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हसरतो की हसीन मौत ....
सोचा था-
अहिंसा को अपनाऊंगा,
,सत्य मार्ग पर चलूँगा,
तो गाँधी बन जाऊँगा,
पर ऐसा हो न सका,
मैं गाँधी बन न सका|
सेवा का वृत धारूँगा,
दुखियों के साथ रहूँगा,
पर- दुख में सुख खोजूँगा,
पर डगर कठिन थी,
चलने की हिम्मत न थी|
जाऊं गुफा में हिमालय की,
खोज कर लूँ आत्मज्ञान की,
मिटा लूं भूख अमर शांति की,
पर इतना धैर्य जुटा न सका,
भूख, अंतर की मिटा न सका|
सवाल दर सवाल करते रहा,
अपने आप को पूछते रहा,
बुझने की जगह सुलगते रहा,
गौतम भी घिरा था सवालों से
कैसे निकला था इस चक्र से?
उसने तन का सुध खोया था,
मन की गहराई मे झाँका था,
मिला प्रेम - करुणा का सोपान,
रिक्ति और विरक्ति का ज्ञान,
सोचा मैं भी खोजू वह आयाम|
मैने भी झाका मन के अंदर,
वहाँ पाया अंधेरे का धूप मंज़र,
और गहरे उतरने कि की पहल,
आत्मा वहाँ पड़ी थी निश्चल,
सोचा अब कैसे हो इसमे हलचल?
पर कैसे होती उसमे हलचल,
आत्मा के तो प्राण गये निकल,
इसका मुझको कोई अब गम नही,
किसी की भी आत्मा मे दम नही,
सुनलो बात जो मैने अंत मे कही|
गम केवल करता रहा हूँ इस का,
क़ि जीवन का अर्थ तो पा ना सका,
पर जीवन मे अर्थ भी पा ना सका|
पर जोभी पाया उसका अभिमान नही
क्या इतना पाना भी आज बहुत नही?
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