**श्रीराम जयराम जैजैराम**
अपने हिन्दूसमाज में बहुत प्राचीन समय से ही कुल अथवा वंश की मान्यता रही है। भगवान राम इक्ष्वाकुवंश से थे।जब माता कैकई ने राजा दशरथ से दो बार मांगे, 1राम को चौदह वर्ष का वनवास तथा 2भरत को अयोध्या का राज्यसिंहासन । तब राजा दशरथ बहुत व्याकुल एवं विचलित मनोदशा में थे। यह देखकर राम ने अपने पिता से कहा कि इक्ष्वाकुवंश की यह प्रथा रही है कि "प्राण जाए पर वचन न जाई" इसीलिए मै सहर्ष वन में जाने को तैयार हूं। पिता से उन्होंने कहा कि आप चिंता न कीजिये, मैं अवश्य ही आपने जो वचन माता कैकई को दिया है उसका मैं पालन करूँगा। क्योंकि इक्ष्वाकुवंश की यह रीत रही है।
प्रत्येक सुविज्ञ भारतीय अपने वंश या कुल पर गौरव महसूस करता ही है। हम जिस वंश के वंशज है, वह किन्हेकर वंश के नाम से प्रचलित हुआ। हमारा गोत्र कौण्डिन्य है। विदर्भ में कौण्डिन्य ऋषि हुए, जिन्होंने रुक्मिणी हरण में भगवान कृष्ण की मदत की थी। यह स्थान अमरावती के पास कौनडण्यपुर के नाम से स्थित है।
हमारे दादा भास्कर कीन्हेकर खानदेश अर्थात वर्तमान में कर्नाटक से लगा हुआ महाराष्ट्र प्रदेश का भाग है, से आये थे। शायद उस समय मुस्लिम नवाबों के अत्याचार से पीड़ित हुए बहुत से परिवार उस काल मे वहां से नागपुर में रोजी रोटी के लिए आकर बसे।
भास्कर राव कीन्हेकर को तीन पुत्र एवं एक पुत्री ऐसे चार बच्चे हुए । हमारे बड़े पिताजी देवीदास , पिताजी कृष्णराव, व एक चाचा थे,जो बचपन मे ही मृत्यु को प्राप्त हुए। हमारे दादाजी का स्वर्गवास उस समय हुआ जब हमारे बड़े पिताजी व पिताजी किशोरावस्था में ही थे। दादाजी के मृत्यु के पश्चात हमारी दादी ने सम्पन्न परिवारों 0के यहाँ भोजन बना कर परिवार का भरण पोषण, बच्चो की शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था बखूबी निभाई। बड़े पिताजी ने जब मेंट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तब हाई कोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील के पास अर्जनवीस का काम करने लगे, तथा बाद में उनकी आय भी अच्छी होने लगी। हमारे पिताजी
(2) छोटे होने के कारण अपनी पढ़ाई में लगे रहे।
हमारे बड़े पिताजी हाई कोर्ट में अर्जनवीस का काम करते हुयेअर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ होते गये, तथा अनेक जजों के संपर्क में रहे, तथा उनका अत्यंत विश्वास भी अर्जित किया। लगभग 40,45 वर्ष की अवस्था तक यह उनका कार्य चलता रहा। इस बीच महाल नागपुर वर्तमान संघ बिल्डिंग के पास ही एक मकान खरीद लिया। इस मकान के बाजू में ही अण्णासाहेब देशपांडे का मकान लगा हुआ था। वे भी खानदेश से यहाँ आये थे। बड़े पिताजी का विवाह वर्धा के एक परिवार खलत्कर की लड़की से हुआ। उससे उनको दो पुत्रियां हुई। बड़ी पुत्री का नाम कुसुम व छोटी पुत्री का नाम पुष्पा था।
हमारे पिताजी पढ़ने में अत्यंत होशियार थे। वे मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उनकी इच्छा के अनुसार बाद में पुणे के राबर्टसन मेडिकल कॉलेज में अगली शिक्षा के लिए भर्ती हुए।लेकिन जल्द ही कुछ महीनों के बाद उन्होंने वह कालेज छोड़ दिया। उस समय लोकमान्य तिलक का स्वदेशी आंदोलन जोरो से प्रारंभ हुआ था। तथा युवाओं को आव्हान किया गया था कि वे सरकारी कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दें, और सरकारी नौकरी छोड़ी। तथा कॉलेज भी छोड़ा। उस समय अनेक युवाओं ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और कॉलेज भी छोड़ा। शायद यही कारण था कि पिताजी सरकारी कॉलेज छोड़कर पूना से नागपुर आ गये। पिताजी का विवाह अण्णासाहेब देशपांडे की सबसे छोटी बहन कमला से हुआ। जो बाद में कमलाबाई के नाम से जानि जाने लगी। विवाह के पश्चात शायद पिताजी को अपने दायित्व का बोध हुआ होगा। वे कहीं नौकरी के प्रयत्न में रहे। इसी बीच हमारे एक रिश्तेदार दिनकर राव कोठेकर ने बड़े पिताजी से बातचीत में कहा कि क्या कृष्णराव हमारे जमीदारी में मैनेजर का कार्य करेंगे क्या? बड़े पिताजी जिनको हम आबाजी कहते थे,अपने भाई कृष्णराव से सलाह मशविरा कर इस नौकरी के लिए तैयार हो गए। श्री कोठेकर की जमीदारी में पौसेरा, मनेरी,कनकी,ननसरी, गांव थे, जो बालाघाट जिले में थे। (3) उनका मुख्य निवास मनेरी ग्राम में ही था।
हमारे पिताजी इस जमीदारी में मैनेजर की नौकरी के लिए हमारी माताजी कमलाबाई को लेकर नागपुर से मनेरी आ गए। मनेरी ग्राम ब्लॉक मुख्यालय लांजी से पांच किलोमीटर के अंतर पर था। नागपुर से लांजी जाने के लिए नागपुर कलकत्ता रेलवे मार्ग पर गोंदिया रेलवे स्टेशन के पश्चात आमगांव नामक एक छोटा से स्टेशन था। वहीं से लांजी जाना पड़ता था। उस समय आवागमन का साधन केवल बैल गाड़ी ही थी।
मैने पूर्व में ही कहा था कि हमारी एक बुआ थी, वह कोठीवान खानदान में ब्याही गई थी। मैने उन्हें देखा तो नही था , परन्तु उनका एक ही लड़का था, जो दादा कोठीवान के नाम से प्रसिद्ध था। तथा उसकी उम्र हमारे मां के बराबर थी। इसीलिये इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि हमारी बुआ की उम्र हमारे बड़े पिताजी, आबाजी कीन्हेकर से भी अधिक होगी। कोठीवान परिवार हमारे घर से लगभग एक किलोमीटर दूर तुलसीबाग रोड पर प्रायमरी स्कूल के पास ही रहता था। यहां उनका खुद का मकान था। जो काफी बड़ा था, दो मंजिला था। सामने का एक भाग एक सुनार को किराए पर दिया था। दादा कोठीवान के दो चचेरे भाई थे। जो उसी मोहल्ले में अपने अपने खुद के मकान में रहते थे। दादा कोठीवान एक नकलाकार के रूप में विदर्भ में बहुत प्रसिद्ध थे। उनकी एक नक्कल तांगेवाला उस समय बहुत प्रसिद्ध थी। उन्हें इसके लिए शासन के द्वारा सम्मानित किया गया था। विशेषकर गणेशोत्सव के समय विदर्भ के विभिन्न शहरों में उनकी नक्कल की कार्यक्रम की बड़ी मांग रहती थी। उनका विवाह वर्धा के प्रसिद्ध वकील श्री मनोहरपंत देशपांडे की पुत्री के साथ हुआ था। उन्हें दो पुत्र मदन एवं मोहन थे, तथा तीन पुत्रियां थी। बड़ा पुत्र मदन कोठीवान सरकारी नौकरी में था। तथा मोहन कोठीवान मराठी फिल्मों में सहायक कलाकार की भूमिकाएं किया करता था। इसीलिए वह नागपुर छोड़कर मुम्बई में स्थायिक हुआ था। दादा कोठीवान ने आज के बच्छराज व्यास चौक के पास ही बाकर रोड पर स्टेशनरी की दुकान प्रारम्भ की थी।
(4)
दादा कोठीवान की एक लड़की जो सब बच्चों में बड़ी थी,इसीलिए उसे सब माई कहते थे। उसका वास्तविक नाम मुझे मालूम नही है। उसका विवाह जबलपुर निवासी अगस्ती परिवार में हुआ था। उसके पति श्रीअगस्ती कोऑपरेटिव सोसाइटी में ऑडिटर थे। वे एक बार लांजी भी आये थे। दादा कोठीवान की दूसरी लड़की को नलु कहते थे, उसका विवाह आंबेकर परिवार में हुआ था। उनके पति आंबेकर की उनके घर के बिल्कुल समीप ही तुल्सीबाग रोड़ पर महाल में स्टेशनरी की दुकान थी। श्री गोविंद राव शिल्लेदार बिलासपुर की तीसरी नंबर की बहन भी इसी आंबेकर परिवार में ब्याही गई थी। उनके पति आंबेकर मजिस्ट्रेट थे।
पूर्व में मैने कहा था कि हमारे बड़े मामा अण्णासाहेब देशपांडे हमारे बड़े पिताजी के मकान के लगे हुए मकान में ही रहते थे। सबसे बड़े मामा अण्णासाहेब, उसके बाद उनसे छोटे अप्पा मामा, उसके बाद भाऊ मामा, उसके बाद तात्या मामा, और सबसे छोटे मामा बाबू मामा थे। अण्णा मामा, अप्पा मामा और बाबू मामा नागपुर में ही रहते थे। भाऊ मामा भुसावल में तथा तात्या मामा नाशिक में रहते थे। अण्णा मामा को मैंने देखा नही था। उनका निधन मेरे जन्म के पूर्व ही हो गया था। परंतु बड़ी मामी जिन्हें अक्का कहते थे ,को दीर्घ जीवन प्राप्त हुआ। चि. भास्कर के जन्म के समय वह लगभग तीन चार महीने लांजी में रही थी। उन्हें दो लड़के तथा चार लड़कियां थी। सबसे बड़े जयंत, उनके बाद प्रभाकर तथा बहिने विमला ताई, छबूताई, उषा एवं बनमाला थी। सभी बहने नागपुर में ही ब्याही गई थी। तात्या मामा को तीन लड़के, 1 अंतु दादा ये रायपुर में pwd कार्यालय बहुत वर्ष तक शंकर नगर में सुपरिन्टेन्डेन्ट के पद पर थे। उसके बाद वे ट्रांसफर होकर भोपाल गए ,तथा वहीं पर स्थायीक हुए।
(5) दूसरे नम्बर के पुत्र बालूदादा नागपुर में ही स्थाईक हुए थे। वे a g आफिस में अकाउंटेंट थे। सबसे छोटे लड़के पद्माकर भोंदू दादा भी सरकारी नौकरी में मध्यप्रदेश में रहे और वहीं स्थाईक हुए।अप्पा मामा की एक लड़की थी, जिसको सुशी ताई कहते थे। वह धंतोली नागपुर के पिंगले परिवार में ब्याही गई थी। संघ के प्रसिद्ध कार्यकर्ता श्री मोरोपंत पिंगले के बड़े भाई जो एक बड़े सरकारी अधिकारी थे उनके साथ ही सुशी ताई का विवाह हुआ था। भाऊ मामा की एक लड़की थी, उसके पति पोस्ट आफिस में कार्यरत थे। तात्या मामा को एक लड़का और एक लड़की थी। लड़का नाशिक में जहां सिक्के बनते थे उस कारखाने में नौकरी करते थे। बाद में वे मुम्बई में स्थायीक हुए। बाबू मामा हलदारपुरा में चिटनीस पार्क के पास उनका मकान था। उनके पड़ोस में ही उनकी ससुराल भी थी। वे नगरनिगम स्कूल में स्कूल इंस्पेक्टर थे। उनके तीन लड़के व दो पुत्रियां थी। बड़ा लड़का श्याम मेरे ही उम्र का था, जो मेट्रिक के बाद इम्पीरियल बैंक में नौकरी में लगा। यही बैंक आगे चलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया हुई । दूसरा लड़का श्याम कनेरा बैंक में तथा तीसरा लड़का अनिल किसी सरकारी कार्यालय में नौकरी में था। बड़ी लड़की ग्वालियर में ब्याही गई थी। तथा छोटी लडकी , जिसको छोटी कहते थे, देशपांडे को ब्याही गई थी। श्री देशपांडे पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी में थे। अपने बालासाहेब देशमुख के साथ निकट का परिचय था। क्योंकि वे भी अमरावती में नौकरी कर पूरा जीवन बिताया।
हमारी मां वगैरह तीन बहने थी। सबसे बड़ी सुंदरी मौसी थी, जो नाना साहब उद्गीरकर को ब्याही गई थी। श्री नानासाहेब उद्गीरकर अकोला महाराष्ट्र के निवासी थे। तथा वहां टाटा की डालडा फैक्टरी में कार्य रात थे। उन्हें तीन लड़कियां व चार लड़के थे। (6) सबसे बड़ी लड़की चम्पूताई अकोला में ही पुरंदरे को ब्याही गई थी। उसके बाद कुसुम ताई श्री भैयाजी पट्टलवार को ब्याही गई थी। सिंधुताई श्री वामोरकर को ब्याही गई थी जो रेलवे में कार्यरत थे। भैयाजी पट्टलवार अपना गॉंव काटोल छोड़ने के बाद रेडियो स्टेशन में नागपुर में बाँसुरी वादक कलाकार के रूप में कार्य करने लगे थे। सबसे छोटी लड़की मंदा ताई शिक्षक थी, जो विनायक राव जोशी को ब्याही गई थी। जोशी नागपुर यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे।
बबूताई जिसको हम बबू मावशी के नाम से जानते थे, वह धंतोली नागपुर में रहती थी। वह देशपांडे परिवार में ब्याही गई थी। परंतु उनके पति का देहांत बहुत कम उम्र में हुआ था। वे वकालत करते थे । उनका एक लड़का था, पति के देहांत के एक वर्ष के पश्चात लड़के का भी देहांत होगया। वैसे उनका जीवन बहुत दुख पूर्ण था। परंतु उन्होंने अपने आप को सम्हालकर टीचर्स की ट्रेनिंग की। नागपुर मे ही एक प्राइवेट स्कूल में सीताबर्डी में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। वे धंतोली नागपुर में मुले के बंगले में जहां तीन चार किरायेदार और भी थे, किराये से रहने लगी। उनकी विशेषता यह थी कि वे बहुत सामाजिक थी। मोहल्ले में सबसे प्रेममय संपर्क रखती थी। घर मालक मुले साहब भी उनका खूब सम्मान करते थे। उनके ससुराल से उनके भतीजे मुंशी, चाबुक्सवार आदि भी वहाँ पढ़ने के लिए रहते थे। सुदंरी मावशी के लड़के भास्कर, लड़की मंदा भी वहीं उनके यहां रहकर अपनी पढ़ाई की। उनके शोक ग्रस्त जीवन मे उन्हें कभी अकेलापन महसूस नही हुआ। वे मोहल्ले में एक अति मिलनसार के रूप में प्रख्यात थी। तथा सबके अच्छे बुरे समय मे अपनी सेवाएं भी देती थी। वह सब जगह मावशी के नाम से प्रसिद्ध थीं। उनके पड़ोस में ही एक वैद्य परिवार रहता था। उन्ही के भांजे श्री विनायकराव बर्डे के साथ चि. निर्मला हमारी बहन का विवाह सम्पन्न हुआ था।
बड़ी मावशी सुंदरी के दो लड़के 1 मधुकर 2 भास्कर । बड़े लड़के मधुकर ने पढ़ाई कर शिक्षक की नौकरी की व छोटे लड़के भास्कर को पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी मिली। मधु दादा जठार पेठ अकोला में स्थायिक हुए।
(7) तथा भास्कर दादा ने शेगॉंव में ही नौकरी का पूरा समय व्यतीत किया, सेवा निवृत्ति के बाद वे भी अकोला में स्थायिक हुए। सिंधुताई अमरावती में स्थायिक हुई क्योंकि उनके पति श्री वामोरकर बडनेरा, मूर्तिजापुर व अमरावती में ही अपना सेवा कार्य पूर्ण कर सेवा निवृत्त हुए तथा वहीं स्थायिक हुए। मंदाताई बड़ी मावशी की सबसे छोटी लड़की थी, जो श्री विनायकराव जोशी को जो नागपुर के ही निवासी थे को ब्याही गई। परंतु उनको कोई लड़के बच्चे नही हुए।मंदाताई बाबू मावशी के यहां नागपुर में पढ़कर ही ट्रेनिंग प्राप्त कर तिलक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। उसके पति नागपुर यूनिवर्सिटी में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे।
बाबू मावशी ने अपने प्रारंभिक जीवन मे भयंकर दुख सहन किया। परंतु बाद में अपने दुखों को भूलकर एक ऐसा आदर्श जीवन जिया कि पासपड़ोस के छोटे बड़े सभी परिवारों के साथ स्नेहिल संबंध रखते हुए सबके सुख दुख में सदैव साथ देती रही। इसीलिए वह "जगत मावशी" के रूप में प्रसिद्ध हुई। उनकी मृत्यु के पश्चात वहां के प्रसिद्ध मराठी पेपर तरुण भारत ने उनके बारे में एक काफी लंबा लेख छापा था।
हमारे बड़े पिताजी श्री देवीदास भास्कर कीन्हेकर का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। क्योंकि हमारे आजोबा भास्कर राव का निधन बहुत कम उम्र में हुआ था। इसके पूर्व मैने उल्लेख किया है कि हमारी आजी ने प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवारों के यहां रोटी बनाने का कार्य प्रारंभ किया था। वह जैसे तैसे अपने बच्चों का पालन पोषण कर शिक्षण करती रही। जब हमारे बड़े पिताजी जिनको हम आबाजी कहते थे, व समाज मे भी इसी नाम से प्रसिद्ध हुए, ने मेट्रिक की पढ़ाई के पश्चात वे जिला कोर्ट में एक प्रसिद्ध वकील के सहयोग से अर्जनवीस का कार्य करने लगे। इस कार्य को वे बहुत ही कुशलता पूर्वक सम्पन्न करने लगे। इस कारण कोर्ट में अन्य वकीलों से और जजों से उनका संपर्क दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। इससे उनकी धाक सब पर जमने लगी। उनका व्यवहार भी सबसे प्रेमपूर्वक रहता था।
(8)वे बहुत मिलनसार थे। लगभग 45 वर्ष की उम्र तक उनका यह कार्य उत्तम ढंग से चलता रहा।
रिश्तेदारों के अलावा भी उनका कुछ परिवारों से घनिष्ठ संबंध था। एक परिवार श्री कोठेकर का था। वे लांजी (बालाघाट जिला) के समीप मनेरी के जमीदारी के मालिक थे।दूसरे भैया साहेब चावजी थे । जो प्रारम्भ में लांजी पुलिस स्टेशन में सबइंस्पेक्टर रहे। बाद में वे तरक्की करते हुए नागपुर के डी आई जी पोस्ट तक पहुंच गए, तथा सेवानिवृत्ति के बाद नागपुर में ही तुल्सीबाग महाल में रहने लगे। हम लोग जब भी नागपुर जाते थे तो उनके यहां एक दिन अवश्य व्यतीत करते थे। हम भैया साहब की पत्नी को आत्याबाई कहते थे। अपने खास रिश्तेदारों जैसा ही उनका हमारे परिवार से स्नेहिल संबंध था। अपने अरविंद राव जोशी की आत्या बाई जोशी लका मकान उनके मकान के ठीक पीछवाड़े था। तीसरे माहुरकर परिवार था, जिनसे घनिष्ठ संबंध था। उनकी लीथों प्रेस थी। उनके यहां भी हमारा आना जाना होता था। वे रंगारी जाती के थे। हम उन्हें काका ही कहा करते थे। उनके यहां कोई पर्व उत्सव हो तो हम खाना खाने जाते थे। वे भी एक सम्पन्न व्यक्ति थे। उनके तीन पुत्र थे। दोनों बड़े पुत्र लिथो प्रेस में ही काम करते थे। छोटा पुत्र प्रोफेसर था। उनका मकान बच्छराज व्यास चौक के पास चितार नाम की गली थी, वहां पर था। इसी गली में परम पूज्य गोवलकर गुरुजी का भी मकान था।
श्री आबाजी (बड़े पिताजी) बाद में अर्जनवीस का काम छोड़कर उन्होंने बड़कस चौक, वर्तमान में बच्छराज व्यास चौक के पास ही बाकर रोड पर एक स्टेशनरी का दुकान प्रारम्भ किया। बहुत साल तक वह दुकान रही। बाद में उस दुकान को दादा कोठीवान को बेच दी थी। श्री आबाजी का अनेक ब्राह्मण परिवारों में संबंध होने के कारण वे लड़कियों का विवाह संबंध भी जोड़ने का काम निस्वार्थ समाज सेवा समझ कर करते थे।
(9)उनका जीवन बहुत संयमित और नियमित था। संध्या को घूमने जाना उनकी उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी। घूमते समय एक दो परिवार से वे मिलते ही रहते थे। हम बहुधा वर्ष में एक बार नागपुर जाते ही थे। तथा एक माह वहां रहकर सभी रिश्तेदारों के यहां एक दो दिन रहते थे। इस प्रकार सभी रिश्तेदारों से अत्यंत निकट का प्रेम संबंध बना रहता था। कभी अकोला महाराष्ट्र में उद्गीरकर मावशी बड़ी मावशी के यहां हो आते थे।
श्री आबाजी हम बच्चों को बहुत चाहते थे। अपनी दुकान से हम लोगों के लिए बहुधा खिलौने लाकर देते थे। वे कभी किसी रिश्ते दार के यहां जाते तो हम बच्चो को जरूर ले जाते थे।
पूर्व में मैंने लिखा है की हमारे पूज्य पिताजी श्री कृष्णराव किन्हें कर किस परिस्थितियों में मनेरी के जमीदार श्री दिनकर राव कोठे कर के यहां मैनेजर की नौकरी को स्वीकार किया था। श्री कोठेकर एक प्रतिष्ठित जमीदार के रूप में लांजी क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। उनकी पत्नी सौ बनू ताई कोठेकर बालाघाट के प्रासिद्ध वकील नारायण राव केलकर की पुत्री थी। उनको एक पुत्र श्री मधुकर कोठेकर तीन पुत्रिया क्रम शह सरलाताई, सुमन ताई व शांता थी। सरला ताई एक डॉक्टर को ब्याही गई थी, जो नागपुर के ही निवासी थे। सुमन ताई श्री वैध परिवार में ब्याही गई थी, वह भी नागपुर के ही निवासी थे। तथा छोटी पुत्री शांता धंतोली नागपुर के सोमलवार परिवार मैं ब्याही गई थी। श्री कोठेकर के जमीदारी में मनेरी लांजी से 5 किलोमीटर दुर गांव, पौसेरा लांजी से लगभग 4 किमी दुर, नन्सरी ग्राम माहाराष्ट्र में लांजी का सीमावर्ती ग्राम था तथा बालाघाट के समीप कनकी ग्राम सम्मीलित थे। बालाघाट में स्टेशन रोड पर ही उनका एक बड़ा बंगला था। इनकी जमीदारी का मुख्यलय मनेरी ग्राम ही था।
इनके जमीदारी में दो बहनों की मालकीयत थी। बड़ी बहन चटकी बाई को कोई वारसान नहीं थे। ईसलिए उन्होंने दिनकर राव कोठेकर को दत्तक लिया था। (10)तथा चटकी बाई के मृत्यु के बाद श्री दिनकर राव कोठेकर ये संपूर्ण जमीदारी के मालिक बने। चटकी बाई की छोटी बहन वाईकर परिवार में ब्याही गई थी। बंटवारे में छोटी बहन को करनजा आमगांव के पास, ददिया बालाघाट के पास, तथा वारासिवनी के पास ये एक गांव इनकी जमीदारी में सम्मीलित थे। वाईकर परिवार में तीन भाई थे तथा माता जी की मृत्यु के पश्चात तीनों भाई में जमीदरी का बटवारा हुआ था।
मनेरी में एक हनुमान मंदिर था। उसके उसके पुजारी नागपुर के देशकर थे। उनके मृत्यु के पश्चात उनकी पत्नी जो मारुति वाली बाई के नाम से प्रसिद्ध थी, वहां रहती थी। मनेरी में 9 दिन रामनवमी का उत्सव बड़े शान से मनाया जाता था। आसपास के गांव से बड़ी संख्या में लोग जत्रा के रूप में एकत्रित होते थे। राम नवमी के समय श्री कोठेकर परिवार नागपुर से आकर वहां 10 -12 दिन तक रहते थे। उनके अन्य परिचित व रिश्तेदार भी उपस्थित रहकर इस उत्सव में भाग लेते थे। हमारा परिवार भी उस उत्सव में श्री कोठेकर के निमंत्रण पर वहां उपस्थित रहता था। गर्मी के दिनों में कोठेकर परिवार एक महीने के लिए नागपुर से आकर मनेरी में रहते थे। हमारा परिवार भी उस समय पांच छह दिन उनके साथ रहता था। श्री कोठेकर के बच्चे हमारे पिताजी को मामा मानते थे। उनकी नौकरी छोड़ने के बाद भी अंत समय तक हमारे परिवार से बहुत ही घनिष्ठ संबंध था। हम श्री कोठेकर की पत्नी को आत्या बाई कह कर पुकारते थे। आत्या बाई का मुझ पर विशेष प्रेम था। इसीलिए जब वे गर्मी में वहां आते, तब पौसेरा, बालाघाट, कनकी में अपने साथ (11)मुझे लेजाते थे। कनकी में एक आम का बड़ा बगीचा था। वहां अनेक प्रकार के आम के वृक्ष थे।
हमारे पिताजी सुदृढ़ शरीर के और गौर वर्ण के ऊंचे पूरे थे। वे हॉकी के भी अच्छे खिलाड़ी थे। उनको मराठी, हिंदी, बंगाली भाषा का अच्छा ज्ञान था। लगभग 3 वर्ष के पश्चात मनेरी जमीदारी की नौकरी छोड़कर वे लांजी के एक नीमटोला मोहल्ले में रहने लगे। यहां आकर बटाई में खेती करते तथा वन विभाग में लकड़ी आदि के ठेके लेते। इस प्रकार उनका जीवन निर्वाह होने लगा। वे लिखे पढ़े होने के करण जिले से कोई भी जिले का बड़ा अफसर जब लांजी आता तो उन्हें मिलने व चर्चा के लिए बुला लिया जाता। मेरा व बड़े भैया का जन्म लांजी निमटोला में ही हुआ।
पिताजी बाद में डिस्ट्रिकट काउंसिल के सदस्य चुने गए। न्याय पंचायत के भी एक सदस्य थे। डिस्ट्रिकट काउंसिल के सदस्य के नाते उन्हें लांजी क्षेत्र के स्कूलों का दौरा निरीक्षण करना पड़ता था। वे इस कार्य को बड़ी दक्षता व ईमानदारी से निभाते थे। वे अनुशासन प्रिय थे, इसीलिए वे कोई भी गलत कार्य करने वाले पर बहुत नाराज होते थे। एक बार तहसीलदार ने गांव के ही एक किसान के लगान न देने का करण बताते हुऎ उस किसान की बैल जोड़ी जब्त कर ली। किसान हमारे पिताजी से मिला और अपना कष्ट बताया। उसके पास लगान पटाने की रसीद थी । पिताजी किसान को लेकर सीधे जिले के कलेक्टर से मिले। व तहसीलदार की शिकायत दर्ज की। कलेक्टर ने जांच की और तहसीलदार के गलती पर उसे वारनिंग दी। तहसीलदार पिताजी से माफी मांगने लगा।
हम लोग पढ़ने के लिए गोंदिया शहर गए। मैं बड़े भैया और एक बहन तथा मां के साथ गए । व रेलटोली में श्री दातार के घर में किराए से रहने लगे। उस समय मैं सातवी कक्षा में वहां म्युनीसीपल हाई स्कूल मैं प्रवेश लिया। (12) बड़े भैया ने लांजी में ही सातवी कक्षा पास कर ली थी। उनको अस्थमा की शिकायत थी। वह क्रॉनिक हो गया था। अतएव उनकी पढ़ाई बंद करना पड़ा। परंतु फिर भी वहां एक माहाराष्ट्रीयन ब्राहमन श्री लिमये टेलरिंग का काम करते थे। वहां उनसे टेलरींग सिखने के लिए भैया जाने लगे। गोंदिया में मंझले भाई जयंत का जन्म हुआ। उस समय मैं आठवीं कक्षा में था। वहां के सरकारी लेडी हॉस्पिटल में मां को भरती करना पड़ा। एक माह तक हॉस्पिटल में मां भारती रही। मां उस समय बहुत कमजोर हो गई थी। इसीलिए हमारी बड़ी मौसी सुंदरा बाई उदगिरकर को उसके सेवा सुश्रुसा के लिए वहां बुलवा लिया गया। वह लगभग तीन माह तक वहां रही। पिताजी लांजी में ही रहते व वहां का अपना काम धाम संभालते। बीच बीच में वे गोंदिया आते रहते। इस बीच पिताजी ने अपनी सुषुप्त इच्छा डॉक्टर बनने की गोंदिया में पुरी की। गोंदिया में रेलवे में एक विभागीय इंजीनियर श्री नायडू साहब थे, वे होमियोपैथिक के प्रैक्टिशनर थे। उनकी बड़ी ख्याति थी। अनेक दुर के शहरों से पेशेंट उनके पास चिकित्सा के लिए आते थे। उनकी पहचान श्री काका साहब जोगलेकर (आनंद देशपांडे के आजोबा) से थी। उनके कारण पिताजी का डॉक्टर नायडू से घनिष्ठ परिचय हुआ। एक दिन उन्होंने अपनी व्यथा उनसे कही। कैसे डॉक्टर होने के लिए पूना गए ,व वापस आ गए। यह उन्होंने डॉक्टर नायडू को बताया। डॉक्टर नायडू ने अपने होमियोपेथी के ग्रंथ उन्हें पढ़ने के लिए दिये। कुछ ग्रंथ उनके बतायेनुसार बाहर से भी मंगवाए थे। ( 13) ग्रंथों का सतत अभ्यास कर पिताजी ने लांजी में ही होमियोपैथी की प्रैक्टिस शुरू की। जल्दही अनेक लोग उनसे दवा लेने आते व स्वास्थ्य लाभ कर प्रसन्न होते। वे फीस नही लेते थे । एक पेटी में दान इच्छानुसार देने के लिए कहते। उनके हाथ मे यश होने के कारण अनेक कठिन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति रोग रहित हुए, यह मैने प्रत्यक्ष अनुभव किया।
लांजी में शिवरात्रि की बहुत बड़ी यात्रा भरती थी। उस समय मिडिल स्कूल के मैदान में तीन दिन टूर्नामेंट आयोजित किया जाता। बालाघाट, गोंदिया, तुमसर की टीमें वहां आती थी। हॉकी, फुटबाल व कबड्डी के मैच होते।
इस टूर्नामेंट का आयोजन लांजी के प्रतिष्ठित व्यक्ति और सरकारी अधिकारी मिलकर करते थे। एक समिति बनाई गई, जिसमे पिताजी भी उसके सदस्य थे। यह टूर्नामेंट सिविल और विद्यार्थी दोनों के लिए आयोजित होता था।
पिताजी स्वयं अपने हाथ से चरखे के द्वारा सूत कताई करते व वहीं के गरेवाल समाज के द्वारा अपने खादी के कपड़े तैयार करवाते थे।
वे नियमित भगवत गीता पढ़ते। उन्होंने लोकमान्य तिलक की गीता रहस्य ग्रंथ का अच्छा अध्ययन किया था। बालाघाट जिले में वे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे।
(14 ) उन्होंने उन्होंने अपने कृतित्व से 25 एकड़ खेती की जमीन, एवं एक राइस मील खरीदी थी। जनवरी 50 में लांजी में प्लेग का प्रकोप हुआ। लांजी के एक मोहल्ले सुंदर टोला में प्लेग ज्यादा फैला था। पिताजी अपने होमियोपैथिक औषधि से चिकित्सा करते । प्रतिदिन 8:00 से 12:00 बजे तक वहां रह कर मरीजों की निशुल्क सेवा करते। यह सेवा कार्य लगभग एक माह चला। उन्हें इसके बाद बुखार ने आ घेरा। डॉक्टर चौधरी का औषधि उपचार चलता रहा। परन्तु उन्हें कोई आराम नहीं हुआ। आखिर बुखार ने डबल निमोनिया का रूप ले लिया। व उनकी हालत गंभीर होती गई। अंत में एक दिन बहुत ही ताबियत बिगड़ी। डॉक्टर चौधरी तथा श्री झोलुजी भार्गव जो आयुर्वेद के जानकार वैद्य थे, दिन भर बैठे रहे। अचानक रात में उन्होंने कहा रघुपति राघव राजाराम भजन गाने के लिए सब उपस्थित लोगों को कहा। वे भी भजन गाने लगे। भजन के बाद पंडित गौरिकान्त मिश्रा जी को भगवत गीता का 11वां अध्याय पढ़ने के लिए कहा। अध्याय समाप्त होते ही वे बेहोश हो गए। तथा आधा घंटा पश्चात उनके प्राण निकल गए। उस समय घर मे गांव के तीस चालीस लोग उपस्थित रहें। मृत्यु के पूर्व हमारे गांव के प्रतिष्ठित बुजुर्ग व्यक्ति श्री जेठू महाजन ने पित्तजी से कहा कि बच्चों और बाई को कुछ कहो। उन्होंने कहा कि वह परमेश्वर सबका ठीक ही करेगा।
हमारी माताजी ने पिताजी के पश्चात घर की जिम्मेदारी सम्हाली। उस समय मैं सोलह वर्ष का तथा बड़े भैया वसंतराव 19 वर्ष के थे। उसके बाद मैं दो वर्ष 11वीं व कालेज में नागपुर में शिक्षा ग्रहण किया। व लांजी वापस आया। कुछ दिन खेती और राइस मिल का काम सम्हाला।(15) उसके बाद में लांजी में ही मुझे शिक्षक की नौकरी करना पड़ा।
हमारी माताजी का स्वभाव थोड़ा तेज था। वे क्रानिक अस्थमा से ग्रसित थी। इसीलिए हर हफ्ते अस्थमा के अटेक आया करते थे। फिर भी वे भोजन आदि, तथा घर के और काम किया करती। घर मे कोई व्यक्ति आने पर चाय पिलाना अथवा भोजन के समय कोई आया तो उसे भोजन खिलाना यह उनके स्वभाव में था। गांव के लोग भी विशेषकर गरीब लोग कोई वस्तु या अचार वगैरह मांगने आते तो वह सहर्ष उन्हें देती, किसी को खाली हाथ नही जाने देती। घर मे छह नौकर व तीन बाईयां सदैव काम में रहती। उनसे भी उसका व्यवहार बड़े प्रेम का रहता।
गोंदिया जब हम पढ़ने के लिए गए थे, तब सन 1948 में गांधीजी का वध हुआ था। बड़े भैया उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय और नियमित स्वयंसेवक थे। उस समय सत्याग्रह के रूप में कुछ कार्य करने का निश्चय किया गया। क्योंकि उस समय संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध सरकार के द्वारा लगाया गया था। अधिकारियों ने निश्चित किया कि विरोध में आधी रात को शहर भर पाम्पलेट दीवारों में चिपकाएंगे। पाम्पलेट नागपुर से लाने के लिए तीन स्वयंसेवक प्रतिदिन नागपुर जाते। व पहेट को चार बजे ट्रैन से पाम्पलेट लेकर गोंदिया आते। उस समय हमारी माताजी स्वयंसेवक के लिए बेसन भात बनाकर खिलाती। उसके पश्चात वे और अन्य स्वयंसेवक शहर में पाम्पलेट चिपकाने का कार्य किया जाता। स्वयंसेवकों में हमारे बड़े भैया भी सम्मिलित होते थे।
(16) हमारे यहां वर्ष में प्रायः सभी त्यौहार धूमधाम से मनाए जाते। विशेषकर नवरात्रि व महालक्ष्मी का त्योहार। भोजन के लिए अतिविशिष्ट व्यक्ति लगभग 30, 40 की संख्या में उपस्थित रहते। वर्ष में एक बार किसी प्रवचनकर्ता का रामायण का कार्यक्रम आयोजित किया जाता। यह लगभग तीन दिन चलता।
इस प्रकार हमारी माताजी स्वास्थ्य से कमजोर होने पर भी सभी कार्यों को बड़े उत्साह से सम्पन्न करती। बड़े भैया की शादी होने के बाद लगभग4,5 साल पश्चात उनका स्वर्गवास हुआ। उस समय वे नागपुर के मेडिकल कॉलेज में भर्ती थी। उनकी अंतिम क्रिया विधि नागपुर तथा रामटेक में सम्पन्न हुई।
हमारे बड़े भैया वसंतराव का जन्म 29 फरवरी 1931 में लांजी के निमटोला ग्राम में हुआ। वे जब नौ वर्ष के हुए, उन्हें अस्थमा (दमा) का अटैक आया। तब से वे सतत अस्थमा से पीड़ित रहे। उनकी प्राथमिक व मिडिल की शिक्षा लांजी में ही हुई। परंतु अस्थमा के कारण आगे की पढ़ाई नही कर सके। 7वी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही हम लोग माताजी के साथ अगली पढ़ाई के लिए गोंदिया गए। उस समय मैं छठवी कक्षा पास कर चुका था। 7वी में म्युनिसिपल हाई स्कूल गोंदिया में प्रवेश लिया। वहां हम रेलटोली में रेलवे स्टेशन के पास ही दातार, जो पोस्टल डिपार्टमेंट में कार्यरत थे, उनके मकान में किराए से रहने लगे। बड़े भैया को पिताजी ने टेलरिंग का काम सीखने के लिए श्री लिमये जी के टेलरिंग शॉप में प्रतिदिन जाने की व्यवस्था की।
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हम लोग इसी वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में, जो रेल टोली में ही एक प्राइमरी स्कूल के मैदान में लगती थी, वहां प्रतिदिन शाम को जाते थे। हमारे बड़े भैया बाद में संघ के नियमित व सक्रिय स्वयंसेवक बने। मैं नियमित रूप से शाखा नहीं जा पाता था, क्योंकि मुझे फुटबॉल और हॉकी खेलने का बहुत शौक था। इसीलिए मैं हॉकी अथवा फुटबॉल खेलने रेलवे ग्राउंड में खेलने जाया करता था। गोंदिया में रेलवे में बंगाली कर्मचारीयों की बहुत बड़ी संख्या थी, इसीलिए वे लोग वहां की रेलवे लाइब्रेरी में बहुत शानदार दुर्गोत्सव मनाते थे। दुर्गा जी की मूर्ति बनाने के लिए कोलकोता से तीन चार कलाकार आते थे। इस समय बड़े भैया रोज उनकी कलाकारी देखने वहां प्रतिदिन जाया करते। व काफी समय वहां व्यतीत करते थे। दुर्गा जी की मूर्ति तैयार करने में लगभग एक माह लगता था। वह वहां बैठकर निरीक्षण करते कि मूर्ति निर्माण कैसे की जाती है। इस प्रकार उन्होंने मूर्ति बनाना सीख लिया।
पिताजी की मृत्यु 1950 में हुई। इसलिए हमें गोंदिया छोड़ना पड़ा। व लांजी वापस आ गए। पिताजी की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण खेती आदि की जिम्मेदारी बड़े भैया संभालते थे। उस समय उनकी उम्र 19 वर्ष की और मैं 16 वर्ष का था। गोंदिया से आने के बाद में अगली पढ़ाई अर्थात ग्यारहवीं व कॉलेज के 2 वर्ष नागपुर में जाकर की। 3 वर्ष के बाद मैं लांजी आया तथा 2 वर्ष बड़े भैया के काम में साथ दिया करता। उसके बाद मुझे लांजी में ही शिक्षक की नौकरी का आदेश मिला और अपनी ड्यूटी पर नियमित जाने लगा। यह अगस्त 1954 की बात थी।
(18)बड़े भैया ने अपना काम संभालते हुये वहीँ हमारे मोहल्ले निमटोला में संघ की शाखा प्रारम्भ की। और एक अच्छी नियमित चलने वाली शाखा बनी। लगभग प्रतिदिन 25 से 35 बाल एवं तरुण स्वयं सेवक उस शाखा में नियमित उपास्थित रहते थे। बाद में लांजी मुख्य बस्ती में भी संघ की शाखा प्रारम्भ हुई।
इस प्रकार संघ के अच्छे एवं जिम्मेदार स्वयंसेवक के रूप में बड़े भैया का नाम प्रसिद्ध हुआ। आमगांव महाराष्ट्र जो लांजी से 22 की मि दूर था, वहां से वरिष्ठ कार्यकर्ता शाखा का निरीक्षण करने महीने में एक बार हमेशा आते थे व मार्गदर्शन भी करते थे। समय बीतने के साथ लांजी की शाखा की ख्याति बालाघाट जो हमारा जिला मुख्यालय था, पहुंची। वहां के संघ अधिकारी भी लांजी में दौरा करने लगे। आपातकाल के समय वे मीसा में जेल भी गए। बालाघाट जिले में जब जनसंघ की पहली बार राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापना हुई तो बालाघाट के साथ ही लांजी, बैहर, कटंगी, वारासिवनी, परसवाड़ा विधान सभा क्षेत्रों में भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई थी। उसमे जनसंघ के विस्तार में बड़े भैया ने बहुत परिश्रम किया था। उन्हें 1982 में जनसंघ (भाजपा ) की तरफ से लांजी विधान सभा का प्रत्याशी बनाया गया था। उस चुनाव में वे केवल 1900 मतों से पराजित हुए थे। वे 15 वर्ष तक लांजी ग्राम पंचायत के सरपंच भी निर्वाचित हुए थे।
उन्हें तीन पुत्र उमेश लक्ष्मीकांत एवं रविन्द्र हुए। पुत्रियां क्रमशः शीला कुमुद सुषमा एवं ज्योति हुए । अस्थामा के कारण अंतिम पांच वर्ष बड़े कठिनाई एवं कष्ट के व्यतीत हुए। उनका हृदयाघात होने से सन 1989 में उनका स्वर्गवास हुआ।
लेखक बलवंत कीन्हेकर, लांजी, जिला बालाघाट म. प्र.
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