kali
व्यंग
कलीदेव
लुभाऊ बहुत दुखी था| ले दे कर हाई स्कूल पास किया| पिताजी ने संभव मार्गो का उपयोग कर कालेज मे प्रवेश दिला दिया| पर होनहार बालक लुभाऊ का मन पढ़ाई लिखाई मे कम ही लगता था| बालक लुभाऊ को बाहर की हवा लगी, लुभाऊको कन्याओं के छेड़छाड़ के आरोप मे कालेज भी छोड़ना पड़ा| दुर्भाग्य ने साथ नही छोड़ा, बालक लुभाऊ को छोटे बड़े अपराधो के लिए पुलिस लाकअप मे भी रहना पड़ता| बाप भी कितनी चिंता करता| परंतु लुभाऊ अन्यथा होशियार था| तंग आकर उसनेभगवान को प्रसन्न करने की ठानी|
प्रश्न यह था कि किसकी पूजा की जावे| लुभाऊ ने विचार किया कि सभी भगवान बहुत ब्यस्त हैं, क्यौ ना कलियुग के देवता कलीदेव की आराधना की जावे| ऐसा विचार कर वह उपवास पर बैठ गया|
तीन दिन बाद कलीदेव प्रसन्न हो अवतरित हुए |कलीदेव ने लुभाऊ से पूछा "हे वत्स क्या बात है,कहो?" लुभाऊ ने कहा" भगवन सभी महान व्यक्तियों का पूर्व जीवन कष्टों मे बीतता है, ऐसा सुना है|मेरा भी जीवन अब तक बहत कष्टों मे बीता है, अतयेव मुझे बड़ा आदमी बनने के गुर बताने की कृपा करें|"
कलीदेव ने कहा "बालक तेरे उपर कृपा करने ही आया हूँ पर तुझे दो प्रश्नो के उत्तर देने होंगे| उत्तर संतोषजनक होने पर ही बात आगे बाढेगी|" चतुर लुभाऊ ने कहा आप तो कृपानिधान हैं,कहिए महाराज" कह कर कली देव के चरणो पर गिर गया| कलीदेव ने पूछा "लोग तो इतने सारे अन्य देवो की आराधना करते है तू मेरे पास ही क्यों आया|" लुभाऊ ने कहा आपतो सर्वत्र है, ग़रीब- अमीर, क़ाला-सफेद, छोटा-बड़ा, सज्जन-दुर्जन सब में व्याप्त हैं| सहज प्राप्य हैं| अन्य देवो की तरह भाव नही खाते है| अन्य देव तो
कालबाहय अर्थात आऊट डेट हो चूके हैं| अब तो केवल आप की ही प्रासंगिकता बची है|" ऐसे वसायुक्त मीठे वचन सुनकर कली देव गदगद हो गये|
कलिदेव बोले कलियुग मे मीठी जिव्हा वाला व्यक्ति ही उन्नति करता है| तुम होनहार हो| तुम मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर दो| "पुत्र तुमने तीन दिन उपवास किया| पर बीचबीच मे पूडिया से क्या खाते थे?" लुभाऊ बोला" देव मैं बहुत दुखी था,या तो आपकी कृपा चाहिए थी या मृत्यु, इसीलिए उपवास के साथ जहर भी खा रहा था| देखो देव पूडिया पर लिखा है कि इसका सेवन हानिकारक है|" "बालक तुम असत्य कथन भी तर्कसंगत ढंगसे और,लुभाने वाली वाणी से करते हो| मैं प्रसन्न हूँ, आगे कहो|”
लुभाऊ समय की नज़ाकत कोसमझ कर बोला" देव कलियुग मे कौनसा धंधा शीघ्र फल देने वाला है| उसे प्राप्त करने के लीएकौनसा योग करना चाहिए| कृपा कर मुझे कहें| " ऐसा कह कर देव के चरणो मे गिर पड़ा|
कलीदेव ने बड़े दयाद्र भाव से लुभाऊ की ओर देखा और कहा "वत्स मैंने तुम्हारी योग्यता को पहिचान लिया है,तुम कम से कम कर्म कर अधिक से अधिक पाना चाहते हो| तुम्हारे जैसे स्वाभाव के जातक के लिए राजनीति के द्वारा छद्म सेवा का व्यवसाय अति उत्तम है एवम अति फलदाई है| अब मैं तुम्हे वह योग बताता हूँ जो मैने डेढ़ सौ साल पहले एक नेता को गुप्त रूप से बताया था| पर अब बहुत से लोग उसे जान गये हैं|
सो अब तू ध्यान से सुन मैं तेरे योग्य वह योग बताता हूँ| हमारे शास्त्रों मे चार प्रकार के मुख्य योग बताए गये हैं| पहलायोग कर्म योग बताया गया है , पर इससे आदमी स्वाभिमानी बनता है,जो राजनीति मे नकारात्मक गुण है| दूसरा योग ज्ञान योग बताया गया है , पर इसके प्राप्त होने से आदमी सही तर्क करने लगता है | ऐसा व्यक्ति कड़वा सत्य भी बोलने लगता है| यह स्वाभाव भी राजनीति के नाज़ुक व्यवसाय के लिए अनुपयुक्त होता है| तीसरा राजयोग है, इस योग मे कठिन प्रतियोगिता है। इस पर तेरा विचार न करना ही उचित है| वत्स, अतयेव अब मैं तुझे उस महत्वपूर्ण योग के विषय मे बताता हूँ जिसे भक्तियोग कहते है| यद्यपि मैने समय-काल एवं अलग अलग व्यवसायों की आवश्यकता को ध्यान मे रख कर इसमे कुछ सन्सोधन किए है| मैं तेरे हित लाभ को ध्यानमे रख इसे कहता हूँ, ध्यान से सुन|
सबसे पहले उस व्यक्ति का ध्यान कर जिससे तेरा हित सध सकता है| पर याद रखना ऐसा व्यक्ति तेरे पंहुच से बहुत दूर नाहो| स्वाभाविक रूप से पर तेज गति से शुरू में संपूर्ण शक्ति किंतु आस्थाई समर्पण के साथ ऐसे लाभकारी व्यक्ति के साथ चिपक जाना| धीरे से उसके कमजोर नस का पता लगाना| उस कमजोर नस मे जोंक की तरह इस प्रकार चिपक जाना कि खून चूसा जा रहा है यह पता ही ना चले|
राजनीति की नीति कहती है की जोंक की तरह चिपके रहो| पर दृष्टि बगुले की तरह दूसरी बड़ी मछलि की खोज मे लगाए रखो| छोटी मछली पर किए प्रयोग को बड़ी मछली पर भी दुहरओ पर सावधानी के साथ| बड़ी मछली पर पूर्णतः चिपकते तक पहली मछली के विश्वासपात्र बने रहो| वरना माया मिली ना राम वाली बात हो ज्एगी| वत्स देखो इस कहावत मे भी माया शब्द को पहले रख कर। माया का सन्मान हि किया गया है| इस प्रकार सदैव धर्म का तर्कसंगत किंतु स्व लाभकारी अध्ययन भी करते रहना चाहिए| बालक लुभाऊ अब मैं जा रहा हूँ , पर एक बात याद रखना, मैने जिस समर्पण का उल्लेख किया है इसे कुछ विद्वान छद्मसमर्पण भी कहते हैं , कुछ पापकर्म भी कहते हैं। पर तू किसी भ्रम मे मत पड़ना| मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास रखते ( क्योंकि अन्य देवी देवता तुझे सन्मार्ग दिखाकर पथभ्रष्ट भी कर सकते हैं|) हुए वत्स सफल होवो| इतना कहकर कलीदेव अंतर्धान हो गये| लुभाउ ने पूरी तन्मयता और शक्ति के साथ इस भक्ति योग की साधना प्रारम्भ कर दी।
लुभाऊ अब लुभाऊ से लाभ चंद और लाभ चंद से लाभ नारायण हो गये | पहले ये मधुमक्खी थे,अब छत्ते हो गये|
kali
व्यंग
कलीदेव
लु.भाऊ बहुत दुखी था| ले दे कर हाई स्कूल पास किया| पिताजी ने संभव मार्गो का उपयोग कर कालेज मे प्रवेश दिलादिया| पर होनहार बालक लुभाऊ का मन पढ़ाई लिखाई मे कम ही लगता था| बालक लुभाऊ को बाहर की हवा लगी, लुभाऊको कन्याओं के छेड़छाड़ के आरोप मे कालेज भी छोड़ना पड़ा| दुर्भाग्य ने साथ नही छोड़ा, बालक लुभाऊ को छोटे बड़े अपराधो के लिए पुलिस लाकअप मे भी रहना पड़ता| बाप भी कितनी चिंता करता| परंतु लुभाऊ अन्यथा होशियार था| तंग आकर उसनेभगवान को प्रसन्न करने की ठानी|
प्रश्न यह था कि किसकी पूजा की जावे| लुभाऊ ने विचार किया कि सभी भगवान बहुत ब्यस्त हैं, क्यौ ना कलियुग के देवता कलीदेव कि आराधना की जावे| ऐसा विचार कर वह उपवास पर बैठ गया|
तीन दिन बाद कलीदेव प्रसन्न हो अवतरित हुए |कलीदेव ने लुभाऊ से पूछा "हे वत्स क्या बात है,कहो?" लुभाऊ ने कहा" भगवनसभी महान व्यक्तियों का पूर्व जीवन कॅशटो मे बीतता है, ऐसा सुना है|मेरा भी जीवन अबतक बहुत कॅशटो मे बीता है, अतयेव मुझे बड़ा आदमी बननेके गुर बताने की कृपा करें|"
कलीदेव ने कहा "बालक तेरे उपर कृपा करने ही आया हूँ पर तुझे दो प्रश्नो के उत्तर देने होंगे|उत्तर संतोषजनक होने पर ही बात आगे बादेगी|" चतुर लुभाऊ ने कहा आप तो कृपानिधान हैं,कहिए महाराज" कहकर चरणो पर गिर गया| कलीदेव ने पूछा "लोग तो इतने सारे अन्य देवो की आराधना करते है तू मेरे पास ही क्यों आया|" लुभाऊ ने कहा आपतो सर्वत्र है, ग़रीब- अमीर, क़ाला-सफेद, छोटा-बड़ा, सज्जन-दुर्जन सब में व्याप्त हैं| सहज प्राप्य हैं| अन्य देवो की तरह भाव नही खाते है| अन्य देव तो
कालबाहय अर्थात आऊट डेट हो चूके हैं| अब तो केवल आप की ही प्रासंगिकता बची है|"ऐसे वसायुक्त मीठे वचन सुनकर देवगदगद हो गये|
कलिदेव बोले कलियुग मे मीठी जिव्हा वाला व्यक्ति ही उन्नति करता है| तुम होनहार हो| तुम मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर दो| "पुत्र तुमने तीन दिन उपवास किया| पर बीचबीच मे पूडिया से क्या खाते थे?" लुभाऊ बोला" देव मैं बहुत दुखी था,या तो आपकी कृपा चाहिए थी या मृत्यु, इसीलिए उपवास के साथ जहर भी खा रहा था| देखो देव पूडिया पर लिखा हैकि इसका सेवन हानिकारक है|" "बालक तुम असत्य कथन भी तर्कसंगत ढंगसे और,लुभाने वाली वाणी से करते हो| मैं प्रसन्न हूँ, आगे कहो|”
लुभाऊ समय की नज़ाकत कोसमझ कर बोला" देव कलियुग मे कौनसा धंधा शीघ्र फल देने वाला है| उसे प्राप्त करने के लीएकौनसा योग करना चाहिए| कृपा कर मुझे कहें| " ऐसा कह कर देव के चरणो मे गिर पड़ा|
कलीदेव ने बड़े दयाद्र भाव से लुभाऊ की ओर देखा और कहा "वत्स मैंने तुम्हारी योग्यता को पहिचान लिया है,तुम कम से कम कर्म कर अधिक से अधिक पाना चाहते हो| तुम्हारे जैसे स्वाभाव के जातक के लिए राजनीति के द्वारा छद्म सेवा का व्यवसाय अति उत्तम है एवम शुद्ध फलदाई है| अब मैं तुम्हे वह योग बताता हूँ जो मैने डेढ़ सौ साल गुप्त रूप से बताया था|पर अब बहुत से लोग उसे जान गये हैं|
सो अब तू ध्यान से सुन मैं तेरे योग्य वह योग बताता हूँ| हमारे साष्तरो मे चार प्रकार के मुख्य योग बताए गये हैं| पहलायोग कर्म योग बताया गया है , पर इससे आदमी स्वाभिमानी बनता है,जो राजनीति मे नकारात्मक गुण है| दूसरा योग ज्ञान योग बताया गया है , पर इसके प्राप्त होने से आदमी सही तर्क करने लगता है | ऐसा व्यक्ति कड़वा सत्य भी बोलने लगता है| यह स्वाभाव भीराजनीति के नाज़ुक व्यवसाय के लिए अनुपयुक्त होता है|तीसरा राजयोग है, इस योग मे कठिन प्रतियोगिता है इसपर तेरा विचार न करना ही उचित है| वत्स, अतयेव अब मैं तुझे उस महत्वपूर्ण योग के विषय मे बताता हूँ जिसे भक्तियोग कहते है|यद्यपि मैने समय-काल एवं अलग अलग व्यवसायों की आवश्यकता को ध्यान मे रख कर इसमे कुछ सन्सोधन किए है| मैं तेरे हित लाभ को ध्यानमे रख इसे कहता हूँ, ध्यान से सुन|
सबसे पहले उस व्यक्ति का ध्यान कर जिससे तेरा हित सध सकता है| पर याद रखना ऐसा व्यक्ति तेरे पंहुच से बहुत दूर नाहो| स्वाभाविक रूप से पर तेज गति से शुरू में संपूर्णकिंतु आस्थाई समर्पण केसाथ ऐसे लाभकारी व्यक्ति के साथ चिपक जाना| धीरे से उसके कमजोर नस का पता लगाना| उस कमजोर नस मे जोंक की तरह इस प्रकार चिपक जाना कि खून चूसा जा रहा है यह पता ही ना चले|
राजनीति की नीति कहती है की जोंक की तरह चिपके रहो| पर दृष्टि बगुले की तरह दूसरी बड़ी मछलि की खोज मे लगाए रखो| छोटी मछली पर किए प्रयोग को बड़ी मछली पर भी दुहरओ पर सावधानी के साथ| बड़ी मछली पर पूर्णतः चिपकते तक पहली मछली के विश्वासपात्र बने रहो| वरना माया मिली ना राम वाली बात हो ज्एगी| वत्स देखो इसकहावत मे भी माया शब्द को पहले रख कर माया का सन्मान हि किया गया है| इस प्रकार सदैव धर्म का तर्कसंगत किंतु स्व लाभकारी अध्ययन भी करते रहना चाहिए| बालक लुभाऊ अब मैं जा रहा हूँ , पर एक बात याद रखना, मैने जिस समर्पण का उल्लेख किया है इसे कुछ विद्वान छद्मसमर्पण भी कहते हैं ,पर तू किसी भ्रम मे मत पड़ना| मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास रखते{ क्योंकि अन्य देवी देवता तुझे सन्मार्ग दिखाकर पथभ्रष्ट भी कर सकते हैं| वत्स सफल होवो| इतना कहकर कलीदेव अंतर्धान हो गये|
लुभाऊ अब लुभाऊ से लाभ चंद औरलाभ चंद से लाभ नारायण हो गये | पहले ये मधुमक्खी थे,अब छत्ते हो गये|
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