Tuesday, June 7, 2011

संसदेतर शक्ति


बुलंदियो पे पहुॅचना कोई कमाल नही
बुलंदियो पे ठहरना कमाल होता है।
 संसदेतर शक्ति
अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलन के साथ एक नई बहस को लालूजी ने जन्म दिया|क्या संसद के उपर भी कोई शक्तिशाली संस्था का होना प्रजातांत्रिक प्रणाली के लिए घातक तो नही होगा? विषय गंभीर हैलालू स्वयं जेपी आंदोलन की उपज रहे है,जो प्रजातंत्र को
   बचाने केलिए किया गया आंदोलन था| पर सत्ता के घेरे ने स्वयं लालू का चेहरा कितना विकृत कर दिया इसे विस्तार से बताने की आवश्यकता नही |कितना दुरुपयोग संसद और विधानसभा का नेताओ द्वारा किया जाता रहाइसे बताने के लिए लालू सेबेहतर और अनुभवी कोई नही हो  सकतासत्ता के समानांतर सत्ता केंद्र के उदाहरण हमेशा रहे, वशिष्ठ,भीष्म, चाणक्या से लेकर गाँधी तक| परंतु ये सब अच्छे -बुरेदोनो परिणामो की ज़िम्मेदारी से कतराते नही थे| परंतु सोनिया केरूप मे बना कार्यपालिका का नया समानांतर केंद्र  कार्यपालिका केअच्छे कार्यो की वाहवाही का हकदार तो खुद को मानता है पर असफलता का ठीकरा कार्यपालिका के सिर   ठोक देता हैयही कारण है की  कार्यपालिका आसमान को छूते भ्रष्टाचार के गंभीर विषय पर निर्णय लेने मे भी उपापोह की स्थिति मे बनी रहतीहै| परिणामस्वरूप जो काम संसद और कार्यपालिका को करना चाहिए वह मीडिया व न्यायपालिका कर रही है| जो जनता के संसद पर से विश्वास उठ जाने का कारण बन गया|बाजपेयी ने संसद के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था की कभी संसद की बहस मीडिया के लिए समाचार होते थे| आज समाचार संसद मे बहस की  विषयवस्तु होते है| ऐसे समय संसद और राजनीति से बाहर की ताकते राजनीतिक मुद्दो पर जनता की लड़ाई लड़ रही है तो इसके लिए संसद -नेता-कार्यपालिका ही ज़िम्मेदार है|
                                               
                              


                                               
                              


                                               
                              

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