सिविल सोसायटी
मीडीया अन्ना हज़ारे एवं उनके कुनबे को पूरे देश की सिविल सोसायटी का प्रतिनिधि बता रहा है | इसपर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है | सिविल सोसायटी अर्थात नागर समाज , समाज का वह अंग है जो समाज मे विचारो का प्रवर्तन करता है| समाज उन विचारो को स्वीकार या अस्वीकार करता है| यदि विचार जनसामान्य को स्वीकार्य हों तो तदनुसार हलचल पैदा होती है| पर अन्ना ने नागरसमाज को हि जन मान लिया | यही मीडिया और सरकार ने भी किया | भ्रष्टाचार के विरुध्द आवाज़ उठनी चाहिए आंदोलन भी होना चाहिए | आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर है कि क्या नागर समाज का विचार जनता ने स्वीकार लिया है , या जनांदोलन होने का यह आभास मात्र है | नागर समाज के तथाकथित प्रतिनिधि संपूर्ण न्याय पालिका एवं कार्यपालिका को लोकपाल के दायरे मे लाकर लोकपाल को जिस प्रकार एक निरंकुश संस्था बनाना चाहते है, वह तत्कालिक रूप से योग्य विचार हो सकता है , परंतु दूरगामी दृष्टि से यह निरंकुश्ता नई गंभीर समस्या की जननी तो नही बन जाएगी ?
हमारा देश आज आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है | परंतु यही बात दुनिया की शक्तिया पचा नही पा रही है| ऐसे समय मे सरकार को, विरोधिदलो को तथा समाज प्रवर्तको संयम के साथ कदम उठाने की ज़रूरत है| किसी भी पक्ष के द्वारा जल्द बाजी मे उठाया गया कदम देश के लिए ख़तरनाक हो सकता है | सरकार ने अब भी जनभावनाओं का सही आंकलन कर बड़े भ्रष्टाचारो तथा विदेशों मे जमा धन के विरूद्ध ईमानदारी से एवं समय्बद्ध कार्यवाही नही की तो जनभावनाओंका रूख़ कौन, कबऔर कहाँ मोडेगा कहना कठिन है |
जहाँ तक नागर सभाओ का सवाल है ,दिल्ली में भ्रष्टाचार की लड़ाई को पूरी ताक़त के साथ लड़ना ज़रूरी है ,पर इसकी अधिक सार्थकता आंदोलन को नीचे स्तर तक ले जाने मे है | जहाँ सामान्य व्यक्तिपल हर पल ज़मीन तक व्याप्तहा भ्रष्टाचार संस्कृति दो दो हाथ कर रहा है | नागर सभा कोएक लंबी लड़ाई लड़नी है| जिसका रास्ता गाँव के खेत खलिहान से होकर जाताहै|
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