाधान भी हो गया व जमीदार के साथ सम्बंध भी बने रहे। यह उस काल की विशेषता थी, या कृष्णराव व कमलाबाई की ईमानदारी या जमीदार परिवार  विशाल हृययता थी,या जमीदार की पत्नी का अपने भाई पर स्नेह, या दोनों परिवारों का मिला जुला स्वार्थ  कहना कठिन है, पर सच यह है कि दोनों परिवारों के बीच विश्वास एवं स्नेह के सम्बंध दूसरी पीढी तक भी बने रहे. कृष्णराव एवं जमींदार के निधन के बादभी। जमींदारी के अंतिम हिसाब किताब तक व कृष्णराव के जाने की बाद की व्यवस्था को बनाने के लिए कृष्णराव कुछ दिन मनेरी में रूके रहे। अब मनेरी छोड़ने की तैयारी भी चालू हो गई। पत्नी कमलाबाई को यद्यपि यह निर्णय पंसद नहीं आया, पर कृष्णराव के निश्चय को अंतिम  मानने वाली पत्नी के लिए कृष्णराव का अनुकरण करने के अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं था। कृष्णराव भी सामान्य नही थे। नागपुर से पुणे के विस्थापन एवं पूणे से नागपुर के विस्थापन के समय कृष्णराव पर उनकी अकेले को जिम्मेदारी थी। मनेरी के दूसरे विस्थापन के समय पत्नी की भी जिम्मेदारी थी। परन्तु अब इस नये विस्थापन के समय पत्नी एवं बच्चे दोनों की जिम्मेदारी थी। एसे में कृष्णराव जैसे व्यक्ति का भी थोड़ा चिंतित होना स्वाभाविक था। परन्तु खुद पर अटूट आत्म विश्वास इस चिंता पर भारी पड़ रहा था। अब मनेरी छोड़कर लांजी (नीमटोला) के लिए प्रस्थान का भी समय आ ग
          एक बैलगाड़ी में घर का सामान लाद दिया गया। दोनों पति-पत्नी छकड़े पर बैठ कर जाने वाले थे। दो ढाई वर्ष तक के मनेरी के बाड़े से भी तो आत्मीयता उत्पन्न हो गई थी। अपने कार्य स्थल से मन लगाये बिना और गहरे स्नेह के सम्बन्ध बनाये बिना व्यक्ति अपने कार्य को पूरी ईमानदारी से अंजाम नहीं दे सकता। और कृष्णराव को इसी विशेषता ने उन्हें सफलता दिलाई। जाते समय कृष्णराव ने आंगन में बंधी सफेद गाय के पीठ पर बड़े स्नेह से हाथ फेरा। गाय भी सर झुकाये खड़ी रहो। पास खड़े नौकरों के कंधे पर हाथ रखकर सबके हाथ पर कुछ पैसे रखे। नौकरों के चेहरे पर उतर आया विदाई का दर्द साफ दिखाई दे रहा था। निकलते-निकलते कमलाबाई ने पूरी श्रध्दा के साथ आंगन में लगी तुलसी को घुटनों के बल बैठ कर प्रणाम, किया। अपने हाथों लगाये गेंदे व मोगरे के पौधों पर एक स्नेहपूर्ण दृष्टि डाली।
             मनुष्य कितना कुछ बोता हैं पर सब कुछ हर स्थान पर अपने साथ नहीं ले जा सकता। इस श्मसान वैराग्य के दर्शन बार-बार व्यक्ति को होते हैं, इसके चावजूद व्यक्ति पुनः बोने के व काटने के काम में लग जाता है। इसीलिए दुनिया चल भी रही है। बैलगाड़ी पर बैठे कृष्णराव दम्पत्ति को विदाई देने मनेरी के आत्मीय परिवार भी उपस्थित थे। भरे हृदय से कृष्णराव ने हाथ जोड़कर सब लोगों से बिदाई ली, कमलाबाई की व्यथा उसके आंसुओं से भीगे पल्लू में सँचित हो गई। दो वर्षों में कृष्णराव परिवार ने मनेरी के लोगों से इतने अत्यन्त आत्मीय सम्बंध बना लिये कि वर्षों उनका हमारे घर आना जाना बना ही नहीं रहा तो कृष्णराव के राजनीतिक उतार-चढ़ाव में व उनके बड़े पुत्र के राजनीतिक केरियर में भी ये सम्बंध पचास वर्षों तक लाभदायी सिद्ध हुए। 
                गाड़ीवान ने भी बेमन से छकड़े को धोरे-धीरे आगे बढ़ाया और छकड़े की गति के साथ-साथ कृष्णराव दम्पत्ति भी धीरे-धीरे बिदाई के धुंध के बाहर आने लगी। एक डेड घंटे बाद बैलगाड़ी नीमटोला (लांजी) पहुंची। कृष्णराव परिवार ने नौकरों की सहायता से अपना सामान उतारा व इस नई ग्रहस्थी को फिर से स्थापित करने में जुट गये।
         यह उस काल को बात है जब सी पी बरार प्रांत हुआ करता था। जीसमें छत्तीसगढ़ महाकोशल और विदर्भ आते थे। कृष्णराव ने जमीदार की सुविधापूर्ण नौकरी छोड़कर लांजी आने का फैसला किया। उधर लगभग इसी समय कृष्णराव के पथप्रदर्शक प्रोफेसर जोगलेकर ने भी प्राध्यापकी छोड़कर पूर्णतः स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काम करने का फैसला लिया। नौकरी छोड़कर जोगलेकर गोंदिया में स्थाई निवास बनाकर रहने लगे। जोगलेकर बहुत समय तक गोंदिया नगर पालिका के चेयरमैन रहे । विदर्भ के प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं में उनकी गिनती होती थी। जमींदारी की नौकरी के समय भी कृष्णराव का वर्ष में दो बार नागपुर जाना होता तो जोगलेकर से अवश्य मिलते। स्वंय के जीवन के निजी निर्णयों से लेकर राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन व कांग्रेस की बाते होती रहती। परन्तु अब जोगलेकर के गोंदिया आने के बाद ये मुलाकाते बढ़ने लगी। विचारों का आदान-प्रदान भी बढ़ा। कृष्णराव जिस प्रकार का अस्थाई जीवन जी रहे थे उसमें राजनीतिक आंदोलन के लिए कुछ अधिक करने को सम्भावना नहीं थी। फिर भी जोगलेकर हमेशा कृष्णराव को जीवन के कठिन समय में भी ईमानदारी, साफगोई न छोड़ने की सलाह देते रहें। आंदोलन में सक्रिय होने के लिए इन परिस्थितियों में कहना उचित नहीं, यह वे भी जानते थे। परन्तु व्यक्तिगत जीवन में गांधीवादी दृष्टि अपनाने का आग्रह हमेशा रहता। लम्बे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे जोगलेकर कृष्णराव के अंदर छिपी राजनीतिक सम्भावनाओं को पहचानते थे। भविष्य में लांजी व बालाघाट में आंदोलन के लिये योग्य एवं विश्वसनीय व्यक्ति की आवश्यकता जोगलेकर को भी थी और वह व्यक्ति कृष्णराव से बेहतर उनके लिए कोई और नहीं हो सकता था। कृष्णराव जोगलेकर के ज्ञान, राजनीतिक विचार, कार्यपध्दति एवं समर्पित, सुचितापूर्ण जीवन से बहुत प्रभावित थे। गांधीवाद जोगलेकर के व्यक्तिगत जीवन में बस गया था। यद्यपि कृष्णराव ने इस बीच सक्रिय आंदोलन में भाग नहीं लिया पर यही वह समय था जब जीवन भर पैर में चप्पल न पहनने का निर्णय लिया। स्वयं अपने हाथ से चरखे से धागा बुनने व उस धागे से बने कपड़े पहनने का क्रम चालू हुआ। अपने हाथ से बना धागा वे स्थानीय कपड़ा बनाने वाले गडवाल समाज को देते, जो कपड़ा बनाकर वापस करते। यह क्रम कृष्णराव जोवनभर निभाते रहे। जीवन की व्यावहारिकता ‌के साथ सिद्धांतों का अदभूत समन्वय कर चलने की कला कृष्णराव में थी।
                लांजी पहुंचकर शुरुवात में वनोपज के छोटे मोटे ठेके लेने लगे। उसके बाद स्थानीय स्तर पर धान का छोटा-मोटा व्यापार कृष्णराव ने शुरू कर दिया। उनके पास जो जमापूंजी थी उसमें, उनके लिए इससे अधिक बड़ा व्यवसाय करने की क्षमता नहीं थी। और इस छोटे व्यवसाय से जीवन धीरे धीरे चलने लगा था। कृष्णराव एक सुबह जमीदार बाड़े के दालान में बैठे चाय की चुस्कीयों ले रहे थे। बाड़े के सामने थी एकड़ों में फैली जमीदार की खेती। इस खेती का बड़ा भाग ठेके पर दे दिया जाता था व कुछ हिस्से में जमीदार अपने नौकरों से खेती कराते थे। चाय के प्याले से निकलती भांप के पीछे कृष्णराव को एक धुंधली राह दिखाई देने लगी। क्यों न जमीदार द्वारा छोटे कृषकों को ठेके पर दी जाने वाली जमीन को स्वयम ठेके पर लिया जाये। यह धुंधली राह स्पष्ट होने लगी। इससे कई लाभ थे। एक तो समाज में किसान का स्टेटस मिल जावेगा। दूसरे घर में दो-तीन नौकर भी मिलेगें। तीसरे सब्जी-भाजी, चावल दाल गेंहू यह घर का रहेगा। और खेती के साथ चांवल का व्यापार भी सरलतापूर्वक चलाया जा सकेगा। कृष्णराव तत्काल नागपुर गये, जमीदार से बात की। जमीदार के लिए भी यह बेहतर प्रस्ताव था। उनसे सहमति मिलने के बाद वे खेती के काम में जुट गये। मनेरी का खेती का अनुभव अब स्वयं की खेती में  काम में आ रहा था। धीरे-धीरे एक सफल किसान के रूप में कृष्णराव स्थापित होते गये।
                    कृष्णराव के लिए किसी एक मुकाम पर रूक जाना सम्भव नही था। नये मुकाम की खोज उनका स्वभाव था। अब तक का धान एवं चांवल का व्यापार वे स्थानीय मण्डी के लिए करते थे। परन्तु उनकी दृष्टि अब गोंदिया एवं नागपुर की बड़ी मण्डीयों पर थी। जहां तक का सीधा व्यापार अधिक लाभदायक एवं विस्तृत होने की सम्भावना थी। दूसरा इस व्यवसाय में अग्रवाल समाज के १०-१२ परिवारों का एकाधिकार था। अर्थात उनके जैसे जमे जमाये व्यवसाथियों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच काम करना। तीसरे कृष्णराव परिवार में अकेले थे। इसके लिए और विश्वसनीय साथी ढूंढना। इसके अलावा उस समय गोंदिया और नागपुर की मण्डियों में धान चांवल भेजने की सीधी व्यवस्था नहीं थी। बैलगाड़ी से चांवल भेजना बड़ा श्रमसाध्य, समय साध्य एवं जोखिम भरा काम था। यदि इस व्यापार को स्थापित करना हो तो इन सब बाधाओं को दूर करना आसान काम नहीं था। मनेरी के एवं अब लांजी के अनुभवों के कारण उनके चावल के स्थानीय छोटे-छोटे व्यापारियों से अच्छे सम्बंध बन गये थे। उन्होंने इन छोटे-छोटे व्यापारियों के साथ मिलकर बातचीत की, अपनों योजना समझायी। पढ़े लिखे, एवं सटीक योजनाकार कृष्णराव के लिए इन छोटे व्यापारियों को सहमत करना बहुत कठिन नहीं था। इससे दो लाभ थे, एक तो उनकों स्थानीय सहयोगी मिल गये व दूसरे खुद को बहुत अधिक पूंजी तत्काल नहीं लगानी पड़ी।
             स्थानीय व्यापारियों के लिए भी यह अधिक लाभ की स्थिति थी। व्यापार के इस नेटवर्क में अनेक व्यापारी जुड़ते गये। यह कृष्णराव का चुम्बकीय व्यक्तित्व ही था या इमानदारी जो भी हो परन्तु कृष्णराव के साथ जुड़े इन व्यापरियों ने अंत तक कृष्णराव का साथ दिया, यहां तक कि उनके निधन के बाद भी परिवार में उनका आना जाना बना रहा। कृष्णराव सामान्यतः गोदिया प्रवास में जोगलेकर से मिलते व अपनी प्रत्येक निजी समस्याओं पर उनसे चर्चा करते। व्यवसाय के प्रारंभ करने पर भी उन्होंने जोगलेकर के साथ विचार विमर्श किया।  जोगलेकर के दामाद थे देशपाण्डे । जोगलेकर ने नागपुर की नौकरी छोड़ने के बाद चाक व फिनाईल का निर्माण कार्य प्रारंभ किया था जिसमें देशपाण्डे भी अपना हाथ बंटाते थे। जोगलेकर ने कृष्णराव को सलाह दी कि इस कार्य में देशपाण्डे का भी सहयोग लिया जावें। कृष्णराव के लिए यह अनपेक्षित किंतु उत्साह वर्धक प्रस्ताव था। क्योंकि गोंदिया की मण्डी की जिम्मेदारी के लिए इनसे अच्छा कोई साथी मिलना कठिन था। फिर नागपुर
भेजे जाने वाला माल गोंदिया से होकर  जाना था। इस बात पर तत्काल सहमति बनी। कृष्णराव की पूंजी की एवं विश्वसीय साथी की बड़ी समस्या का समाधान हो गया। उन्होंने धान चांवल के व्यापार में पर्याप्त धन कमाया। इधर ठेके पर ली गई खेती से भी आय थी ही तथा घर में खाने के लिए चांवल गेंहू साग भाजी दाल की व्यवस्था भी हो जाती। थोड़ी पूंजी, जमा हो गई। लांजी के सम्भ्रान्त परिवारों में कृष्णराव परिवार की गिनती होने लगी। ग्रामीण समाज को रचना में पूंजी कितनी भी हो परन्तु खुद को मिलकियत की खेती का होना भी आवश्यक होता हैं, जिसका आर्थिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार का महत्व हैं। स्थाइत्व की ओर बढ़ रहे कृष्णराव ने इस ओर गम्भीरता से सोचना प्रांरभ कर दिया। जमापूंजी इतनी भी नहीं थी कि बड़ी खेती खरीद सके। जमा नगद पूंजी के साथ कृष्णराव ने इस बीच पत्नी के लिए सोने के और गहने बना दिये थे। अब खेती खरीदने के लिए पत्नी के सोने के सभी गहने बेच दिये। कुछ रूपया अपने साथ धान के व्यापार में लगे सहयोगी व्यापारियों से उधार लिया व नीमटोला में 25 एकड़ खेती की जमीन खरीद ली। इसी बीच उन्होने मकान बनाने के लिए एक एकड़ जमीन भी मनेरी मार्ग पर खरीद लो। वहीं पर एक छोटा सा मकान मिट्टी का बना लिया। खेती, धान के व्यवसाय एवं अन्य छोटे-बड़े कामों में अनथक परिश्रम कर कृष्णराव अब स्थाई किसान भी बन गये थे तथा जमीदार का सर्व सुविधायुक्त पक्का बाड़ा छोड़कर खुद के मिट्टी के मकान में रहने आ गये। जीवन के छः सात वर्षों में अपने अधक परिश्रम, दूरदृष्टी, व्यावसायिक बुद्धि, एवं समाज में विश्वसनीयता के दुर्लभ गुणों के कारण कृष्णराव ने जो सम्पत्ति कमाई वह अपने आप में एक इतिहास था। उस क्षेत्र में मराठों के काल में जमीदार के रूप में स्थाई हुए अनेक छोटे बड़े तालुकेदार थे। उन लोगों को लांजी जैसे पिछड़े क्षेत्र में कोई सम्भावना नहीं दिखाई दे रही थी। उनमें से अधिकांश लोग गोंदिया, नागपुर या बालाघाट को अपना केंद्र बनाने में लग गये थे। वे लोग धीरे-धीरे गांव की जमीने भी बेच रहे थे। ऐसे समय में कृष्णराव जैसे मराठी व्यक्ति द्वारा इस पिछड़े क्षेत्र में अपने बलबूते पर आर्थिक एवं सामाजिक मजबूती के साथ अपने आपको खड़े कर लेना एक बहुत बड़ी सफलता थी।
           अपने पति के औचक निर्णयों से हमेशा सशंक रहने वाली कमलाबाई के लिए अपने गहने बिक जाने का कोई गम नहीं था। वरन् अपनी खुद की खेती, खुद का  मकान और खुद्दार पति यह  प्रतिष्ठा यही उसके लिये अनपेक्षित थी। अपने मिलनसार स्वभाव के कारण कृष्णराव की सामाजिक प्रतिष्ठा को बढाने में उनकी पत्नी का बड़ा योगदान था। मनेरी के पुराने जान पहचान वाले, पति के व्यापार में सहयोगी, दूर से आने वाले व्यापारी, क्षेत्र में इधर-उधर फैले मराठी परिवार एवं बालाबाट से आने वाले स्नेहीजन, इन सबका लांजी  आना जाना लगा रहता। इन सब लोगों को खाना खिलाना या नाश्ता एवं रहने की व्यवस्था करना, इन सब कामों को पूरे मनोयोग  से करना माँ के स्वभाव में था। जिसका लाभ आगे चलकर कृष्णराव के राजनीतिक जीवन को मजबूत बनाने में मिला। गाँव के लोगों के दुख दर्द में सहभागी होने का ऐसा स्वभाव था कि दिनभर गाँव का कोई न कोई व्यक्ति अपनो छोटी छोटी कठिनाइयों को लेकर कमलाबाई के पास आते ही रहते। और कमलाबाई हर सम्भव सबकी सहायता करती। सुबह से घरेलु कामों में जुट जाती व दिन में घर में खेतों से सम्बंधित काम करने वाली महिला मजदूरों के साथ बैठकर उनके काम में सहयोग करती। जब महिला मजदूरों का खेती पर काम होता तो वह खेत पर भी जाती रहती। घर में दो बच्चे राम लक्ष्मण की जोड़ी। दो बच्चियाँ, बच्चों के हंसने-रोने व किलकारियों से घर गूंज उठता। ये सब आकस्मिक खुशियाँ देखकर कमलाबाई भयभीत रहती कि कहीं इन खुशियों को किसी की नजर न लग जाये। जब आदमी के पास कुछ रहे तो नही होने का गम होता है. जब कुछ पा लेता है तो उसे खोने का चिंता लगी रहती है। यही मानवीय नियति है।
         वर्तमान मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में महाराष्ट्र को सीमा से १५ मील दूर एवं छ.ग. की सोमा से भी १५ मील दूर है लांजी ग्राम। उस समय बालाघाट जिला सी पी एण्ड बरार का हिस्सा हुआ करता था। जिसकी राजधानी नागपुर थी। लांजी का ही एक भाग हैं नीमटोला जो लांजी के मुख्य आवासीय क्षेत्र से १ किलो मीटर दूर पड़ता था। लांजी नीमटोला के बीच केवल खेत हुआ करते थे। बीच-बीच में बबूल के वृक्ष। नीमटोला लांजो को जोड़ने वाली जो मुरम गि‌ट्टों की संकरी रोड़ थी, मनेरी रोड़ कहालाती थी। राजस्व की दृष्टी से लांजी ग्राम पचांयत का एक हिस्सा होते हुए भी निमटोला व्यावहारिक दृष्टी से लांजी से अलग थलग तीन टोलों में बसा अलग गाँव था। बीच के टोले में जो मनेरी रोड़ पर स्थित तथा एक चौक जिसे स्थानीय ग्राम देवता के नाम पर खिलवा मुठवा कहते थे। इसी चौक के पूजा स्थान पर एक बड़ा कदम का पेड़ हुआ करता था। जिस के एक तरफ नीमटोला के दो टोले बसे हुए थे तथा दूसरी ओर एक टोला बसा हुआ था। इन टोलों को जोड़ने वाला रास्ता मनेरी सड़क को क्रास करता था। इसीलिए यहां एक चौक बन गया। इस चौक के सामने फैले थे धान के खेत। खेत के उस पार दूर सतपुड़ा पर्वत को शाखाएं दिखाई देती थी। खेतों के बीच-बीच पलास के वृक्ष व बबूल के वृक्ष होते। बरसात के दिनों में इन खेतों में भरा पानी किसी समुद्र का एहसास कराता। वर्षा की शुरूआत ही धान की खेती के मेहनत भरे दिन होते। पर्वतों के पार उगने वाली सूरज की किरणें पानी से लबालब खेतों पर पड़ती तो सामने का पूरा दृश्य नयनाभिराम हो उठता। धान के रोपा के बाद यह पूरा क्षेत्र हरियाली से भर उठता। दूर पर्वत का गहरा काला रंग इस हरे रंग के साथ मिलकर मानों धरती माता को हरी साड़ी एवं गहरे काले हरे रंग के पल्लू का एहसास कराता। बीच-बीच में पीले चोंच और लम्बे पैर वाले प्रवासी सारस पक्षी मछलियां ढूंढने इन खेतों पर आते। भोजन प्राप्त कर उड़ते हुए दूर निकल जाते। खेतों में बोई धान की हरी फसल  दो महीनों बाद पक कर कब धानी रंग में बदल जाती है,यह गाँव में तेजी से बीतते  समय के साथ पता ही नहीं चलता। इस समय मानों पूरा क्षेत्र धान की स्वभाविक स्वर्णिम आभा से चमक उठता। ठीक भी तो है गाँव के किसान के लिए धान का एक-एक दाना सोने के भाव का होता, धान के एक-एक दाने के साथ किसान के पसीने की कीमत जुड़ी होती। जब धान कट जाता तो उसके बाद आने वाली बंसत ऋतु में पलास के फूल धरती को सजा देते। प्रकृति की भी कैसी माया है कि धरतों को कभी किसी भी ऋतु में बिना सजे नहीं रखती हैं। हर ऋतु में प्रकृति के बदलते रंग  इस चौक से देखे जा सकते हैं। इसी चौक पर अल सुबह गायों का जमावड़ा होता। गायों की घंटी से निकले मधुर स्वर हर सुबह का स्वागत करते। यहीं से गायों को घास चरने के लिए जंगल ले जाते। प्रकृति के सौदंर्ष से आप्लावित चौक के सामने था एक एकड़ के रकबे वाले बांस की बाड़ से घिरे प्लाट पर बना था कृष्णराव  का  तीन कमरों का मिट्टी का मकान। पूर्व दिशा की ओर एक खुला दालान था एवं दक्षिण दिशा की और घिरे हुए दालान में था भोजन बनाने का कथित किचन। इसके ऊपर केवलू का छत था। दरवाजे पर लगा आम पत्ते का तोरण, गोबर से लिपे आंगन में लगी तुलसी, आंगन में  किनारे लगे गोंदे व सदाबहार के पौधे, दरवाजे पर बनी रंगोली और आंगन के कोने में सफेद फूल का वृक्ष घर के ग्रहिणी के सुघडपन व धार्मिक होने का प्रमाण देते। यही वह घर हैं कृष्णराव का जिनका दिन प्रातः ५ बजे प्रारंभ हो जाता है।  
             कृष्णराव आय के बड़े साधनों में लगे होने के बावजूद छोटे-छोटे आय के साधनों पर भी ध्यान देते। वनोपज पर किसानों का सीमित अधिकार सरकार मान्य था। परन्तु सस्ते दर पर किसानों को उपलब्ध वनोपज का दुरूपयोग न हो इस हेतु सीमा बांध दी गई थी। अतएव वनोपज के लिये विशेष रसीदे काटने का काम सरकार द्वारा लाइसेंसी व्यक्ति को दिया जाता। कृष्णराव ने इस कार्य हेतु भी लाइसेंस ले रखा था। यद्यपि इस कार्य से बहुत आय  नहीं थी, परन्तु क्षेत्र के आस-पास के किसानों से इसी बहाने मिलना हो जाता था। इन रसीदो हेतु किसान सुबह ५.३० बजे से आ जाते। कृष्णराव को इस समय तैयार रहना पड़ता। सुबह सात बजे इस कार्य से निवृत्त होने के बाद स्नानादि से निपटते। कृष्णराव अपनी सभी सम्भावनाओं को आय में बदलने में निष्णात थे। उनके इंटर साइंस होने का गांव के वातावरण में आय के स्त्रोत के रूप में भी उपयोग हो सकता हैं ऐसा सोच नही सकते। परन्तु कृष्णराव ने गणित व अंग्रेजी के ट्यूशन पढ़ाकर आंशिक तौर पर क्यों न हो पर अपनी पढ़ाई का आय के रूप उपयोग कर लिया। कुछ व्यापारी अग्रवाल परिवार के लड़के कुछ मालगुजार व बड़े किसानों के लड़के ट्यूशन पढ़ने आते।
अनुशासन प्रिय कृष्णाराव पूरी कड़ाई के साथ इस कार्य को अंजाम देते। सात बजे नहाने के बाद कृष्णराव कुछ देर गीता का पाठ करते। कृष्णराव कर्मकाण्डी. या पूजा पाठी तो नहीं थे पर गीता पाठ नियमित रूप से करते। उसके बाद नौ बजे से प्रांरभ होती ट्यूशन की कक्षा जो दो घंटे तक चलती। ट्यूशन को कड़ाई और अनुशासन के कई किस्से मुझे उनके मृत्यु के १५ वर्ष बाद भी सुनने को मिलते।
नये आयामों की तलाश करना व किसी भी हालत में उसे कार्य रूप में लाना कृष्णराव जैसे जिद्दी व्यक्ति के लिए ही सम्भव था। अब तक कृष्णराव की आर्थिक व सामाजिक स्थिति क्षेत्र के कई स्थापित तालुकेदारों से बेहतर थी। वनोपज के लाइसेंस, ट्यूशन, खेती बाड़ो, और चांवल के व्यापार की बहुआयामी बोझ से भी कृष्णराव थकते नहीं थे। नई सम्भावनाओं पर विचार भी चलते रहता था। लांजी ब्लाक एवं आसपास के क्षेत्रों में धान की भरपूर फसल होती। धान से चांवल बनाने के परम्परागत तरीके ही अब तक पूरे क्षेत्र में उपयोग लाये जाते। बड़ी मात्रा में चांवल बनाने के लिए बालाघाट या गोंदिया तक धान ले जाकर मील से चांवल बनाया जा सकता था। इससे चांवल की कीमत बढ़ जाती। कृष्णराव को बार-बार यह लगता कि लांजी में राइस मिल हो तो चांवल की कीमत कम हो सकती थी।  नगद आय का एक अच्छा स्त्रोत भी बन सकता था। परन्तु इस व्यवस्था को प्रारम्भ करने के पहले कई बातों पर विचार करना जरूरी था। चांवल बनाने के परम्परागत व्यवसाय को अचानक छोड़कर स्थानीय लोग मिल से ही चांवल बनवायेंगे यह जरूरी नहीं था। कच्चामाल पर्याप्त मिल पायेगा या नहीं यह भी प्रश्न था। फिर मील का तकनीकी ज्ञान रखने वाला कोई स्थानीय व्यक्ति नहीं था। वह भी बाहर में लाना पड़ेगा। इतनी सारी कठिनाइयों का समाधान निकालने के बाद ही मिल के विषय में विचार किया जा सकता था। कृष्णराव कठिनाइयों का निदान करने में बहुत देर नहीं लगाते थे। उन्होंने बालाघाट, गोंदिया जाकर राईस मिल की जरूरी प्राथमिक जानकारी प्राप्त की। तकनीकी विशेषज्ञों से मिलकर तकनीकी जानकारी प्राप्त की। मिल मालिकों के साथ बातचीत कर लाभ-हानि का विचार किया। स्थानीय व्यापारियों से मिलकर कच्चे माल को कितनी व्यवस्था हो सकती है इसका सम्पूर्ण विचार किया। क्षेत्र में जो दो चार तकनीकी रूप से काम करने का स्वभाव रखते थे, उनसे बातचीत की। अपने पास की नगद पूंजों व कुछ बैंक में रखी डिपाजीट पर कर्जा लेकर और कुछ उधारी लेकर अंततः राईसमिल का काम शुरू कर दिया। तकनीकी क्षेत्र में व्यावसिक रूप से पर्दापण करने वाले बालाघाट जिले के इने-गिने व्यावसायिों में कृष्णराव का नाम भी जुड गया। जो उस काल को बड़ी उपलब्धी थी। राईसमिल की यह योजना कृष्णराव के लिए सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी सिद्ध हुई। 
                  कृष्णराव ने अपने विद्यार्थी काल में डाक्टर बनने का सपना देखा था, परन्तु परिस्थितियों को विषमता के कारण उस सपने की भ्रूण हत्या हो गई थी। उनको इस बात का अंदर ही अंदर मलाल तो था कि वे डाक्टर नही बन पाये। परन्तु अपनी अपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने की अदम्य इच्छाशक्ति कृष्णराव में थी। गोंदिया में बच्चे पढ़ने के लिए माँ के साथ रहते थे, उस समय उनका गोंदिया में आना जाना लगा रहता था। गोंदिया में एक रलवे के इंजीनियर थे, नायडू। वे होमियोपैथी के डॉक्टर भी थे। गोंदिया में उनका दूर दूर तक नाम था। डॉ नायडू का देशपांडे से भी अच्छा परिचय था। उनसे मिलकर कृष्णराव ने  उनकी शागिर्दी में होमेओपेथी के ग्रंथों का अध्ययन किया। उनका जब भी नागपुर जाना होता होमियोपेथी से सम्बंधित साहित्य अवश्य लाते। अध्ययनशील कृष्णराव के लिए चिकित्सा का यह विषय उनके चाहत का होने के कारण इस विषय में गहरा ज्ञान प्राप्त करना उनके लिए कठिन नहीं था। लांजी आने केबाद उनकी मित्रता सरकारी डाक्टर चौधरी से हुई जो मूलरूप से बंगाली थे। उन्हें भी बंगाली होने के कारण होमियोपेथी पर भी विश्वास था।
        इधर उनके एक और मित्र थे जेठू महाजन जो आयुर्वेद के वैद्य थे। इन दोनों के साथ आयुर्वेद के नाड़ी ज्ञान व एलोपेथी की बारीकियों पर हमेशा चर्चा होती। इस चर्चा से प्राप्त ज्ञान के कारण उनका होमियोपेथी का ज्ञान व प्रेक्टिस दोनों में पैठ बन गयी। होमियोपेथी की प्रेक्टिस की सफलता के कारण दिनों दिन उनके पास आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ती गई। गाँव के बाहर भी यदि जरूरी होता तो पैदल ही क्यों न हो अवश्य जाते। गरीब मरीजों से कोई फीस या दवा की कीमत नहीं लेते। उस काल में गाँव में चेचक, कालरा, ज्वांइडिस, मलेरिया, जब फैलता तो महामारी का रूप ले लेता। ऐसे समय में गाँव के लोगों को मुफ्त दवाई बांटने वाले कृष्णराव का अलग ही रूप होता। होमियोपेथी की इस प्रेक्टिस के कारण कृष्णराव को आर्थिक लाभ कम था पर आत्म संतुष्टी अधिक थी। इसीलिए इस काम को वे बड़ी तन्मयता से करते। बिना किसी आर्थिक लोभ के उनकी यह लोकसेवा भी उनके राजनीतिक जमीन को मजबूत करने में बड़ी लाभकारी सिद्ध हुई। 
                 कृष्णराव का व्यक्तित्व एक अजुबा था। बिना चप्पल चलने वाले अपने हाथ से काते गये सूत के रखादी के कपड़े पहनने का संकल्प लेने वाले, उस वृत को आजीवन निभाने वाले, होमियोपेथी के अच्छे जानकार तथा सेवा भाव से गाँवों में गरीबों को पैदल जाकर दवा देने वाले इस निस्पृह मना व्यक्ति ने  खेती बाड़ी धान का व्यवसाय, ट्यूशन, राईसमिल का व्यवसाय,( इस व्यवसाय में पहले से स्थापित अग्रवाल समाज  प्रतिद्वंदिता के बावजूद) को सफलता पूर्वक किया, परंतु राजनीति के क्षेत्र में राजनीतिक हतकण्डों से परहेज भी नहीं किया। यही नहीं तो राजनीति, सेवा, खेती, व्यवसाय में अपने मूल्यों से एवं स्वाभिमान से समझौता न करके भी सभी क्षेत्रों में सफलता की उंची पायदान पर खड़ा रहा अपने खुद के मजबूत पैरों पर।
                   कृष्णराव की राजनीतिक यात्रा तो पुणे के विद्यार्थी जीवन से ही प्रारंभ हो गई थी। परन्तु जीवन के कठिन संघर्षों के कारण इसे  विराम देना पड़ा। इस काल में कृष्णराव की राजनितिक यात्रा व्यावहारिक रूप से तो सुप्त थी, पर उनके कुछ हद तक विप्लव कारी अंतर्मन में आजादी  के आंदोलन की चिंगारी बुझी नहीं थी। दो तीन वर्षों के जीवन के कठिन संघर्षों के दौर के बाद पुनः राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय होने की सुगबुगाहट प्रारंभ हो गई। उधर गोंदिया में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर आये जोगलेकर से सतत सम्पर्क के कारण स्वयं के जीवन को गांधीवादी शैली में ढाल लिया था। लांजी यद्यपि पिछड़े क्षेत्र का ब्लाक सेंटर था परन्तु राजनीतिक सरगरमी की दृष्टि से बालाघाट जिले का महत्वपूर्ण केन्द्र था। लांजी में उनकी अपनी एक मित्र मण्डली थी जिसमें क्षेत्र के प्रभावशाली लोग थे। इनके प्रमुख थे डॉ. चौधरी जो सरकारी अस्पताल के डाक्टर थे बंगाल से इस सुदूर क्षेत्र में नौकरी करने आये थे। अपने सेवाभावी एवं मिलनसार स्वभाव के कारण क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय थे। डाक्टर के प्रतिष्ठित व्यवसाय के साथ उन्होंने भी लांजी में स्थाई निवास बना लिया था व छोटी खेती भी खरीद ली थी। दूसरे थे विध्नेश्वर रेंच, जो लांजी के मालगुजार थे कांग्रेस के नेता भी थे व आजादी के आंदोलन की अगुवाई इन्हीं के हाथों रहती। तीसरे थे गौरिकांत मिश्र पेशे से पूजापाठी ब्राम्हण थे परन्तु क्षेत्र के सम्मानित पण्डित थे। चौथे थे जेठु महाजन जो नीमटोला में कृष्णराव के पड़ोसी थे। ग्राम पंचायत के मेम्बर भी थे। सम्पन्न किसान होने के साथ-साथ नाड़ी वैद्य भी थे। कृष्णराव के राजनीतिक जीवन के निकटतम सहयोगी रहे जेठु महाजन उंची, सांवली, बलिष्ठ कद‌काठी के थे। आवश्यकता पड़ने पर मसल पावर के उपयोग से भी नहीं हिचकते थे। उनके अलावा लांजी क्षेत्र के छोटे-मोटे तालुकेदारों के भी कृष्णराव के साथ अच्छे सम्बन्ध थे। उस समय सरकारी तंत्र में जिला केंद्र तक कृष्णराव की पहुंच थी। जिले में पड़े लिखे कानून तथा प्रशासनिक कामो जानकर होने के कारण इन तालुकेदारों के बहुत से सरकारी काम इनके सहयोग से पूरे  हो जाते थे। इनके अलावा बालाघाट से लांजी तक सरकारी अफसरों एवं कर्मचारी भी उनके साथ सम्पर्क में रहते। जीवन में आयी थोड़ी आर्थिक स्थिरता के बाद राजनीति में धीरे-धीरे अधिक समय देना कृष्णराव के लिए संभव होने लगा। कृष्णराव जीवन पद्धति से तो पहले से हो गांधीवादी हो गये थे। कृष्णराव का आकर्षक व्यक्तित्व, हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी भाषा पर समान अधिकार, मितभाषी किन्तु प्रभावशाली वाक क्षमता, उनके व्यक्तिव की विशेषता थी। व्यवसाय के कारण, होमियोपैथी चिकित्सक होने के कारण एवं वनोपज के वेंडर होने के कारण बना उनका व्यापक जनसम्पर्क उनकी राजनीतिक यात्रा में बहुत सहायक सिध्द् हुआ। इन गुणों ने कृष्णराव को सफल व्यवसायी के साथ संघर्षशील राजनेता भी बना दिया। 
          कृष्णराव ने स्वाध्याय से कानून का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। प्रशासन में काम में आने वाली सरकारी नियम कानून तो उनके जुबान पर रहते थे। तर्क संगत एवं निरपेक्ष भाव से विचार करने के स्वभाव के कारण कृष्णराव आमजनता तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ सरकारी अमले को भी सहज स्वीकार्य थे। तहसीलदार में लेकर अंग्रेज कलेक्टर तक क्षेत्र की किसी समस्या पर कृष्णराव को राय को निर्णायक वजन देते। अपने निर्भीक स्वभाव के कारण सत्य बात को वह चाहे जितनी कड़वी हो कलेक्टर के सामने भी तर्क संगत ढंग से रखने से नहीं चूकते। जन सामान्य को सरकारी कामों में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए वे सरकारी अमले का विरोध करने से भी नहीं हिचकते थे। इस कारण कृष्णराव के पास सरकारी तंत्र से परेशान लोगों का अपनी समस्या के समाधान के लिए लगातार आना बना रहता था।


              दूर गाँव के एक किसान ने अकाल के समय सरकारी लगान नही पटाया था। बाद में उसने लगान  की अदायगी भी कर दी थी। परन्तु किसान के पास लगान अदायगी के पर्याप्त सबूत नहीं थे। तकालीन तहसीलदार ने उस किसान की पूरी खेती राजसात कर ली। कृष्णराव अपने मिट्टी के घर के सामने की दालान में आने जाने वालों से घिरे बैठे थे। उसी समय वह किसान भी आया व उसने अपनी कहानी आंखों में आंसू भर कर बताई कि उसने अनेक लोगों से सम्पर्क किया किन्तु कोई भी समस्या का समाधान नहीं कर सका।
             एक किसान के लिए उसकी खेती का राजसात होने का मतलब है भूखे मरना या आत्महत्या करना। जिसका एहसास किसान की सूरत पर आसानी से पढ़ा जा सकता था। कृष्णराव ने बड़े धैर्य से किसान की बातें सुनी व सम्बंधित लगान वापसी के अपूष्ट साक्ष्यों का अवलोकन किया। फाकेवाजी के दिन कितने कष्टदायक होते हैं उसकी अनुभूति कृष्णराव से अधिक किसकों हो सकती थी। उन्होंने किसान को भावनात्मक रूप से आश्वस्त किया व कुछ दिनों बाद फिर मिलने कहा।
                 अपने सरकारी सम्पकों के आधार पर कृष्णराव ने किसान के ऋण अदायगी के कुछ और अस्पष्ट प्रमाण एकत्रित किए। स्वयं कृष्णराव ने तहसीलदार से बातकर राजसात की कार्यवाही वापस लेने के लिए निवेदन किया। परन्तु अंग्रेजों की शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण और अधिकार सम्पन्न तहसीलदार किसी भी हालत में कृष्णराव की बात मानने को तैयार नहीं था, यही नही तो तहसीलदार ने कृष्णराव के तेवर को देखकर यह भी चेतावनी दे दी कि मुझसे दुश्मनी लेने की कोशिश मत करना वरना अंजाम भुगतना पड़ेगा। कृष्णराव घर वापस आ गये। परिस्थितियां कैसी भी हो अपने प्रारंभ किये कार्य को अंजाम तक पहुंचाये बिना कृष्णराव को चैन नहीं आता था। इस प्रकरण में अब आगे बढ़ने का मतलब तहसीलदार से दुश्मनी मोल लेना था। कृष्णराव उपलब्ध तथ्यों को लेकर बालाघाट अंग्रेज कलेक्टर के पास पहुंचे। कलेक्टर ने पूरी बात ध्यान से सुनी। तहसीलदार के विरुद्ध एक शिकायत कृष्णराय ने कलेक्टर को सौंप दी। लगातार तीन-चार बार कलेक्टर से बातचीत के बाद किसान को अपनी जमीन वापस मिल गई। तहसीदार कलेक्टर के इस निर्णय से भयभीत हो गया। तहसीलदार ने कृष्णराव के पास आकर निवेदन किया कि मेरी शिकायत वापस ले लें वरना मेरी नौकरी चली जायेगी। सह्रदय कृष्णराव ने शिकायत वापस ले ली। ऐसी एक नहीं अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है कृष्णराव का जोवन।
           
यह १९40 के बाद का कार्यकाल था। उस समय कांग्रेस पार्टी पूरे देश में राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी। इधर अंग्रेजी सत्ता ने भी प्रशासन, शिक्षा एवं न्यायव्यवस्था में जनभागीदारी प्रारंभ कर दी थी। स्थानीय निकायों को स्वावलंबी बनाने का क्रम भी चालू हो गया था। समय को पहचानने वाले कृष्णराव कब चूकने वाले थे। स्वाध्यायी कृष्णराव को कानून एवं प्रशासनिक कार्य में दिलचस्पी थी ही। साथ ही हिन्दी, मराठी एवं अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान होना भी इस समय काम आया। वे यह जानते थे कि जनता की निजी एवं सार्वजनिक समस्याओं के निराकरण के लिए इन निकायों का अच्छा उपयोग किया जा सकता है। शासकीय मशीनरी से भी मधुर संबंध होना भी इस समय उपयोगी सिध्द हुआ। कृष्णराव को डिस्ट्रीक्ट कौंसिल का मेम्बर चुन लिया गया। उस समय यह बहुत सम्मानित पद था। उन्होंने इस पद का पूरा उपयोग जनसमस्या निवारण के लिये किया। यही वह समय था जब अपनी क्षमताओं के कारण कृष्णराव न केवल लांजी क्षेत्र में ही नही तो बालाघाट जिले में प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित हो गये।
               न्याय पंचायतों के गठन में कृष्णराव को न्याय पंचायत के सचिव की जिम्मेदारी दी गई। अध्यक्ष प्रसिद्ध समाजवादी नेता ताराचंद श्रीवास्तव थे। ताराचंद श्रीवास्तव के छोटे भाई बाद में विधानसभा के उपाध्यक्ष एवं म.प्र. सरकार में वरिष्ठ मंत्री भी रहे। ताराचंद स्वयंम् मेघावी राजनीतिज्ञ थे एवं बीजागढ़ राज्य के प्रबंधक के सुपुत्र थे। परन्तु पूरे कार्यकाल में उनका कृष्णराव पर इतना विश्वास रहा कि न्याय पंचायत के किसी भी निर्णय पर बिना देखे हस्ताक्षर कर देते थे। कृष्णराव के कार्यकाल में लांजी की न्याय पंचायत को नजीरी न्याय पंचायत माना जाता था।
                         इस प्रकार खेती, व्यवसाय, राईसमिल आदि कार्यों के साथ राजनीतिक के क्षेत्र में भी सफलता के परचम लहराने में कृष्णराव सफल रहे। स्थानीय निकायों के चुनाव में सक्रिय भागीदारी रहती थी। परन्तु यह सब खेल इतना आसान नहीं था। क्षेत्र की व्यवसायियों की लाबी को कृष्णराव का व्यवसाय एवं राजनीति में आगे बढ़ना कभी नहीं सुहाया। धनवल एवं बाहुबल से सम्पन्न यह लाबी कृष्णराव को नीचा दिखाने का हमेशा प्रयास करती रही। परन्तु कृष्णराव इन सबसे कभी भयभीत नहीं हुए।
              कमलादेवी की इच्छा थी कि अब कच्चे मकान के स्थान पर पक्का मकान बना लिया जावे। परन्तु कृष्णराव को तो मानो आसामान्य परिस्थितियों से खेलने का नशा हो गया था। वे अपनी धर्मपत्नी कमलादेवी से कहा करते, मैं लांजी में नहीं रहूंगा। हमें तो इसके बाद वारासिवनी जाना है। वारासिवनी बालाघाट जिले की सबसे बड़ी मण्डी थी, विशेष रूप से चावल के व्यापार का बड़ा केन्द्र थी। अर्थात लांजी का पड़ाव भी कृष्णराव की योजना के अनुसार अस्थाई पड़ाव ही था।
               कृष्णराव अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बड़े सतर्क रहा करते थे। उन्होंने अपनी पत्नी को गोंदिया में अलग मकान लेकर बच्चों के साथ रखने का निर्णय लिया ताकि बच्चे उचित शिक्षा प्राप्त कर सकें। कुल मिलाकर समय अपनी सरपट गति से भाग रहा था। कृष्णराव तो लगता समय के भी आगे दौड़ते रहते थे। अतएव १०-१५ वर्ष का समय कैसे बोता यह समझ नहीं आया। कमलादेवी भी अपने पांच बच्चों के लालन-पालन में व्यस्त रहती। माँ को खेती में भी ध्यान देना पड़ता। समय के भागने की गति को वह भी समझ नहीं पाई। 
           गाँव में सरदी, खासी, बुखार का सीजन था। कृष्णराव लगभग रोज ही कभी पैदल तो कभी  सायकल पर इन गांवों में होमियापेथी की दवा देने जाते। इस सर्दी खांसी ने इंफ्लूजा का रूप ले लिया। उस काल मे यह भी एक महामारी ही थी।   निमटोला से लगे सुन्दरटोला में इसका बहुत प्रकोप हुआ। कृष्णराव रोज सुबह 9 बजे से 12 बजे तक वहीं मरीजों को दवा देते। शाम को अन्य स्थानों पर जाते। एक दिन शाम को घर वापस आने पर कमलादेवी सहज रूप से चाय ले आई। परन्तु आज चाय पीते-पीते कृष्णराव को दो-तीन बार खांसी आते देख कमलादेवी थोड़ी चिंतित हुई। रात को सरदी, खांसी के लिए देशी दवाई का काढ़ा कृष्णराव को दिया। रात को  कृष्णराव को सामान्य नींद नहीं लगी। सुबह कृष्णराव समझ गये कि बुखार भी है। सरकारी अस्पताल के डॉ. चौधरी ने दवायें दीं। परन्तु बुखार शरीर को छोड़ने का नाम नहीं ले रहा था। कमलादेवी डॉ. चौधरी एवं कृष्णराव के बीच होने वाली बातचीत से इतना तो समझ गई थी कि बीमारी कुछ गंभीर किस्म की है। मितभाषी कृष्णराव से जब तक वे नहीं चाहेंगे तब तक कोई बात उगलवाना कठिन था। अतः कमलादेवी को भी वास्ताविक बीमारी का ज्ञान नहीं था। बीमारी धीरे-धीरे बढ़ते जा रही थी। कमला बाई भी बीमारी की गंभीरता से कुछ परिचित होने लगी थी। गांव के नाड़ी वैद्य  जेठू महाजन भी दिन में तीन-चार बार आकर नाड़ी परीक्षण करते व आयुर्वेदिक मात्रा  देते।
          शाम का समय था कमलादेवी कृष्णराव के पैरों के पास बैठी थी। आसपास बच्चों की धमाचौकड़ी चल रही थी। और दिन होते तो दोनों पति पत्नी इस चौकड़ी का आनंद लेते। परन्तु कमलादेवी का इन सब बातों की ओर ध्यान नहीं था। उन्हें पूरा विश्वास हो गया था कि इस  परिवार के मुखिया को किसी की नजर लग गई होगी। उसने धीरे से संकोच के साथ कृष्णराव को पूछा कि किसी गुनिया बैंगे से झाड़फूंक करवा लेते है। परन्तु  कृष्णराव इन सब बातों पर विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने परिस्थितियों की नजाकत एवं कमलादेवी की भावनाओं को समझकर प्रेम से समझाया कुछ नहीं एक दो दिन में बीमारी नियंत्रण में आ जायेगी। कमलादेवी जानती थी पति के ना को  हाँ में बदलना असम्भव है। अतएव चुप रही। 
              कृष्णराव को समझ में आ रहा था कि निमोनिया की यह बीमारी लगभग असाध्य है। धीरे-धीरे बिमारी बढ़ती गई। इस अवस्था में भी कृष्णराव का सुबह का गीता पाठ चालू रहता। आने जाने वालों से अपनी बीमारी के विषय को छोड़कर उनकी ही समस्या के विषय में बात करते। इस कठिन समय में रेच परिवार की बुजुर्ग महिला नानीबाई लगातार कमलादेवी के साथ रहती। कृष्णराव भी नानी बाई का बड़ा सम्मान करते। अनुभवी नानी ने ताड़ लिया कि केवल कुछ दिनों का समय बचा है। उन्होंने कृष्णराव से पूछा क्या कमला को कुछ बताना है? बताना है तो उसे बता दो या उसे न कह पाओ तो मुझे समझा दो। कृष्णराव उन परिस्थितियों में भी एक कमजोर हंसी के साथ परिस्थिति को सामान्य करने का प्रयास करते रहे। उन्होंने नानी के आंखों में अपनी कमजोर नजर डालते हुए कहा नानी बाई आपको अभी भी लगता है कृष्णराव कुछ छिपाकर रखता है। जो कुछ है खुला है। उन्होंने ऐसा कहकर एक कातर दृष्टि पास बैठी अपनी पत्नी कमलादेवी पर डाली। कृष्णराव की जीवन भर की भागदौड़ के कारण उनके जीवन का सबसे कम हिस्सा केवल कमलादेवी को ही तो मिला था। कृष्णराव का जीवन का बड़ा हिस्सा भाग दौड़ में ही बीता। हर बुरे अच्छे समय में पत्नी ने बिना प्रतिप्रश्न किये उन का साथ दिया। घर को किसी समस्या को कृष्णराव को बताकर वह उन्हें और बेचैन नहीं होने देती। न ही अच्छे दिनों में कोई बड़ी मांग रखती। पति के अचानक निर्णय लेने के स्वभाव के कारण भी उन्हें हमेशा असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अस्थमा की क्रानीक पेशेंट कमलाबाई ने कभी अपने स्वास्थ्य की चिंता को कृष्णराव की चिंता नही बनने दी। व्यस्तता के कारण अपनी पत्नी के स्वास्थ्य की ओर कृष्णराव कभी आवश्यक ध्यान नही दे पाये। इन्हीं सब बातों को याद कर शायद पत्नी से कुछ कहना चाहते हों या उनके बाद उत्पन्न परिस्थितियों में अपने पति के पदचिन्हों पर आंखें मूंदकर चलने वालो सीधी-साधी पत्नी छोटे-छोटे छः बच्चों के जिम्मेदारी को कैसे पूरा कर पायेगी इसका परीक्षण अपनी कातर निगाह से कर रहे हो।
              अगले दिन शाम को हमेशा की तरह जेठू महाजन कृष्णराव को नाड़ी की जांच करने लगे। ज्यों-ज्यों नाड़ी की गति का जेठू महाजन अवलोकन करते त्यों-त्यों उनके चेहरे हावभाव बदलते जाते। परिक्षण के बाद कृष्णराव ने अर्धनिमिष आंखे खोली। जेठू महाजन को और पास आने का इशारा किया। जेठू महाजन के कानों में कुछ बुद बुदाये। जेडू महाजन ने सिर हिलाकर हामी भरी पर बड़े भारी मन से। अनेक जिन्दगीयों को मौत में बदलते देखने का आदि यह नाड़ी वैद्य अपने मार्गदर्शक, मित्र और हर समस्या का समाधान निकालने वाले कृष्णराव की बाते सुनकर बड़े मुश्किल से अपने आपकों सम्भाल पा रहा था। उनकी आंखों के सामने खुद्दार, अपने मूल्यों के प्रति अति आग्रह रखने वाले किसी भी कीमत पर हार न मानने वाले कृष्णराव का संघर्षपूर्ण अतीत एक फिल्म की भांति घूम रहा था। इस अंतिम कठोर सत्य का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करना इस उंचे बलिष्ठ शरीर वाले जेठू महाजन के लिए भी कितना असम्भव था। यह वे ही जानते थे। फिर भी कृष्णराव के बताएनुसार गीता पाठ व रामायण पाठ की तैयारी में वे जुट गये। 
         सरल स्वभाव, पति के हर कदम का अंधानुकरण करने वाली कमलाबाई भी जेठू महाजन के चेहरे पर उत्तरते-चढ़ते भावों को देखकर समझ गई थी कि अब पति का साथ कुछ घंटों का बाकी हैं। जिस पति के कदम कभी रूके नहीं उन्ही निस्तेज पैरों के पास बैठी यह कभी पति को देखती तो कभी शुन्य की ओर, सोच रही थी ईश्वर का यह कैसा अन्याय है? पैतालीस साल की उम्र में विधवा होने से बड़ा और कौन सा एक महिला के लिए अभिशापहो सकता है। तीन छोटे बच्चे आने वाली विपदा से बेखबर अपनी बालसुलभ दिनचर्या में व्यस्त थे। दो बड़े लड़‌के, वे भी अभी १6-18 वर्ष के ही थे। परन्तु उन्हें आने वाले कठिन काल को पूर्ण न हो तो भी अधूरी चिंता तो थी ही। इन सब बच्चों को जिम्मेदारी का एहसास तो कमलाबाई को भविष्य में और गहरे अकेले हो महसूस करना था। अभी तो केवल पति के विरह की चिंता ही कमलाबाई के मस्तिष्क को शुन्य बना रही थी।
       कृष्णराव बिस्तर पर आंखे बंद किये पड़े थे। स्वाभिमानी कृष्णराव इस हालत में भी छाती में होने वाले दर्द को स्वयं ही पी जाना चाहते थे, इसीलिए तो बीच-बीच में दांतों को दबाकर छाती की वेदना को दबाने का स्पष्ट भाव चेहरे पर दिखाई दे रहा था। पूरे जीवन भर अकेले राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में अपने मूल्यों एवं सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए अनवरत संघर्ष को भी अकेले हो लड़ने वाला यह कर्मयोगी मानों अंतिम लड़ाई को भी अकेले ही लड़ना चाहता था। कभी हार न मानने बाले कृष्णराव के लिए यह पहली एवं अंतिम हार सिद्ध होने वाली थी। सैतालिस वर्ष की अल्पआयु में हो शून्य से शुरू होकर ३० एकड़ खेती, मकान, राईस मिल,का साम्राज्य बनाने वाले और राजनीतिक सफलताओं एवं सामाजिक उँचाईयों पर स्वयं को स्थापित करने वाले कृष्णराव की यह असहज स्थिति उनकी पत्नी को और विव्हल कर रही थी। जीवन में कभी किसी के सामने न झुकने वाला, किसी भी परिस्थितियों न टूटने वाला यह व्यक्ति अब और ताकत जुटाने में शायद समर्थ नही था, इसीलिए शरीर को ढीला छोड़कर सहज भाव से नियति के इस अंतिम निर्णय को स्वीकार करने का मन उन्होंने बना लिया। इस बीच मध्यम स्वर में रामायण का पाठ चल ही रहा था। सम्भवता कृष्णराव के छाती में जोर से दुर्द उठा, दर्द से कराहते उनके मुख से हे राम निकला और  प्राण पखेरू शरीर को छोड़कर अनंत में विलीन हो गये। पीछे रह गया कृष्णराव का शरीर। बिलखती कमलाबाई, और रोते दोनों बड़े बच्चे, छोटे तीनों बच्चे जो अभी निद्रा में ही थे,और पत्नी के पेट में पल रहे बच्चे से बेखबर होकर, साथ छोड़ गये हजारों मित्रों व चाहने वालों का भी। 
और अंत मे------
यह कहानी का अंत नहीं यह तो प्रस्तावना है, 
कुछ लोगों को हम देखते हैं पर समझ नहीं पाते, 
कुछ लोगों को देख नहीं पाते पर समझ लेते हैं।

काश में उन्हें देख पाता तो अधिक समझ पाता, 
शायद उनके विषय में और बेहतर बता पाता।  
मुझे विश्वास है इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में,
 उनसे जरूर मिलूंगा।

 इस प्रस्तावना के आगे की पूरी किताब लिखूंगा,
 इस जन्म में नहीं मिलने का हिसाब पूरा करूंगा, 
अवसाद इतना ही है कि,
 मैं उस जन्म में शायद आप को वह सब नहीं बता पाऊगां, 
शायद किसी और को सुनाऊंगा।
भरे मन के साथ अलविदा।
                        -----   भास्कर



Monday, October 20, 2025

श्री हनुमत चरित्र

                                 💐 💐श्री हनुमत चरित्र💐💐
                       
    
            जब मैं  श्री हनुमंत जी के विषय में विचार करता हूं तो मेरा भी अपना एक दृष्टिकोण है। भगवान श्री राम  युग नायक है। पुरुषोत्तम है।  और युगों युगों तक आदर्श बने रहेंगे। उनकी गाथाओं को विद्वान पुरुषों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।  हनुमान जी सामान्य जन के नायक है। सामान्य व्यक्ति को भी हनुमानजी अपने से लगते हैं। उनके साथ अपना दुख दर्द बांटने में चाहे वह भक्त हो चाहे ना हो कोई भी संकोच नहीं करता। यहां तक की छोटे बच्चे भी बड़े श्रद्धा पूर्वक हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए दिखाई देंगे। चाहे कोई परीक्षा हो, कोई प्रतियोगिता हो या खेल हो सब जगह सफलता की प्राप्ति के लिए वह हनुमान जी को एक नारियल चढ़ाते हुए जरूर दिखाई देंगे। यही हनुमानजी की विशेषता है। सबको वे सहज उपलब्ध लगते हैं। दूसरी बात, श्री रामजी की हम भक्ति तो कर सकते है, पर रामत्व का अनुकरण कठिन ही नही तो लगभग असंभव है। परंतु हनुमानजी की भक्ति भी सहज है और उनके गुणों का अनुकरण भी कुछ कठिन हो सकता है पर असंभव नही।
         तुलसीदास जी हनुमान जी के गुणो का वर्णन करते हुए कहते हैं वह वे अतुलित बल धाम है, विद्यावान है, गुनी है, ज्ञान के सागर हैं और चतुर है। सामान्य व्यक्ति के लिए शारीरिक सुख यानी निरोगी काया है। प्रत्येक व्यक्ति बलवान बना रहना चाहता है, कम से कम स्वस्थ तो बना ही रहना चाहता है। विद्या यह पढ़कर, सुनकर, देख कर, या सतसंग से प्राप्त होती है, प्रत्येक व्यक्ति विद्यावान भी होना चाहता है। गुनी का अर्थ लोक व्यवहार में कुशल होने से है। विद्या का विवेक सम्मत उपयोग ही ज्ञान है। चतुर व्यक्ति उचित निर्णय लेने की क्षमता रखता है। इसमें से प्रत्येक गुण को मनुष्य चाहे तो स्वयं में विकसित कर सकता है।शायद यही कारण है कि श्री राम के नाम के पहले श्री लगना स्वाभाविक लगता है।   हनुमानजी को रामभक्त, रामदूत, पवन सूत, वीर, महावीर तो कहना स्वाभाविक लगता है। पर उनके नाम के पहले श्री लगाना यह प्रचलित भी नही है और स्वाभाविक भी नहीं लगता। इसी मूल विचार को ध्यान में रख कर मेरे जैसा सामान्य व्यक्ति भी हनुमानजी पर अपने विचार रखने का दुस्साहस कर पाया है। 
                मेरे विचारों को लिपिबद्ध करने एक और महत्वपूर्ण कारण है, कि श्री हनुमानजी के चरित्र की विशेषताओं को स्वयं में विकसित करना असंभव नही है। इन विशेषताओं को जो व्यक्ति स्वयं में विकसित कर लेगा, उसके जीवन मे सफलताएं उसके चरणों मे होंगी। श्री हनुमान जी के चरित्र का लौकिक और परा लौकिक दोनो प्रकार का महत्व है।
                                       1***** कुशल संप्रेषक****
                 महर्षि वाल्मीकि हनुमानजी को  एक और विशेषण  से संबोधित करते है। "उवाच हनुमान् वाक्यम सुग्रीवं वाक्यकोविदः  अर्थात वाक्यकोविद (बातचीत करने में कुशल ) हनुमान जी सुग्रीव से बोले।"  इस वाक्यकोविद शब्द का प्रयोग हनुमानजी के लिए क्यों किया गया यह आगे और स्पष्ट होता है।
           सुग्रीव के आदेश से हनुमानजी के किष्किंधा पर्वत पर श्री राम और लक्ष्मण जी के आने का प्रयोजन जानने हेतु दोनो से भेंट करते है। प्रारंभिक बातचीत  की समाप्ति के बाद वाल्मीकि हनुमानजी के लिए कहते है "वाक्यज्ञो वाक्यकुशलः (अर्थात, शब्दों के मर्म को समझने वाले और कुशलता पूर्वक बात करने वाले  )  हनुमानजी।" वस्तुतः हनुमानजी ने अनेक अवसरों पर कुशल संप्रेषक की भूमिका का सफलता पूर्वक निर्वहन किया है।
           श्री राम और लक्ष्मण जी के किष्किंधा पर्वत पर पहुंचने पर  भयग्रस्त सुग्रीव श्री राम और लक्ष्मण जी को बाली के भेजे हुए शत्रु समझ बैठता है। सुग्रीव बाली से पराजित होने के बाद जिस प्रकार का जीवन बिता रहा है उसका हर क्षण भयभीत रहना स्वाभाविक है। सुग्रीव श्रीराम और लक्ष्मण के विषय में जानना भी चाहते हैं, पर यह भी चाहते हैं कि सुग्रीव के हृदय का संशय श्री राम को ज्ञात भी ना हो और  श्री राम से शत्रुता भी ना हो।  यह कार्य करने के लिए सुग्रीव अपने मंत्री श्री हनुमान जी का चयन करते हैं। सुग्रीव बाली से इतने भयभीत है की वे हनुमान जी से कहते हैं तुमको अगर जरा भी शक हुआ तो मुझे इशारा भर कर देना "पठये बाली होइ मन मैला भागो तुरत तजियों यह शैला।" ( मैं तुरंत यह पर्वत छोड़कर चला जाऊंगा") हनुमान जी श्री राम और लक्ष्मण जी से पंपा सरोवर के पास मिलते हैं, वह भी ब्राह्मण के वेश में। सुग्रीव संशय ग्रस्त होकर पूर्वाग्रह के साथ श्री राम के विषय में विचार करता है, वहीं हनुमान जी  बिना किसी पूर्वाग्रह के बिना किसी संदेह के श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी से मिलते हैं। हनुमान जी जानते हैं की पूर्वाग्रह रखकर किसी व्यक्ति के विषय में विचार करने से सही निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता। पहले दृष्टि में ही हनुमान जी समझ लेते हैं कि जिस प्रकार का इन दोनों का व्यक्तित्व है वह कभी भी बाली के या किसी भी अन्य के आदेश पर यहां नहीं आ सकते। इनका अपना स्वतंत्र तथा गरिमामय व्यक्तित्व है।                            इसलिए बातचीत के शुरुआत में ही हनुमान जी श्री रामचंद्र जी एवं लक्ष्मण जी को प्रणाम करते हैं। दोनों भाइयों की प्रशंसा में कहते हैं आप दोनों पराक्रमी राजश्री और देवताओं के समान प्रभावशाली, यशस्वी तपस्वी और कठोर व्रत का पालन करने वाले हो।  शत्रुओं को नष्ट करने की शक्ति आप दोनों में है। आप मे देवताओ के योग्य राज भोगने की शक्ति है। कहीं आप लोग देव लोक से तो नही आये? इस प्रकार प्रारंभिक भेंट में ही श्री राम और लक्ष्मण जी की बड़ी कुशलता के साथ वस्तुनिष्ठ प्रशंसा करते हुए उनके किष्किंधा पर्वत पर आने का कारण पूछते हैं। श्री राम चन्द्रजी लक्ष्मणजी से कहते हैं लक्ष्मण तुम "बात के मर्म को समझने वाले"  हनुमान जी से बात करो। परंतु श्री रामचंद्र जी यहीं नहीं रुकते, लक्ष्मण को सावधान करने के उद्देश्य से आगे हनुमान जी के वाक्चातुर्य की विशेषता का वर्णन करते हुए अपरोक्ष रूप से लक्ष्मण को वार्तालाप कौशल्य की सिख  देते हैं। श्री रामचंद्र जी लक्ष्मण जी के सामने हनुमान जी के वाक्चातुर्य का इस प्रकार विश्लेषण करते हैं --
   वे लक्ष्मण से कहते हैं, लक्ष्मण
  1 जो वेद का ज्ञाता है वही इतनी सुंदर भाषा में वार्तालाप कर सकता है।
  2  निश्चय ही इन्होंने व्याकरण का कई बार अध्ययन किया है इसलिए उनके मुंह से कोई अशुद्धि नहीं निकली है।
  3  संभाषण के समय इनके मुख, नेत्र, ललाट ,भौंह या किसी भी अंग से कोई दोष प्रकट नहीं हुआ है।
  4  हनुमान ने थोड़े शब्दों में परंतु स्पष्टता के साथ अपना अभिप्राय प्रतुत किया है।
  5  बातचीत में कहीं पर भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया है जो कर्ण कटु हो!
  6  हृदय के भाव को  मध्य स्वर में  व्यक्त किया है, उनका स्वर ना तो बहुत तीव्र था ना ही बहुत धीमा।
   7  इनकी भाषा संस्कार संपन्न है, उच्चारण शास्त्रशुद्ध  है, और बिना रुके बात रखने की क्षमता है।
   8  बातचीत करते समय  हृदय, कंठ  और तालु का ऐसा समन्वय था की बातचीत को सुनकर मन प्रसन्न हो जावे। वध करने के लिए तैयार शत्रु का हृदय भी ऐसी वाणी से बदल सकता है।
           आगे श्री राम कहते हैं कि जिसके पास वार्तालाप  का ऐसा कौशल  हो उसके मनोरथ तो केवल बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं।
            श्री रामचंद्र जी ने ऊपर श्री हनुमान जी के वार्तालाप कौशल की जो विशेषताएं बताई हैं वह वास्तव में वार्तालाप कौशल का संक्षिप्त में किंतु संपूर्ण दर्शन है।
          लक्षण जी अपना परिचय देते हुए हनुमान जी से कहते हैं की हम दशरथ पुत्र है। वनवास से लेकर माता सीता के अपहरण तक की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए लक्ष्मण जी बताते हैं कि सबको शरण देने वाले शरणागत  वत्सल श्री राम किस प्रकार सुग्रीव के शरण में आए हैं । आगे लक्ष्मण जी निवेदन करते हैं की  राजा सुग्रीव ने उन पर कृपा करनी चाहिए।
         हनुमान जी किसी प्रकार श्री राम और लक्ष्मण को कम नहीं आंकते हैं और न ही दिखाना चाहते। क्योंकि यदि मैत्री होना है तो बराबरी के स्तर पर ही होगी। इसीलिए श्री हनुमान जी कहते हैं वीर राजकुमारों महाराज सुग्रीव को भी आप जैसे बुद्धिमान और क्रोध विजयी जितेंद्र पुरुषों के मैत्री की आवश्यकता थी।  राजा सुग्रीव स्वयं राज्य से भ्रष्ट है।  उनकी स्त्री का भी बाली ने अपहरण कर लिया है। (जैसा श्री रामजी के साथ हुआ।) इसलिए सुग्रीव बाली से अत्यंत भयभीत होकर यहां एकांतवास कर रहे हैं। सुग्रीव स्वयं माता सीता का पता लगाने में आपके साथ रहेंगे। श्री हनुमान जी की विवेक युक्त बात सुनकर लक्ष्मण समझ गए की जितनी आवश्यकता श्री राम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव की है उतनी आवश्यकता सुग्रीव को राम और लक्ष्मण की है।  यह सब कहते हुए श्री हनुमान जी की जैसी प्रभावशाली शारीरिक भाषा थी, उसको पहचान कर लक्षमण श्री राम जी से कहते हैं, भैया  पवनसुत हनुमान जी झूठ नहीं बोल रहे हैं। वार्ता करते हुए स्वयं को विश्वसनीय सिद्ध करवा लेने की अद्भुत क्षमता हनुमानजी में है।
              2*****दूसरे के सन्मान का प्रबंधन शिष्टाचार पूर्ण व्यावहार*******
       श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी ना केवल अयोध्या के महाराज दशरथ के पुत्र हैं। वनवास के बाद वे राजगद्दी पर विराजे जाएंगे, यह भी निश्चित है। हनुमानजी यह भी जानते हैं की श्री रामचंद्र जी अलौकिक पुरुष हैं। इधर सुग्रीव राजा है और हनुमान जी उनके मंत्री हैं। निष्काषित राजा होने के बावजुद भी सूग्रीव की अपनी सेना है। अपना सामर्थ्य है , बल है। हनुमान जी के मन में बड़ा सवाल है की सुग्रीव को श्री रामचंद्र जी से मिलने के लिए यहां लाया जाए या रामचंद्र जी को लेकर सुग्रीव के पास जाया जाए। लौकिक मर्यादा में सुग्रीव राजा है और रामचंद्र जी सुग्रीव से मित्रता करने के लिए ही आए हैं। अतः श्री राम का सुग्रीव के पास जाना उचित जान पड़ता है। परंतु श्री रामचंद्र जी, जैसा कि पहले कहा गया है, अयोध्या के होने वाले राजा हैं और अलौकिक पुरुष भी। श्री हनुमान जी इस समस्या से बाहर आने के लिए अनोखा मार्ग  निकालते हैं। वह श्री राम और लक्ष्मण जी को सुग्रीव के पास तो लेकर जाते हैं, परंतु अपने कंधों पर लेकर जाते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता।  इस प्रकार सूझबूझ के साथ श्री रामचंद्र जी और सुग्रीव दोनो की मर्यादा और सम्मान को को बनाए रखते हैं। 
         हनुमान जी किस प्रकार व्यक्ति को पहचान कर  उनके स्वभाव के अनुसार व्यवहार करते हैं। इस विषय में श्री वाल्मीकि जी का लिखा यह प्रसंग महत्वपूर्ण है। सुग्रीव के पास पहुंचने पर हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के बैठने लिए तो साल के पत्तों का आसान बना कर देते हैं, परंतु लक्ष्मण जी जो शेषनाग के अवतार हैं, के लिए चंदन के पत्तों का आसन बनाकर देते हैं। चंदन भुजंगों को प्रिय है।
               कुल मिलाकर सुग्रीव और श्री रामचंद्र के मित्रता करने के लिए हनुमानजी सभी उपायों का प्रयोग करते हैं।  और कहीं पर भी लक्ष्मण जी को भी उपेक्षित नहीं रखते। इस प्रकार अंत मे आपस मे मित्रता करा दने में सफल हो जाते हैं। 
                 3 **** मर्यादायुक्त किन्तु स्पष्ट बातचीत की कला में  दक्ष***
        इधर श्री रामचंद्र जी बाली का वध कर सुग्रीव को राज्य सौंप कर अपना वादा पूरा कर देते हैं। सुग्रीव का राज्याभिषेक भी हो जाता है। उस समय वर्षा ऋतु होने के कारण माता सीता के खोज का अभियान प्रारंभ करना ठीक नहीं था। सुग्रीव श्रीराम को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि जैसे ही वर्षा ऋतु समाप्त हो जाएगी और शरद ऋतु प्रारंभ हो जाएगी वे सारे वानर यूथपतियों को माता सीता की खोज में लगा देंगे। राज्य मिलते ही सुग्रीव का कुछ समय तो राज्य को व्यवस्थित करने में लगा। परंतु उससे अधिक समय सुरा सुंदरियों के उपभोग में बीत रहा था। 
          अब  शरद ऋतु प्रारंभ होने को थी, परंतु माता सीता के खोज के अभियान के लिए सुग्रीव के द्वारा कोई पहल नहीं दिखाई दे रही थी। हनुमान जी की श्री सुग्रीव और श्री रामचंद्र जी के बीच मैत्री कराने के लिए बड़ी भूमिका थी। इसीलिए सुग्रीव अपने वचन का पालन करें इसकी चिंता भी हनुमान जी को ही अधिक थी। सुग्रीव राजा थे और हनुमानजी उनके मंत्री थे। हनुमानजी और सुग्रीव के बीच राजा और मंत्री का सम्बंध होने के कारण हनुमान जी को उस मर्यादा का भी विचार करना पड़ता था। साथ ही सुग्रीव के द्वारा राम को दिया गया वचन भी पूरा करवाना था।
         हनुमान जी उचित समय देखकर सुग्रीव से मिलते हैं। महर्षि वाल्मीकि हनुमान जी की इस इस समय की बातचीत की प्रवीणता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अपने युक्ति युक्त किंतु मनोरम वचनों के द्वारा हनुमानजी सुग्रीव को प्रसन्न कर सुग्रीव से सत्य, अर्थ, नीति से युक्त और सुदृढ़ निश्चय के साथ प्रेम भरे वचन कहते हैं।
          हनुमान कहते हैं महाराज सुग्रीव आपने कुल परंपरा से आई हुई लक्ष्मी का संवर्धन किया है। राज्य का काम भी व्यवस्थित कर लिया है। किंतु अभी मित्रों का कार्य शेष रह गया है, उसे पूर्ण करना चाहिए। राजन, आप सदाचार से संपन्न और धर्म के मार्ग पर स्थित है। आपने मित्र के कार्य को सफल बनाने के लिए जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचित रूप से पूर्ण कीजिए। 
         पहले तो सुग्रीव को बड़ी बुद्धिमानी के साथ बड़ा बताने की कोशिश करते हैं, पर आगे कहते हैं, राजन, परम बुद्धिमान श्री राम को स्वाभाविक रूप से कार्य की सिद्धि के लिए जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन होने के कारण संकोचवश कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आगे हनुमान जी अपने ढंग से राम के उपकार का उल्लेख करते हुए कहते हैं, आप तो उनका भी कार्य करते हैं जिन्होंने आप पर कोई उपकार नहीं किया है, फिर रामचंद्र जी ने तो बाली को मार कर आप पर बड़ा उपकार किया हुआ है। 
       इतना कह कर आगे हनुमान जी श्री राम की शक्ति का  वर्णन कर अपरोक्ष रूप से सुग्रीव को सावधान भी कर देते हैं। वे कहते हैं इसमें कोई संदेह नहीं की दशरथ कुमार भगवान श्री राम अपने बाणों से समस्त देवताओं, असुरों और बड़े-बड़े नागों को भी अपने वश में कर सकते हैं, ( तुम्हारी क्या बिसात है)तो भी वे आपके द्वारा की गई प्रतिज्ञा को पूर्ण करने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। 
      देवता, दानव, गंधर्व, असुर, मरुदगन और यक्ष भी श्री राम को हानि नहीं पहुंचा सकते। फिर राक्षसों की बिसात ही क्या है। सुग्रीव ने इसके बाद वानर यूथपतियों को किष्किंधा में सेना सहित आने का आदेश दिया।
                           4  ****दूसरों के क्रोध का प्रबंधन****
        इधर मंत्री हनुमान जी राजा सुग्रीव को उनका मित्र धर्म का स्मरण कराते हैं। उधर श्री रामचंद्र जी सुग्रीव के द्वारा किए जाने वाले विलंब को देखकर लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं की सुग्रीव की राजधानी में जाकर सुग्रीव को भय  दिखा कर उसको मेरे साथ की हुई प्रतिज्ञा की याद दिलाना। लक्ष्मण जी अपने भाई श्रीरामजी की सीताजी के विरह से उत्पन्न व्याकुलता के कारण वैसे ही व्यथित हैं। राम की आज्ञा होने पर क्रोध से भरे हुए वे किष्किंधा में सुग्रीव के  महल तक जाते है। अपने धनुष को उठाकर सुग्रीव को ललकारते हैं। उनका क्रोध देखकर और अपनी गलती को महसूस कर सुग्रीव भय से कांपने लगते हैं। हनुमान जी से सलाह कर श्री लक्ष्मण जी के क्रोध को कम करने के लिए पहले अंगद को भेजते हैं। अंगद यह बाली का पुत्र है और स्मरण रहे बाली ने मरते समय अंगद को श्री रामचंद्र जी को सौंप दिया था। इसलिए श्री राम और लक्ष्मण जी के मन में अंगद के प्रति स्नेह भी है और दया का भाव भी।  इसी पृष्ठभूमि के कारण हनुमान जी पहले अंगद को लक्ष्मण जी के पास भेजने की सलाह देते हैं। लक्ष्मण जी के सामने अंगद बड़े भयपूर्ण भाव से हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।  अंगद को देखते ही लक्ष्मण जी ने एक हाथ उठाकर उसे अभय दान दे दिया। अंगद ने विनय पूर्वक श्री लक्ष्मण जी से क्रोध शांत करने हेतु प्रार्थना की। श्री लक्ष्मण जी का क्रोध थोड़ा शांत हुआ।  उसके बाद बाली की पत्नी तारा को लक्ष्मण जी के पास भेजा । तारा के प्रति भी श्री राम और लक्ष्मण के मन में दया का भाव है, दूसरे महिला होने के कारण लक्ष्मण जी को महिला के साथ कि बात की मर्यादा का पालन भी करना है। तारा ने नाना प्रकार के मधुर वचनों से श्री लक्ष्मण जी को शांत किया।  अंगद और तारा के मिलने के बाद लक्ष्मण जी का क्रोध बहुत हद तक शांत हो गया था।
                यदि किसी व्यक्ति को प्रसन्न करना है तो उसके प्रिय व्यक्ति का गुण गान करो । लक्ष्मणजी के लिए श्रीरामजी से प्रिय कौन हो सकते है? अतएव हनुमानजी लक्षमण  से  मिलते हैं तो प्रभु श्री राम का यशोगान करते है। हनुमानजी लक्ष्मणजी को लेकर सुग्रीव के महल में जाते है। हनुमानजी सीधे सुग्रीव के शयन कक्ष में लक्ष्मण जी  को लेकर जाते है।  वनवासी, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लक्षण जी को सीधे शयन कक्ष मे लेकर जाने का क्या औचित्य था? लक्ष्मणजी तो शेषनाग के अवतार हैं। किसी के पलंग पर साधारण सांप भी दिख जाए तो आदमी काम और अय्याशी भूल जाएगा! पहले अपने प्राणों की चिंता करेगा। सुग्रीव जो अय्याशी में डूबा होने के कारण अपने कर्तव्य को भूल गया, उसके लिए इससे अच्छी सिख क्या होसकती है।
          उसके बाद सुग्रीव ने जाकर श्री लक्ष्मण जी से क्षमा मांगी और अपने द्वारा किए गए प्रयासों के विषय में सूचना दी। लक्ष्मण जी सुग्रीव को क्षमा करते हुए उसे साथ लेकर श्री रामचंद्र जी के पास गए। इस प्रकार श्री हनुमान जी ने श्री लक्ष्मण जी के क्रोधका प्रबंधन उचित व्यक्तियों को उचित समय पर भेज कर किया। 
        किसी भी व्यक्ति के क्रोध के प्रबंधन का सबसे अच्छा तरीका यही होता है।
                            5    ****टीम भावना ****
        अब सुग्रीव सीता माता की खोज की योजना में लग जाते है। सभी वानर युथो को किष्किंधा आने का आदेश देते हैं। अलग अलग वानर युथो को अलग अलग दिशा में माता सीता की खोज के लिए भेजते है। संभावना यही अधिक थी कि माता सीता को लंकापति रावण ही अपहरण कर ले गया होगा। इसीलिये दक्षिण की ओर बालिपुत्र वीर अंगद के नेतृत्व में एक दल भेजा जाता है। इस दल में रीछपति जामवंत और महावीर हनुमानजी भी हैं। 
                वानरों का यह खोजी समूह अंगद के नेतृत्व में दक्षिण की ओर जाता है। आगे चलकर  दक्षिण के सघन और निर्जन  वनों से निकलता हुआ यह दल भूख प्यास से त्रस्त  हो जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब असफलता के कारण सामूहिक आत्महत्या करने की ईच्छा भी  उनके मन में आ जाती है। इस समय संपाती नमक गिद्ध उनकी सहायता करता है। और उन्हें सीता माता का पता बताते हुए कहता है कि माता सीता को रावण अपहरण कर अपने राज्य लंका में ले गाया है।   परंतु उस स्थान  अर्थात लंका पहुंचने के लिए 100 योजन के सागर को पार करना पड़ेगा।  जो एक असंभव सा कार्य था।
                अंगद सभी वानर यूथपतियों से पूछता है की कौन इस इस समुद्र को पार कर सकता है? वानर वीरों ने अलग अलग जवाब दिया। वानर वीर गज ने कहा 10  योजन तक तक छलांग लगा सकता है। वीर शरभ कहते हैं मैं 30 योजन तक छलांग लगा सकता हूं।  वीर ऋषभ ने कहा वह 40 योजन तक छलांग लगा सकता है। तेजस्वी गंधमादन 50 योजन तक छलांग लगाने की बात कहते हैं। वानर वीर मयंद 60 योजन तक,  तो महा तेजस्वी द्विविद ने 70 योजन दूरी तक छलांग लगाने की अपनी शक्ति बताई।  स्वयं दलपति अंगद कहते हैं कि मैं समुद्र तो पार कर लूंगा, परंतु वापसी के विषय में कुछ सुनिश्चित नहीं कह सकता। 
           इस इस पूरी बातचीत में हनुमान जी मौन रहते हैं ।  साधारणतया  यह देखा जाता है की जिनके पास थोड़ी भी ताकत रहती है, वे अपनी ताकत का वर्णन कर लेना चाहते है, परंतु जो वास्तव में शक्तिशाली है और योग्य है वह अपनी ताकत का वर्णन स्वयं नहीं करता, वह प्रतीक्षा करता है की कोई अन्य उसकी शक्ति का आंकलन करें तो ही वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेगा। एक तो यह निराभिमानी शक्तिशाली की पहिचान है। दूसरे टीम के अन्य सदस्यों को भी अपनी शक्ति के विषय मे अपनी बात रखने काअवसर देने का हेतु इस व्यवहार के पीछे है।
            हनुमान जी अन्य वानर वीरों की तरह अपनी शक्ति का वर्णन नहीं करते, वरन मौन रहते हैं। सबसे वरिष्ठ रीछपति  जामवंत  हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण दिलाते हैं--
 "कहहि रिछपति सुनु हनुमाना , का चुप साधि रहेउ बलवाना।
पवन तनय बल पवन समाना, बुद्धि विवेक बिग्यान निधाना।।"
( हनुमान सुनो बलवान होकर भी तुमने यह चुप्पी क्यों साथ रखी है। तुम पवन पुत्र हो और पवन के समान  ही बलवान भी।  बुद्धि, विवेक और विज्ञान के तुम निधान हो।)
             यह सुनकर हनुमानजी समुद्र लांघने  के लिए उद्यत हो जाते हैं। स्वयं को पर्वताकार कर लेते हैं।
         सामान्यतया अपनी शक्ति को बातों के द्वारा प्रदर्शित न करने वाले हनुमान जी समय की नजाकत को पहचानते हैं। ऐसे सामूहिक अवसाद के समय अपनी टीम में उत्साह का संचार करना आवश्यक हो जाता है । हनुमान जी  वानरों के बीच से उठकर खड़े हो गए। संपूर्ण शरीर रोमांचित हो उठा। हनुमान जी ने बड़े बूढ़े वानरों को प्रणाम करते हुए अपनी टीम में उत्साह का संचार करते हुए कहा, मैं शीघ्र वेग से चलने वाले शीघ्रगामी महात्मा वायु का औरस पुत्र हूं और छलांग लगाने में उन्हीं के समान हूं। महाराज गरुड़ में, मुझ में या वायु देवता में ही समुद्र को लांघ कर जाने की शक्ति है। इसके अलावा और इस कार्य को कोई नहीं कर सकता।
     वज्रधारी इंद्र अथवा स्वयंभू ब्रह्मा जी के हाथ से भी मैं बलपूर्वक अमृत छीन कर ला सकता हूं। 
            श्री हनुमान जी जब यह गर्जना कर रहे थे तब संपूर्ण वानर यूथ अत्यंत हर्ष से भरकर आश्चर्य से उनकी ओर देख रहे थे। इन बातों को सुनकर वानर रीछपति  जामवंत को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे बोले वीर केसरी पुत्र तुमने अपने बंधुओं का महान शोक नष्ट कर दिया है। यही परिणाम हनुमान चाहते भी थे। हनुमानजी अपनी प्रशंसा में उक्त बातें नही कहते, वरण हारी हुई मानसिकता वाली अपनी टीम में उत्साह के जागरण के लिए अपनी शक्ति का परिचय देते है। आगे टीम भावना का परिचय देते हुए हनुमान जी वरिष्ठ योद्धा जामवंत से पूछते है, अब मुझे क्या करना है, आप ही बताओ। जामवंत कहते हैं कि तुम केवल माता सीता का पता लगा कर आओ। आगे की लीला तो स्वयं श्रीराम करेंगे। ****
            जामवंत की बात को विनम्रता पूर्वक स्वीकार करते हुए अभियान पर जाने के पूर्व अपने सभी साथियों से कहते हैं, मैं शीघ्र वापस आऊंगा तब तक आप लोग यहां मूल फल खाकर मेरी प्रतीक्षा करना। इसके बाद टीम के सारे सदस्यों को सर झुकाकर प्रणाम करते हैं। मानो वे उनकी शुभकामनाएं और आशीर्वाद लेकर जा रहे हैं।  इस प्रकार हनुमान सारे सदस्यों को मन से अपने अभियान के साथ जोड़ लेते हैं। यह भी सामूहिक रूप से सबको अपने अभियान से मानसिक रूप से जोड़े रखने की एक कला है। यह तो हुई बल और विनम्रता के संयोजन की बात और इसके आगे श्री हनुमान जी अपने अभियान पर निकलने के पहले श्री रामचंद्र जी को अपने हृदय में धारण करते हैं  "चले हरषि हियँ धरी रघुनाथा"। जब लक्ष्य की प्राप्ति में निकले व्यक्ति में बुद्धि, बल, विनम्रता के साथ भक्ति का भाव होतो लक्ष्य प्राप्ति में सफलता निश्चित है। और भक्ति का भाव अहंकार को समाप्त कर देता है।
                  हनुमान जी महेंद्र गिरी पर्वत पर चढ़ जाते हैं। ईश्वर को, अपने पिता पवन देव को और माता अंजना माई को प्रणाम करते हैं।  हनुमान जी को शंका रहती  है कि अभी भी वानर युथ मेरे इस अभियान की सफलता पर पूर्ण विश्वास कर रहे हैं या नहीं, इसलिए वे वानर युथों को संबोधित करते हुए और उनमे विश्वास का भाव जागृत करते हुए कहते हैं, मैं किसी प्रकार से सीता माता का पता लगाऊंगा। वह लंका में होगी तो लंका से ले आऊंगा, स्वर्ग में होगी तो मैं वहां से खोज कर लाऊंगा। परंतु सीता माता का पता लगा कर ही आऊंगा। यदि इसके बाद भी जानकी माता का पता न लगा पाऊं तो लंका को उखाड़कर रावण सहित यहां ले आऊंगा। आप सब लोग निश्चिंत रहें। ऐसा कह कर टीम के सदस्यों के मन मे अभियान की सफलता में थोड़ा बहुत संशय बचा होगा तो उसे भी दूर कर देते हैं। 
                                  6****पहला अवरोध मैनाक पर्वत****
            समुद्र पार कर लंका में प्रवेश करते तक हनुमान जी को चार प्रकार के  अवरोधों का सामना करना पड़ा। चारों ही अवरोधों की प्रकृति और प्रकार अलग-अलग थे। स्वाभाविक रूप से इन अवरोधों को हटाने में हनुमान जी को अलग-अलग प्रकार के उपाय करने पड़े।
               प्रथम अवरोध मैनाक पर्वत के रूप में आता है। यह मित्रता पूर्ण और सुविधापूर्ण अवरोध है। मनुष्य के जीवन में भी लक्ष्य की प्राप्ति में इस प्रकार के अवरोध कभी सुख के रूप में कभी सुविधा के रूप में और कभी आलस्य के रूप में आते रहते हैं। समुद्र के ऊपर श्री राम के पूर्वजों का बड़ा ऋण रहा है। श्री राम के पूर्वज महाराज सगर के कारण सागर का अस्तित्व है। इसीलिए सागर यह विचार करता है कि हनुमान जी श्री रामचंद्र के दूत है, मुझे उनके पूर्वजों का ऋण चुकाने का यही अवसर प्राप्त  हुआ है। मैं श्री हनुमान जी को कुछ देर तक यहां विश्राम करने के लिए व्यवस्था  कर दूं। वे मैनाक पर्वत से निवेदन करते हैं की तुम हनुमान जी को विश्राम के लिए आमंत्रित करो। मैनाक पर्वत समुद्र की इच्छा को पूरा करने हेतु श्री हनुमान जी को अत्यंत आदर पूर्वक विश्राम करने हेतु आमंत्रित करता है। मैनाक पर्वत हनुमान जी से निवेदन करता है की आप वानरों में श्रेष्ठ हैं, फिर श्री राम जी के दूत हैं। सागर के ऊपर श्री राम के पूर्वजों का बड़ा उपकार रहा है और मेरे ऊपर भी आपके पिता महात्मा पवन देव का बड़ा उपकार है। जब इंद्र ने सारे पर्वतों के पंखों को काट दिया था, तब महात्मा पवन ने मुझे धक्का देकर खारे समुद्र में डुबो दिया।  जिससे मेरे पंख आज भी सुरक्षित हैं।  मेरा आपसे निवेदन है की मेरा आतिथ्य स्वीकार कर मुझे भी अनुग्रहित करें।  श्री हनुमान जी ने मैनाक पर्वत से कहा पर्वत राज आपके आतिथ्य से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं।  परंतु मेरा कार्य शीघ्रता का है और मैंने वानरों को वचन दिया है कि बिना कहीं रुके सीता जी का पता लगा कर आऊंगा। श्री गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में हनुमान जी कहते हैं "रामकाज कीन्हे बीनू मोहे कहां विश्राम।" इस प्रकार कहकर श्री हनुमान जी मैनाक पर्वत को प्रेम और आदर के साथ छूकर और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ऐसा करके उन्होंने अवरोध के रूप में आए हुए मित्रवत मैनाक पर्वत को पूरे सम्मान के साथ विश्राम से मना कर अपने लक्ष्य प्राप्ति में अवरोध नहीं बनने दिया, साथ ही मैनाक पर्वत को दसादर छूकर और प्रणाम कर आभार भी व्यक्त करने से भी नहीं चूकते।
                     7  *****दूसरा अवरोध, नागों की माता सुरसा****
             लक्ष्य की प्राप्ति में हनुमान जी के मार्ग में दूसरा अवरोध सुरसा के रूप में प्रस्तुत होता है। सुरसा नाग माता है। देवताओं ने जब हनुमान जी को समुद्र पार करते देखा तो उनके मन में विचार आया कि जिस कठिन काम के लिए हनुमान जी जा रहे हैं। वे उस काम के योग्य है या नहीं इसकी परीक्षा तो ले ली जाए।  देवताओं ने नागमाता सुरसा से कहा कि तुम राक्षसी का रूप लेकर हनुमान जी के वायु मार्ग में जाकर उनको खाने की की कोशिश करो। यदि तुम सफल हो गई तो हनुमान जी वापस चले जाएंगे। यदि हनुमान जी ने तुम्हारे मुंह में जाकर भी निकलने में सफलता प्राप्त कर ली तो हनुमान जी अपने कार्य की सिद्धि के लिए योग्य हैं और वह आगे बढ़ जाएंगे। हनुमान जी वायु मार्ग से जा रहे थे तभी सुरसा ने उनको ललकार कर कहा कि देवताओं ने मुझे तुम्हें अपने मुंह में प्रवेश कराने के लिए भेजा है। इसीलिए तुम मेरे मुख में स्वयं हो कर समा जाओ। अन्यथा मुझे बल प्रयोग करना पड़ेगा। हनुमान जी ने पहले तो निवेदन किया की मैं श्री राम जी की भार्या माता सीता को खोजने के लिए निकला हूं, यह बहुत ही महत्वपूर्ण काम है। इस पुण्य कार्य में तो आपको सहयोग करना चाहिए, यदि सहयोग न भी करना चाहो तो मैं श्री रामचंद्र जी का कार्य पूरा करने के बाद वापस आऊंगा तब मुझे अपना भक्ष्य बना लेना। परंतु सुरसा नहीं मानी उसने अपना मुंह बड़ा किया। हनुमान जी ने भी अपना शरीर उतना ही विशाल कर लिया।  सुरसा लगातार अपना मुंह बड़ा करते जा रही थी और हनुमान जी भी अपना शरीर बड़ा करते जा रहे थे। जब सुरसा ने अपना मुख सौ योजन  तक बढ़ा लिया तो बुद्धिमान हनुमान ने लघु रूप धारण कर लिया और सुरसा के मुंह में घुसकर धीरे से बाहर आ गए। अपने सामान्य रूप में आकर उन्होंने सुरसा से कहा की माता अब प्रतिज्ञा पूरी हो गई। मैं तुम्हारे मुंह में प्रवेश करके बाहर भी आ गया। सुरसा के पेट से बाहर निकलकर हनुमानजी सिर नवाकर बिदा मांगते है इस पर सुरसा कहती है
 "मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा ,बुधि बल मरमु तोर मैं पावा " । आगे सुरसा से रामकाज में सफल होने का आशीर्वाद लेकर हनुमानजी अपने अभियान में आगे बढ़ते है।
         यदि हनुमान जी चाहते तो सिंहनी राक्षसी की तरह सुरसा को भी मार सकते थे। परंतु एक परीक्षक के साथ भद्रता पूर्ण व्यवहार करना और परीक्षा में  उत्तीर्ण होकर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना, इस बात को हनुमान जी ने ध्यान में रखकर सुरसा को मारने की कोशिश नहीं की। वरन सुरसा की परीक्षा में  खरे उतरे।  बल का कहां और कितना उपयोग करना चाहिए , इसके लिए बल के धाम हनुमान जी हमेशा अपने विवेक का युक्तियुक्त उपयोग करते हैं। दूसरी परीक्षक के सामने उससे बड़ा बनना मर्यादा के विरुद्ध है। इसीलिए कुछ देर तो हनुमान जी के सुरसा के मुंह से बड़ा बनने की कोशिश करते है। परंतु उसके बाद तुरंत लघु रूप धारण कर लेते हैं। एक परीक्षार्थी के लिए आवश्यक है कि वह परीक्षक से छोटा बना रहे ।परंतु यह बात भी वही लागू होती है जहां परीक्षक सद्भाव पूर्वक परीक्षा लेता है। हमारे जीवन में भी अनेक परीक्षाएं और परीक्षक अनेक रूपों में आते हैं। चाहे वह माता-पिता हो, चाहे वह गुरु जन, चाहे व्यवसाय में साथ काम करने वाले लोग हो, चाहे हमारा बॉस हो ये सब जब परीक्षा लेते हैं तो हमें कई बार गलतफहमी हो जाती है की या तो मुझे नीचा दिखाया जा रहा है, या असंतुष्टि का भाव प्रकट हो रहा है। ऐसे समय में विवेक बुद्धि के साथ निर्णय लेकर अपने वरिष्ठों के द्वारा ली जा रही परीक्षा के लिए लघु रूप धारण करके अर्थात छोटा बन कर सफलता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। 
                   8     ****तीसरा अवरोध सिहिंका के रूप में ****
          लक्ष्य प्राप्ति में तीसरा अवरोध सिंहिका राक्षसी के रूप में आता है। सिहिंका कश्यप ऋषि की पत्नी दिति की पुत्री थी। कश्यप ऋषि के दो पत्नियां थी। एक से असुर पैदा हुए और दूसरी से सुर पैदा हुए । ऋषि के यहां पैदा होने के बावजूद भी सिहंका राक्षसी थी। उसकी विशेषता थी कि वह सीधा अपने शिकार पर हमला नहीं करती थी। उसकी छाया को पकड़ लेती थी और छाया को पकड़ लेने के मात्र से शिकार पकड़ में आ जाता था। सागर को पार करते हुए हनुमान जी की गति अचानक कम होने लगी, उन्होंने आसपास देखा, पर उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया, जो उन्हें खींच रहा हो। हनुमान जी ताड गए की यह ऐसी शक्ति है जो परोक्ष रूप से आक्रमण कर रही है। और मेरे अभियान में बाधा उत्पन्न कर रही है। हनुमान जी ने ध्यान लगा कर सिंहिंका को पहचान लिया और उसके ऊपर आक्रमण कर उसके प्राण हर लिए। 
      जो परोक्ष रूप से आक्रमण करे उसे कपट कहा जाता है। कपट करने की प्रेरणा ईर्ष्या से प्राप्त होती है। ईर्ष्या का भाव हमारे लक्ष्य प्राप्ति में बड़ी बाधा होता है। यह सच है हमारे अंदर की ईर्ष्या का भाव हमारे लक्ष्य की प्राप्ति में बड़ी बाधा है परंतु हमारे अंदर ईर्ष्या का भाव है यह हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते। ईर्ष्या के प्रतिफल के रूप में हम कपट भी कर लेते हैं, परंतु उसको भी हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते। अपने अंदर के ईर्ष्या भाव को वही जान सकता है और जानने के बाद नष्ट भी कर सकता है, जो श्री हनुमान जी की तरह सम भाव के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है।
                श्री हनुमान जी इस प्रकार तीन अवरोधों  को पार कर लंका की भूमि पर पहुंच जाते हैं। अब तक तो उन्होंने विशाल रूप धारण कर समुद्र पार किया था। 
                             9 ****चौथा अवरोध लंकिनी****

                हनुमान जी लंका में पहुंचकर देखते हैं कि अनेक प्रकार के वृक्ष फलों से लदे हुए हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह वर्णन इसलिए किया की वानर को यदि फलदार वृक्ष दिख जाए तो सबसे पहले वह फल खाने का काम करता है फिर आगे दूसरा कोई और कार्य करता है। परंतु हनुमान जी उस समय फल नहीं खाते।  हनुमान जी लंका का अवलोकन करने हेतु एक ऊंचे पर्वत पर  कूद कर चढ़ जाते हैं। वहां से लंका का निरीक्षण करते हैं। वे देखते हैं बड़े-बड़े भवन लंका में है। हजारों की संख्या में सैनिक चारों ओर से लंका की सुरक्षा में लगे हुए हैं लंका के चारों और सुंदर परकोटा बना हुआ है, जिसमें सैनिक पहरा दे रहे हैं। उनकी आंखे चुरा कर परकोटे में प्रवेश करना बहुत कठिन है। अब  वे निश्चय करते हैं कि सूक्ष्म रूप धारण करके ही लंका में प्रवेश किया जा सकता है। वे लघु रूप धारण कर परकोटे में प्रवेश करते हैं।
            लंका की सुरक्षा का भार लंकिनी नामक एक राक्षसी के ऊपर रहता है। लंकिनी के आंख से बचकर कोई भी परकोटे में प्रवेश नहीं कर सकता था। लंकिनी का भी एक इतिहास है। रावण ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से लंका को मांगा तो ब्रह्मा जी ने रावण को लंका दे दी। अब रावण ने लंका की सुरक्षा के लिए लंकिनी को भी मांग लिया।  लंकिनी के ऊपर ब्रह्मलोक के सुरक्षा का भार था। परंतु श्राप के कारण उसे पृथ्वी पर आना ही था।  ब्रह्मा जी ने रावण को लंकिनी को ले जाने की अनुमति दे दी।  लंकिनी ने ब्रह्मा जी से पूछा की भगवान इस श्राप से मुझे मुक्ति कब मिलेगी, तो ब्रह्मा जी ने कहा की जब कभी तुम्हारा किसी ऐसे बलवान वानर से मुकाबला होगा जिसके मुक्के मात्र से तुम्हारे मुंह से खून निकलने लगेगा, तो समझ जाना रावण का अंत आ गया है और तुम उसी समय शापमुक्त हो जाओगी।
           हनुमान जी जैसे ही ,परकोटे में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं  उनके सूक्ष्म स्वरूप के बावजूद लंकिनी की दृष्टि से वह बच नहीं पाते। लंकिनी हनुमान जी को ललकारती है, मेरे रहते तुम परकोटे में कैसे प्रवेश कर रहे हो? मैं लंका की सुरक्षा की अधिष्ठात्री देवी हुँ। तू मेरे मेरी अहवेलना करके लंका में प्रवेश कर रहा है। अब तो तू स्वयं को मरा हुआ जान। हनुमान जी अब पर्वत आकार लेकर लंकिनी के सामने खड़े होकर कहते हैं, देवी मैं तो केवल लंका के दर्शन कर लेना चाहता हूं।  मैं दर्शन करके वापस आ जाऊंगा। लंकिनी कहती है तू कैसे प्रवेश करेगा? यदि प्रवेश करना है तो पहले मेरा सामना करना पड़ेगा। ऐसा कह कर लंकिनी हनुमान जी को एक थप्पड़ मारती है। हनुमान जी क्षण भर सोचते हैं कि एक तो यह नारी है, दूसरे मूल रूप से राक्षसी नहीं है। तीसरे जो कुछ कर रही है यह उसका कर्त्तव्य है । ऐसे में इसके प्राण लेना ठीक नहीं है। उन्होंने ने शक्ति संचय कर एक घुसा लंकिनी को मार दिया। लंकिनी भूमि पर गिर पड़ी और उसके मुंह से खून निकलने लगा।  मुंह से खून निकलते देख लंकिनी को ब्रह्मा जी की बात स्मरण हो आई। वह उठी और हनुमान जी से हाथ जोड़कर कहती है, वीर हनुमान तुम निर्भीक होकर लंका में प्रवेश करो और अपना कार्य संपन्न कर वापस आओ। यह मेरा सौभाग्य है की आज मुझे साक्षात श्री रामचंद्र जी के दूत का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी के अनुसार अब रावण का अंत निश्चित है।
           इस अवरोध को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी ने मजबूरी में बनी राक्षसी लंकिनी का वध नहीं किया और घूंसा मारकर उसकी उसकी पूर्व जन्म की स्मृति को ताजा भर कर दिया।
                  10***मित्रता की युक्तियुक्त पहल*****
             अब श्री हनुमान जी लंकिनी से निपटने के बाद लंका की ओर सूक्ष्म रूप धरकर प्रवेश करते हैं। वह अनेक महलों में जाते हैं और सीता जी का पता लगाने का प्रयास करते हैं, परंतु उन्हें कहीं पर सीताजी का पता नहीं लग पाया। यहां तक कि हनुमान जी रावण के महल में, कुंभकरण के महल में, मेघनाथ के महल में, औरअन्य राक्षस सेनापतियों के महल में जाकर देखते हैं, परंतु सीता जी का कोई सुराग नहीं मिलता। इस प्रकार एक-एक  महल को देखते हुए आगे बढ़ते है। एक महल में उन्हें एक मंदिर बना हुआ दिखाई देता है। इसके आगे साफ सुथरा तुलसी का चौरा  है।  वहीं एक दीपक भी जल रहा है।  इसका मतलब इस महल में प्रतिदिन ईश्वर की पूजा की जाती है। यहां रहने वाला व्यक्ति निश्चित थी सात्विक प्रवृत्ति का होगा। हनुमान जी यह विचार कर ही रहे थे कि महल के अंदर से एक व्यक्ति राम नाम लेते हुए निकल रहा था। हनुमान जी विचार करते हैं की यह व्यक्ति तो सज्जन दिखाई दे रहा है। रात भर घूमने के बाद, सारे प्रयास करने के बाद भी सीता जी का पता नहीं लग पाने से थके हुए श्री हनुमान जी को यह एक महत्वपूर्ण सूत्र दिखाई दिया। हनुमान जी विचार करते हैं अच्छा यह होगा कि मैं स्वयं आगे बढ़कर उनसे परिचय प्राप्त कर लूं और बातचीत शुरू करुं। सज्जन व्यक्ति से स्वयं होकर बात करने से कोई हानि नहीं होती है, कुछ लाभ ही होगा। हनुमान जी तुरंत सूक्ष्म रूप छोड़कर ब्राह्मण के वेश में खड़े होकर महल से निकल रहे विभीषण को आवाज देते हैं। विभीषण आवाज सुनकर ब्राह्मण को पूछते हैं, हे ब्राह्मण आप अपनी कथा सुनाओ। अर्थात अपना परिचय दो। आपको देखकर मेरे मन में आपके प्रति स्नेह उमड़ रहा है। आप कौन हैं? क्या आप राम के दूत हैं या स्वयं राम है।
           अब तक चतुर हनुमानजी समझ जाते हैं की यह व्यक्ति विश्वास करने के योग्य है। और निश्चित रूप से सीता माता की खोज में इससे सहायता मिल सकती है। यदि आपको किसी व्यक्ति से सहायता चाहिए तो उसके साथ बिना किसी छल के वास्तविकता को सामने रख देना चाहिए।  हनुमान जी यही करते हैं, उन्होंने विभीषण को अब तक की श्री रामचंद्र जी की कथा सुना दी, और अपना पूरा परिचय दे दिया।
           विभीषण कहते हैं मैं तो यहां राक्षसों के बीच कैसे रहता हूं मैं ही जानता हूं। मैं भी श्री हरि की कृपा चाहता हूं। परंतु एक तो मेरा यह शरीर राक्षस कुल का है।  इस शरीर से कोई साधना बनती नहीं है।  न हीं मेरे मन में श्री राम के प्रति अगाध भक्ति है। इसीलिए मुझे संदेह है कि मुझे  ईश्वर की कृपा प्राप्त हो सकेगी।  फिर भी एक आशा बंधी है, क्योंकि बिना हरि की कृपा के संत लोग नहीं मिलते हैं, आज आपसे भेंट हो गई। 
            हनुमान जी कहते हैं विभीषण सुनो, प्रभु हमेशा अपने सेवकों पर प्रेम करते हैं।  मुझे ही देख लो मैं कौन सा कुलीन हूं? मैं तो वानर जाति का हूं, चंचल स्वभाव का हूं, सभी प्रकार नीच हूं। जो कोई सुबह हमारा नाम भी ले ले तो उसे खाना तक नसीब नहीं होगा।  मेरे जैसे अधम पर भी प्रभु ने कृपा की है। ऐसा कहते हुए हनुमान जी के नेत्रों में भक्ति भाव का जल भर आया।  हनुमान जी जानते हैं की मित्रता बराबरी के स्तर पर होती है।  इसीलिए वह विभीषण की इस हीन भावना को, कि वह राक्षस कूल में पैदा हुआ है इसलिए अयोग्य है, इसे दूर करने के लिए स्वयं को भी बहुत छोटा और निम्न कुल का होना बताते हैं। यही हनुमान जी की संप्रेषण की विशेषताएं है।  हनुमान जी और आगे बढ़कर विभीषण से कहते हैं "सुनो भाई!" भाई  कह कर विभीषण को भाई तो बना लेते हैं, परंतु उसके आगे कहते हैं कि मैं मां जानकी को देखना चाहता हूं, अर्थात यह भाई का रिश्ता हनुमान जी ने जोड़ा और वह भी मां जानकी के पुत्र के रूप में। अभी तक तो विभीषण इस दुविधा में था की रावण उसका भाई है उसको छोड़कर वह कैसे जा सकता है।  परंतु हनुमान जी ने यह भाई का रिश्ता, वह भी जान की मां के पुत्र के रूप में जोड़कर अब विभीषण को भाई का विकल्प भी दे दिया। हनुमान जी ने इस प्रकार अपनी व्यवहार कुशलता और संप्रेषण के कौशल के द्वारा श्री रामचंद्र जी के लिए एक नया और महत्वपूर्ण सहयोगी विभीषण के रूप में  बना लिया।  विभीषण ने मां जानकी का पता बता दिया और किस प्रकार जाना है यह भी बता दिया। श्री हनुमान जी पुनः मूषक रूप धरकर अशोक वन की ओर प्रस्थान कर गए।
        11********** माता सीता को विश्वास में लेना****************
                   अशोक वन में पहुंचकर हनुमान जी मां जानकी को अत्यंत दुखी अवस्था में देखते हैं। मां जानकी श्री राम के वियोग में कमजोर हो गई है, उन्होंने खाना पीना भी छोड़ दिया है। मां जानकी विलाप करते हुए अपने जीवन के अंत की कामना करती है। इसी  समय रावण वहां आता है और सीता जी से कहता है तुम एक बार तो मेरी ओर देखो मेरी सारी रानियां मंदोदरी सहित तुम्हारे चरणों में दासी के रूप में प्रस्तुत कर दूंगा। माता सीता को श्री रामचंद्र जी पर पूरा विश्वास है और उनके चरणों में संपूर्ण निष्ठा है। इसलिए तृन की वोट लेकर रावण से निर्भय होकर कहती है। तुम तो एक जुगनू के समान हो और भगवान श्री राम सूर्य के समान है। तुम्हारी श्री राम से कहां तुलना? उनके एक बाण मात्र से तुम नष्ट हो जाओगे। सीता जी के इन शब्दों से अपमानित हुए रावण का अहंकार और क्रोध जाग उठा। वह वह नंगी तलवार लेकर सीता जी को मारने दौड़ा। आगे बढ़ कर सुशील और गुणी मंदोदरी ने रावण को रोक लिया। रावण साथ आये राक्षसियों को कहता है, सीता जी को किसी भी तरह से, चाहे भय से ही क्यो न हो मनाने की कोशिश करो। सीता जी को कहता है कि यदि तुम एक महीने में मेरी बात को नहीं मानोगी तो मैं इस तलवार से तुम्हारा सिर अलग कर दूंगा। सीता जी कहती है श्री राम के अलावा मेरे गले में और किसी का हाथ नहीं पहुंच सकता या तो श्री राम जी का हाथ पहुंचेगा या इस तलवार  की धार। रावण माता जानकी को चेतावनी देकर अपने घर की ओर चला गया। माता सीता पुनः विलाप करने लगी।
         इस प्रकार नाना विधि रावण से प्रताड़ित एवं श्री राम जी के विरह में दुखी माता सीता के लिए हनुमान जी का सीधा सामने जाना संभवतया सीता जी के लिए सँशय का करण बन सकता है। राक्षस तो अनेक रूप लेकर विचरण करते रहते हैं। हनुमान जी विचार करते हैं की मैं अचानक माता के सामने प्रकट हो जाऊं तो वानर जानकर संभव है मुझ पर विश्वास ना करें। दूसरे वे सीधे माता के पास जाते हैं तो हो सकता है की रावण के सैनिक और सीता माता पहरा दे रही राक्षसियों को संशय ना हो जाए। इसीलिए सीधे माता के सामने जाने से पहले वे वह श्री रामचंद्र जी की गाथा का धीमी आवाज में गान करते हैं। किस प्रकार महाराजा दशरथ के पुत्र को जो युवराज घोषित होने वाले थे,  उनको वनवास मिला और किस प्रकार माता सीता का रावण ने हरण किया। यह सुनकर सीता माता उस अशोक वृक्ष को ध्यान से देखने लगी। हनुमानजी उस वृक्ष से श्री रामचंद्र जी के द्वारा दी गई अंगूठी को माता के सामने डाल देते हैं। सीता जी राम नाम अंकित अंगूठी को देखकर उसे पहचान गई। उनके हृदय में हर्ष विषाद का मिला-जुला भाव आने लगा। जब किसी व्यक्ति को कोई प्रिय चीज अचानक मिल जाए तो उसे संदेह होने लगता है। सीता जी भी विचार करती हैं कहीं यह राक्षसों की माया तो नहीं है। परंतु उनका विश्वास कहता है की माया से श्री रामचंद्र जी की अंगूठी को बनाया नहीं जा सकता। इसी समय हनुमान जी श्री रामचंद्र जी का गुणगान करने लगते हैं। श्री राम की कर्ण मधुर कथा को सुनकर सीता जी प्रसन्न हो जाती हैं। और कहती हैं, भाई तुम कौन हो, सामने आ जाओ।  तब हनुमान जी उनके निकट आकर खड़े हो जाते हैं। 
              वानर को देखकर माता सीता मुंह फेर लेती है। उन्हें आश्चर्य भी होता है। हनुमान जी कहते हैं माता जानकी! मैं करुणा निधान की शपथ लेकर कहता हूं की मैं राम का दूत हूं। माता! यह अंगूठी मैंने ही लाई है, जिसे श्री रामचंद्र जी ने निशानी के रूप में मुझे दिया था। सीता माता अपना संन्देह दूर करने के लिए पूछती है, यह वानर और मनुष्य की संगति कैसे हो गई? तब श्री हनुमान जी पूरी कथा को कहते हैं। श्रीराम और लक्ष्मण जी के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं। हनुमान जी की पूरी बात सुनने के बाद सीता जी के मन में विश्वास जाग गया। वह कहती हैं, हनुमान तुम तो विरह के सागर में डूबती हुई मेरे जैसे के लिए जहाज के समान हो। श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण कुशल तो है? करुणा निधान  राम मेरे प्रति इतने कठोर कैसे हो गए? वह तो स्वभाव से ही सेवक को सुख देने वाले हैं, क्या कभी मेरी याद भी करते हैं? मैं उनको कब आंख भर कर देख पाऊंगी? हे ईश्वर, हे स्वामी आपने तो मुझे भूला ही दिया! हनुमान जी सीता जी को विरह में व्याकुल देखकर अपनी बात रखते हैं। हनुमान जी जानते हैं की विरह में व्याकुल व्यक्ति को यदि धीरज दिलाना है तो उसे यह विश्वास दिलाना बहुत आवश्यक है की सामने वाला व्यक्ति आपसे भी अधिक बिरह में व्याकुल है।  श्री हनुमान जी कहते हैं माता प्रभु अपने अनुज सहित कुशल हैं।( कुशलता को बहुत संक्षेप में कहकर) आगे कहते हैं परंतु आपके विरह में दुखी हैं। माता! अपना मन छोटा मत करिए श्री रामचंद्र जी के हृदय में आपके प्रति आपसे दूना प्रेम है। ऐसा कहते हुए हनुमान जी के आंखों से अश्रु निकल पड़े। हनुमान जी आगे श्री रामचंद्र का संदेश सुनाते हुए कहते हैं कि श्रीरामचंद्र जी ने कहा है "सीते तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नए कोपल अग्नि के सामान लगते हैं। रात्रि कालरात्रि बन गई है। चंद्रमा सूर्य के समान धधक रहा है।  कमल बाणो के समान हो गए हैं। मेघ भी मानो खौलता तेल बरसा रहे हैं। वायु के झोंके जहरीले लगने लगे है।  हे प्रिया मैं अपनी बात अपना दुख किसी से कह भी तो नहीं पाता।  मेरा मन तो सदा तेरे पास ही रहता है। यह सुनकर सीता के जी के हृदय में श्री रामचंद्र जी के प्रति इतना प्रेम भर गया कि उन्हें अपनी सुधि नहीं रही।  आगे हनुमान जी श्री रामचंद्र जी की वीरता का वर्णन करते हुए माता सीता को विश्वास दिलाते हैं कि श्री रामचंद्र जी शीघ्र ही यहां आएंगे। हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के वीरता का बखान करते हुए कहते हैं कि मैं मनुष्य असुरों और देवताओं में भी किसी को ऐसा नहीं देखा जो भगवान श्री राम के बाणों की वर्षा के समक्ष टिक पाए। उनके बाणो से सारे राक्षसों का नाश होगा, और श्रीराम आपको अपने साथ लेकर जाएंगे। जब व्यक्ति दुखी होता है तो उसके मन में कई संशय उत्पन्न होते हैं।  माता पूछती है कि मुझे संशय है तुम जैसे वानरों को लेकर श्री राम जी राक्षसों का सामना कैसे करेंगे?  तब श्री हनुमान जी ने अपना भूधराकार शरीर दिखाया।  इतना ही नहीं तो वह कहते हैं प्रभु की कृपा से केवल मैं ही नहीं तो मेरे जैसे सभी वानर इतने ही बलवान है। अब सीता माता को विश्वास हो गया। वे हनुमानजी को अनेक आशीष देने लगी।
             हनुमान जी माता सीता से कहते हैं, मां अब  मुझे बहुत भूख लगी है मुझे इस बगीचे के फल खाने की आज्ञा दीजिए। सीता जी सावधान करते हुए कहती है, यहां पर बड़े-बड़े राक्षस इस बगीचे की रक्षा कर रहे हैं। हनुमान जी कहते हैं मां यदि आपकी आज्ञा हो तो मुझे इन सबका कोई भय नहीं है। 
          हनुमान जी को उस समय भी फल दिखे थे जब वे समुद्र पार कर लंका के किनारे खड़े थे। परन्तु उस समय उनको फल खाने की इच्छा नहीं हुई । जब उन्होंने सीता जी का खोज का काम पुरा कर लिया तब वे फल की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। इसका मतलब ये है की जब तक आप अपने उद्देश्य में सफल ना हो जाए तब तक उसके फल की इच्छा भी नहीं करनी  चाहिए।  हां उद्देश्य पुरा हो जाए तो फल की इच्छा स्वाभाविक है।
           12******सफल दूत की तरह शत्रु की शक्ति का आंकलन करना और शत्रु पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना***********
        हनुमान जी ने माता सीता का पता तो लगा लिया परंतु एक दूत के लिए मुख्य कार्य करने के बाद भी कुछ और कार्य होता है जिनका संपादित करना बहुत आवश्यक होता है। श्री हनुमान जी विचार करते हैं कि माता सीता का पता तो लग गया परंतु अभी शत्रु की शक्ति का आंकलन करना शेष रह गया है। इसके चार ही उपाय हैं शाम दाम भेद और दंड।  राक्षसों के लिए शाम नीति का उपयोग करना व्यर्थ है। यह लंका तो सोने की है। यहां विपुल धन है, आतएव दाम का प्रयोग का विचार करना भी ठीक नहीं है।  यह सब के सब बलशाली है इसलिए  भेद नीति भी यहां लागू नहीं हो सकती। ऐसी दशा में पराक्रम दिखाकर शत्रु को उकसाकर उसे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए बाध्य करना ही उचित होगा।  शत्रु की शक्ति का ज्ञान होने के बाद ही माता सीता को मुक्त कराने का अभियान सूचारू रूप से प्रारंभ किया जा सकता है। इस  प्रकार अच्छा योजक केवल मुख्य कार्य को ही नहीं करता तो वह अन्य पूरक कार्यों को भी पूरा कर मुख्य कार्य की सफलता को सूनिश्चित करता है, यही हनुमान जी भी करते हैं।
           इस सुंदर उपबन को देखकर हनुमान जी अगली योजना बना लेते हैं। उनके लिए तो फल खाना एक बहाना था, इसी बहाने उन्होंने उस उपवन के अनेक  वृक्षो को तोड़ कर गिरा दिया। उस बगीचे के रक्षकों ने उस बंदर को वृक्ष गिराते और उपवन को उजाड़ते देख, उस पर आक्रमण किया। उन रक्षकों को तो हनुमान जी ने क्षण दो क्षण में ही निपटा दिया। कुछ को तो मसल मसल कर मार डाला। यह समाचार रावण के पास पहुंचा, तो रावण ने अपनी किंकर जाति के लड़ाकू राक्षसों की सेना को भेजा। यह सेना  भी हनुमानजी से हार गई। उसके बाद रावण ने क्रम से प्रहस्त्र पुत्र जाम्बुमाली को, उसके बाद अपने मंत्री पुत्रों को, और बाद मे अपने वीर पुत्र अक्षय कुमार को भेजा। परंतु उनमें से कोई भी श्री हनुमान जी को जीत नहीं पाया। रावण पुत्र अक्षय कुमार को भी हनुमानजी ने मार  डाला । पुत्र वध से क्रोधित रावण ने बड़े पुत्र महाबली मेघनाथ को सेना के साथ भेजा। मेघनाथ  रथ पर हनुमान जी ने एक बड़े वृक्ष को फेंक दिया। मेघनाथ का रथ टूट गया। अब दोनों आपस में लड़ने लगे। हनुमान जी ने एक घूंसा मारा और पेड़ पर चढ़ गए। मेघनाथ ने सारे दाँव अपना लिए परंतु पवन पुत्र को जीत नहीं पाए। अंत में मेघनाथ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं। ब्रह्मास्त्र स्वयं ब्रह्मा के द्वारा दिया गया अमोघ अस्त्र है। परंतु इधर हनुमान जी को भी ब्रह्माजी का यह वरदान प्राप्त था की वह किसी भी दैवी अस्त्र से वध्य नहीं होंगे। परंतु ब्रह्मास्त्र चूंकि ब्रह्मा के द्वारा दिया गया अमोघ अस्त्र था, यदि हनुमान जी ब्रह्मास्त्र की महिमा को नहीं मानते तो सामान्य जन में भी ब्रह्मा जी की महिमा कम हो जाती। इसके पहले भी पौराणिक घटनाओ में अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है की जिन राक्षसों और कुछ मुनियो ने भी आशीष रूप में प्राप्त दैवी शक्तियों के प्रयोग दैवी शक्तियों के विरुद्ध किया उसके परिणाम अच्छे  नही रहे । महर्षि विश्वामित्र भी इसके एक उदाहरण है। इसलिए हनुमान जी ने ब्रह्मास्त्र की शक्ति का सम्मान किया। एक उत्तम व्यक्ति को बल के साथ-साथ लोक नियमों का भी ध्यान रखना पड़ता है। अतएव ब्रह्मास्त्र  लगते ही बेहोश होकर गिर पड़े। परंतु गिरते गिरते भी सैकड़ो राक्षसों का नाश कर दिया। अब पुनह हनुमान जी विचार करते हैं कि वे ब्रह्मास्त्र से घिरे हुऎ हैं तो उनके ऊपर ब्रह्मा जी की कृपा बनी रहेगी। इसी प्रकार इंद्र की कृपा भी बनी रहेगी। पवनसूत  होने कारण वायुदेव की कृपा तो है ही। ऐसा सकारात्मक विचार कर हनुमान जी निश्चिंत हो गए। इंद्रजीत मेघनाथ हनुमान जी को नागपाश से बांध कर रावण के दरबार मे ले गए। 
         जिस वानर ने रावण के बलवान सैनिकों को मार डाला उसके पुत्र को मार डाला ऐसे वानर को देखने के लिए वहां राक्षसों की भीड़ इकट्ठा हो गई। हनुमान जी ने रावण के दरबार को देखा। उस विशाल दरबार में बड़े-बड़े रथी, महाराथी, यक्ष, और देवता रावण के सामने सिर झुकाकर  खड़े थे। उस वैभव को देखकर भी हनुमान जी प्रभावित नहीं हुए। पहले तो रावण एक वानर को देखकर दुर्वचन कहता हुआ हंसने लगा।  परंतु जैसे उसे अपने पुत्र की मृत्यु का दुखद स्मरण हुआ तो हनुमान से पूछता हैं वानर तू कौन है? तूने किसके बल पर वन को उजाड़ दिया है। क्या तूने मेरा यश नहीं सुना है?  हनुमान जी उत्तर देते हुए श्री राम के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं,  रावण सुन  जिनके बल से ब्रह्मा विष्णु और महेश अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। जिन्होंने शिवजी का धनुष तोड़कर राजाओं के गर्व को तोड़ दिया।  जिन्होंने खर दूषण त्रिशिरा और बाली का वध कर दिया और जिनकी पत्नी को तुम चोरी से हर कर ले  लाए हो, मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी का दूत हूं।
        हनुमान जी चाहते तो अपने परिचय में शुरुआत में ही जैसा कि सब लोग करते हैं, अपने परिचय में माता अंजनी या पिता वीर केसरी या परमवीर पवन का  उल्लेख कर सकते थे। पर उन्होंने ऐसा ना करके श्री राम जी के गुणो का उल्लेख करते हुए सीधे राम जी के नाम से अपना परिचय दिया। व्यक्ति स्वयं अपना परिचय किस संदर्भों के साथ देता है इसका सीधा प्रभाव सामने वाले व्यक्ति पर पड़ता है, इस  मानोविज्ञान को श्री हनुमान जी अच्छी तरह जानते हैं। 
            उसके बाद यह भी बताते हैं की रावण मैं तुमसे अपरिचित नहीं हूं, मैं जानता हूं तुमने सहस्त्रबाहू के साथ और बाली के साथ युद्ध करके कितना यश प्राप्त किया?   (रावण को सहस्त्रबाहु और बाली दें युद्ध में हराया था) व्यंग को सुनकर रावण खिसिया कर हंस दिया। हनुमान जी ने रावण को उसकी हार का इतिहास याद करा कर फिर दूसरा मनोवैज्ञानिक आक्रमण किया।
         आगे हनुमान जी बगीचे को उजाड़ने के कारण को बताते हुऎ कहते हैं मुझे तो भूख लगी थी इसीलिए मैने फल तोड़ कर खायें। मैं तो वानर हूं वृक्षों को तोड़ना और विनाश करना यह तो मेरा स्वाभाविक गुण है और जहां तक राक्षसों के को मारने का प्रश्न है, पहले तो उन्होंने मुझे मारा एसलिए मैने उनको मारा। तुम्हारे पुत्र ने मुझे बांधकर लाया है,  इसमें भी मुझे कोई लज्जा नहीं है क्योंकी मैं तो प्रभु के कार्य से यहां आया हूं। इस पूरे प्रसंग में पहले तो हनुमान जी यह बता देते हैं की मैं वानर हूं ईसलिए फल खाना और वृक्षों को तोड़ना तो मेरा स्वाभाव है।  परोक्ष रूप से हनुमान जी रावण को यह बताना चाहते हैं कि मेरा स्वाभाव वश किया हुआ कार्य यदि अपराध है, तो तुम तो मूझसे बड़े अपराधी हो, जो ज्ञानी होते हुऎ भी और उच्च ऋषि कुल में उत्पन्न होने के बाद भी माता सीता का हरण करने का अपराध तुमने किया है। दूसरी बात जो रावण को समझा देना चाहते हैं की 'आपका पुत्र मुझे बांधकर यहां तक लाया है' , इस गलतफहमी में ना रहना, मैं तो केवल प्रभु की इच्छा के करण यहां तक लाया गया हूं।
        हनुमान जी कई प्रकार से रावण को समझाते हैं कि श्री रामचंद्र जी की महिमा अपार है, तुम्हारा हित इसी में है की माता सीता को श्री रामचंद्र जी को ससम्मान सौंप दो। परंतु अहंकारी रावण हनुमान की बात को अनसुना करके हनुमान जी को मृत्यु दंड देने की आज्ञा करते हैं।  विभीषण के हस्तक्षेप के बाद रावण हनुमान जी के पुंछ में आग लगाकर उन्हें पूँछहीन कर वापस अपने मालिक के पास भेजने के लिए आज्ञा देते हैं। जिससे पूछहीन वानर को देखकर उनका मालिक घबरा जाए। श्री हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा बांधकर उस पर घी  लगाने का काम लंकावासी करते हैं। परंतु हनुमान जी की पूछ तो बढ़ती ही जाती है। यहां तक कि लंका के निवासियों का घी भी समाप्त हो जाता है।  हनुमान जी के पूछ को आग लगाकर लंकावासी आनंद मानाते हैं।  परंतु हनुमान जी 'आपदा को अवसर में बदलने का' गुर खूब जानते हैं। हनुमानजी लंका के महलों  के ऊपर कूद कूद कर अपनी पुंछ की आग से लंका के महलों को जला देते हैं। इसके बाद वे वापस माता सीता के पास आते हैं। 
     हनुमान जी अशोक वन में वृक्षों को तोड़ते हैं और राक्षसों को युद्ध के लिए  उकसाते हैं वह सब योजना पूर्वक करते हैं। जिसकी परीणीती हमें लंका के दहन में दिखाई देती है।
          लंकावासी रावण को अजेय मानते हैं। हनुमान जी लंका दहन के बाद  संपूर्ण लंका वासी  मनोवैज्ञानिक  दबाव में आ जाते है। शत्रु को मानसिक दबाव में रखना यह युद्ध पूर्व की निति का महत्वपूर्ण भाग है और उसको हनुमान जी कुशलता पूर्वक पुरा करते हैं। यहां तक की रावण की पत्नी मांदोदरी भी लंका दहन के बाद रावण को समझाने के लिए मजबूर हो जाती है। रावण के अजेयता  पर न केवल लंकावासियों को वरन स्वयं मंदोदरी को भी अब शंका होने लगी।
                इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के बाद हनुमान जी माता सीता को पुरी तरह आश्वस्त करते हैं कि श्री रामचंद्र जी उनको सकुशल वापस लेकर  जाएंगे इसमे कोई शंका नही है।  माता सीता से स्मृतिचिन्ह लेकर वापस निकल चलते हैं।
           13 ****** एक आदर्श योद्धा की तरह स्वयं की प्रशंसा न करना और प्रशंसा किए जाने पर अहंकार में ना आना*********
           सामान्य रूप से किसी बड़ी सफलता के बाद अपने अभियान के समय सहयोग करने वालों को और सहानुभूति रखने वालों को भुला देना सामान्य बात है। परंतु हनुमान जी लंका से वापसी के समय मैंनाक पर्वत को  छूकर प्रणाम करते हैं। वैसे देखा जाए तो हनुमान जी के इस अभियान में मैनाक पर्वत ने केवल आराम करने कहा था, फिर भी हनुमान जी उस सहानुभूति को भी स्मरण रखते हैं, और वापसी में मैंनाक  पर्वत का धन्यवाद करना नहीं भूलते। यह कृतज्ञता का भाव व्यक्तित्व को अहंकार मुक्त करता है।
            हनुमान जी अपने कार्य को सफलतापूर्वक पुरा कर समुद्र के किनारे अपने साथियों के पास वापस आते हैं। उनके  तेज को, हर्ष और गर्जना को देखकर साथी वानर समझ गए कि हनुमान जी अपना कार्य पुरा करके वापस आ गए हैं। अब तो पूरी टीम को  जीवनदान मिल गया।  सबका अति प्रसन्न होना स्वाभाविक था।
           सभी वानरों वीरों ने फलादि से हनुमान जी का स्वागत किया। हनुमान जी ने वहां उपस्थित वरिष्ठ वानर वीर जामवंत और अंगद को प्रणाम किया। हनुमान जी ने सूचित किया कि माता सीता का पता लगाकर आया हूं। वह अशोक वाटिका में है। इसके बाद सभी वानर वीर महेंद्र पर्वत पर एकत्रित हुए जहां टीम के नेता अंगद उच्च स्थान पर बैठकर हनुमान जी से पूरे अभियान के विषय में जानकारी लेने लगे। यहां यहां यह ध्यान देने योग्य और सीखने योग्य बात है की किसी बड़ी से बड़ी सफलता के बाद भी अपने टीम के नेता को ही उच्च स्थान अर्थात सम्मान का स्थान देना चाहिए।
      हनुमान जी ने अपने साथियों को समुद्र पार करते समय आई हुई कठिनाइयों का वर्णन किया कि किस प्रकार सीता जी को खोजा और किस प्रकार लंका में आग लगाई। यह सारा वर्णन करने के बाद हनुमान जी अपने अभियान की सफलता का श्रेय भगवान श्री राम और अपनी टीम को देते हुए कहते हैं, श्री रामचंद्र जी की कृपा और आप लोगों के प्रभाव से मैंने सुग्रीव के कार्य की सिद्धि के लिए सब कुछ किया। सफलता का श्रेय पूरी टीम को देकर टीम भावना को बनाये रखने  का यह उत्कृष्ट उदाहरण है।
              किष्किंधा पहुंचकर श्री सुग्रीव से सभी वानर मिलते हैं और श्री हनुमान जी के सफलता की कहानी बताते हैं। यहां भी श्री हनुमान जी अपने मुंह से सफलता की कोई बात सुग्रीव से नहीं कहते। सुग्रीव सबको साथ लेकर श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी के पास जाते हैं।  श्री जामवंत जी श्री रामचंद्र जी को आदर पूर्वक कहते हैं कि  जहां आपका आशीर्वाद हो वहां सभी कार्य सफलतापूर्वक निपट जाते हैं। आगे श्री हनुमान जी के विषय में कहते हैं कि हनुमान जी ने जो कुछ किया उसकी प्रशंसा हजारों मुख से भी नहीं की जा सकती। ऐसा कह कर हनुमान जी के द्वारा सफलता पूर्वक किए गए अभियान की सारी बातें जामवंत बताते हैं।
               जामवंत जी द्वारा सुना गए हनुमान जी के चरित्र को सुनकर श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया।  और उत्सुक हो माता सीता का हाल पूछने लगे। श्री हनुमान जी ने अशोक वाटिका में माता श्री सीता के  दुख पूर्ण स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है, शब्दों में बताने से आपके दुख ही बढ़ेंगे। हनुमान जी निवेदन करते हैं प्रभु तुरंत चलिए और अपनी भुजाओं से राक्षसों का नाश कर सीता जी को ले आइये।
            श्री रामचंद्र जी माता सीता का हाल सुनने के बाद हनुमान जी को कहते हैं तुम्हारे जैसा मेरे लिए कोई उपकारी नहीं है।  मैं उस उपकार का बदला कैसे चुकाऊ। मैं अब तुझसे उऋण नहीं हो सकता। ऐसा करते हुए श्री रामचंद्र जी हनुमान जी की ओर प्रेमाश्रु भरे नेत्रों से लगातार निहार रहे हैं । श्री रामजी का  शरीर पुलकित हो उठा है। 
      स्वयं श्री रामचंद्र जी द्वारा हनुमान जी को हृदय से लगा लेना,  उनको सबसे बड़ा उपकारी बताना,  मैं कभी इस उपकार का से उऋण नहीं हो सकता ऐसा कहना, किसी के लिए भी इससे बड़ी गर्व की बात क्या होगी।  किसी भी व्यक्ति का अहंकार तब जागृत होता है, जब या तो वह बड़ी सफलता प्राप्त करता है, या तब जब वह स्वयं को ज्ञानी समझता है,  और तब जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति  उसकी प्रशंसा करने लगे। जामवंत जी हनुमान जी के सफलता की कहानी बड़े गर्व से कहते हैं और स्वयं श्री रामचंद्र जी जिसकी प्रशंसा करते नहीं थकते  हैं, ऐसे में अहंकार का  आ जाना  स्वाभाविक बात है।  इस बात को श्री हनुमान जी जैसे गुणी व्यक्ति अच्छी तरह जानते हैं।  जब भी अहंकार आक्रमण करने लगे तो उसका एक ही उपाय है कि ईश्वर के सामने झुक जाइए, विनीत हो जाइए, समर्पित हो जाइए, और सफलता का सारा श्रेय प्रभु को दे दो। श्री हनुमान जी यही करते हैं।  श्री रामचंद्र जी के चरणों को पकड़ कर नतमस्तक हो जाते है (मानो बार-बार विनती कर रहे प्रभु अहंकार से मेरी रक्षा करो! मेरी रक्षा करो!!)।  श्री रामचंद्र जी बार-बार हनुमान जी को अपने चरणों से उठाने का यत्न करते हैं परंतु हनुमान जी है कि श्री रामचंद्र जी के चरणों से उठना नहीं चाहते। श्री रामचंद्र जी बार-बार प्रयत्न करने के बाद श्री हनुमान जी को उठाकर अपने हृदय से लगाते हैं,  और निकट बैठा लेते हैं। श्री रामचंद्र जी पूछते हैं हनुमान तुमने रावण की इतनी सुरक्षित लंका को किस तरह जलाया? हनुमान जी बड़ी सरलता पूर्वक कहते हैं भगवान वानर का इतना ही  पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर सहज चला जाता है।  बस इसी विधि से मैंने समुद्र को भी पर किया और लंका को भी जला डाला।  प्रभु इसमें तो मेरी कोई बढाई नही है। मैं तो केवल अपने जन्मजात गुण के कारण एक डाल से दूसरे डाल पर कूद रहा था। बाकी सब कुछ जो हुआ उसमें मेरी कोई प्रभुता नहीं है। यह तो सब आपका ही प्रताप है। अंत में हनुमान जी निवेदन करते हैं कि हे प्रभु यदि सचमुच आप प्रसन्न है तो केवल मुझे अपनी निश्चल भक्ति दे दीजिए।  श्री रामचंद्र जी ने  एवं अस्तु कह कर आशीर्वाद दिया। श्री हनुमानजी जैसी आत्ममुग्धताविहीन स्थिति कठिन साधना के बाद ही प्राप्त हो सकती है।
     14 ************ हनुमान जी द्वारा अजेय लंका का वर्णन, साथ ही श्री रामचंद्र जी को विजय के लिए आश्वस्त करना **************
        श्री वाल्मीकि जी युद्ध पूर्व का वर्णन करते हुए लिखते हैं, श्री रामचंद्र जी सुग्रीव को आश्वस्त करते हैं की समुद्र को पार कराने के लिए मैं सक्षम हूं। ऐसा कहते हुए श्री रामचंद्र जी हनुमान जी से पूछते हैं, हनुमान तुमने लंका को अच्छी तरह से देखा है। उसकी सुरक्षा की क्या-क्या व्यवस्था है उस संबंध में मुझे कहो। 
           हनुमान जी अजेय लंका का वर्णन करते हुए कहते हैं कि किस प्रकार लंका के मजबूत दुर्ग बने हुए हैं, वहां कितनी विशाल सेना है,वह सेना लंका की सुरक्षा के लिए कितनी सचेत रहती है, रावण के तेज से प्रभावित लंकावासी उसके प्रति कैसा स्नेह रखते हैं। लंका की समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र किनारा कितना भयंकर है, उस लंकापुरी की चारदीवारी के चार दरवाजे किस प्रकार मजबूत है और सैनिकों के द्वारा सुरक्षित हैं, लंकापुरी किस प्रकार चारों ओर खाइयों से सुरक्षित है, रावण किस प्रकार हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहता है, कठिन समय मे भी धीर और गंभीर बना रहता है, यह लंकापुरी देवताओं के लिए भी दुर्गम  है। इस प्रकार लंका का और उसकी सुरक्षा का सही-सही वर्णन हनुमान जी करते हैं और एक सहायक का यही कर्तव्य भी है कि वह स्वामी को सत्य बात कहे।
            लंकापुरी का ऐसा अद्भुत वर्णन करने के बाद हनुमान जी श्री रामचंद्र जी को  आश्वस्त करते हुए कहते हैं, प्रभु इस अचूक  सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद मैंने तो उन सब अवरोधों को तोड़ डाला।   परकोटे को धराशाही कर दिया और वहां की विशाल सेना के एक हिस्से को समाप्त कर दिया।  प्रभु हम लोग एक बार समुद्र पार कर लेवे तो लंका वानरों द्वारा नष्ट हुई समझिए।
        यहां पर आगे हनुमान जी अपने वानर वीर अंगद द्विविध मैंद जामवन और सेनापति नल नील का उल्लेख करते हुए कहते हैं, प्रभु यह सारे वीर भी मेरे ही जैसे बलवान है अंगद सहित हम सब वीर ही लंका पहुंचकर लंका को तहस-नहस कर सकते हैं और माता सीता को वापस ला सकते हैं। इस प्रकार हनुमान जी श्री रामचंद्र जी को आश्वस्त तो करते हैं साथ ही अपने साथी वानर वीरो के बल का वर्णन करते हुए उन्हें भी अपने ही जैसा बलवान कह कर कर टीम भावना को बनाए रखते हैं।
    15**********हनुमानजी का व्यक्ति को परखने का अद्भुत गुण  ***********
                महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं, रावण के भाई विभीषण  रावण को युक्तियुक्त और धर्म युक्त बात कह कर माता सीता को श्री रामचंद्र जी को सादर सौंपने  की सलाह देते हैं। रावण विभीषण की बात को तो नहीं मानता और विभीषण को कड़वे वचन कह कर अपमानित  कर देता है। विभीषण दुखी होकर श्री रामचंद्र जी के शरण में आने के लिए समुद्र के उस किनारे पर पहुंचते हैं जहां श्री रामचंद्र जी अपनी सेना के साथ अपस्थित हैं। विभीषण वानर रक्षकों को बताते हैं की वे रावण के भाई विभीषण है। किस प्रकार उन्होंने रावण को उसके हित में उचित  सलाह दी कि माता सीता को सादर श्री रामचंद्र जी को लौटा दिया जाए। रावण ने मेरी बात को तो माना ही नहीं। मुझे दास की तरह अपमानित किया। अब मैं अपने स्त्री पुत्रों को छोड़कर श्री रघुनाथ जी के शरण में आया हूं।  हे वानरों आप शीघ्र श्री रामचंद्र जी के पास जाकर उनसे कहो की शरणार्थी विभीषण श्री रामचंद्र जी के शरण में आया है।
           श्री विभीषण को और उनके साथ आये चार शस्त्रधारी रक्षको को देखकर और उनकी बातें सुनकर वानर मंत्रियों के मस्तिष्क में नाना प्रकार के विचार और संदेह आते हैं।
               महाराज सुग्रीव प्रभु श्रीराम से  कहते है, हमारे शत्रु रावण  की सेना में रहा हुआ कोई व्यक्ति अब आपकी सेना में आना चाहता है।  जो स्वयं को रावण का भाई बता रहा है। राक्षस लोग स्वभाव से मायावी होते है। उनके किसी बात पर विश्वास नहीं किया सकता। उसे रावण द्वारा भेजा हुआ ही माना जाना चाहिए , जो कभी भी अवसर देखकर हमें धोखा दे सकता है।  पहले तो किसी गुप्तचर द्वारा ठीक से पता लगाया जाए।  यदि मेरी माने तो अभी तो उसे बंदी बना लेना है  ही उचित होगा। श्रीराम सुग्रीव की युक्तियुक्त बात सुनकर अन्य वानर मंत्रियो से उनकी भी राय पूछते हैं।
           अंगद कहते हैं , अभीअभी हमारे पास आया हुआ शत्रु है। इस पर पूरा विश्वास करना ठीक नही होगा। कुछ लोग अपनी वास्तविक मंशा को छुपा लेते हैं। मौका मिलते ही प्रहार कर देते हैं। अतएव गुण दोषो का ठीक से विचार कर लेना चाहिए।
           मंत्री शरभ कहते हैं कि गुप्तचर भेजकर पहले सही जानकारी ले लेनी चाहिए।
             चतुर जमवान ने कहा रावण बड़ा पापी है। विभीषण उसी के पास से आ रहा है वास्तव में यह ना तो आने का समय है ना ही स्थान। इसलिए इसके विषय में सशंक रहना ही ठीक रहेगा।
          मंत्री मयंद अपनी बात रखते हुए कहते हैं, यह यह रावण का छोटा भाई ही तो है।  इससे मधुर व्यवहार के साथ धीरे-धीरे सब बातें पूछ लेना चाहिए।
       अंत में सचिवों में श्रेष्ठ शास्त्रों के ज्ञान जनित संस्कार युक्त हनुमान जी कहते हैं प्रभु मैं जो भी कहूंगा वह बुद्धिमत्ता के अभिमान के कारण नहीं कहूंगा अथवा किसी कामना से भी नहीं कहूंगा। मैं कार्य की गुरुता को समझ कर यथार्थ कहूंगा। जहां तक गुण दोष की परीक्षा लेने की बात है हमारे लिए अभी संभव नहीं है।
      उसे किसी काम में लगाकर उसकी परीक्षा  लेना मुझे सदोश ही प्रतीत होता है ।
           गुप्तचर नियुक्त करने की बात है तो वैसा करने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता। जो दूर रहता है जिसका वृतांत ज्ञात नहीं है, उसी के लिए गुप्तचर नियुक्त किया जाता है। जो स्वयं सामने ने खड़ा है और और स्पष्ट रूप से अपने विषय में कह रहा है उसके लिए गुप्तचर की क्या आवश्यकता है?
         जहां तक देशकाल का प्रश्न है मेरी बुद्धि के अनुसार यही उत्तम देश और काल है। विभीषण एक दुष्ट पुरुष के पास से चलकर श्रेष्ठ पुरुष के पास आया है। उसने दोनों के दोष और गुणो का विवेचन भी किया है। इसका आगमन सुविचारित है। 
          किसी मंत्री ने कहा है की अपरिचित पुरुषों द्वारा पूछताछ की जाए। जिसने स्वयं के बारे में सब कुछ बता दिया है उससे अपरिचित व्यक्ति पूछताछ करें तो सामने वाले का स्वच्छ मन भी कलुषित हो जाएगा। (हम एक संभावित मित्र को खो देंगे।) यद्यपि दूसरे के मन को समझ लेना संभव नही है, तो भी बातचीत में कहीं दुर्भाव दिखाई नहीं  देता। मुख प्रसन्न है।  इसलिए मुझे कोई संदेह नहीं है। दुष्ट पुरुष कभी भी निशंक हो कर सामने नहीं आ सकता। इसकी वाणी में. भी दोष नहीं है। कोई कितना भी छुपाये मन  का दोष शरीर पर (शारीरिक भाषा केरूप में) दिखाई देता है। विभीषण के आने का कारण भी स्पष्ट है। आपके द्वारा किए गए सत्कार्य, रावण का मिथ्याचार,  बाली का वध,  सुग्रीव का राज्याभिषेक यह सब सुनकर और समझ कर वह यहां आया है।  उसको विश्वास है की श्री राम उसकी रक्षा भी करेंगे और राज्य भी दिलाएंगे। (हनुमानजी द्वारा विभीषण को लंका का राज्य देने की बात कहना,ब हनुमानजी की श्री राम को कूटनीतिक सलाह थी, जिसके बाद किसी भी हालत में विभीषण का रामचंद्रजी का साथ छोड़ने का विचार करना भी संभव नही था।)  इन्हीं सब कारणों से विभीषण को साथ रखना  उचित जान पड़ता है। अंत में प्रभु! उचित अनुचित का निर्णय आपको ही करना है।
         श्री रामचंद्रजी विभीषण को न केवल अपने साथी के रूप में स्वीकार करते हैं, आगे उनका लंकापति के रूप में राज्याभिषेक भी कर देते हैं।
             16 ********** भरोसेमंद महावीर हनुमान**********
          महर्षि वाल्मिकी कहते हैं कि रावण के पराक्रमी भाइयों और पुत्रों का युद्ध में संहार हो जाने के पश्चात रावण का व्यथित होना और उद्वेलित होना  स्वाभाविक था। विभीषण, देवांतक त्रिशिरा, और महा पराक्रमी अतिकाय के मारे जाने के कारण रावण की शक्ति क्षीण हो गई थी। अपने मृत भाइयों और पुत्रों के स्मरण से  रावण की आंखों से अश्रु निकल रहे थे। ऐसे समय में रावण पुत्र इंद्रजीत रावण को दुख और  हताशा से बाहर निकालने के लिए कहता है, राक्षस राज! जब तक इंद्रजीत जीवित है तब तक आप चिंता और मोह में न पड़ीए। मेरे बाणों से घायल होकर कोई भी समरांगण में अपनी रक्षा नहीं कर पाएगा। मेरे बाणों से राम और लक्ष्मण भी बच नहीं पाएंगे। ऐसा कहकर रावण पुत्र मेघनाथ ने युद्ध भूमि में जाने के लिए रावण की आज्ञा प्राप्त कर ली।
        युद्ध भूमि में इंद्रजीत ने नाना प्रकार के दैवी अस्त्रों का प्रयोग कर वानर सेना में हाहाकार मचा दिया, वानरों के शरीर क्षत विक्षत  हो गए। वानरों द्वारा फेके गए चट्टानों, और वृक्षों का इंद्रजीत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वानर सेना के सैनिक लगातार इंद्रजीत के अग्नि तुल्य तेजस्वी बाणो घायल हुए जा रहे थे। वानर सेनापति गंधमादन को तीखे बाणों से घायल कर वीर नल को भी घायल कर दिया। सेनापति मयंद को और गज को भी  युद्ध स्थल में अपने बाणो से बिंध दिया।  जाम्बवंत और नील भी इंद्रजीत के बाणों के प्रहार से घायल होने से बच नहीं पाए। इंद्रजीत ने वरदान में पाए हुए शस्त्रों से सुग्रीव, ऋषभ, अंगद, और द्विविद् को भी घायल कर दिया। अपने बाणों से वानर यूथपतियों को घायल कर इंद्रजीत अब गदाओं और सुवर्ण कांति के बाणों की वर्षा श्री राम और लक्ष्मण जी पर करता है। श्रीरामजी और लक्ष्मण को भी घायल हुआ देख कर विज्योन्मत्त हो जाता है। रावण को जीत का समाचार सुनाने समरांगण से वापस हो जाता है।
         इधर हनुमान जी और विभीषण चिंतित हो जाते हैं ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से67 करोड़ वानर मारे जाते हैं। इन सब के बीच हनुमानजी और विभीषण जामवंत को ढूंढते हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र जामवंत स्वाभाविक वृद्धावस्था से युक्त थे। शरीर में बाण धंसे हुए थे।  उन्हें देखकर विभीषण उनके पास गए और पूछने लगे तात आप जीवित तो है?  विभीषण की आवाज सुनकर जामवंत बोले मैं बाणों से बिंधा हुआ हूं। आंखें खोलकर देख भी नहीं पा रहा हूं। केवल आवाज से पहचान रहा हूं। परंतु उत्तम व्रत के पालक विभीषण यह तो बताओ की माता अंजनी और पवन देव के पुत्र जीवित तो है? जामवंत का यह प्रश्न सुनकर विभीषण ने पूछा ऋक्ष राज आप दोनों राजकुमारों को छोड़कर केवल पवन कुमार हनुमान को ही क्यों पूछ रहे हैं? आपने ना तो अंगद न सुग्रीव ना ही श्री राम पर भी ऐसा  स्नेहा दिखाया है, जैसा आप प्रेम हनुमान जी के प्रति दिखा रहे हैं। जामवंत कहते हैं राक्षस राज सुनो मैं पवन कुमार को इसीलिए पूछता हूं क्योंकि यदि वीरवर हनुमान जीवित हैं तो यह मरी हुई सेना भी जीवित है, ऐसा समझना चाहिए। यदि हनुमान जी के प्राण निकल गए हैं, तो हम लोग जीते हुए भी मृतक के समान हैं। यदि वायु के समान वेगशाली पराक्रमी पवन कुमार हनुमान जीवित है तो हम सब की भी जीने की आशा की जा सकती है। इसी समय हनुमान जी ने आकर जामवंत को विनीत भाव से पैर पड़कर प्रणाम किया। हनुमान जी की आवाज सुनकर जामवंत जी को नया जीवन मिल गया, और उन्होंने महा तेजस्वी हनुमान से कहा वानर शिरोमणि आओ, संपूर्ण वानरों की रक्षा करो।
           जो सेना के सबसे वरिष्ठ नेता का इतने कठिन समय मे भी विश्वास जीत सके, वही तो हनुमान है। जो अपने साथियों के बीच इतनी विश्वसनीयता अर्जित कर ले उसकी सफलता निश्चित है।
       और अंत मे ---
                हनुमानजी ने सुग्रीव को राजपद दिलवा दिया, विभीषण को लंकेश बना दिया, माता सीता का पता लगाकर सारे वानरों के प्राणों का रक्षण ही नहीं की तो श्री रामचंद्र जी को अनुग्रहित भी कर दिया, श्री लक्ष्मण जी को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया। परंतु स्वयं के लिए जो सुग्रीव का मंत्री पद था, उसको भी त्याग दिया और श्री रामचंद्र जी की निष्काम भक्ति में लग गए। ऐसा व्यक्ति ही जो दूसरों की समस्या के समाधान के लिए तो पूरे शिद्दत से लग जाता है, परंतु स्वयं के लिए कुछ नहीं करता, अपनी टीम का अघोषित नेता होता है और और इतना ही नहीं तो जन-जन में भी इतना लोकप्रिय और पूज्य हो जाता है कि आराध्य से अधिक स्वयं आराधक के मंदिर और पूजा स्थान बन जाते हैं।
  💐💐 प्रभु रुद्रा की कृपा से कहे गए दो शब्द श्री हनुमान जी को सादर समर्पित💐💐💐