Thursday, October 3, 2024

मेरी मधुर जीवन यात्रा गावँ की गली से शहर तक

मेरी मधुर जीवन यात्रा
   रायपुर से नागपुर रेल मार्ग पर डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन कभी लोको शेड का बड़ा केंद्र होने के कारण प्रसिद्ध रेलवे स्टेशन था। यहां लगभग सभी रेलगाड़ियां  रुकती थी। पिछले 40 वर्षों में मैंने कितनी बार रायपुर से आमगांव तक का रेलवे  से सफर किया है,  इसकी गिनती मुझे याद नहीं है ।जब मूंछ की लकीरे फूट रही थी उस समय मैं कॉलेज में पढ़ने के लिए रायपुर आया था। और  अब मेरे बाल सफेद हो गए  हैं।
     लांजी मेरा जन्म स्थान है। जहां मैंने 12वीं तक की पढ़ाई की है और जो मेरा पैतृक गांव भी है। रायपुर से लांजी जाने के लिए रायपुर से आमगांव रेलवे स्टेशन तक ट्रेन का लगभग 100 किलोमीटर का सफर है। आमगांव से लांजी तक 25 किलोमीटर का सफर बस से तय करना पड़ता है।
      मुझे यह यात्रा इतनी बार करनी  पडी है कि रायपुर से आमगांव तक के सारे रेलवे स्टेशन,  यहां तक की पैसेंजर के स्टॉपेज भी मेरी स्मृति में रच बस गए हैं। (जब हम पढ़ते थे तो पैसा बचाने के लिए हमेशा पैसेंजर ट्रैन का ही उपयोग करते थे।)  ऐसा क्यों ना हो,  मेरे अपने गांव जाने का यही एकमात्र जो जरिया है, जिसका उपयोग मैं जीवन भर करते आया हूं। मगर कंगाली को भी तर्क से सुविधा में में बदला जा सकता है, मैं कहा करता था कि कम पैसे अधिक देर तक ट्रेन में बैठने का मजा लेना हो तो पैसेंजर गाड़ी में बैठो।
         खैर ! बात रायपुर से लांजी तक के सफर की हो रही हो रही थी। मैं लंबे अरसे बाद आज लांजी जा रहूं। रायपुर से  डोंगरगढ़ तक रायपुर दुर्ग भिलाई की नगरीय संस्कृति का प्रभाव रेलवे की यात्रा के दौरान भी महसूस किया जा सकता है।  यात्रा के दौरान यात्रियों के व्यवहार में थोड़ी सी औपचारिकता, थोड़ी आत्म सम्मान की झलक, कुछ होने का अभिमान, उससे भी आगे रेल के डिब्बे में उनके अधिकारों के जानकारी की झलक साफ-साफ दिखाई देती है।
       डोंगरगढ़ आते ही दो महत्वपूर्ण बातें रायपुर से डोंगरगढ़ तक की एकरसता को तोड़ देती है। पहली बात डोंगरगढ़ की  प्रसिद्धि लोको शेड के  कारण तो है ही , उससे अधिक प्रसिद्धि वहां के मां बमलेश्वरी देवी के मंदिर के कारण है। डोंगरगढ़ आते ही मेरे दोनों हाथ ऑटो मोड में  नमस्कार की स्थिति में आ जाते हैं। कुछ बाते कब हमारी बॉडी लैंग्वेज में कब रच बस जाती है, इसका हमें भी गुमान नहीं रहता। कभी  विचारों की घनीभूतता के कारण  ऐसा ना भी हो सका तो  भी  अन्य  सह यात्रियों को  हाथ जोड़ते देख कर,  विचारों की तंद्रा से बाहर आकर मेरे हाथ भी ऊपर उठ जाते हैं। श्रद्धा से  सिर झुक जाता है। दूसरी बात डोंगरगढ़ से निकलते ही ट्रेन के अंदर की महानगरीय संस्कृति कहीं  धीरे धीरे लुप्त होने लगती है और गांव की भदेसी संस्कृति अपना प्रभाव जमाना शुरू कर देती  है, विशेष रूप से पैसेंजर ट्रेन में।
       डोंगरगढ़ से ट्रेन के छूटते ही गॉंव, खेत, खलियान, बैलगाड़ी, पलाश और सागौन के पेड़, न जाने कितने ही चिर परिचित दृश्य आंखों के सामने से निकल जाते हैं। ये दृश्य मुझे मेरे विगत से, मेरे बचपन की सुखद स्मृति  से,  मेरे जीवन के सबसे मधुर क्षणों से मुझे जोड़ देते हैं। आम के मौर की बहार  से सजे आम के वृक्षों  की स्वर्णिम आभा प्रकृती की स्वाभाविक अमूल्यता का भाव उत्पन्न कर देती है। बसंत में कुमकुम रंग के फूलों से लदे पलाश के वृक्ष अपने गैरिक आभा से  प्रेम और विरक्ति का सम्मिलित भाव जगा देते हैं। परंतु स्वयं नाना प्रकार के कीड़ों का आवास यह पलाश का वृक्ष इन दिनों में कितना इठलाता है। कितना मस्त हो जाता है। यह जानते हुए भी कि उसकी यह बसंती मादकता क्षणिक है। बाद में उस पलास को उस में निवास कर रहे हैं लाख के कीड़ों के साथ ही जीवन बिताना है। प्रकृति में और मानवीय अनुभूतियों में कितना साम्य में होता है।
            डोंगरगढ़ के बाद बीच-बीच में ट्रेन पहाड़ी रास्तों से गुजरती है। जिसके कारण कहीं-कहीं पर पटरिया मुड़कर रास्ता बनाती है। इन्हीं मोड़ों पर कई बार पीछे के डिब्बो में बैठे हुये यात्री को भी गाड़ी का इंजन साफ साफ दिखाई देने लगता है। इस इंजन को वनों को चीरते हुए पहाड़ों को काटते हुए आगे बढ़ते हुए देखने का अलग ही आनंद होता है। खासकर उन दिनों में जब मैं सद्य युवा था, मेरा सरल मन एंजिन के गति  के साथ खुद  को जोड़कर स्वयं को इस कठिन  डगर का  यात्री  मान बैठता था।  मानो स्वयं इन सघन वनों को काट  कर  और  दैत्याकार पहाड़ों को तोड़कर   रास्ता बनाता हुआ  जीवन पथ पर  आगे बढ़ रहा हूं। इस वयः संधि में यह आभासी अहंकार  भी युवा मन की अलग प्रकार की  आत्ममुग्धता होती है।
        जंगलों के बीच-बीच में रास्ते में दिखाई देने वाले खेत आगे आने वाले गांव की सूचना दे देते हैं। खेतों में घुटने तक कच्छी पहना हुआ  कृषि मजदूर। कच्चे रास्ते पर सफेद टोपी, धोती और कमीज पहने  साइकिल पर गर्व से चलते गांव के कथित सफेदपोश, कंधे पर नागर रखें खेत की ओर जाते किसान,  सिर पर कपड़े में बंधी हुई सिदोरी (भोजन) रखी हुई किसान के पीछे चलती उसकी पत्नी,  साथ में चलते बैलों की घंटी की बिना लय ताल की किंतु  मोहक ध्वनि।
         तालाब पर पानी भरने, नहाने और कपड़ा धोने आई महिलाओं का  बैठने का  ढंग  ही बता देता है  कि  उनके बीच कभी समाप्त न होने होने वाली बातचीत चल रही है । गांव की इस किस्सागोई का अपना साहित्य होता है। आज किसके यहां कौनसी सब्जी बनी है, सब्जी नही थी तो मिर्ची की लाल चटनी ही आज काम चल जाएगा ,  किसके यहां मेहमान आया है, फलां लड़की का या लड़के का ब्याह तय हो गया। पड़ोसन से लेकर पटेलन तक सबके गुणों- अवगुणों पर विमर्ष यह तो नियमित विषय होता। तीज त्योहार, जैसे समसामयिक विषयो पर समय समय  पर चर्चा होती। किसके घर मे त्योहार में क्या खास बना। किसके लिये नया कपड़ा आया। चर्चा के विषय होते। सबसे हॉट सब्जेक्ट तब बनता, जब गॉंव में किसी के घर मे ननंद -भौजाई, सास- बहू,  भाई -भाई या पड़ोसियों के बीच होने वाला झगड़ा सड़क पर आ जाता। हारी बीमारी, अपनी नही पड़ोस की क्यों न हो, इलाज बैगा गुनिया से कराया या बैद से कराया या बीमारी बढ़ने के बाद बड़े कस्बे  में सरकारी अस्पताल में होने वाला इलाज चर्चा का नया विषय होता।
       खेतो में अधपकी फसलों की खुशबू सब कुछ कितना जाना पहचाना कितना अपना लगने लगता है। इस वातावरण में अपने अतीत में ले जाने से स्वयं को रोक पाना असंभव है। और अतीत की याद में  खो जाना  कितना अच्छा लगता है, खासकर बचपन की यादों में। मैं कई बार सोचता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना बचपन क्यों हमेशा याद आता है? केवल बचपन ही एक ऐसी अवस्था है जहां मनुष्य का जीवन अनुशासन हीन, अनगढ़ और असंगत तर्कों से भरा होता है। जहां पर ना तो परंपराओं का का बंधन होता है, ना ही समाज का भय,  जमीन के कानून की बात तो दूर की है। इसके बाद का जीवन अनेक सामाजिक पारिवारिक और परंपरागत अनुशासन से और जिम्मेदारियों से बंधा रहता  है। परंतु मनुष्य मूलरूप से उच्छृंखल होने के कारण ही उसे सारे बंधनों से मुक्त बचपन हमेशा याद आता है, अच्छा लगता है।
      डोंगरगढ़ के आगे  छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाएं आपस में मिलती है। सीमाओं के साथ भाषा संस्कृति और बोली पहनावा सब कुछ मिलाजुला होता है।  सांस्कृतिक क्षितिज  की अनोखी छटा  आपको  इस 2 मिनट में  दिखाई दे देगी। किसी छोटे से रेलवे स्टेशन पर जब यात्री चढ़ते हैं या उतरते हैं, तो यह भी एक बानगी होती है। एक ही व्यक्ति ग्रामीण लहजे की मराठी, हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में बोलते हुए मिल जाएगा। रुकीये ! इस व्यक्ति को बहुभाषी होने का दर्जा मत दीजिए। इसने तो ये भाषाएं अपनी विद्वत्ता  के कारण नहीं सीखी है बल्कि जीवन की कठोर आवश्यकताओं ने उसे बहुभाषी बना दिया है। परंतु एक बात तो है  प्रदेशों के इन सीमांत क्षेत्रों में चाहे शहरी लोग हो या गांव के सब एक दूसरे की संस्कृति का आदर भी करते हैं, एक दूसरे के तीज त्योहार में एकरस भी होते हैं और एक दूसरे की भाषाओं को जानने और समझने का  प्रयास भी करते हैं। यही इस देश की  सुंदरता है,  जिसे,  तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने वाला पढ़ा लिखा आदमी जो स्वार्थवश केवल विषमता के बीज खोजता है, नहीं समझ सकता। उसको समझने के लिए ज्ञान की आवश्यकता नहीं है अगर आवश्यकता है तो सरल ह्रदय की या पेट की जरूरत की।
       
             हां तो बात ट्रेन पर चढ़ते ग्रामीणों की हो रही थी। प्लेटफार्म पर किसी यात्री को छोड़ने आए ग्रामीणों की भीड़ से प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी तरह से यात्री को सावधानियां बताते रहता है।  नसीहत देते रहता है। उसमें भी कोई मराठी में बोल रहा होता है। कोई हिंदी में बोल रहा होता है, तो कोई  छत्तीसगढ़ी में बोल रहा होता है। कितनी  हिदायतों को वह यात्री सुन पाता है कहना कठिन है ,  जो थोड़ा बहुत सुन लेता है उसमें से भी कितना याद रख पाता है, यह आँकलन उस व्यक्ति पर ही छोड़ देना चाहिए। परंतु छोड़ने आए ग्रामीणों की सरलता इस बात में है की वह वह अपनी चिंता को मुखर करने से चुकना नहीं चाहते। ट्रेन के छूटने के बाद भी, ट्रेन की गति के साथ साथियों का और विशेष रूप से साथ आई महिलाओं का तबतक तेज आवाज के साथ हिदायत देना चालू रहता है, जब तक की यात्री आंखों से ओझल ना हो जाए। तब तक खड़े रहेंगे जब तक कि पूरी ट्रेन ओझल न हो जाये। ग्रामीण रिश्तेदारों की ट्रेन को अंत तक देखने की यह आदत शायद ट्रेन को देखने की उत्सुकता से उपजी हुई है या यात्री के प्रेम के कारण कहना कठिन है। जो भी हो परंतु यह भदेसी   वातावरण मुझे अच्छा लगता है।
       मुझे अपना गांव छोड़ें 40 वर्ष बीत गए, पर स्थानीय बातचीत की लय, माटी की सुगंध,  किसान मजदूर के कपड़ों से  श्रम बिंदुओं से उपजी परिश्रम की गंध, सम्मोहित कर देती है। किसी भी वस्तु को देखकर, ग्रामीण बच्चों के चेहरे पर दिखाई देते आश्चर्य के बाल सुलभ भाव, बच्चे को लेकर डिब्बे में बैठी गरीब,  ग्रामीण,  अभाव की जिंदगी जीती महिला के चेहरे पर भी बच्चे के प्रति  उमड़ती  ममता की छाया, सब कुछ मेरे मन को उद्वेलित कर देता है। गांव का देखा, जिया यथार्थ फिल्मों की तरह घूमने लगता है।
     रायपुर से नागपुर रेल मार्ग पर गोंदिया से पहले पड़ने वाला रेलवे स्टेशन है- आमगांव। यह एक्सप्रेस का स्टॉपेज भी है। यहां से 25 किलोमीटर दूर सड़क रास्ते पर स्थित है लांजी नामक गांव। यह भी मजेदार बात है की छत्तीसगढ़ से निकलकर महाराष्ट्र के आमगांव रेलवे स्टेशन पर उतर कर फिर से मध्य प्रदेश प्रवेश करने के बाद लांजी की पहुंच है। मात्र 20 किलोमीटर में तीन प्रान्त की सीमा दिखाई देती है। मूल लांजी ग्राम से 1 किलोमीटर दूर नीमटोला यह बड़ा मोहल्ला  लांजी के तीन वार्ड से बना  है। यद्यपि राजस्व की दृष्टि से नीमटोला लांजी के तीन  वार्ड से बना हुआ लांजी का ही हिस्सा है। परंतु स्थानीय ग्रामीण व्यवस्था, अलग संस्कृतिक कार्यक्रम,  सामूहिक तीज त्यौहार की दृष्टि से इसे स्वतंत्र अस्तित्व के साथ अलग ग्राम मानना ही उपयुक्त होगा। निमटोला से 6 किलोमीटर दूर  स्थित छोटे से गांव मनेरी की जमीदारी के अंतर्गत निमटोला आता था। शायद इसीलिए गिट्टी मुरम की बनी रोड ही क्यों न हो मनेरी तक जाने वाला यह रास्ता अन्य रास्तों की तूलना में तत्कालीन परिस्थिति में ठीक-ठाक अवस्था में था, ऐसा कहा जा सकता है। इस रास्ते के ठीक ठाक होने का दूसरा कारण था कि यह रास्ता खराड़ी बांध को भी जोड़ता है।  इसी मनेरी रोड पर निमटोला स्थित है। मनेरी रोड से कट कर एक रास्ता  गांव के अंदर जाता है। इसी मोड़ पर गांव के मुहाने पर हमारा मकान स्थित है।
       गांव  की परिभाषा में उस समय गांव में केवल हमारा ही पक्का मकान था। तथाकथित पक्के मकान के नाम पर मिट्टी की जुड़ाई से ईटों का बना यह मकान। जिसमें प्लास्टर न होकर केवल सीमेंट की दराजबंदी थी। जिसके ऊपर चुने से सफेदी कर दी जाती थी। कहीं-कहीं पर  उखड़ी सफेदी से झांकती ईंटें मकान के पक्के होने का पक्का  सबूत दे देती थी। नीचे तल्ले की छत बांस की बनी थी। जिसे मिट्टी से लिप दिया गया था। पहले तल की छत कवेलू की बनी थी। यानी कि दो मंजिला मकान जो सामान्यतया बाड़े के नाम से जाना जाता था। मकान के सामने लाल और पीले गुलमोहर के दो बडे पेड़ और थोड़े बहुत गुड़हल, कनेर गुलाब आदि के बेतरतीब ढंग से लगे पौधे आंगन की शायद शोभा ही बढ़ाते हों।
       हमारे मकान के सामने चौक पर एक ग्राम देवता थे। वहां कोई मूर्ति नही थी। देवता के रूप में पत्थर रखा हुआ था। जिसे समय-समय पर या  कुछ तीज त्योहारों पर सिंदूर से रंग दिया जाता था। मैने इस देवता के इतिहास को जानने की कोशिश की  पर  कभी  इसकी जानकारी  प्राप्त नहीं हो सकी। यदि सिंदूर ना लगा हो तो यह एक सामान्य पत्थर ही था। हां इस चौक का कोई बड़ा महत्व था तो दीपावली के समय यहां "गाय को खिलाने" के नाम पर एक कार्यक्रम हुआ करता था। शायद लंबी परंपरा से इस चौक पर यह कार्यक्रम होता चला आया है। इसीलिए खिलाने का अपभ्रंश होकर यह खिलवा हो गया। वह स्थान स्थाई रूप से  इस कार्यक्रम का स्थल  बनने से  मुठवा  यह शब्द  जुड़ गया।  इसलिए  इसका नामकरण  खिलवा मूठवा  हुआ होगा। कभी इस चौक पर ग्राम देवता के पास एक बड़ा कदम का पेड़ हुआ करता था।   मैंने केवल उसके ठूंठ को ही  देखा।  समय के थपेड़ों से बचे हुए उसके ठूँठ को बहुत वर्षों तक देखता रहा।  धीरे धीरे वह ठूँठ भी ओझल होता गया।
      इस चौक की एक और विशेषता या उपयोगिता थी।  गांव की सभी गायों को जंगल में घास चराने के लिए समूह में जंगल ले जाया जाता था। चरवाहे  गांव की सारी गायों को इसी चौक पर सुबह-सुबह इकट्ठा करते और यहीं से सारी गायों को एक साथ जंगल की ओर लेकर जाते। इसकी खासियत यह थी की 50 से 100 के बीच एक साथ गायों को ले जाने के लिए केवल  एक या दो चरवाहे होते थे। केवल वे दो ही सभी गायों पर नियंत्रण रखते थे। खासकर जंगल में जहां घास चरती हुई गाय दूर तक निकल जाती थी। वह भी अपने चरवाहे के आवाज को पहचान कर वापस आ जाती थी।  कभी-कभी लगता है की पशु मनुष्य की अपेक्षा  अधिक अनुशासित होते हैं और संवेदनशील भी। इन चरवाहों के ड्रेस कोड में कम्बल होना आवश्यक था। कम्बल भी भेड़ के बालों से हाथ से बना हुआ। इस कम्बल का उपयोग जाड़े में तो होता ही था, पर बरसात मे भी  इसको ओढ़ने से पानी कम्बल के ऊपर फिसल जाता था। बरसात के पानी से सर को बचाने के लिए पत्ते औए कमचियो का बना छाता ओढ़ लेते थे। गायों के जाने के बाद कुछ महिलाएं गोबर उठाती दिखाई देती है। इस भ्रम में न रहना की सड़क की सफाई के लिए गोबर उठाया जाता है। गोबर के कंडे बनाकर उसका ईंधन के रुप में उपयोग किया जाता था।
     गांव की जनसंख्या के हिसाब  यह चौक हमेशा चार पांच लोगों से  आबाद बना रहता है। इन लोगों की बातचीत के विषय वर्षा, पानी, ठंड जैसी मौसम की बातों से लेकर फसल, बीमारी, स्थानीय समस्याएं तो रहती है,  परंतु उसके आगे देश और प्रदेश की राजनीति के बारे में अपनी आधी अधूरी जानकारी के आधार पर ये पूरी बहस भी करते। साथ साथ भूत प्रेत से लेकर विज्ञान तक की बातें भी होती  रहती है। बातचीत में अपनी बातों के समर्थन में कबीर के दोहे,  रामायण की चौपाइयां, महाभारत की कहानियां या भागवत पुराण की सुनी  कथा कहने में इन्हें महारत हासिल रहता है। परंपरा से इनके जुबान में यह ज्ञान  बसा हुआ  है। साथ मे चिलम, बीड़ी या तमाकू के शौकीन अपना शौक भी पूरा करते रहते हैं।
       यह चौक स्टडी सर्कल, समाचार पत्र, मौसम विभाग, राजनीति से लेकर दर्शन तक की आधी अधूरी जानकारी का भदेसी केंद्र था। कुछ बुजुर्ग या बिना काम के लोग रोज ही तीन चार घंटे जमे रहते। कुछ लोग आते जाते घंटा आधा घंटा बैठ लेते।
        एक और जगह थी जहाँ मजमा लगता था। वह थी लोहार का ठिया। वह ठिया दो भागों में बंटा था। दो चचेरे लोहार परिवार के आधे आधे हिस्से में था। ये लोहार ही बढ़ई का काम भी करते। मोहल्ले के एक पंच थे , उम्रदराज,  नाड़ी  वैद्य, और पॉलिटिशियन भी । बात यदि जवाहर लाल नेहरू की निकले तो वे बताते अरे तुम का जानो जवारी लाल तो नीति वाला आदमी है।अपने बाप जैसे होशियार। वो तो जनसंघियों की भी सुनता है और समाजवादियों की भी। पर इनकी औकात को भी समझता है। बिलायत में पढ़ा है सुनता सबकी है पर करता अपने मन की है। पुराने बिलायती हाकिम अभी भी उससे सलाह लेते है। अपना पुराना बिलायती हाकिम तो संघियो और समाजवादियों को तो पहचानता तक नही।
    कुछ ताजा ताजा जनसंघी बने नए लड़के ने टोक दिया , इन्ही हाकीमो के साथ मिलकर तो नेहरू ने देश का बटवारा कर दिया। जवाब भी हाजिर रहता तेरा बाप तो पढ़ा लिखा  सातवी बोर्ड पास था ना,  जवारीलाल से थोड़ा ही कम पढ़ा लिखा होगा । वो भी तो तेरे घर का जमीन का भाई बंटवारा नही रोक पाया। ये तो युग युग से चली आई रीति है। कल के जनसंघी का जाने।
        अब राजनीति का जनाजा निकलने के बाद भूगोल  का जनाजा निकलेगा। बढ़ई चार पांच रोज से नई बैल गाड़ी बना रहा था। आज बनकर तैयार हो गई। उधर से गांव का कोटवार जाते जाते रुक कर मजमे में शामील हो गया। उसने घूम घूम कर बैल गाड़ी का मुआयना किया जैसे  उसका  हवलदार साहब किसी वारदात का मौका मुआयना करता है। "वाह क्या बैलगाड़ी बनी है, तेरे हाथ मे तो कीमिया है दयाराम। ऐसी गाड़ी में बैठ कर तो "लंदन" निकल जाओ। कोई परेशानी नही।। '' चल, निकलना है हवलदार साहब ने थाने में  बुलाया है-- ---  एक बीड़ी पिला दे दयाराम।" कोटवार बीड़ी बैलगाड़ी की तारीफ की एवज में मांग रहा था या थाने जाने की धौंस में यह तो बढई और कोटवार ही जाने।
          मनेरी जाने वाले रास्ते के एक तरफ गांव बसा है। तो सामने की ओर दृष्टि की पहुंच तक खेतो की जमीन ही दिखाई देती है। बीच बीच मे पलास और बबूल के वृक्ष, खेतों की निरंतरता में दखल देते रहते हैं। हमारे घर की दलान में बैठकर यह दृश्य आसानी से दिखाई देता है। खेतों की निरंतरता को बांधने का काम सतपुड़ा पर्वत की शाखा मैकाले की फैली हुई पहाड़ियां करती हैं। ऐसा आभास होता है कि ये। ये खेत पर्वत श्रेणियों तक अबाध रूप से फैले हुए हैं।
           आज से 40 -50 साल पहले बालाघाट जिले मैं 70 से 80 इंच औसत वर्षा होती थी। जो  मध्य प्रदेश का सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक था। बरसात के दिनों में इन खेतों में लबालब पानी भरा होता था। खेतों की छोटी मोटी मेढ़ का तो इस वर्षा में डुब जाना स्वाभाविक बात थी। दूर-दूर तक अर्थात सड़क से लेकर पर्वत श्रेणियों तक फैले हुए पानी से भरे खेतों को देखकर समुद्र का आभास हुआ करता था।  इन्हीं खेतों में प्रवासी पक्षी सारस बड़ी संख्या में देखने मिलते थे। जो खेत मे इधर उधर बैठे दिखाई देते थे, शायद कीड़े मकोड़े या मछलियों को पकड़ कर शिकार करने की ताक में रहते थे।
       सितंबर माह में अधपका धान का रंग कहीं हरा तो कहीं सुनहरा होता है।  मानो प्रकृति ने सोने का सिंगार किया हुआ हो।  जिस में  बीच-बीच में हरे नग की आभा  है। मिलों तक फैले खेतों में इस दृश्य को देखते रहना  एक मायावी अनुभूति है। धान कटने के बाद बसंत ऋतु में पलाश के वृक्षों में लगे नारंगी फूलों की अद्भुत छटा  बसंत ऋतु का आगाज करती है। हम लोग जंगल से पलाश के फूल तोड़कर उसमे से निकलने वाले एक दो बूंद शहद को चाटते।
           खेतों के पार दिखने वाली पर्वत श्रेणी के पीछे से उगते सूरज  की अलग ही आभा होती है। घर में बैठे-बैठे पहाड़ों के पीछे से उगते सूरज को गहरे लाल से धीरे धीरे भगवे होते हुए देखना एक अलौकिक अनुभूति है। यह भी मजेदार बात है कि उगता हुआ सूरज जो अपने यौवन की ओर बढ़ता है, वह भी भगवे रंग का ही होता है। और थका हुआ  यह सूर्य जब अस्ताचल की ओर डूबता होता है तब भी भगवे रंग का होता है।  मानो सूर्य उत्थान और अवसान के अद्वैत का साक्षी बन रहा हो। प्रकृति में यह भाव कई जगह दिखाई देता है। बरसात में नई कोपलो और हरी पत्तियों के साथ श्रृंगारित  यह वृक्ष बड़े साक्षी भाव से पतझड़ में इस साज श्रृंगार को छोड़ देता है ।बरसात में  उफान पर रहता नाला जिसे लांघना आसान नहीं है, वहीं नाला गर्मी में सूखकर पद दलित होता रहता है। बात चल रही थी पर्वत श्रेणियों की जो हमारे घर से बड़ी आसानी से देखी जा सकती है। मैंने कितनी बार इन पर्वतों को रंग बदलते देखा है। बरसात में वनों की हरियाली बड़ी बड़ी चट्टानों से बने पर्वत की कठोरता को बड़े नाटकीय ढंग से छिपाकर पर्वत को मनमोहक बना लेती  है। वहीं पतझड़ के बाद चट्टानों से बने पर्वत का कठोर रूप भी सामने आ जाता है। जीवन का द्वैत और अद्वैत प्रकृति में ही परिभाषित होता रहता है।
             प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ गांव का सीधा सरल व्यक्ति अध्यात्म और धर्म का सहज योग प्रकृति से ही सीख लेता है। इसलिए मैं गांव के व्यक्ति को धार्मिक मानता हूं। जबकि शहर का व्यक्ति किताबों में सुविधा के अनुसार धर्म को खोजता है और उसका उपयोग धार्मिक होने के कारण नहीं तो ईश्वर के भय के कारण अपने जीवन में करता है। शहर का व्यक्ति धार्मिक नहीं है, बल्कि धर्मभीरु है।
          पहाड़ों के साथ एक और याद जुड़ी हुई है ।गर्मी के दिनों में पहाड़ पर जब  बांस आपस में टकराते हैं तो उससे अग्नि पैदा होती है। और यह अग्नि इतना विकराल रूप धारण कर लेती है की जंगल के वृक्ष जलने लगते है।  इसे ही दावानल कहते हैं।  घर के आंगन में बैठकर शाम के धुंधलके में  पर्वत में लगी आग एक रेखा में दिखाई देती है। दूर से यह विकराल दावानल ठीक वैसा ही दिखाई देता है, जैसे किसी बड़े शहर के आने के पहले ट्रेन से शहर की स्ट्रीट लाइटों की श्रृंखला दिखाई देती है।  दावानल के साथ एक  बात और जुड़ी हुई है।  पहाड़ पर रहने वाले आदिवासी इस आग को हरे पत्तों के सहारे बुझाते हैं।  वास्तव में यदि यह आदिवासी समाज अपनी जान पर खेलकर इन  जंगलों की हिफाजत ना करें तो सारे जंगल दावानल की भेंट चढ़ जाएं
            चलो पर्वत कथा से आगे बढ़े। इन्हीं खेतों के बीच एक विशाल पीपल का  वृक्ष हुआ करता था। जो हमारे घर से 10 मिनट के पैदल रास्ते पर स्थित था। उस वृक्ष  के साथ जुड़ी भूतों की अनेक कहानियां अपने मित्रों से सुन रखी थी। शाम के समय इस वृक्ष की झूमती हुई शाखाएं सचमुच किसी दैत्य के झूलते हुए विशाल बाहों का एहसास करा देती। गर्मी के दिनों में सामान्यतया खेत सुनसान हुआ करते थे।  गर्मी की भरी दोपहरी मैं उस वृक्ष की ओर जाने की मां की सख्त मनाही थी।  परंतु जैसा कि बाल सुलभ स्वभाव  होता है,  जिस बात के लिए मना किया जाए उसी को करने की बार-बार इच्छा होती है। हम दोस्त मिलकर दोपहर को मां की आंखों से बचकर  उस वृक्ष के पास पहुंच जाते थे और किसी काल्पनिक भूत का एहसास करते हुए डर के मारे भागते हुए वापस आ जाते थे। कई बार यह भय बहुत समय तक मन में बना भी रहता।
        हमारे घर के बगल से बस्ती की ओर जाने वाले रास्ते पर थोड़ी दूर पर एक बड़ा कदम्ब का वृक्ष हुआ करता था। उस पर सफेद गुलाबी रोए वाले गोल गोल सूंदर फूल लगा करते थे।हम इन फूलों को तोड़कर अपने हाथों में सहेज के रखते थे ताकि इसका I रोए टूट ना जाए। परंतु यह सहेजने का धैर्य दो-चार मिनट ही रह पाता था। उसके बाद उस फूल को  गेंद की तरह उछाल कर खेलने लग जाते। उसके रोए पूरी तरह से झड़ जाते थे। कुछ दिनों बाद ये कदम के फूल फल  में बदल जाते हैं। उसके सुंदर सफेद रोए झड़ जाते हैं। और बचा रहता थोड़े से हरे लाल रंग का फल जो पकने के बाद खट्टा मीठा स्वाद का होता था।   लगता है कि अंदर की मिठास बढ़ानी हो तो बाहरी दिखावे को खोना पड़ता है। हम इन फलों को मजे से खाते। यह विशाल कदंब का पेड़ मेरे देखते देखते ही काल कलवित हो गया। अवचेतन  बाल मन पर नश्वरता की  एक इबारत लिख गया।
          हमारे घर के एक तरफ से एक पतली गली सोनवाने परिवार के मोहल्ले तक जाती है। उस परिवार के कुछ सदस्य हमारे स्कूल के सहपाठी भी थे।  सोनवाने मोहल्ले के गली में घुसकर  सोनवानों के घरों तक पहुंचना किसी हॉरर फिल्म जैसा ही था। पतली गालियां , उन गलियों में बंधे भैंसे, कही बीच मे धान का भूंसा, मुर्गी , बकरे तक सभी को लांघकर जाना होता।  सोनवाने परिवार के सबसे बड़े भाई के घर के पीछे बाड़ी में काफी दूर तक  घास फूस और बेतरतीब उगे मौसमी झाड़ियों के पीछे बाड़ी के अंतिम छोर पर इमली के दो बड़े-बड़े वृक्ष थे। इन वृक्षों की स्थिति ऐसी थी की पूरा वातावरण डरावना लगने लगता था।  ऊपर से इमली के वृक्षों के साथ भी भूत प्रेत की कहानियां संलग्न हुआ करती थी ।स्वाभाविक रूप से इन वृक्षों तक पहुंचना बहुत ढाढस का काम था। परंतु गर्मियों की छुट्टी में इमली खाने के मोह में  इन वृक्षों तक पहुंचने में ना तो दोपहर का सूनापन बाधक बनता था,  ना ही इमली के वृक्षों के साथ जुड़ी हुई भूत प्रेत की कहानियां ही बाधक बनती। उपर से दोपहर की गर्मी में कहीं ना जाने की मां की हिदायत भी टूट जाती। दोपहर को सोनवाने परिवार के ही साथ पढ़ने वाले एक दो साथी हमारे यहां खेलने के लिए आते रहते थे। दोपहर का यह समय , जब हमारे परिवार में मां दोपहर की नींद में होती और सोनवाने परिवार के बड़े  लोग भी या तो खेतों में काम करने गए होते हैं या खा पीकर आराम करते होते,  इमली तोड़ने का सबसे अनुकूल समय होता।  हम लोग पीछे बाड़ी में जाकर इमली तोड़कर  हमारे घर ले आते। इमली के साथ नमक का जुगाड़ भी इस सावधानी से करना पड़ता कि कोई खटपट की आवाज ना हो। और मां की नींद ना खुले इतनी सावधानी बरतने के बाद नमक के जुगाड़ का  अभियान सफल कर इमली खाने का अलग आनंद होता।  परंतु इमली खाने के बाद प्यास जरूर लगती। और इमली खाने के बाद पानी नहीं पीना यह माँ की  स्थाई  हिदायत होती। परंतु नियम कानूनों को तोड़ना यही तो बाल स्वभाव है। मैं फिर चुपचाप पानी पीने के लिए किचन में घुस जाता और पानी पीकर बाहर आता।  परंतु एक तो नमक निकालते समय और दूसरे पानी पीते समय कभी ना कभी कोई ना कोई बर्तन गिर ही जाता और मां की  नींद खुल जाती। उसके बाद मां की पुलसिया पूछताछ में कोई बहाने बाजी नही चलती। हर एक मां को बच्चे से सच उगलवाना आता है। एक तो गर्मी की दोपहरी में बाहर निकलना, दूसरे प्रतिबंधित स्थान पर जाना, तीसरे दूसरे के घर की इमली लाना , ऊपर से पानी पीना , इतने सारे अपराधों के एक साथ करने के बाद डांट पड़ेगी, या मार पड़ेगी और कितनी पड़ेगी यह इस बात पर निर्भर करता की मां का मूड कैसा है और उसे कितनी गहरी नींद से  जागना पड़ा है।
               परिवार के जीवन यापन का मुख्य साधन कृषि ही थी। इसीलिए गाय, बैल, भैंसे पालना अनिवार्यता थी।  घर में दो तीन गाय होने के कारण एक बछड़ा हमेशा अपनी मां से अलग बरामदे में  रहता था। गाय के बछड़े की विशेषता होती है की जन्म लेते ही वह चलने लग जाता है। अपनी मां के पास वह केवल दूध पीने के लिए ले जाया जाता था।    
          नवजात बछड़े को देखना,  उसका चलना सीखना,  एक-दो दिन में ही छलांग मारना,  एक कौतुक भरा दृश्य होता। उसके पीठ पर के नरम नरम रोएं पर हाथ घुमाना बड़ा अच्छा लगता। शाम को गाय के जंगल से वापस आने पर वह बच्चा जान जाता कि उसकी मां आ गई है और वह जोर-जोर से रंभाने लगता। गाय भी रंभाने लगती। प्रकृति ने गाय और बछड़े को एक दूसरे की उपस्थिति को बिना देखे जानने की अद्भुत क्षमता प्रदान की है।  गाय के रंभाने  की आवाज सुनकर बछड़ा अपनी मां के पास जाने के लिए कितना व्याकुल हो जाता,  यह उसके शारीरिक भाषा से सहज रूप से जाना जा सकता है। परंतु गाय को तत्काल बांध दिया जाता,  और बछड़े को भी तब तक बाहर तब तक नहीं निकलने दिया जाता था जब तक की गाय का दूध निकालने का समय ना हो जाए। इस बीच अपने बच्चे को मिलने के लिए व्याकुल गाय का रंभाना और बछड़े की  गतिविधियां माँ बेटे की मानवीय संवेदना से अधिक गहरी और स्पष्ट होती थी।
         गाय  का बछड़े के प्रति प्रेम और उसका उसके केयरिंग नेचर की बानगी दीपावली के समय देखने मिलती थी। दीपावली के समय सामने चौक पर एक खेल का आयोजन होता। जिसे गाय खिलाना कहते हैं।  दोपहर के समय गांव के लोगों का जमावड़ा शुरू हो जाता।  और उसी समय नवजात बछड़े वाली गायों को भी बच्चे सहित लाया जाता।  गायों को रोज घास चरने के लिए  जंगल ले कर जाने वाले चरवाहे द्वारा किसी एक गाय और उसके बछड़े को अपने पास लाया जाता। चरवाहा बछड़े को पकड़ता और धीरे धीरे उस पर आक्रमण का अभिनय करता।  चूंकि चरवाहा गाय का परिचित होता, इसलिए शुरू में तो गाय  शांत रहती।  परंतु जैसे-जैसे चरवाहे का बछड़े के ऊपर आक्रमण का अभिनय तेज होता जाता, गाय अपने बछड़े को बचाने के लिए चरवाहे पर आक्रमण करना शुरू कर देती। इस खेल में गाय के आक्रमण से कई बार चरवाहे के शरीर से खून भी निकलने लगता।  परंतु चरवाहा इस पूरे अभिनय में स्वयं गाय से मार खाता पर बछड़े को जरा भी चोट नहीं लगने देता था। इस खेल की विशेषता यह होती थी कि चरवाहा जितना अधिक गाय को आक्रमण के लिए उत्तेजित कर सके उतनी खेल की सफलता होती।  इस प्रकार गाय और नवजात बछड़े की तीन चार जोड़ियों के  अलग-अलग करतब  होते। इस खेल में चरवाहा जितना अधिक मार खाता या घायल हो जाता  उतना ही उसे और दर्शकों को भी आनंद आता।  गाय और बछड़े के बीच के इस अद्भुत प्रेम में चरवाहा इतना एकाकार हो जाता कि उसे अपने कष्टों का ख्याल ही नही रहता।
     @घर के पीछे की ओर एक कुंआ  था। उस कुएं के आसपास आम, केले, चंपा, जाम, गुलहड़, जामुन, आदि के  वृक्ष  हुआ करते थे। उस कुएं से गांव के लगभग एक तिहाई परिवार रस्सा बाल्टी से पानी भरते थे। जिससे बहुत सा पानी बेकार बह जाता था। कुए के पास ही कपड़े धोने, नहाने, और बर्तन मांजने की व्यवस्था थी।  इस काम में भी बहुत सा पानी वह जाता था। परंतु इस सारे पानी को बेकार नहीं होने देते थे,  बल्कि यह सारा पानी इन्हीं वृक्षों को और अन्य पौधों को मिल जाता था।  इस प्रकार गांव में पानी के रीसाइक्लिंग की स्वाभाविक व्यवस्था  होती थी।
      लो! मैं भी कहां विज्ञान की धीर गंभीर बातें ले बैठा। मेरा मन तो अभी घूम रहा है,  गांव , घर, बाड़ी, आंगन, खेत, खलियान, गली,  चौबारे में जहां मेरा बचपन डोला करता था। तो बात चल रही थी कुएं के आसपास लगे आम चंपा जाम आदि के पेड़ों  की। उन पेड़ों  पर  पक्षियों के घोसले हुआ करते थे। उनमे कव्वे के घोसले ही अधिक होते थे।  चिड़िया, गोरैया के घोंसले सामान्यतया दालान की छत के नीचे  लगी बड़ी -बड़ी लकड़ियों के पीछे हुआ करते। इन्ही चिड़ियों की चहचहाट से गांव के सुरमई सुबह की शुरुआत होती।  हमारे घर के सामने चौक पर जंगल जाने वाली गायों का सुबह से जमावड़ा होता। सुबह गाय की घंटियों की ताल और उनके रंभाने की आवाज, चरवाहे की जोर-जोर से गायों को दिए जाने वाले दिशा निर्देश के आवाज के रहते किसी अलार्म की जरूरत नही होती। इस बीच में कव्वे की कांव-कांव भी सुनाई देती।  इन सारी मधुर आवाज के बीच में कव्वे की कांव-कांव इतनी बुरी भी नहीं लगती।  या कह सकते हैं की सुबह की मधुरता को बढ़ाती ही थी।**********
     सतपुड़ा की पर्वतमाला के पीछे की लालिमा उगने वाले सूरज के स्वागत में क्षितिज पर गेरुआ कालीन बिछा देती। कुछ क्षणों में ही धीरे धीरे सूर्य भगवान अपनी राजसी चाल के साथ  शैने शैने ऊपर की ओर बढ़ने लगते। गांव का सीमित जीवन भी यथार्थ में कितना असीमित है और शहर का तथाकथित असीमित जीवन कितना सीमित है।
   गांव के लोग सामान्यतया  सूर्योदय के पूर्व ही अपनी शौच आदि क्रियाओं से निपट कर निवृत्त हो चुके होते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी होता हो कि  घरों में शौचालय नहीं होने के कारण शौच के लिए बाहर खेतों में जाना होता था। अंधेरे में सूर्योदय के पूर्व शौच से निपट जाना लाजमी था। गायों के जंगल के लिए प्रस्थान के बाद यह चौक खाली हो जाता था।  फिर धीरे धीरे धीरे यहां गांव के लोगों का जमावड़ा शुरू हो जाता है।  कुछ महिलाएं और पुरुष गाय जाने के बाद गोबर इकट्ठा करने का काम करते जिसका उपयोग कंडा बनाने के लिए किया जाता। कंडा यह उस समय गांव के लिए लकड़ी के बाद ईंधन का मुख्य स्त्रोत था।
       कुछ लोग जमावड़ा लगा कर गपशप करते देखे जा सकते थे। लगभग  घंटे भर तक चलने वाली इस चर्चा में मोहल्ले परिवार से लेकर दीन दुनिया तक, धर्म से लेकर राजनीति तक,  का प्रथम सत्र प्रारंभ हो जाता। समाचारों के दुनिया की यह ग्रामीण बानगी सुनने लायक होती। जिस उत्साह एवं रोचकता के साथ यह सिलसिला चलता कि उस जमावड़े से तब तक उठने की इच्छा ही नहीं होती जब तक की घर से किसी की पुकार ना सुनाई दे। बात का सिलसिला किसी के घर में खरीदी गई नई बैल जोड़ी या किसी के घर में चल रही है रिश्ते की बात , किसी के घर में बीमारी की खबर से लेकर चीन और पाकिस्तान तक के समाचार का  यह सिलसिला  अपनी ग्रामीण किस्सा गोइ के साथ चालू रहता। उसमें यदि कोई व्यक्ति गोंदिया बालाघाट या नागपुर से ताजा आया हो तो वह बातचीत का हीरो बन जाता। मोहल्ले, ग्राम पंचायत से नेहरुजी गांधीजी तक किसी भी विषय पर बात हो सकती थी।
       विचारों के घोड़े बड़े तेजी से दौड़ते हैं मन की गति और भी तेज है। क्षण में मन कहीं से कहीं पहुंच जाता है। परंतु हमारा अवचेतन मन जो हमेशा वर्तमान में जीता है मन को वापस सही समय पर  सही स्थान पर ला ही देता है। इसीलिए तो वर्तमान हमारे हाथों में रहता है।  अन्यथा हम भूतकाल के विचारों से वापस नहीं आ पाते। खैर मेरा मन भी गांव घर गली चौबारा से वापस वर्तमान में ट्रैन के अंदर आ जाता है।  ट्रेन की खिड़की से झांक कर देखा तो बड़ी-बड़ी चट्टानों वाली पहाड़ी दिखाई दे रही थी।  साथ में बिना मेढ़ वाला तालाब भी दिखाई देने लगा था। पटरी के दोनों ओर करीने से लगे हुए बांसों के ढेर अब दो चार मिनट में आमगांव रेलवे स्टेशन आने की पूर्व सूचना दे रहे थे। व्यक्ति अपने स्वभाव से कितना बंधा होता है। अब रेलवे स्टेशन आने वाला है,  यह सोच कर अपने घुटने पर रखें थैले को थोड़ा और नजदीक खिसका लेता हूं । अभी तक दिमाग में एक बात चल रही थी की आमगांव रेलवे स्टेशन कब आएगा? आदमी का स्वभाव ऐसा विचित्र है की वह एक समस्या से निदान नही  पाता है तो दूसरी समस्या की ओर उसका ध्यान चला जाता है।  वास्तव में हमारे साथ समस्याएं  लगातार बनी रहती है।  इसीलिए जीवन जीने  का आनंद है। समस्याएं समाप्त हो जाए तो जीवन का कोई वजूद नहीं रहेगा।  आमगांव रेलवे स्टेशन के नजदीक आते ही अब मन दूसरी समस्याओं की ओर मुखातिब हो जाता है। आमगांव रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद लांजी के लिए बस पकड़ना पड़ेगा।  ट्रेन आधा घंटा विलंब से चल रही है कहीं बस वाला समय पर बस छोड़ ना दे। मन को तसल्ली देता हूँ कि बस वाला आधा घंटा तो प्रतिक्षा करेगा ही। यदि बस छूट गई तो दूसरी बस के लिए दो घंटे रुकना पड़ेगा। यह भी हो सकता है कि कोई जीप वाला मिल जाए। यदि कोई जीप वाला ना भी मिला तो कोई मोटरसाइकिल वाला मिल सकता है।  अब गांव में भी मोटर साइकिल वाले हो गए हैं। यदि ऐसा हुआ तो मैं बस की झंझट से बच जाऊंगा। यात्रा के समापन का समय जैसे-जैसे नजदीक आता है, वैसे वैसे समय की गणना दिन से घंटों में, घंटों से बदलकर मिनटो पर आ जाती है।  एक एक मिनट भी भारी पड़ने लगता है।  मनुष्य की उम्र कितनी भी हो जाए परंतु उसके अंदर बालपन के बहुत से अवशेष बचे रहते हैं। यात्रा के समय की अधीरता भी बालस्वभाव का ही एक गुण है।  यह सच है कि मनुष्य अपनी मर्यादाओं के  कारण अपनी बाल सुलभ प्रवृत्ति को उजागर नहीं करता।  परंतु जहां उजागर करने से कोई मर्यादा टूटती नहीं दिखती है तो वहां उस बाल सुलभ प्रवृत्ति में जी कर कितना सुख पाता है,  इसकी अनुभूति तो केवल उसी समय होती है।
        इन्हीं विचारों के बीच आमगांव का प्लेटफार्म आ गया। अन्य यात्रियों के साथ मैं भी यात्री जन्य मानोभाव के अनुसार आपाधापी के साथ, (जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी,)  ट्रेन से नीचे उतरा । पटरी क्रास करके बुकिंग ऑफिस के बगल से देखने लगा, शायद उस मैदान में बस खड़ी होगी। परंतु वह मैदान खाली था। फिर मेरी नजर पीपल के उस बड़े वृक्ष की ओर गई जहां कभी-कभी बस रुक जाया करती है। परंतु वहां भी बस नहीं थी। एक अंतिम प्रयास के रूप में मैंने फिर नजर घुमाई कि कहीं कोई जीप दिख जाए ।परंतु आशा की अंतिम किरण भी समाप्त हो गई। अब बस के इंतजार के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था।
        ऐसे इंतजार के समय चाय की अनायास याद आ जाती है।  मैं चाय की टपरी की ओर जाने लगा। चाय की दुकान के पास कुछ यात्री बैठे हुए बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं उन यात्रियों को ध्यान से देखने लगा शायद लांजी का कोई परिचित व्यक्ति दिख जाए। परंतु मैं यहां भूल गया कि आने जाने वाले यात्रियों में लांजी के तीसरी पीढ़ी के लोग ही ज्यादा है।  जिनको ना तो मैं पहचान पाऊंगा और ना ही वें मुझे पहचान पाएंगे।  फिर भी मैंने एक व्यक्ति से पूछ लिया बस कब तक आएगी?  उसने बड़े निर्विकार भाव से जवाब दिया पता नहीं कब तक आएगी।  फिर दूसरे व्यक्ति ने जवाब दिया की एक आध घंटे में आ सकती है।  गांव के एक आध घंटे का मतलब 2 घंटे भी  हो सकता है।  गांव की घड़ी ऐसे ही आराम से चलती है। खैर, मैं और ध्यान से यात्रियों को देखने लगा।  इन चालीस वर्षों में कितना परिवर्तन हो गया।  पहले यात्रियों में से  80% लोग कपड़े की गठरी लिए हुए होते थे।  कुछ लोगों के पास कपड़े का थैला  दिखाई देता ।सूटकेस लेकर यदि कोई व्यक्ति है  तो समझ लो  वह  लांजी का  नहीं है।  कहीं बाहर से आया है । परंतु अब  मैं देख रहा था  80% लोगों के पास  चमड़े या रेगजीन के बैग है। थैला  तो केवल दो चार  व्यक्तियों के पास ही था। गठरी नाम की चीज शायद कालातीत हो चुकी थी।  अब गांव सचमुच छोटे शहर बनते जा रहे हैं।
            अंततः मैं चाय की टपरी में घुस गया। घुस क्या गया टपरी के बाहर लगी हुई बेंच पर  जा बैठा।  मैंने टपरी पर नजर घुमाई,  टपरी में 50 साल में कोई अंतर नहीं आया। काउंटर नुमा टेबल के उस पार बैठा मालिक था।  हां एक परिवर्तन तो साफ-साफ था कि अब पुराने सेठ की जगह उसका लड़का माथे पर वैसा ही बड़ा तिलक लगाएं बैठा हुआ था,  ठीक अपने पिता की तरह।  टेबल के बगल में एक और टेबल था,  जिस पर कांच का तथाकथित  शोकेस रखा था।  जिसमें दो चार समोसे, दो चार आलू चाप,  कुछ मिक्सर रखा हुआ था। टेबल के ऊपर सस्ते वाले  ब्रेड के  छोटे छोटे पैकेट रखे हुए थे।  शोकेस के टूटे हुए कांच को जोड़ने के लिए बाकायदा कागज चिपके हुए थे। शो केस की सफाई का यह हाल था कि उसके धुंधले काँच से झांक कर आलू चाप, या समोसे,  या मिक्सर को देखने के लिए काफी प्रयास करना पड़ता था। इसी बीच में चाय वाले का नौकर आकर पूछने लगा क्या लाऊँ। कस्टमर से साहब, या बाबू जैसे संबोधन  के साथ बात करने की उसे कभी जरूरत ही महसूस नही हुई। मैं जानता हूं यह नौकर छोटू है। 50 साल पहले तो उसको छोटू कहना ठीक लगता था। परंतु 50 साल बाद भी वह छोटू बड़ा नहीं हो पाया।  उसका जवान मालिक भी अब तक उसको छोटू  कह कर ही बुला रहा था। नाम की बात छोड़ो परंतु यह सच है कि आज भी गरीबी में जीने वाले लोगों के लिए छोटू बने रहना यह परिस्थिति जन्य अभिशाप स्वाभाविक रूप से भुगतना पड़ता है। गावँ में एक कहावत है धन बदले तीन नाम परस्या, परसु, परसराम। छोटू के लिए नाम बदलने लायक स्थिति कभी नही आई। अन्यथा वह भी छोटू से छोटेलाल तो हो ही गया होता। हां  तो  मुझे  छोटू ने  जैसे ही  पूछा,  मैंने उसको  प्रतिप्रश्न किया  की गरम क्या है ।  उसने  उस शोकेस की ओर  तर्जनी  उठा कर  कहा  की  गरम तो  नहीं है पर  समोसा आलू चाप  ताजा है । चाय भी  रेडी है।  अभी-अभी बनाया हूं।   असल में  किसी  कानून की किताब में  या  संविधान में  ताजे  की  कोई परिभाषा  या  समय सीमा  नहीं दी हुई है। इसलिए  सुबह से लेकर  1 घंटे पहले तक बने  समोसे को भी  बेहिचक  ताजा  कहने का वैधानिक अधिकार  होटल वाले को  मिला हुआ है।  मैंने  चाय मंगाई  चाय पीने का और एक कारण था  कि मुझे दो रुपये में  चाय के साथ  आधा घंटा  बेंच पर बैठने का  अधिकार भी  मिल  जाएगा।
      काउंटर के पीछे पुराने होटल मालिक का फोटो लगा हुआ था। जिसे मैं अच्छी तरह पहचानता था। फ़ोटो पर माला चढ़ी हुई थी। इसका मतलब था की अब पुराना मालिक नहीं रहा।  सामने बैठा हुआ लड़का पूरे  मालिकाना अधिकार के साथ होटल में बैठा हुआ है। पुराने मालिक से चाय पीते पीते दो चार वाक्यों की बातचीत हो जाती थी। मैंने इस लड़के से भी बातचीत करने की शुरुआत की। पूछा भैया लांजी की बस कब तक आएगी।  पुराना मालिक इसके जवाब में छोटू को बुलाकर पूछता लांजी की बस कब गई। अगर छोटू ने कहा कि 2 घंटा हो गया तो पुराना मालिक जवाब में बताता कि 1 घंटे में बस आ जाएगी।  परंतु इस लड़के ने सपाट चेहरे से उत्तर दिया मुझे नहीं मालूम।  मैं सोच रहा था पुराने और नए पीढ़ी का अंतर जिसको हम प्रोफेशनलिज्म कहते हैं , केवल शहरों नहीं आया है तो आमगांव की इस चाय की टपरी तक भी पहुंच गया है।  एक बात और है, पहले मेरे जैसे कुलीन कहे जाने वाले लोग होटल में बहुत कम आते थे।  और जो आते थे उनके साथ होटल का पुराना मालिक केयरिंग नेचर के साथ बातचीत कर लिया करता था।  परंतु अब तो कुलीनो की संख्या इतनी बढ़ गई है की होटल वाला भी कितने लोगों की केयरिंग करेगा। आज के तेजी से बदलते परिवेश में यह कहना बहुत कठिन है कि हमारे विचारों के कौनसे गणित सही है और कौन से गलत। शायद इसीलिए जीवन का मार्ग चुनना भी कठिन है। यही कारण है जो भी रास्ता दिखता है, उसमें से निकल जाने की एक अनचाही होड मची हुई है।
         सामने बैठे हुए यात्रियों के बीच कुछ हलचल दिखाई दी। ऐसा लग रहा था की बस के आने का कोई संकेत इन लोगों को मिल गया।  मैं भी बेंच  से उठ कर यात्रियों की तरफ जाकर बात करने लगा। पूछताछ के बाद पता चला की बस आमगांव बाजार तक आ गई है। इसका मतलब अभी और 20 मिनट बाकी है।  पुनः बैठे हुए प्रतीक्षारत यात्रियों पर नजर घुमाई।  परंतु अब भी मुझे कोई परिचित चेहरा दिखाई नहीं दिया। थोड़ी देर बाद बस आने वाली थी। मैं भी अपना छोटा सा थैला लेकर खड़ा हो गया।  मानो अगर बैठा रहा तो शायद बस मुझे छोड़कर चली जाएगी।  आदमी की कितनी उम्र हो जाए,  कितना भी पढ़ लिख जाए,  परंतु एक यात्री की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाता।   जिंदगी के खेल का यही मजा है।
     अंततः बस आ ही गई। यात्री बस में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे। हालांकि बस खाली थी और चढ़ने वाले सीमित संख्या में थे। फिर भी बगैर धक्का-मुक्की के कोई काम करना भारतीय  कानून के खिलाफ था।
           मैं भी सबसे अंत मे बस मे चढ पाया। एक नजर बस में दौड़ाई 5 सीटें अभी भी खाली थी। मैंने बगल बैठे एक यात्री से बात शुरू करने के लिए पूछा कहां तक जा रहे हो।  लांजी तक जाना है कहकर वह चुप हो गया। मैंने भी बात जारी रखने की कोशिश बंद नहीं की।  मैंने बताया की मैं भी लांजी जा रहा हूं। निमटोला जाना है। फिर अपना सरनेम भी बताया। पर सामने वाले ने कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी। मैं भूल गया था की हमारे नाम की धमक अब समाप्त हो गई है।  इस नई फिजा में लांजी का वीआईपी परिवार एक सामान्य परिवार के हैसियत का हो गया है।  अपनी जमीन छोड़ने के बाद व्यक्ति  अपने ही लोगों से कैसे दूर जाता है इसका यह एक कड़वा अनुभव था। फिर भी अतीत से तो जुड़ने मोह छूटता नही है।
       मैं तब 8 या 9 वर्ष की आयु का रहा हूंगा। पूरे मध्यप्रदेश में या शायद देश के कई भागों में कालरा की जान लेवा बीमारी का प्रकोप आया। गांव में न तो स्वास्थ्य सुविधाएँ थी , न लोगो के पास धन ही था। मेरे मोहल्ले में ही ,जो 30 , 40 घर का था, पांच छह लोगों की मृत्यु कालरा से हुई। मेरे बाल मस्तिक के लिए यह एक नया और भयावह अनुभव था। मृतको में मेरा एक सहपाठी भी था। तब तक एक भ्रम था कि मृत्यु बुढापे के बाद ही आती है। परन्तु अपने सहपाठी की मृत्यु को देख कर यह भ्रम टूट गया। मैं बहुत दिन तक सदमे से या मृत्यु के भय से बाहर नही आ पाया।
      संभवतया 1961 की बात थी। उस वर्ष पूरे देश मे अभूतपूर्व वर्षा हुई थी। देश मे कुछ स्थानों पर आदमकद पत्थर की  मूर्तियां भी बाढ़ में बह गई थी। हमारा क्षेत्र अधिक वर्षा का क्षेत्र था। हमारे गाँव के पास लगा हुआ एक बड़ा तालाब था। उस बाढ़ में तालाब की मेढ़ का  एक हिस्सा टूट गया। पानी हमारे गॉंव में घुस गया। हमारा घर पक्का था और ऊंचाई पर था। मोहल्ले के सब लोग जिनका घर नीचे था शाम तक हमारे घर मे इकट्ठा होने लगे । 100, 150 लोग रहे होंगे। सब लोगों ने पूरी रात भूखे प्यासे बिताई। छोटे बच्चों के लिए जैसा बन पड़ा खाने की व्यवस्था की गई।
      पशुओं के रहने के लिए जो घर बनाये जाते है वे या तो बांस के या मिट्टी की पतली दीवार के होते हैं।  इस आशंका से कि घर गिरा तो पशु दब जाएंगे , पशुओं को घर मे नही रखा गया ।बाहर खुले में बरसते पानी मे बांध दिया गया था।
       इधर गांव के सभी जवान लोग सीमित सरकारी अमले के साथ तालाब के टूटे  बंध को बांधने में लगे थे। यह कहना मुश्किल था कि रात में कितनी बाढ़ बढ़ेगी और कैसे हालात का सामना करना पड़ेगा। हरेक व्यक्ति अपने अपने हिसाब से मकानों के टूट जाने से लेकर  पशुओं के बह जाने के साथ मनुष्य की जान जाने तक की  कल्पनाएं कर रहे थे।  मैं भी उन कल्पनाओ में डूबा हुआ रात भर भय से माँ की गोदी में सिर छुपा कर लेटा रहा। बच्चे के लिए अंततः मा की गोद ही सुरक्षित होती है।  पूरी रात तनाव और भय को कम करने का एक ही साधन था, भजन और राम नाम का जाप। बाकी महिलाएं और बुजुर्ग वही कर रहे थे । सब जवान और अधेड़ तो तालाब की टुटी मेढ़ को बांधने गए हुये थे।
      पूरी रात की मेहनत के बाद तालाब के मेढ़ को बांधने में सफलता मिली। एक बड़ा हादसा होते होते टला। सुबह हम लोग बाहर निकले तो देखते हैं कि पूरे गांव की सडक और आंगन घुटने भर पानी मे डूबे थे। कुछ घर आंषिकरूप से क्षतिग्रस्त भी हो गए थे। दो चार बूढ़े पशु रात भर वर्षा और ठंड के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।
    इसी समय दो वर्ष बाद भयंकर अकाल  पड़ा। जहां पानी के साधन थे वहां थोड़ी बहुत फसल तो हुई। परंतु तालाब के पानी के लिए किसानों के बीच आपस मे डंडे चलना स्वाभाविक बात हो गई थी। उसमे भी मजदूरों की हालत बहुत खराब थी। किसानी के छोड़कर मजदूरी का कोई साधन नही था। और किसान स्वयं त्रस्त थे।
      उस समय सरकार ने राहत कार्य चलाये थे। परंतु मजदूरों की सँख्या के हिसाब से ऊंट के मुंह में जीरा ही था। ऐसे समय मे सम्पन्न किसानों ने अपने खेत के छोटे तालाबो के किनारों को मजबूत करने और खेत के मेढ़ के पुनर्निमाण जैसे कामो में अपना धन लगाया इससे भी मजदूरो को बहुत राहत मिली। परंतु सबसे बड़ी राहत तो प्रकृति ने दी। उसी वर्ष बांस में फल लगे थे , कहते है 40 वर्ष में एक बार बांस में फल लगते हैं।  और उस वर्ष अकाल भी पड़ता है। बांस का जंगल गॉंव से लगा हुआ था। बांस के फल का आकार गेहूं के जैसे होता है। इसकी रोटी बनती है। लोग सुबह उठकर जंगल जाते और नीचे गिरा हुआ बांस का फल इकट्ठा कर ले आते। एक व्यक्ति एक बार में इतना इकठ्ठा कर लेता था कि उसे तीन चार दिन की रोटी की चिंता नही करनी पड़ती। एक मान्यता थी कि बांस के स्वाभाविक तरीके से नीचे गिरे फल को ही उठाना चाहिए । बांस के ऊपर लगे फलों को कोई तोड़ता नही था। यह मान्यता कितनी समतावादी थी कि इससे कोई बांस के फल को बड़ी मात्रा में संग्रहित नही कर सकता था। मेरे अधिकांश साथी इसी मजदूर वर्ग के थे, तो मुझे भी बांस के फल की रोटी चखने का अवसर मिला। मैं स्वयं अपेक्षाकृत सम्पन्न किसान परिवार से था। हमने अकाल की भयावहता को उतनी शिद्दत से महसूस नही किया , जितना मजदूर परिवारों को या सीमांत किसानों को करना पड़ा। मैने अपने मित्रों को कई बार भूखे सोते देखा। कुछ सहपाठियों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। सीमांत किसानों के साथ तो दोहरी जिम्मेदारी थी, स्वयं का परिवार और साथ मे पशुओं के पेट की व्यवस्था। गांवो में इस अकाल का प्रभाव दो तीन वर्षों तक मजदूर और किसानों पर रहा।
       हमारे घर से प्राइमरी स्कूल डेढ़ किलोमीटर था। रास्ते मे एक तालाब पड़ता था। तालाब से थोड़ा आगे एक बांस के झाड़ का झुंड था। उसके आगे देशी शराब की दुकान थी। उस दुकान का ठेकेदार बड़ी बड़ी मूंछो वाला ऊंचा स्वस्थ रोबदार व्यक्तित्व वाला था। शाम को स्कूल से वापसी के समय देशी ठेके की दुकान पर थोड़ी रौनक शुरू हो जाती। झूमते हुए एक दो व्यक्ति दिख जाते। हम लोग  घूमकर दूरी बनाकर दौड़ते हुए उस स्थान को पार करते।
         गॉंव में तब तक प्रायमरी स्कूल में विद्यार्थियों के बीच जूता चप्पल पहनने का स्वभाव नही था। मुझे याद नही कि उस समय जूता चप्पल की दुकान गांव में थी या नही। हाँ गांव का मोची गांव के ही मरे पशुओं के चमड़े से जो जूते चप्पल बनाता वही गांव के लोग पहनते थे। कुछ सफेदपोश गोंदिया या बालाघाट से चप्पल खरीद लेते। हम लोग नंगे पांव ही स्कूल जाते। स्कूल से तालाब तक तो कथित रूप से सड़क थी। परंतु सड़क से तालाब की मेढ़ पर चढ़ने के लिए बीच मे एक बड़ी नाली या छोटा नाला पार करना पड़ता था। बरसात में तो घुटने भर से ज्यादा पानी होता। हाफपैंट को ऊपर कर नाला पार करते। यदि अधिक बरसात हुई तो पानी बढ़ जाता था। हालांकि एक दूसरा रास्ता भी था । परंतु उस दिन तो छुट्टी कर ही लेते। पर दूसरे दिन के लिए मां की हिदायत रहती कि आज वापस नही आना , दूसरे रास्ते से स्कूल जाना।
     बांस के झुरमुट के पास से जाते समय बांस के कांटे पैरो में न चुभ जाए। इसका ख्याल रखना पड़ता। बांस का कांटा बड़ा और नुकीला होता है। एक तो उसे खींच कर निकालना कष्ट दायक होता, घर जाने के बाद उसमें इन्फेक्शन न हो जाए इसके लिए मां सरसों तेल की बाती को जलाकर उससे गरम तेल की बूंदे उस स्थान पर डालती, उसका कष्ट अलग। यह गांव का एन्टी टिटेनस था। कभी लोहे का खिला भी चुभ जाए तो यही प्रयोग किया जाता था।
    सूखे दिनों में धूल से पांव सन जाते। स्कूल के पास पहुंचकर बेशरम के पत्तों से पावों की धूल को साफ कर लिया करते। बरसात में तो जगह जगह डबरों में पानी भरा रहता। कीचड़ के पांव धोने के बहाने पानी मे खेलने का मजा ही अधिक होता। स्कूल के सामने एक महिला कुटकी (एक जंगली अनाज) के गुड़ से बने लड्डू बेचती। उस समय इस अनाज की कोई कीमत नही होती। आज तो मिलेट के रूप में यह अनाज चावल से अधिक महंगा हो गया। घूरे के भी दिन फिरते है। पहले "कोदो कुटकी खा कर जिंदगी बिता रहे है" कहना बहुत गरीबी को व्यक्त करने वाली कहावत थी। अब यही अनाज सबसे महँगा हो गया। हाँ तो बात लड्डू बेचने वाली महिला की चल रही थी। उसके विषय मे विद्यार्थियों के बीच यह बात कही जाती थी  कि वह जादू टोना जानती है। बावजूद इसके सभी उसी के पास के लड्डू खरीद कर खाते। एक बात थी कि उस काल मे भी मेरी माँ कहा करती यह जादू टोना कुछ नही है। कोई सामान्य व्यक्ति मंत्र तंत्र से किसी को परेशान कर सकता तो कोई कुछ भी कर लेता। माँ पढ़ी लिखी इतनी ही थी कि उसको अक्षर ज्ञान था। रामायण आदि धार्मिक ग्रंथ ,और समाचार पत्र पढ़ती थी।
परंतु उसके तर्क सहज बुद्धि जन्मे ,  बिना पूर्वाग्रह के होते। यदि कोई नेहरूजी की आलोचना करता तो उसकी सरल मान्यता होती कि "छोटा सा परिवार  चलाने में तो "त त ब ब" हो जाती है। वो आदमी तो पुरा देश चला रहा है।" पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सोचने का थोड़ा स्वभाव मुझमे माँ से ही आया। हमारी आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी, ऊपर से छह भाई बहनों का परिवार, और माँ का स्वयं विधवा होना, उसके बावजूद चीन के युद्ध के समय उसने सरकार के आव्हान पर सोना दान किया था। केवल यह सोचकर कि सैनिको की जान के सामने तो यह तुच्छ है।
    पीछे चले! बात स्कूल की चल रही थी।
मेरे मंझले भाईसाहब उसी स्कूल में शिक्षक थे। एक तो गॉंव का थोड़ा पढ़ा लिखा परिवार था हमारा, दूसरे भाई साहब का शिक्षक होना। स्वाभाविक रूप से मेरे ऊपर सभी शिक्षकों की निगाह रहती। जिसका लाभ तो था, परंतु एक हानि भी थी, मैं उन्मुक्त होकर बाकी साथियों जैसे बिंदास व्यवहार नही कर पाता।
       मैं पांचवी कक्षा में पहुंच गया था। यह बोर्ड परीक्षा का साल होता था। हमारे क्लास टीचर दुरुगकर सर थे। वहीं हमारे गांव के पास के रहने वाले। औसत से ज्यादा ऊंचाई, छरहरा बदन, नेट पर वालीबाल के अच्छे खिलाड़ी थे। उस समय
लांजी की वालीबाल टीम बहुत अच्छी थी।
सरल स्वभाव के बहुत सीधे थे। बोर्ड परीक्षा की क्लास होने के बावजूद विद्यार्थियों को मारते नही थे। बोर्ड परीक्षा की क्लास अच्छे पढ़ाने वाले शिक्षकों को ही दी जाती थी। दूसरी बोर्ड क्लास आठवी की थी। जिसके शिक्षक मेरे बड़े भाई साहब थे।
शहरों आज के ट्यूशन के द्वारा धन अर्जित करनेवाले शिक्षकों को मैं देखता हूँ तो मेरे उन शिक्षकों के सामने मेरा सिर श्रद्धा से नत हो जाता है। दुरुगकर सर नवंबर से एक्स्ट्रा नाईट क्लास स्कूल में ही लेते। हम लोग रात का खाना 7 बजे खाकर डेढ मिल पैदल पुनः रात 8 बजे स्कूल पहुंच जाते। सर भी स्कूल से घर जाकर पुनः रात को 8 बजे स्कूल वापस पहुंच जाते। उस समय गांव में इलेक्ट्रिक नही थी। एक गैस लैंप का इंतजाम होता। और रात ग्यारह बजे तक पढ़ाई होती। रात के अंधेरे में एक डेढ़ किलोमीटर पगडंडी नुमा रास्ते से घर जाना संभव नही था। रात को साँप बिच्छू का भय बना रहता था । इसीलिए हम सब लोग रात को पैरा
बिछाकर स्कूल में ही सो जाते। सुबह उठकर घर आते। हमारे शिक्षक चाहते तो रात को साइकिल से घर जा सकते थे । परंतु वे भी रात को हमारे साथ ही रुकते। हम फिर 11 बजे से स्कूल की रेगुलर क्लास में पहुंच जाते। सर एक एक विद्यार्थी की तैयारी को देखते। मुझे याद है उस वर्ष हमारी कक्षा के सभी विद्यार्थी पास हो गए। पूरे जिले में हमारे स्कूल का रिजल्ट सबसे अच्छा था। नमन ! ऐसे शिक्षकों को जो अपनी मेहनत से एक सेमिट्राइबल गांव में  शिक्षा के मिशन को इतनी मेहनत से सफल कर रहे थे।
      मैं पढ़ाई में साधारण से ऊपर ठीक ठाक विद्यार्थी था। बहुत मेहनती भी नही। परंतु हमारे शिक्षक की मेहनत का परिणाम था कि मेरा भी बोर्ड परीक्षा के आधार पर स्कॉलरशिप के लिए चुनाव हुआ। मेरे पूरे परिवार को पहली और आखरी बार ऐसी खुशी मैं दे पाया। आज मैं पूरी ईमानदारी से कह सकता हूँ कि इसका श्रेय दुरुगकर सर को ही जाता है।
     इस शाला में 8वी तक ही कक्षा थी।  उसके बाद छठवीं के लिए भाई साहब ने मेरा प्रवेश दुसरे स्कूल में करा दिया, जहाँ पर हायर सेकंडरी तक की पढ़ाई होती थी।
यह स्कूल घर से तीन किलोमीटर दूर था। अब रोज 3 किलोमीटर दूर पैदल ही जाना होता। छठवीं से एक परिवर्तन आया कि अब मैं चप्पल पहनकर स्कूल जाने लगा था। यह स्कूल जंगल से लगा हुआ था। पहले वाले स्कूल में तो लगभग सभी शिक्षक स्थानीय आसपास के गांवों के थे। परंतु इस स्कूल में दूर दूर के
दूसरे प्रांत के शिक्षक भी थे।
कुछ शिक्षक जो हाई स्कूल में पढ़ाते थे वे उत्तर प्रदेश के भी थे। कुछ सागर ग्वालियर के भी थे। इन शिक्षकों के लिए यह जंगल खेत खलिहान अजूबा होता, वे स्कूल के बीच की छुट्टी में जंगल मे घूमने का आनंद लेते। गन्ने के खेतों में जाकर गन्ने का आनंद लेते। परंतु स्थानीय शिक्षकों के लिए यह सब रोज की बाते थी। यह भी एक सामान्य मनोविज्ञान है कि जो सहज उपलब्ध होता है उसकी कीमत नही होती , जिनको वही चीज सहज  उपलब्ध न हो तो वह उसकी उपलब्धता का आनंद उठाता है। परंतु हम
विद्यार्थियों के लिए  जंगल घूमने की अलग ही बात है, हम लोग "चार" फल (जिसके बीज से चिरौंजी बनती है) और तेंदू फल(जिसकी पत्तियों से बीड़ी बनती है) खाने  के लिए और आम के सीज़न में आम खाने के लिए जंगल जाते। यद्यपि वह जंगल अब बिरला हो गया है। दूर तक बसाहट हो गई है।
      स्कूल के पास ही ब्लॉक आफिस था। जहाँ कचरे के ढेर में टाइप राईटर में उपयोग के बाद कार्बन फेंक दिए जाते थे ।
हम लोग वहां से कुछ ठीक ठाक कार्बन उठा लेते। गांव के हिसाब से ठीकठाक आफिस जैसी वही एक जगह थी। यहां थोड़ा झांक कर ऑफिस को देखने का भी लोभ होता।
      जंगल की बात निकली तो यह बताना लाजमी होगा कि लांजी एक सेमी ट्राइबल गांव है। लांजी से ही जंगल की शुरुवात होती है। सोन नदी के किनारे और घने जंगल थे, परंतु जंगल के बीच बीच नदी के कछार पर बैंगन, मिर्ची, और  गन्ने की खेती भीहोती। गन्ने की खेती अपने आप मे एक जंगल ही होता है। मै बी एससी करने के बाद इन कछारों में गन्ने की खेती की देखभाल के लिए कई बार जंगल मे रुका करता था। जंगली सुवर , शेर, चीते आदि का भय बना रहता। जंगली सुवर और चिता देखने तो मिला , परंतु शेर के कभी दर्शन नही हुए। उन दिनों ने मुझे जंगल के निवासियों के कठिन जीवन  को पास से देखने का और अनुभव करने का अवसर मिला। मैं जिस घर मे कभी कभी रुकता था, वह उस गांव के पटेल की झोपड़ी थी । बाकी घरों से उसकी एक ही विशेषता थी कि एक कमरा मिट्टी का बना था। उस कमरे के तीन ओर घांस फूस की छत से बने दालान थे। मिट्टी का कमरा भी घास फूस की छत का बना था। पटेल ने बड़ी उम्र में तीसरा विवाह किया था। दो पत्नी से कोई संतान न थी, तीसरी पत्नी से एक बच्चा था। स्वाभाविक रूप से बच्चे के प्रति दोनों पति पत्नी अधिक ही केयरिंग थे। उसके बावजूद बच्चे को ठंड, वह भी जंगल की ठंड से बचने के लिए उतने ही नाम मात्र के कपड़े थे जितने अन्य आदिवासियों के पास थे। उन्हें कभी लांजी , जो बाजार केंद्र था , आना भी पड़ता तो 14, 15 किलोमीटर पैदल ही आते। जब  कथित पटेल की यह स्थिति थी, तो दूसरे वनवासियों के विषय मे कहना ही क्या। उसी अवधि में मैने वहां एक महिला के चिते के द्वारा मारे जाने की भी खबर सुनी। यह पानी, ठंड, गर्मी को खुले में सहन करना भी शरीर की प्रतिरोध क्षमता को मजबूत कर देता है। कठिन परिस्थितियों में और जान हथेली पर रख कर जीने की इस कला को संभवतया हमारे तपस्वियों ने भी इसीलिए स्वीकार किया कि यह जीवन पद्धति शरीर के प्रति अनासक्ति का भाव प्रदान करती है। वहां मैं गन्ने की खेती के लिए गया हुआ था। गन्ने का रस निकालने से लेकर गन्ने से गुड़ बनाने की प्रक्रिया प्रायः रात भर चलती। रात को मैं स्थानीय मजदूरों से पूछता कि क्या रात को शेर या चीता आ सकता है क्या? तो वे बड़े विश्वास से बोलते कि नही यहां रात भर आग जलती है, जंगली जानवर नही आएंगे। यह तो मुझे बाद में पता चला कि आग जलती रहने के बावजूद चिता या शेर आ सकते है।
परंतु इन आदिवासीयों को यह विश्वास ही तो हिम्मत देता है। सामान्य रूप से शेर आदमी पर आक्रमण नही करता। यदि कभी किसी आदमी को शेर ने शिकार बनाया तो उसकी जीभ को मनुष्य का खून लग गया माना जाता था। तभी  बार बार वह मनुष्य का शिकार करेगा। पहली बार भी शेर तभी शिकार करता है, जब उस आदमी से उसे कोई खतरा महसूस होताहै।
      इसी सामान्य पर अनिश्चित नियम को मानकर आदिवासी बाघ देव की पूजा करते है। यह भी विश्वास के अधार पर जीने का तरीका है। यदि कभी किसी आदिवासी पर शेर ने आक्रमण कर भी दिया तो ये मानते है कि मृतक ने बाघदेव की पूजा में कोई कमी कर दी होगी।
  ठीक यही आस्था सांप के साथ भी जुड़ी हुई है। सामान्यतः सांपो की बहुतसी प्रजातियों में इतना जहर नही होता कि आदमी मर  जाए। कुछ ही सांपो के काटने से आदमी की मृत्यु हो सकती है। इसीलिये जब किसी सांप के काटने से मृत्यु हो जाये तो तो उसे भी सांप देवता का प्रकोप मान लिया जाता है। ये छोटे छोटे विश्वास ही इन्हें कठिन परिस्थितियों में जीने का संबल देते है ।
  बात स्कूल की चल रही थी। हमारे स्कूल में हिंदी अंग्रेजी और केमिस्ट्री के व्याख्याता
उत्तर प्रदेश के थे। हिंदी अंग्रेजी के व्याख्याता बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पढ़े थे। केमिस्ट्री के व्याख्याता अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से पढ़े थे। अंग्रेजी के व्याख्याता
संस्कृत में भी एम ए थे। ये दोनों ही साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले थे।  इनके पढ़ाने के एवं बातचीत के तरीके से मैं बहुत प्रभावित था। इन्ही के कारण मेरी भी हाई स्कूल के दौरान ही साहित्य में अभिरुचि पैदा हुई। ये दोनों ही पढ़ते समय या बातचीत में मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, पंत, निराला, रामधारीसिंह जैसे साहित्यकारों की कविताओं और रचनाओं का उद्धरण देते। मेरे जैसे छोटे से गांव में जन्मे बढ़े किशोर के लिए यह एक नई विधा थी।  केमिस्ट्री के व्याख्याता अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से थे, मुस्लिम थे। वे स्वयं अंग्रेजी माध्यम में पढ़े थे और उनकी बोलचाल की भाषा उर्दू थी। यहां तो स्कूल में हिंदी माध्यम था। वे केमिस्ट्री को पढ़ाते समय भी उर्दू शब्दों का बहुतायत से और मजेदार प्रयोग करते थे।
मुझे उनकी यह हिंदी अंग्रेजी उर्दू की मिली जुली भाषा बड़ी अच्छी लगती। उर्दू शब्दो का प्रयोग कर बात को प्रभावशाली ढंग से रखने का तरीका पहली बार उन्ही से सीखा। इसी के साथ नये नये उर्दु शब्द मेरी बोलचाल की भाषा के शब्दकोश में आते गए।
      मेरे साथ पढ़ने वाले सहपाठियों में सभी मेरे से बड़ी आयु के थे। कुछ तो ट्राइबल समाज के थे। जिनका विवाह भी हो चुका था। स्कूल से छह सात किलोमीटर
दूर इनके गॉंव थे । इनके गॉंव का रास्ता हमारे घर के सामने से ही हो के जाता था।
स्कूल से वापसी में हम लोग साथ मे ही आते। उन सब के शरीर सावले और बलिष्ठ
थे। खेल कूद में अव्वल रहते। गांवो के लिए कम से कम व्यय का खेल कबड्डी ही था। दिसंबर की छुट्टियों में दस बारह ग्रामो की टीमें एक स्थान पर कबड्डी प्रतियोगिता में भाग लेने आती।  प्रतियोगिता में कुर्सियां नजदीक के स्कूल से आ जाती। निर्णायक भी आसपास के स्कूल के शिक्षक ही होते। व्यय के नाम पर
केवल खिलाड़ियों के लिए संतरा पिपरमेंट की व्यवस्था करनी पड़ती। निर्णायकों के लिए चाय की व्यवस्था का मतलब होता बिना दूध की गुड़ की चाय। परंतु जीत और हार की खुशी और गम, और खेलने का उत्साह किसी ओलम्पिक से कम नही रहता। निर्णायक के निर्णय को चुनौती भी दी जाती। जिसके लिए आयोजन समिति
के मेंबर ही सुनवाई करते। समिति का स्कूल के ब्लैकबोर्ड पर  नाम लिख दिया जाता। उसपर बकायदा समिति के सदस्यों, अध्यक्ष, सचिव का नाम लिखा होता । समिति का कार्यकाल उतना ही रहता जब तक कि ब्लैकबोर्ड में उसका नाम मिट नही जाता।  सेमिफाइनल तक पहुंचने वाली टीम अपने गांवो में सेमीफाइनल में पहुंचने की सूचना भेज देती। फाइनल होते तक दोनों टीम के गांव से पच्चीस तीस लोग ढोलक मंजीरा लेकर पहुंच जाते। और टीम को बाजे गाजे के साथ अपने गांव में लेकर जाते । गांव में पहुंच कर गांव के लोग इकट्ठा होकर स्वागत करते। गांव के लिए यह एक पर्व ही होता और चर्चा के लिए आठ दस रोज चलने वाला विषय भी मिल जाता। स्कूल में विद्यार्थी इन्ही गावों से आते। तो स्कूल में भी यह एक दो दिन चर्चा का विषय बना रहता।। उस काल मे भी गॉंव के लोग समय समय पर अपनी आर्थिक औकात में रहकर भी आनंद मनाने का कोई न कोई कारण ढूंढ लेते थे। चाहे वह दशहरा का मेला हो , शिवरात्रि का मेला हो, नागपापंचमी में कुश्ती का आयोजन हो, दीपावली का राउत नाचा हो, गांव में आई कोई टूरिंग टाकीज हो, सार्वजनिक गणेश उत्सव हो, जीवन को गतिमय और आनंदमय बना लेते हैं। गांव में पुराने बारदानों  को रंगकर या बांस की टट्टियों को रंगकर गणेश में झांकी बनाना  सजावट का तरीका था। लाइट के नाम पर एक गैस लैंप सर्वाधिक प्रकाश देने वाला साधन होता।
गांव की विपन्नता में भी तीज त्योहारों का अपना आनंद होता।
           इन सबके अलावा  आनंद का एक और अवसर होता। वह बरसात में धान की बोनी के समापन का। धान की खेती बहुत श्रमसाध्य होती है। पहले तो बरसात के प्रारंभ में धान के बीजों को क्यारियों में बोया जाता है। मध्य बरसात के समय पौधे आठ दस इंच के हो जाते हैं, उस समय उन्हें उखाड़कर खेतो में रोपा जाता। रोपाई के पहले खेत मे हल से  एक फुट गहरी खुदाई कर खेत को कीचड़ मय कर दिया जाता। उस कीचड़ में क्यारी से उखाड़े गए पौधों को बंडल बांधकर खेत मे फैला दिया जाता। महिला मजदूर उन बंडल को खोलकर एक एक पौधे को खेत मे घुटने भर किचड़ में कमर झुकाकर चलते हुए  बोती थी। दिनभर, कभी बरसात की चुभती धूप में, कभी दो चार दिनों तक हो रही बारिश के बीच भी दिन भर बोनी का काम चलते रहता। उस समय मजदूरी भी अन्य समय से अधिक होती। अतएव  दो तीन माह के बच्चों की माँ भी इस काम पर मजदूरी करने आ जाती। पर ऐसी महिलाओं के लिए बच्चे की आयु के हिसाब से एक या दो बार बच्चे को दूध पिलाने की छुट्टी मिलती। हालांकि ऐसी मजदूरों से स्वाभाविक रूप से कम काम निकलता। फिरभी ऐसी महिला मजदूरो को काम पर लगाये रखना किसान की नैतिक जिम्मेदारी होती।
       इस धान के रोपा के साथ और एक बात थी कि उस समय रोपा का काम इतना महत्वपूर्ण होता कि घर के पढ़ने वाले व्यक्ति भी इसमें लग जाते। शायद इसी लिए उस समय स्कूलों को बरसात की छुट्टी
मिलती। यद्यपि मेरा खेत मे जाना कोई महत्व नही रखता था। पर हमारे सहपाठी
दिन भर धूप बरसात में अपने घर के रोपा के काम मे लगे रहते। मैं भी उत्सुकतावश
खेत मे जाता। मुझे और कोई काम तो आता नही था। क्यारियों से पौधों को उखाड़कर उनके बंडल बनाये जाते, उनको जहां रोपा होना है, वहां फैलाया जाता। इन बंडलों में कीचड़ लगा होने से इनका वजन दो किलो तक रहता। इन बंडलों को घुटनों
तक कीचड़ में घूम घूम कर फैलाना पडता।
एक डेढ़ घण्टा यह करने के बाद थक कर मैं बैठ  जाता। रात में मां को हाथ दर्द करने की शिकायत करता, तो माँ प्यार से बाम लगाकर मालिश कर देती, और हिदायत भी देती कि कल से इतना भारी काम मत किया कर। परन्तु मेरा यह काम भी जारी रहता, और माँ का मालिश का काम भी। उसका एक लाभ यह होता कि माँ की नजरों में मेरी ऊंचाई बढ़ जाती और रोज माँ के हाथ से मालिश का आनंद अलग।
जिस किसान के यहां यह रोपाई का कठिन काम समाप्त होता तो अंतिम दिन उस किसान के यहां उत्सव का माहौल होता। खेत मे जाने के पहले सभी महिला पुरुष मजदूर किसान के घर मे देशी शराब का या घर मे चोरी छुपे बनाई गई महुए की शराब, को छकते, शराब के साथ थोड़े छोले भी खाने को रहते। उसके बाद सभी मजदूर बाजे के साथ  खेत मे जाते जहां नागर और पशुओं की पूजा होती। पूजा के बाद प्रसाद का वितरण होता। उसके बाद एक दूसरे को कीचड़ से  सरोबार कर उत्सव प्रारम्भ होता। ग्रामीण भाषा मे महिलाएं गीत गाती।अंतिम कड़ी में पुरुष भी साथ देते। उसके बाद बाजे के साथ नाचते गाते मजदूर किसान के घर आते। इस सारे माहौल में किसान यानी कि मालिक भी साथ होता। किसान के घर आकर पुरुष और महिला मजदूर किसान के खेत मे अच्छी फसल की कामना करते ।
किसान की उन्नति के साथ बालबच्चों के सुख और समृद्धि की भी कामना करते। फिर शराब का एक दौर होता। भोजन के बाद अपने घर लौटते। दो तीन दिन तक किसने अधिक पी कर नशे में क्या क्या हरकत की यह चटकारे लेकर बातचित का विषय होता। शहर में तो गरीब और अमीर के सुख दुख अलग अलग होते हैं, पर गांवो में किसान और मजदूर के सुख दुख साझा होते थे।
      हमारा परिवार अपेक्षाकृत ठीकठाक परन्तु पढ़े लिखे किसानों में माना जता था। पिताजी 1920 के पूना से इंटरमीडिएट थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण कालेज से निकाल दिए गए थे। बड़े भैया मैट्रिक थे । दूसरे भाई ग्रेजुएट थे । तीसरे भाई इंजीनियर थे। मैं बी एस सी एल एल बी था। गांव में अब तो गरीब अमीर के बीच के सुविधाओ में खासा अंतर दिखाई देने लगा है। खासकर बिजली आने के बाद और पेट्रोल पंप खुल जाने के बाद।
   हमारे बचपन मे गांव में न तो बिजली थी, न पेट्रोल पंप। मैने मेट्रिक तक लालटेन में ही पढ़ाई की। कुल मिलाकर बिजली और पेट्रोल के नही होने से गाड़ी,पंखा, लाइट, कूलर जैसी सुविधाओं  का सवाल ही नही पैदा होता था। गरीब और अमीर किसान के पास सुविधाओं में बहुत ज्यादा अंतर नही होता। थोड़ा बहुत अंतर कपड़ो की सफाई में जरूर होता।
          फिर भी गरीबी तो गरीबी ही होती है। घर मे मैं लालटेन में ही पढ़ाई करता था।
जबकि मेरे पड़ोस के साथी चिमनी में पढ़ते। लालटेन का मिट्टीतेल का खर्च भी उन्हें भारी पड़ता। मेरे क्लास में पढ़ने वाले मेरे दो मित्र मेरे घर मे ही आकर पढ़ते । उनके घर मे चिमनी भी देर रात तक नही जलती थी। हम तीनो एक ही लालटेन में पढाई करते। ऐसा कर हम मित्रो पर अहसान कर रहे होते ऐसा नही था। गांव में रात 8 बजे सभी सो जाया करते। वास्तव रात में अकेले बैठ कर पढ़ाई करने में डर लगता था। मित्रो की उपस्थिति से मैं भय मुक्त रहता। 
      अपने मित्रों के घर कभी भोजन के समय जाता, तो देखता कि वे लोग कांसे की थाली में  केवल मिर्ची की चटनी के साथ चावल खाते। एक बात और देखता कि वे थाली में अनाज का एक कण भी नही छोड़ते। यदि सब्जी बनती तो भी बहुत थोड़ी सब्जी में चावल खाना पड़ता। मैं अपनी माँ को भी देखता कि वह भी ऐसा ही भोजन के बाद एक कण भी थाली में नही रखती। यह तो मुझे बाद में समझ आया कि माँ धार्मिक होने के कारण अन्न देवता का अपमान नही होने देती। परंतु मेरे गरीब  मित्र को अनाज के एक एक दाने की कीमत मालूम थी इसलिए वह थाली में अनाज नही छोड़ते।
10000 wards
   माँ की बात निकली तो माँ पर कुछ कह लूं। कुछ घटनाएं जीवन को, स्वभाव को , और व्यक्तित्व को बदल देती हैं । मेरा जन्म पिताजी के  निधन के दो महीने बाद हुआ।
उनकी किसी यादों का तो सवाल ही नही है। बस दूसरों के ऊपर पिता का साया देखकर मुझे जीवन मे एक बड़े खालि स्थान की अनुभूति हमेशा रही। दूसरी बात पिताजी की अकाल मृत्यु के बाद मेरे जन्म को माँ ने किस प्रकार स्वीकार किया होगा। मुझे नही मालूम।  मेरे जन्म के पहले माँ का स्वभाव कैसा था, यह भी नही मालूम। परंतु मैने आम महिलाओं की तुलना में माँ को कम बात करने वाली ही पाया। माँ मन में उठ रहे  भावों की प्रतिक्रिया चेहरे पर बहुत कम आने देती। संभवतया विधवा होने की असुरक्षा के भाव के कारण वह बच्चों को प्यार देने में या बच्चों की खुशी में सम्मिलित होने में भी थोड़ी कंजूसी बरतती।  मेरे जन्म के समय बड़े भाई साहब 19 वर्ष के थे, उनसे छोटे 17 वर्ष के। जवान हो रहे दो भाइयों सहित कुल छः बच्चों की बड़ी जिम्मेदारी माँ पर थी। उस समय विधवा होना अपने आप मे समाज में एक बड़ी कमजोरी थी। खेती के काम मे लगे पांच छह नौकरों से काम  लेना भी जिम्मेदारी का एक बड़ा भाग था। एक राइस मिल भी थी, जो न्यायालयीन विवाद में फंसी हुई थी। ऐसी परिस्थितियों में माँ का गंभीर व्यवहार अनपेक्षित नही था। इसके साथ अस्थमा की लंबी बीमारी के कारण  मां शारीरिक रूप से भी कमजोर थी। बावजूद इसके यह भी सच है कि सबसे छोटा पुत्र होने के कारण माँ का मेरे ऊपर अधिक स्नेह था और मुझे लेकर अधिक चिंतित भी रहती थी। मैं 12 वर्ष का रहा हूंगा। मैं स्कूल जा रहा था। चरवाहा अपनी गायों को लेकर जा रहा था। अचानक एक गाय दौड़ती हुई मुझे रौंद कर भागी। मेरे घुटने छील गए थे । एड़ी में भी लगा था। पास ही ग्रामीण डॉक्टर का अस्पताल था। वहां जा कर पट्टी करवाकर घर वापस आ गया। मां ने मेरी चोट को देखा तो कातर हो गई। सामान्यतया शांत रहने वाली कभी नौकरों को भी कड़े शब्द न बोलने वाली माँ ने दूसरे दिन सुबह चरवाहे को जिस तरह डांटा,  मैं देखते आश्चर्य चकित रह गया। पहलीबार मैने मां की ममता को पहचाना। खेत जाना हो तो , गांव में हमारे समाज के कुछ परिवार थे, उनके घर किसी अवसर पर जाना हो तो , या मंदिर जाना हो तो माँ मुझे ही साथ लेकर जाती।
     यद्यपि गांव के हिसाब से हमारे पास बड़ी खेती थी। वह भी दो फसल वाली और सिंचाई वाली। परंतु माँ ने हमारे दिमाग मे संपत्ति का अहम नही आने दिया। वह आगे के भविष्य का चित्र हमारे सामने रख कर बताती की छः भाई बहनों की शिक्षा और हमारे समाज के अनुसार विवाह के व्यय की कितनी बड़ी जिम्मेदारी उस पर है। आगे चलकर बटवारा होगा तो यह जमीन एक के हिस्से में कितनी आएगी। किसी भी छोटे किसान का उदाहरण देकर बताती कि  भविष्य में वैसी गरीबी की जिंदगी जीना पड़ेगा। इसका एक ही हल बताती कि तुम लोग खूब पढ़ो लिखो, अच्छे नंबरों से पास होकर आगे की पढ़ाई करो और किसी सरकारी नौकरी में लग जाओ।
     जब गांव में पढ़ने लिखने के विषय मे चेतना नही थी। हमारे भाई साहब के अलावा कोई मेट्रिक पास नही था। माँ स्वयं भी पढ़ी लिखी थी या नही मालूम नही। क्योंकि उसको कभी लिखते नही देखा। हाँ, वह समाचार पत्र,  रामायण और धार्मिक किताबे जरूर नियमित रूप से पढ़ती। उसे 20 तक के पहाड़े याद थे। हमको गिनती, पहाड़े और हनुमान चालीसा उसने ही कंठस्थ करवाया था। माँ दिया बत्ती के बाद मुझे और मेरे से दो वर्ष बड़े भाई जयंत को अपने पास बिठाकर हनुमान चालीसा के साथ दो तीन श्लोको का पाठ करवाती । उसके बाद पहाड़े याद करवाती। हम सभी भाई अपने अपने क्षेत्रों में यदि कुछ कर पाए तो उसका श्रेय मां के द्वारा शिक्षा के प्रति जगाई गई चेतना को , और संस्कारों को जाता है। हमारे घर मे धर्मयुग और हिंदुस्तान नियमित
रूप से आते। समाचार पत्र भी आता। पर बरसात में शहर को जोड़ने वाले रास्ते पर पड़ने वाली तीन नदियों के कारण कारण समाचार पत्र नही आते । परंतु भाई साहब ने ऐसी व्यवस्था की थी कि समाचार पत्र पोस्ट से आते। यद्यपि दो तीन दिन देरी से आते। कभी कभी पराग और सरिता भी आती।
     जीवन में सब कुछ एक सरल रेखा में नहीं चलता। जीवन भर  सुख-दुख की रेखाएं एक दूसरे को काटती रहती  है। कई बार यह कटाव इतना गहरा होता है कि  घाव जीवन भर नहीं भरता।  माँ का परिस्थिति जन्य मर्यादित प्यार भी मेरे भाग्य में मर्यादित अवधि के लिए ही था। मेरी 13 वर्ष की आयु में माँ का निधन हो गया। मैने पिताजी को नही देखा था , परंतु माँ के प्यार को तो शिद्दत से महसूस किया था। माँ या पिता का साया ना होना जीवन को कितना प्रभावित करता है यह मेरी उस समय की नासमझ उम्र में तो समझ नही आया। समझ मे न आने का बड़ा कारण यह भी था कि मेंरे बड़े भाई और भाभियों ने हमारी चिंता अपने बच्चों से ज्यादा की। यह मैं सौजन्यतावश नही कह रहा हुँ, वास्तविकता यही थी कि वे हमारे लिए ओव्हर कॉन्शस थे। जिसके कारण मुझे अच्छी या कहें कि माता पिता से अधिक केयरिंग के साथ परवरिश प्राप्त हुई।  मूर्त आवश्यकताओं में कभी कोई कमी नही रहने दी गई। इन सबके बावजूद माँ बाप के द्वारा प्राप्य होने वाली अमूर्त आवश्यकताओं की कमी उम्र के बढने के साथ साथ अधिक महसूस होती गई।
   पिताजी का स्वर्गवास मेरे जन्म के कुछ दिन पूर्व है हुआ था, इसलिए पिताजी की अनुपस्थिति मेरे लिए बहुत कष्ट दाई नहीं रही। यद्यपि सामने बड़े हाल में लगी पिताजी  की तस्वीर को  देखकर मैं पिताजी की उपस्थिति को अनुभूत कर सकता था। पिताजी की तस्वीर को ध्यान लगाकर देखने की आदत सी पड़ गई थी ।            
           जीवन भर एक असुरक्षा का भाव और स्वभाव और व्यक्तित्व में बना रहा। आज मैं अनुभव करता हूँ कि यह असुरक्षा का भाव हम सभी भाई बहनों में न्यूनाधिक मात्रा में देखा जा सकता है। परंतु इस भाव भूमिका ने ही  परिवार को अटूट बने रहने की ताकत दी, समाज मे अजातशत्रु और विश्वसनीय बने रहने की व्यबहार कुशलता दी। जिसे हमारी बाद की पीढ़ी तक भी देखा जा सकता है।
        हमारा आमगाव रोड पर जो कि एक
व्यावसाइक इलाका था, एक आधा एकड़ का प्लाट था। हमारे बड़े भाई साहब के एक शराब ठेकेदार मित्र थे। उसको प्लाट की जरूरत थी। भाई साहब ने उसे 2000रुपये में सौदा कर लिया। 500 रुपये बयाना भी ले लिया। घर मे आकर उन्होंने मंझले भाई
साहब को सौदे के विषय मे बताया। मंझले भाई साहब ने सुनकर "ठीक है "  कह दिया।
    गांव में एक राममंदिर था। उसके महंत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। हमारे स्नेही भी थे। काफी उम्रदराज भी थे। वे दोपहर को आम तौर पर घर आते थे। दूसरे दिन वे घर पर आए हुये थे। बड़े भाई साहब ने उन्हें भी जमीन के सौदे के विषय मे बताया। महंतजी ने नाराज होकर कहा कि आपने बहुत सस्ते में बेच दिया। आज उसकी कीमत 4000 रुपये से कम नहीं है।
उन्होंने मंझले भाई साहब से पूछा आपने कैसे मान लिया । मंझले भाई साहब ने कहा जब भैया ने बयाना ले लिया तो मेरे लिए कुछ कहने को  नही था। महंतजी ने कहा मैं जाता हूँ ठेकेदार के पास और बात करता हूँ । महंत जी ने ठेकेदार से 3500 में बात कर ली। इस घटना को बताने का उद्देश्य केवल इतना कि किसी धन या पैसे वाली बात को लेकर घर मे किसी विवाद को जन्म नही देना यह बात हम सब में इन्ही व्यक्त- अव्यक्त संस्कारों से आई।

    गांव के कुछ व्यक्तियों की बात न करे तो
यह लिखना अधूरा रह जायेगा। एक थे , ओमप्रकाश खरगाल, एक शिक्षक के नाते लांजी आये थे । वे कब लांजी आये नही मालूम, पर जब से होश सम्हाला तब से उनको हमारे परिवार के एक सदस्य की तरह ही पाया। वे हमारे बड़े भैया लोगो के हम उम्र थे। मूलतः पंजाब के थे। दो तीन पीढ़ी से वारासिवनी में बस गए थे । उनके पिताजी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी थे। ऊंचे, खुलता हुआ रंग।
घर मे आते तो घंटे दो घंटे गपशप होना मामूली बात थी। जिस हाई स्कूल में शिक्षक थे । वह निजी विद्यालय था। ग्रामीण अंचल में 1957 के आसपास निजी स्कूल अधिक दिनों तक चलाना कठिन  था।
इसे सरकारी स्कूल का दर्जा दिलाने के लिए सरकार के पास बड़ी राशि जमा करना जरूरी था। उस राशि की व्यवस्था के लिए ओमप्रकाशजी साईकल से गांव गांव में घूमते । रोज 20 ,25 मिल घूमने के बाद कही 100 रुपये इकट्ठा हो पाते।ओम्प्रकाश
और उनकी टीम ने डेढ़ दो महीने घूम घूम कर आवश्यक राशि इकट्ठा कर ली। अंततः स्कूल सरकारी हो गया। परंतु सरकारी स्कूल होने के कारण ओम्प्रकाशजी का तबादला दूरस्थ स्थान पर हो गया। उन्होंने आत्मसम्मानवश नौकरी से स्तीफा दे दिया।
उनके पास व्यवसाय करने के लिए भी धन नही था। हमारी माताजी ने उन्हें कुछ राशि दी। बाद में जंगल की ठेकेदारी की। और बहुत अच्छे तो नही पर ले दे कर ठीक ठाक जम गए। उसके कई वर्ष बाद उन्होंने दूसरा निजी स्कूल खोला। और कॉलेज भी खोला। स्कूल तो अच्छा चल गया। परन्तु कालेज बंद करना पड़ा। स्कूल और कॉलेज खोलने में उनका कोई निजी हित भी नही था। गांव में टूर्नामेंट हो, कोई आंदोलन हो,  गायत्री मंदिर की स्थापना हो सब कामो मे जी जान से लग जाते। कुछ लोगों की सामाजिक प्रतिबद्धता इतनी अधिक होती है कि अपने परिवार की कीमत पर भी उसको निभाते रहते है। आपातकाल में उन पर भी पुलिस की नजर थी। परन्तु उनकी पत्नी को कैंसर होने के कारण उन्हें गिरफ्तार नही किया गया। कुछ दिनों बाद पत्नी का भी देहांत हो गया। उस समय बच्चे (संभवतः छः बच्चे) भी छोटे छोटे थे ।  इन सब परिवारीक और आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी उनकी सामाजिक गतिविधियां वैसी ही बनी रही। छोटे स्थानों पर अधिक कठिनाईयों के साथ ये सामाजिक कार्य करनेवाले मिल का पत्थर होते हैं। पर उनको वह सम्मान प्राप्त नही हो पाता जो सुविधाओ के साथ शहर में थोड़ा सा भी सामाजिक कार्य करने से प्राप्त हो जाता है।
   उस छोटे से गांव में जहाँ से  जिला केंद्र बालघाट को जाने के लिए बरसात में  तीन नदियां नाव से पार करनी पड़ती। बस का कोई टाइम टेबल नही। कई बार सुबह निकले तो 50 कीलो मीटर की दूरी पूरी करने में शाम हो जाती। नजदीक का रेलवे स्टेशन आमगाव है। लांजी से 24 किलोमीटर दूर। बीच में हर छह किलोमीटर की दूरी पर एक नाला या नदी पड़ती, जिन्हें नाव से पार करना पड़ता। लोग बहुत जरूरी हो तो साईकल से जाते। गांव में कुछ लोग मजदूरी लेकर साईकल में पीछे बैठाकर भी लेकर जाते। बरसात में कोई समाचार पत्र नही आता। ऐसे  गांव में शिक्षा  के स्तर की केवल कल्पना की जा सकती है। परन्तु इसके बावजूद उस समय भी उस सेमि ट्राइबल इलाके से एम एससी, एल एल बी करने वाले भी विद्यावीर थे। एक ने रायपुर से ही बी ई भी किया। एक शिक्षक ने जो गणित में एम ए थे, एम एड में गोल्ड मेडल प्राप्त किया था। इन्ही लोगो ने जो सारी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक बाधाओं  को पार कर आगे पढ़ने में सफल हुए ,आने वाली पीढ़ी को शिक्षा का मार्ग दिखाया। हम लोग छोटे थे । इनमे से कोई ना कोई गांव में आते रहते , तब इनको
देखना एक अजूबा भी  होता और गर्व का विषय भी।
       हमारे मोहल्ले मे ही दो मित्र रहते। एक का नाम सखाराम और दूसरे का नाम कालूराम था। सखाराम दुबला पतला पर उंचा था। कालूराम ठिगना कसे काठी का था। दोनों बातचीत की कला में एक दूसरे से कम नही थे। गांव के बातचीत के अड्डे पर यदि ये हों तो किसी को बोलने का अवसर मिलना कठिन था। और यह अड्डेबाजी तब तक चलती जब तक इनको कोई जरूरी काम याद न आजाये। दोनों कितने पढ़े थे, यह तो नही मालूम पर हिसाब किताब लिखकर रखना जानते थे। जेब में पांच छह कागज हिसाब के हमेशा रखे हुए होते। दोनों धोती और कमीज पहनते। सर पर सफेद टोपी। दोनों कुछ लोगो के लिए तो बहुत विश्वसनीय थे तो कुछ लोगों के लिए अविश्वसनीय भी। दोनों ही अलग अलग सेठ के यहां नौकरी करते। लांजी के कई व्यापारियों का वनोपज का व्यवसाय था। उस समय जंगल मे रहकर मजदूरों का हिसाब और वनोपज की गिनती का मुंशी का काम करते। इसके लिए दोनों को घने जंगलों में रहना पड़ता। सप्ताह में एक बार शनिवार को शाम को घर आते। इनको भी साप्ताहिक मजदूरी मिलती। सखाराम की हर रविवार होली दिवाली  होती। गांव में रविवार बाजार का दिन होता। गांव के लोग साप्ताहिक बाजार में दाढ़ी बनाकर कर,जरूरत होतो बालो की कटिंग भी करवाकर,( गांव में नाई भी रविवार को ही आता ) नहा धोकर सर में तेल लगाकर और धुले कपड़े पहन कर बाजार जाते। कुछ लोगों के लिए बाजार में कुछ खरीदने बेचने का काम नही होता , पर केवल घूमने ही जाते। बाजार में आठ दस किलोमीटर दूर से लोग आते । गांव में रिश्तेदारी भी आसपास के गांव में ही होती। तो इसी बहाने बाजार में सबसे भेंट मुलाकात भी हो जाती। यह बाजार भी गांव के लिए एक वीकली इवेंट होता। हाँ, तो बात सखाराम की हो रही थी। रविवार को  बाजार से आते समय सखाराम देशी शराब की दुकान पर बिना नागा हाजिरी जरूर लगाता। वहां से लडखडाते एक किलो मीटर चल कर मोहल्ले में आता। शराब के एक अतिरिक्त पौव्वे के साथ खाने के लिए फुटाना जेब मे होता। यदि हम बच्चे दिखाई दिए तो थोड़ा फुटाना हमको भी मिल जाता। कभी रास्ते मे मिलने वालों को गाली देगा, या प्यार करेगा, यह इस बात पर निर्भर रहता है कि उसने कितनी पी है। घर जाकर पत्नी को और बच्चों के साथ भी व्यवहार इसी बात पर निर्भर करता था। अन्यथा सखाराम सीधा और बातों का धनी था। कालूराम को पीने की आदत नही थी, बातों का धनी वह भी था। परंतु सखाराम से अधिक चालाक।
कालूराम ने बाद में स्थानीय राइस मिल में
मुंशी की नौकरी उसी सेठ के यहां कर ली।
दोनों की खासियत यह थी कि एक दूसरे के मजाक बनाने में किसी भी हद तक जाते।पर एक दूसरे का बुरा भी नहीं मानते।  जाड़े के दिनों में हमारे घर मे दोनों की बैठक जमती। गोरसी में आग तापते हुए बातों का रंग गहराते जाता। उनके सेठों की घर की समस्या, जंगल मे शेर का कैसे सामना किया, जंगल की निवासियों की कहानियां, गांव की किसी नई घटना का बेबाक विश्लेषण, किसके घर मे भूत का कैसा तांडव हुवा, किस  पर कब
शैतान आया था, किसके झाड़फूंक से ठीक
हुआ, गांव में कौन व्यापारी क्यों बर्बाद हो रहा है, स्थानीय राजनीति में कौन ताकतवर है ,गांवमें चल रहे भाइयों के विवाद की पूरी पड़ताल से लेकर अवैध संबंधों की ताजा जानकारी तक के ऐसे विषय होते कि रोज के दो तीन घंटे भी कम पड़ते। किस्सागोई की तर्ज पर वे अपनी बातों से सबको घंटो बांध रखने की क्षमता रखते। बस उनके पास की बीड़ी खतम नही होना चाहिए। ये बात भी सच है कि कि हमारे समाज मे ज्ञान का आदान प्रदान का सहज तरीका किस्सागोई ही रहा है। इस सबके साथ एक बड़ी खासियत इन लोगों में यह थी कि ये लोग गांव के लोगों के सुख दुख में पूरी शिद्दत से सहभागी भी होते। वास्तव में ये सरल किस्सागोई की कला और इससे होने वाले मनोरंजन का अपना एक मनोवैज्ञानिक महत्व होता है। यह बात केवल गांवो में ही नही तो छोटे  शहरों में भी थी। हमारे पिताजी के निधन के बाद घर का वातावरण गंभीर था। बड़े भैय्या और मंझले भाई की आयु19, 20वर्ष की थी। छह भाई बहनों तथा माताजी की जिम्मेदारी होने के बाद गंभीर होने लाजमी था। सखाराम और कालूराम हमारे भाई से काफी बड़े थे। पर उस संकट में ये दोनों देर रात तक घर मे बैठते।  घर के वतावरण की गम्भीरता को दूर करने में इन बैठकों की बड़ी भूमिका रही।
      गाँव मे एक भजन मंडली भी थी। जो अनेक प्रतियोगिताओं में सम्मान प्राप्त कर चुकी थी। जब इससे जुड़े लोग आपस मे बैठते तो रामायण , महाभारत ,गीता पर गंभीर चर्चा भी होती। एक दूसरों की बातों के समर्थन या विरोध में अकाट्य तर्क भी दिए जाते। यह युवाओं की गांव के लिहाज से  बुद्धिजीवी मंडली थी। जो राजनीति पर भी सार्थक बहस कर लेती थी। इनमे से कुछ लोग संगीत का भी कार्यसाधक ज्ञान भी
रखते थे। एक दो लोग मौलिक भजन लिख कर स्वयं लय ताल में बांध भी लेते थे।
     जोग्या पहलवान की बात न हो तो गांव के महत्वपूर्ण आयाम से वंचित रह जाएंगे। जोग्या पहलवान मूलतः आदिवासियों के उस समाज से था, जो पीढ़ियों से गांवो में बस गया। ऊंचाई सामान्य से कम पर हट्टा कट्टा गहरा सांवला कसरती बदन था। बोलता कम था। कुछ वर्षों  तक हमारे यहां खेती पर भी काम करता रहा। कुछ परिस्थितिवश पिताजी के निधन के बाद कुछ वर्षों के लिए हमारे भाइयो के लिए अघोषित अंग रक्षक भी रहा। शायद पिताजी के समय भी राजनीतिक आवश्यकता के कारण उसकी अंग रक्षक की यह भूमिका कई बार रही। गांव की यह विशेषता थी कि एक बार जो संबंध बन गए उनको दोनों पक्ष निबाहते थे। हमारी नियमित मजदूरी का काम छोड़ने के बाद भी हमारे घर उसका आना जाना लगा रहता था। चाय पानी से लेकर तीज त्योहारों के समय अन्य नौकरों के साथ यदा कदा भोजन पर भी उपस्थित रहता। खेती की  आकस्मिक आवश्यकता के अनुसार रोजी पर काम भी करता। जोग्या पहलवान की भूमिका गणेश विसर्जन के समय महत्वपूर्ण हो जाती। गांव में बरसात में वर्षा से बचाव के लिए बांस की कमचियों का एक स्केलेटन बनाया जाता। उस स्केलेटन को विशेष प्रकार के पत्तो से ढंका जाता। सिर से कमर तक का पूरा शरीर उससे ढंक जाता। उसका लाभ यह था कि हाथ स्वतंत्र रहते , जिससे मजदूर वर्षा के समय भी बिना भीगे काम कर सकते थे। इसी बांस के पुराने स्केलेटन को यदि जमीन पर रख दिया जाये तो घोड़े के आकार का दिखाई देता।
इसको रंगीन कागजो से सजाकर घोड़े का स्वरुप दिया जाता। स्केलेटन के बीच आदमी समा जाए इतना बड़ा छेद कर दिया जाता। जोग्या पहलवान इसी छेद में खड़ा
हो जाता। स्केलेटन से बनाये घोड़े को इस प्रकार नचाता कि वास्तविक घोड़े के नाचने
का आभास होता। गणेश विसर्जन का यह जुलूस दो तीन घंटे चलता। कभी कभी रात भर भी। परंतु जोग्या पहलवान पूरे समय घोड़े को बिना थके नचाता रहता। जहां भी थोड़ी भीड़ जमा हो गई तो जोग्या पहलवान का उत्साह देखते बनता। गांव में एक डंडार नामक लोक कला का भी मंचन होता। उसमे बीच मे दुर्गाजी की नृत्यमय आरती भी होती। पूरे कार्यक्रम में महिला का अभिनय भी पुरुष ही करते। इस दुर्गाजी की झांकी में जोग्या पहलवान राक्षस का सजीव अभिनय करता। आज मैं विचार करता हूँ कि जितनी मेहनत से राम लीला नाटक, जैसी अनेक कलाओं को गांव वालों ने अपनी मौलिक प्रतिभा से, गांव की गरीबी के बावजूद बनाये रखा था। उसका उस समय मूल्यांकन करने वाला कोई नही था। अब तो गांवो के आधुनिक परिवेश ने इन कलाओं की आवश्यकता को ही समाप्त कर दिया। जहां इन कलाओं का अस्तित्व है भी तो अपनी मौलिकता को खो करl
  इन्ही विचारों में खोए हुए देढ़ घंटा कैसे बीत गया, पता ही नही चला। बस कंडक्टर की आवाज सुनाई दी, "कौन लांजी सुंदरटोला उतरनेवाला वाला है? आगे आ जाओ।" अरे यह तो मेरा प्रायमरी स्कूल आ गया। अब पांच मिनट में लांजी बस स्टैंड आने वाला है।
      बस से उतरने की मानसिकता बनाते हुए थोड़ा सावधान  हो गया। बस स्टैंड से उतरकर अपने घर के रास्ते निमटोला की ओर बढ़ने लगा। बस स्टैंड से हमारा घर एक किलोमीटर दूर है। आसपास नजर घुमाता हूँ। बस स्टैंड में कोइ परिवर्तन नही हुआ।
    मैं देख रहाथा, निमटोला का कोई आदमी दिख जावे तो बातचीत में समय कट जाएगा। उस ओर जाने वाले कुछ लोग तो दिखाई दिए , पर उनमे कोई परिचित नही था। मैं अपना बैग लेकर आगे चलने लगा। 15 मिनट बाद घर दूर से दिखाई देने लगा। अब घर की हालत भी अच्छी नही रही। पुरानी दिवालो से झांकते हुए ईंटों के पीछे से ताकि बीमार मां के चेहरे की परछाई दिखाई देने का भ्रम हो रहा था। इस घर के हर कोने से हरेक ईंट के साथ माँ की स्मृति जुड़ी है। आंगन का फाटक खोलकर आंगन में प्रवेश करता हूँ। कभी यह  परिवार  10 - 15 सदस्यों  का जमावड़ा हुआ करता था। पांच छह नौकर काम करते। गेहूं, चावल, दाल, तिल्ली, गुड़, प्याज, भटा, धनिया आदि फसलों से घर भरा रहता।
    सामने बड़े हाल में बड़े भाई साहब बैठते। उनके पास लोगों का आना जाना लगातार बना रहता। बहुत कम बात करने वाले बड़े भाई साहब का राजनीति में सफल होना भी एक पहेली ही थी। लड़कियां विवाह के बाद ससुराल चली गईं। लड़के एक एक कर  नौकरी करने या पढ़ने बाहर चले गए। पिताजी स्वतंत्रता आंदोलन के जिले के बड़े के चेहरों में एक थे। न्याय पंचायत के सभापति भी रहे। बड़े भैया की भी राजनीति में सक्रियता तो रही ही, वे ग्राम पंचायत के लंबे समय तक सरपंच भी रहे।
स्वाभाविक रूप से परिवार की क्षेत्र में बड़ी धमक थी। परंतु अब परिस्थितियां बदल गई। बड़े भैया भी बहुत पहले स्वर्गवासी हो गए। मंझले भैया की भी आयु 70 वर्ष हो गई। घर मे केवल अब मंझले भाई और भाभी रह गई।
   मेरे दालान में प्रवेश करने के बाद भी दोनों में से किसी को आहट नही लगी।
मैने धीरे से मुख्य कमरे में प्रवेश कर भाभी को आवाज दी। मेरी आवाज सुनकर दोनों बाहर आ गए । मुझे देख कर भैया भाभी के चेहरे पर आश्चर्य जनक खुशी की चमक
सहज महसूस की जा सकती थी। जिस घर का हर कोना  बरसों तक बच्चों की आवाज से चहकता रहता उसी घर मे अब भैया भाभी का अकेले रहना उनके लिए भी कितना असहज है, मैं समझ सकता हूँ। इसीलिए मेरे अचानक आने से उनका प्रसन्न हो जाना स्वाभाविक है। समय कितनी तेजी से सब कुछ बदल देता है।
      शाम का धुंधलका हो गया। थोड़ी देर में  नौकर भी चला जाएगा। गांव में रात का सन्नाटा छाने लगेगा। साढ़े सात बजे तक रात का भोजन हो जाएगा। यही
गांव का समय चक्र है। गांव में रात को जल्दी सोने का कारण खेती के काम से बाद थका होना तो था ही, पर कम से कम समय तक दिया जलाकर मिट्टी तेल बचाना भी कारण था। अब तो कुछ घरों में बिजली भी आ गई। परंतु मजदूरों के घर अभी भी चिमनी को ही मोहताज हैं। वैसे शाम के भोजन में घर मे सब्जी नही बनती, परंतु मेरे आने के कारण भाभी को मैं सब्जी काटते हुए देख रहा था। पहले सोचा कि भाभी को सब्जी बनाने के लिए मना करू, पर मैं जानता हूं कि उनकी खुशी इसी में है, इसलिए मना नहीं कर पाया। बहुत दिन बाद गोबर से लिपे जमीन पर भोजन करने का अवसर मिला। भोजन के बाद गांव के हालचाल के विषय मे , परिवार - रिश्तेदारों की बात चीत हुई। मेरे अधिकांश साथी अब नही रहे। जब भी गांव जाता हूँ तो किसी न किसी साथी के नही रहने की एक नई खबर मिल ही जाती। उस समय गांव की विषम परिस्थितियों एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नही होने के कारण औसत आयु कम ही थी। कुल मिलाकर गांव में अब एक नई पीढ़ी ने अपना मुकम्मल स्थान बना लिया। यह पीढ़ी अब अधिकारों के प्रति, और आत्मसम्मान के प्रति सजग है। सरकारी योजनाओं के कारण और शिक्षा से भी आर्थिक सामाजिक ताने बाने मे आये परिवर्तनों को भी गांव में आसानी से महसूस किया जा सकता है। कृषि के अलावा अन्य आयामो से धनोपार्जित करने के साधनों ने गांव में भी बड़े किसानों के समकक्ष नए वर्ग खड़े कर दिए। यह एक अच्छा परिवर्तन है।
        रात को दस बजे (गांव के हिसाब से बहुत रात गए) सोने के लिए तैयार हो गए।
मैं अपनी पुरानी जगह हाल में रखे तखत पर सोने चला गया। यह हाल यानी बैठक का कमरा। यह कमरा  राजनेताओं , सामाजिक कार्यकर्ता, संत महात्मा, तक नाना प्रकार के घर आने वालों का चश्मदीद गवाह रहा है। परंतु रात को यह मेरे बैडरूम/स्टडी
रूम में बदल जाता। जाड़े के दिनों में यह कमरा गोरसी के पास बैठे गपपाजी या किस्सागोई का देर रात तक केंद्र बना रहता। इस में भूत प्रेत , शेर चिता
या सांप की डराने वाले विषय पर भी गप बाजी होती, उसके बाद रात को अकेले उस बड़े कमरे में सोना भी बहुत हिम्मत की बात थी। उस समय मेरी आयु भी तो 12 13  वर्षो की ही थी। उसमे भी रात को पेशाब जाना पड़ा तो आंगन में जाना पड़ता। वहां गुलमोहर के दो बड़े पेड़ थे, आंगन की कच्ची जमीन में बेतरतीब लगे देशी फूलो के पेड़ थे। इनके बीच  कही भी भूत होने या सांप होने के भय से आशंकित होना स्वाभाविक था।
      इन्ही विचारो में कब नींद लग गई, पता नहीं लगा। सुबह 4 बजे से ही कुछ शब्द कान में पड़ने लगे। गांव में जितनी जल्दी रात का सन्नाटा फैलता है, उतनी ही जल्दी सुबह की शांति भी टूटती है। शौच जाने वालों की बातचीत, जानवर चराने के लिए जाने वालों द्वारा दी जानेवाली हांक, सुबह सुबह लोगो की आहट सुनकर भौंकते कुत्तों की आवाज सुनकर बिना घड़ी देखे समय का अंदाज हो जाता है। कुछ देर बाद गाय की घंटियों की आवाज और गाय के सद्य जन्मे बछड़ो का आर्तनाद लालिमा युक्त प्रकाश होने की सूचना देते है। इसी बीच मे नौकर के फाटक खोलकर आने की आवाज भी आती है। गांव की इस दिनचर्या में कोई बदलाव नही आया है।
    सुबह चौक पर चौपाल बैठती है। मैं भी सुबह की चाय पीकर चौपाल की ओर बढ़ा।
चौपाल को जीवंत रखने वाले पुराने लोगो मे कोई भी चौपाल में नही था। फिर भी दूसरी पीढ़ी के कुछ लोगों के साथ संवाद तो था ही। मैं भी एक पत्थर के उपर बैठ गया। जब ज्ञान और पैसा बढ़ता है तो तकल्लुफ भी बढ़ता। यह बात मैं अब गांव
की चौपाल में भी महसूस कर रहा हूँ। दूसरा पक्ष यह भी रहा होगा कि मुझे जिस सम्मान की अपेक्षा इस चौपाल में थी उतना नही मिलने से भी मैं पूर्वाग्रह से विचार कर रहा हुँगा।
जो भी हो आधे घंटे बाद वापस आ गया।
         कुछ परिस्थितियों को तो हम बदल सकते हैं और अपने अनुकूल बना सकते हैं। कुछ बातों का बदलना कठिन होता है या असम्भव होता है। इसका एक ही इलाज है
कि स्वयं को परिस्थितियों के हिसाब से बदल लें, अन्यथा एक स्थायी अवसाद से घिर जाएंगे। मैं देखता हूँ कि मंझले भाई साहब ने और भाभी ने स्वयं को कितना बदल लिया। सामाजिक, आर्थिक और परिवार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को अद्भुत रूप से ढाल लिया। यही उनकी शक्ति है।
    बात मंझले भाई साहब की चली तो थोड़ा और बता दूं। मंझले भाई साहब का मेरे ऊपर कुछ अधिक ही स्नेह रहा। मेरे लिए तो वे आइकॉन रहे। भाई साहब शिक्षक थे। परंतू उस समय स्कूल में अंग्रेजी भी पढ़ा सकने वाले दो ही शिक्षक थे। उनमें एक श्रीवास्तव सर थे। सीनियर शिक्षक थे, उनको अंग्रेजी मास्टर के नाम से पूरा गांव पहचानता था। दूसरे अंग्रेजी के शिक्षक भाई साहब थे। आठ दस किलोमीटर दूर के गांवों के लड़के उस मिडिल स्कूल में पढ़ने आते थे। उस समय परिवार की पहचान मंझले भैया के कारण ही अधिक थी। भैय्या की पहचान एक आदर्श शिक्षक के रूप में थी। साथ साथ वालीबाल और कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी भी थे। हारमोनियम तबला बजाने और गाने के भी शौकीन थे। मित्रों के साथ महफिल भी जमती। कुल मिलाकर हरफन मौला स्वभाव था, बिंदास जिंदगी जीते। कपड़े भी अच्छे पहनते। स्कूल का काम, शाम को खेलना, बाद में मित्रो की महफिल, रात को आठ बजे घर आना। सुबह आराम से उठना। उस आयु में वे  स्वस्थ और सुदर्शन भी थे। परिवार की , खेती की मुख्यतया जिम्मेदारी बड़े भैया की थी।
   मां के निधन के बाद मंझले भैया में बड़ा परिवर्तन आया। परिवार और खेती की पूरी
जिम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली। एक और परिवर्तन इस बीच हुआ कि बड़े भैय्या
राजनीति में सक्रिय हो गए,  और सरपंच भी बन गए। स्वाभाविक रूप से अब वे भी खेती की ओर ध्यान नही दे पाते थे। इस बड़ी जिम्मेदारी के बाद मंझले भैया के स्वभाव में आमूलचूल परिवर्तन आ गया। खेल कूद, मित्रों का जमावड़ा, बढ़िया पहनने का शौक सब छूट गया।
  बड़े भैय्या के राजनीति में सक्रिय हो जाने के बाद अब परिवार की पहचान उनके कारण होने लगी।
     इन सब परिवर्तनों की विशेषता यह थी कि सारे परिवर्तन बिना वादविवाद के और इतने स्वाभाविक रूप से हुए की न तो परिवार के सदस्यों को न तो बाकि लोगों को ही यह परिवर्तन समझ में आया।
   पहले बड़े भैय्या घर का चेहरा थे और मंझले भैय्या समाज का। अब बड़े भैय्या समाज का चेहरा हो गए और मंझले भैय्या घर का। परंतु हमेशा एक दूसरे के मौन पुरक बने रहे। 
         मैं घर मे बैठे बैठे सामने सड़क को देख रहा था, अब यह मनेरी रोड नही है। यह सड़क अब लांजी से खैरागढ़ को जोड़ने वाली स्टेट हाई वे हो गई। परंतु मेरी याद  मे अब भी मनेरी रोड ही रहता है। पिताजी का नागपुर से लांजी आने में मनेरी के जमीदार एक महत्वपूर्ण कारण थे। हमारा परिवार  मूलतः नागपुर का है। पुराने नागपुर के महाल एरिया में हमारा पुश्तैनी मकान था।
       पिताजी ने मकान का अपना हिस्सा बेचकर पुणे मे आगे पढ़ने का कठिन निर्णय लिया। पुणे उस समय तिलक के कारण स्वतंत्रता आंदोलन का बड़ा केंद्र था। पिताजी भी तिलकजी से प्रभावित थे। पिताजी कॉलेज में आंदोलनकारी विद्यार्थियों के साथ मिलकर स्वतंत्रता के लिए चल रहे आंदोलन में सहभागी होते रहे। इनकी गतिविधियां अधिक बढ़ जाने के कारण कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें कॉलेज से बाहर कर दिया। पुणे से नागपुर वापस आ गए। उन्होंने एक और शपथ ले ली कि वे अब अंग्रेजो की कोई नौकरी नही करेंगे। यद्यपि उन्होंने उस समय 1915 के आसपास नागपुर से इंटरमीडिट कर लिया था। उसी समय वे प्रोफेसर जोगलेकर के सान्निध्य में आये। वही से राजनीति का प्रारंभिक जीवन शुरू हो चुका था। पिताजी की एक मुह बोली बहन बनुताई थी। वे रहती नागपुर मे थी। उनकी मनेरी में बड़ी जमीदारी थी। उन्होने पिताजी को कहा कि मनेरी में रहकर हमारी जमीदारी का काम देखो। पिताजी नागपुर जैसे बड़े शहर को छोड़कर लांजी से पांच किलोमीटर दूर छोटे से देहात मनेरी आ गए। जमीदार की ओर से अच्छा वेतन मिलता। उस समय के शिक्षक से भी अधिक। अनाज साग सब्जी सब खेती से मिल जाती। स्वाभिमानी प्रकृति के पिताजी दो वर्ष से अधिक वहां काम नही कर पाएं और लांजी में आकर धान चावल का व्यवसाय करने लगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि जमीदार परिवार और हमारे परिवार के बीच बड़ा आर्थिक और सामाजिक  गैप था। परंतु पिताजी के नौकरी छोड़ने के बाद भी दोनों परिवारों के बीच दूसरी पीढ़ी तक भी बड़े आत्मीय संबंध बने रहे। यही उस पीढ़ी की बड़ी विशेषता थी। पिताजी ने लांजी आने का निर्णय लिया तो लांजी में स्थित जमीदार बाड़े में ही पिताजी को जमीदार ने रहने के लिए स्थान
उपलब्ध कराया। न तो आर्थिक असमानता न ही व्यवसायीक संबंधों का कड़वाहट, दोनों परिवारों की आत्मीयता के आड़े नही आये।
     वैसे ही एक रेंच परिवार है। विश्वेश्वरजी रेंच पिताजी के साथ कांग्रेस में काम करते थे। स्वतंत्रता सेनानी भी थे। जिले में उनका बड़ा सन्मान था। हमेशा खादि का कुर्ता और धोती पहनने वाले विघ्नेश्वर जी , सुदेर्शन व्यक्तित्व के धनी थे। संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा उनके व्यक्तित्व में दिखाई देती थी।  पिताजी के असामयिक निधन  के बाद उनका हमारे परिवार  को बड़ा मनोवैज्ञानिक सहारा मिला।  माताजी का निधन नागपुर में इलाज के दौरान हुआ, मंझले भाई साहब उनके साथ थे। उन्होंने वहीं मां का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। गॉंव में माताजी के  निधन की खबर फैल गई। श्री रेंच घर पर मिलने आये । उनकी आंखों से अविरल अश्रुधारा निकल रही थी। उसयुग में लोग कितने सहज और सरल हुआ करते थे।

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