Thursday, July 7, 2011

लौट आए

..लौट आए
इस भीड़  भरे शहर मे रहता हूँ,
फिर भी खुद को अकेला पाता हूँ|
कांक्रीट के जंगल का हूँ मैं आदिवासी,
ईर्ष्या का सबब बन गया है वनवासी|
कोई खिड़की भयसे खोल नही पाता हूँ,
आप ही खुली हवाको तरसता रहता हूँ|
सड़कों पर दिखते हैंये हादसो के मंज़र,
कुत्तेकी मौत भी होतीहै इससे बेहतर|
कौनकितना गिरा इसका नही परिमाप है,
इसीलिए गिरे हुए को पशु कहना पाप है|
यह कैसी बनावटी ठंड, फेफड़ो को जलाती है,
फूफ़्फूस को बचाओ, तो गरमी कहर ढाती है|                                                                                                          
जीने के लिए आत्मा कोक्यों मारना पड़ता है,
आत्मा को  बचाओ तो पापी पेट कराहता है|
क्यों मृत्यु से भय ख़ाता, जिंदगी से दूर भागता,
क्या सही है क्या ग़लत यह समझ नही आता|
शहर छोड़ कभी जंगल की राह निकल पड़ता हूँ,
पर कोल्हू का बैल हूँ, शहर वापस लौट आता हूँ|
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1 comment:

  1. कविता काफी मार्मिक बन पड़ी है ! कौन कितना गिरा इसका परिमाप नही है इसलिए गिरे हुए को पशु कहना पाप है, टिप्पणी आज के वातावरण में सटीक व् प्रासंगिक है ! आत्मा को बचाओ तो पापी पेट कराहता है , क्या बात है!

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