।।यात्रा विमर्श -- चार धाम यात्रा॥
मैं मैं मूलतः धार्मिक, आध्यात्मिक या कर्मकांडी नहीं हूं। परंतु मेरे पुरखों के खून से प्राप्त स्वभाव एवं संस्कार के कारण धर्म, कर्मकांड या अध्यात्म पर विश्वास न करने का साहस भी नहीं कर सकता। यदि मैं धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं तो भी धर्मभीरू अवश्य हूं। मेरी पत्नी की बड़ी इच्छा थी की चार धाम की यात्रा की जाए। ये चारों धाम उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों में स्थित हैं। मेरी मेरी पत्नी की धार्मिकता सहज महिला जन्य स्वभाव से उपजी धर्परायणता है। धार्मिक व्यक्ति का धर्मभीरु होना होना सहज बात है। परंतु मेरे जैसे व्यक्ति का धर्मभीरू होना यानी उसमें धार्मिकता कम है, स्वार्थ और भय बड़ा कारण है। इस यात्रा के प्रस्ताव को मैं प्रारंभ में तो किसी ने किसी बहाने टालता रहा। इसका कारण भी था, पहला तो एक साल से पत्नी का गंभीर वात रोग से ग्रस्त होना, ऊपर से उत्तराखंड की ठंड और में पहाड़ों की दुरगम यात्रा। दूसरी महत्वपूर्ण बात ₹100000 का इस यात्रा पर खर्च करना मेरे जैसे तर्क कुतर्क करने वाले व्यक्ति के लिए तर्कसंगत नहीं था। मेरा पुत्र मेरे इस स्वभाव से परिचित है की बाबा इस काम के लिए इतना पैसा खर्चा करने के लिए आनाकानी करेंगे। बहुत से मामलों में मेरे पुत्र की सोच भी मेरी जैसी ही है। परंतु उसको मालूम है की इस यात्रा के लिए उसकी मां की बहुत इच्छा है उसका अपनी मां पर स्वाभाविक अनुराग है। इसीलिए उसने मुंबई से ही ट्रैवल एजेंट के द्वारा हमारी यात्रा का प्रबंध कर दिया, ताकि मुझे नहीं कहने का कोई अवसर न बचा रहे। अब मेरे पास यात्रा के लिए तैयारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। अंततः इच्छा, अनिच्छा, निश्चितता तथा अनिश्चितता के बीच झूलते हुए यात्रा का संकल्प निश्चित हो ही गया।
13 सितंबर 2011 को हमको जम्मू तवी एक्सप्रेस से दिल्ली के लिए प्रस्थान करना था। दिल्ली में मेरी पत्नी का भांजा नचिकेत रहता है। वहां रात भर रुकना था। दिल्ली से ही बस से चार धाम की यात्रा के लिए प्रस्थान होना था। हम लोग 13 तारीख को रायपुर रेलवे स्टेशन पर जम्मू तवी एक्सप्रेस के लिए निकल पड़े। प्लेटफार्म पर हमको छोड़ने के लिए मेरी लड़की सारिका और नाती पार्थ भी पहले से उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति के कारण प्लेटफार्म का वेटिंग पीरियड बड़े आराम से बीत गया। परंतु लाइन क्लियर होते ही हमारी उठने की तैयारी शुरू हो गई। उधर मेरी लड़की और नाती के चेहरे पर हमें छोड़ने का गम दिखाई देने लगा था। ट्रेन आने के बाद यह गम आंसुओं में तब्दील होने लगा। धीरे-धीरे ट्रेन ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया और बच्चे आंखों से ओझल होने लगे। ट्रेन की गति पकड़ते ही ही बच्चों को छोड़ने के गम बादल धीरे-धीरे छटने लगे। मनुष्य स्वभाव की यह एक अच्छी खासियत है कि वह वह शीघ्र ही बीते पलों को भूलकर वर्तमान में आ जाता है। अब हम भी यात्री की पूर्ण मानोदशा में आ गए। सबसे पहले अपने सामान की पुनः एक बार जांच कर ली। पत्नी से भी एक बार पूछ कर सुनिश्चित कर लिया की सारा सामान व्यवस्थित आ गया ना? अब हमने अपने केबिन का निरीक्षण करना प्रारंभ किया पूरे केबिन में हम दो यात्री थे। शायद भाटापारा या बिलासपुर में बाकी बर्थ भी भर जाएंगे। शुरुआती प्रक्रियाओं से मुक्त होकर मन पुनः अपनी लंबी यात्रा की ओर चला जाता है। यद्यपि यह यात्रा मैंने पूरे मन से प्रारंभ नहीं की थी। परंतु अब यात्रा में मन लगाना पड़ेगा तथा पूरी मानसिक सलंग्नता के साथ यात्रा करनी होगी, अन्यथा यह लंबी यात्रा मेरे लिए और मेरे पत्नी के लिए भी बोझ हो जाएगी। अब यात्रा में मन लगाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।
सनातन जीवन पद्धति की यह विशेषता है की धर्म और आध्यात्म जैसे गंभीर दार्शनिक विषयों को भी परम्पराओं के रूप में जीवन क्रम में इस प्रकार स्थापित कर दिया गया कि जीवन का गंभीर दर्शन भी सहजरूप से आत्मसात हो सके। धार्मिक यात्राएं भी इसी का एक आयाम है। उत्तराखंड की यात्राएं बहुत कठिन दुरूह रास्तो से होकर जाती है। ठंड और बर्फ बर्फीली हवा , पहाड़ो- गहरी घाटियों, से गुजरनेवाली, जगह जगह भूस्खलनों की संभावनाओं से युक्त इन यात्राओं में जीवन का जोखिम बना रहता है। वर्षों पहले ये रास्ते कितनी जोखिम भरे रहे होंगे। स्वाभाविक है कि इन यात्राओं का उद्देश्य न तो मौज मस्ती करना होता न तो प्रकृति का आनंद लेना होता । बिना किसी भौतिक अपेक्षा के साथ केवल धार्मिक भाव से की जाने वाली ये यात्राएं होती है। मैं पचास वर्ष पहले अपने बचपन में देखता था कि ऐसी यात्रा में जाने के पहले यात्री के घर मे पूजा का आयोजन होता। जिसमे सारे नजदीकी रिश्तेदार सम्मिलित होते। यात्रा के लिये प्रस्थान पर यात्री को फूल मालाएं पहनाई जाती। बाजे गाजे के साथ बिदाई होती। पर परिवार के सदस्य बड़े दुखी रहते। इसका एक मात्र कारण यह था कि इन कठिन यात्राओं से यात्री जीवित वापस आ जाये यही बहुत था। वास्तव में कदम कदम पर बर्फ, ठंड, एक ओर पहाड़, संकरी पगडंडी की दूसरी ओर गहरी खाई, कभी भी हो सकने वाला भुस्खलन का अंदेशा , कुल मिलाकर मौत को हर क्षण न्योता ही होता। यहां आकर जीवन की क्षणभंगुरता का वह जीवंत अहसास होता जो घंटो शास्त्र पढ़ने के बाद भी नही हो सकता। यही मानसिकता घर, परिवार, संपत्ति और स्वयं के प्रति अनासक्ति का भाव पैदा कर देती है। यही अध्यात्म की पूर्व पीठिका है।
मैं इन्ही विचारों में था कि मोबाइल की घंटी बजी। विचार प्रवाह रुक गया। निश्चित ही यह मेरी बहु स्वाति का फोन होगा। उसका टाइमिंग परफेक्ट होता है।
निश्चिंत होने के बाद ही कि अब हम ट्रैन में चढ़ने की हड़बड़ी और समान की व्यवस्था से निपट चुके होंगे, उसने फोन किया। उसने हम दोनो से बात की। फिर हम दोनो इधर उधर की बात करने लगे। ट्रेन अब बिलासपुर स्टेशन पर पहुंचनेवाली थी।
उत्सुकता थी कि बिलासपुर स्टेशन पर कूपे में कौन चढ़ता है। स्टेशन पर ट्रेन रुकी। कुछ क्षणों बाद ही एक सज्जन अपने दो सद्य युवा बच्चो के साथ कूपे में आये। बातचीत से समझ आया कि यह अग्रवाल समाज से तालुक रखते हैं। दो बच्चों मे एक बच्चा जो छोड़ने आया था, थोड़ी देर बाद उतर गया। छोटा बच्चा साथ मे था , जो दिल्ली के किसी कॉलेज में प्रवेश लेने के लिए पिताजी के साथ जा रहा था l. बिलासपुर का एक प्रसिद्ध होटल के मालिक हैं, इसके अलावा दो पेट्रोल पंप भी है। कुल मिलाकर बिलासपुर के बड़े व्यावसायियो में इनकी गिनती थी। मेरी यह कमजोरी है कि अमीर लोगो के साथ मैं सहज नही हो पाता। शायद निम्न मध्यम वर्ग की यही मानसिकता होती है। मैं विचार करने लगा कि पूरी यात्रा में औपचारिक बने रहना ही ठीक है। वैसे भी एक सहयात्री के नजरिए से विचार करे तो भी नए आने वाले यात्री के विषय मे पूर्वाग्रह बन ही जाते हैं। फिर भी मैने बात का सिलसिला आगे बढ़ाने की कोशिश की। मैन सहज रूप से पूछा अब जबलपुर तक कोई बड़ा स्टेशन नही आएगा। अग्रवाल ने मेरी बात का समर्थन किया। आगे कहा कि कटनी में उसका साला मिलने आने वाला है, यदि आपको कुछ मंगाना हो तो मुझे कह देंगे, बुलवा लूंगा। कुछ देर बाद सहयात्री का मोबाइल बजा। उनके साले का फोन था। मोबाईल पर बात करने के पहले उन्होंने मुझे कहा कटनी से फोन है आपको खाना चाय पान मांगना हो तो बता दें। मैने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। मैं सुन रहा था, वेअपने साले को चार कप चाय लेकर आने को कह रहे थे , यानी कि दो कप हमारे लिए थी। मेरे पुर्वाग्रह पर मुझे ही बड़ी कोफ्त हुई की कैसे हम बिना सोचे समझे किसी व्यक्ति के विषय मे सोच पाल लेते हैं।
यात्रा की यह शुरुवात अच्छे वातावरण में हुई। आगे मेरी लड़की चीकू, दामाद विश्रांत, पुत्र सागर और बहू स्वाति के भी फोन आये। बच्चो के फोन आने से एक तसल्ली रहती है कि हमारी चिंता करने वाले भी कोई हैं।
14 तारीख को सुबह नचिकेत का फोन आया। दिल्ली में हमे नचिकेत
यहां ही रात रुकना था। नचिकेत मेरी पत्नी का भांजा है। वह एक बड़ी कंपनी का सीईओ है। हम पहली बार उसके घर जा रहे थे। हमें किसी कोने में थोड़ा संदेह था कि नचिकेत की कुल मिलाकर कैसे प्रतिक्रिया रहेगी। परंतु सुबह 9:00 बजे उसने फोन पर जिस केयरिंग भाव से हमें अपने घर का पहुंचने का मार्ग बताया, उससे हमें अच्छा लगा, तसल्ली हुई। कुल मिला के यह यह निश्चित हुआ कि नचिकेत के लिए हम अनचाहे मेहमान नहीं थे। हम घर पहुंचे तो नचिकेत की पत्नी ने बिल्डिंग से नीचे उतर कर हमारा समान बड़े अपने पन के साथ लिफ्ट में रखा। घर पहुंचने पहुंचते 2:00 बज गए। इसके आगे की यात्रा अर्थात चार धाम की यात्रा मेरी पत्नी की बहन ज्योति और उनके उनके पति देशपाण्डेजी के साथ पूरी करनी थी। वे लोग भी हमसे पहले ही नचिकेत के यहां पहुंच गए थे। नचिकेत के यहां का समय बड़े अनौपचारिक वातावरण में आत्मीयता के साथ बीता।
अब अब ट्रैवल एजेंसी के साथ चार धाम की यात्रा 12:00 बजे होटल एशिया से प्रारंभ होने की होनी थी। हम लोग 12:00 बजे होटल एशिया पहुंच गए। वहां आवास और भोजन की अच्छी व्यवस्था थी। हमें 3:00 बजे अक्षरधाम मंदिर जाना था। चाय के बीच में मैं हमारे ग्रुप के सहयात्रियों का निरीक्षण कर रहा था। हमारे ग्रुप में महिलाओं की संख्या पुरुषों की अपेक्षा अधिक थी। कुछ महिलाएं अकेले भी थी। लगभग यह सभी नौकरी पेशा थी। परंतु कोई भी पुरुष अकेला नहीं था। महिलाओं में धार्मिक भावना पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है या उनमें घूमने का शौक अधिक होता है यह खोज का विषय हो सकता है। चाय पीने के बाद हम लोग अक्षरधाम मंदिर पहुंचे। बीघों में फैला मंदिर परिसर, आधुनिक साज सज्जा से युक्त मंदिर, पौराणिक कथा के आधार पर बने शिल्प, मानव निर्मित मशीनों से करीने से कटे पौधे एवं सुंदर कटी हुई हरि घास वाले बगीचे, सुंदर गढ़ी गई सोने की भव्य मूर्तियां, सब कुछ नयनाभिराम था। इस अक्षरधाम मंदिर में धार्मिक विलासिता और आधुनिक तौर तरीकों के बगीचे को देखने का अति नयन सुख तो था, परंतु मुझे आध्यात्मिक आनंद की उतनी अनुभूति नहीं हुई जितनी कि मुझे अपेक्षा थी। शायद इसका कारण यह भी रहा हो की बाहरी ताम झाम ने ईतना प्रभावित कर दिया की आध्यात्मिक अनुभूति के लिए मन की एकाग्रता बन ही नहीं पाई। इसीलिए पुराने ऐतिहासिक देवस्थान पहाड़- जंगल के सुनसान वातावरण में, निर्जन स्थान पर,नैसर्गिक आकर्षण के साथ स्थित होते थे। जो मन की आध्यात्मिक एकाग्रता के लिए सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते थे।
मैंने एशिया होटल में अपने कमरे में काउंटर पर फोन कर दो बोतल पानी के लिए कहा। एक तो आधे घंटे बाद बेयरा पानी लेकर आया और दो बोतल का ₹50 का बिल और ₹5 सर्विस टैक्स जोड़कर कुल ₹55 का बिल दे गया। अभिजात्य लोगों के इस होटल में बोतल के ऊपर छपी ₹10 की कीमत पर कोई ध्यान नहीं देता। क्योंकि ऐसा करने से और बहस करने से ग्राहक की अभिजात्यता पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है। चुप रहकर अपनी अभिजात्यता को बनाए रखने में ही मैने भी अपनी भलाई समझी। ईसके विपरीत जब हम लोग अगले पड़ाव पर हरिद्वार से पहाड़ की ऊंचाई पर प्रस्थान करने वाले थे तो हमारे ग्रुप गाइड ने हमें बताया हम जितना ऊपर जाएंगे उतना खाने पीने का सामान महंगा होता जाएगा। क्योंकि सारा सामान नीचे मैदान से पहाड़ पर ले जाना होता है, जो खर्चे वाला होता है। परंतु पुरी यात्रा में मैंने देखा की पानी की बोतल अधिक से अधिक ₹20 में पहाड़ की ऊंचाई पर भी उपलब्ध थी। उसके बाद भी कुछ सह यात्रियों को मैंने ऊंचे पहाड़ पर भी मोल भाव करते देखा। मैं दिल्ली के होटल के ₹25 से तुलना कर सोच रहा था की नव पूंजीवाद अभिजात्यता के नाम पर किस निर्मम तरीके से अपने ग्राहक की जेब खाली कर रहा है। और हम भी बड़े होटल के कस्टमर का बड़प्पन बचाने के नाम पर किस तरह स्वयं को लूटा रहे हैं। यह नव पूंजीवाद शोषण का नया तरीका है। वही पहाड़ों पर परंपरागत से अपने व्यवसाय में लगा हुआ व्यवसाई दिल्ली के उसे होटल से भी कम कीमत पर पानी दे रहा है। परंपरागत व्यवसाय एवं नव पूंजीवाद का व्यवसाय के कस्टमर को अलग-अलग ध्रुव में बांटने के प्रयास का नया अनुभव।
रात को भोजन के बाद सह यात्रियों का आपस में परिचय हुआ। अधिकांश लोग मुंबई के उपनगरों से आए हुए थे। एक परिवार दूर कोकण के गांव से आया था। तीन परिवार महाराष्ट्र के बाहर के भी थे। अधिकांश यात्री 55 से 65 वर्ष के आयु वर्ग के थे। एक परिवार जो गांव से आया था, उसके मुखिया की आयु 84 वर्ष की थी। दो अन्य महिलाएं 70,72 वर्ष की थी। ऐसा हमारा सह यात्रियों का दल था। सुबह नियत समय पर हम दिल्ली से हरिद्वार के लिए रवाना हो गए। रास्ते में बाबा रामदेव का आश्रम एवं योगपीठ देखने गए। इस योगपीठ का भव्य वास्तु एवं कई एकड़ में फैली हरियाली तथा औषधीय वृक्षों से भरा यह परिसर दर्शनीय था। मैं स्वयं बाबा रामदेव के आंदोलन से जुड़ा रहा। इस आंदोलन की अकाल मृत्यु से मेरे जैसे कई लोग दुखी थे। हम लोग योगपीठ देखने के बाद बस में बैठ रहे थे। तब बस के गाइड ने सहजता पूर्वक बाबा के आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि बाबा अच्छा आदमी है, परंतु उसे फंसा दिया गया। मीडिया या राजनीति कुछ भी कहे पर बाबा के आंदोलन पर एक आम आदमी की यह प्रतिनिधि प्रतिक्रिया थी।
17 ता को सुबह हरिद्वार से ऋषिकेश के लिए रवाना हुए। वहां का राम झूला और लक्ष्मण झूला पुरानी तकनीक का अनोखा नमूना है। प्रसिद्ध राम मंदिर और शिव मंदिर के दर्शन किये। बाबा कमलीवाले के स्वर्ग मंदिर भी गए। बाबा कामलीवाले की उत्त्तराखंड और आसपास वही मान्यता है जो गजानन महाराज की महाराष्ट्र में है। भारत वर्ष के सभी क्षेत्रों में ऐसे कई महात्मा हुए जिनकी मृत्यु के बाद भी मान्यता एवं भक्ति बानी हुई है, समय के साथ भक्तो की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कई भक्तो का दावा है कि ऐसे संत अमूर्त रूप में अब भी दर्शन देते हैं। यद्यपि ऐसी बाते तर्क संगत या विज्ञान सम्मत न भी लगे , परंतु यह भी सच है कि विज्ञान की पहुँच भी तो मूर्त तक ही है। जहां पहुंच नही है उसको नकार देना भी तो ज्ञान संगत नही है। विश्वास, श्रद्धा, और अंध विश्वास में थोड़ा सा ही फर्क है। दुनिया के अधिकांश संबंध भी इसी विश्वास के सहारे टिके है। कई बार लगता है कि अंध विश्वास भी कुछ हद तक जरूरी है।
हृषिकेश में रुद्राक्ष और स्फटिक का यात्रियों के लिये बडा आकर्षण होता है। यहां इसका करोड़ों का व्यापार होता है। हमें बस का गाइड बार-बार बता रहा था की मार्केट में कहीं भी रुद्राक्ष मत खरीदना सब नकली होता है। केवल इसकान के मंदिर में ही सही स्फटिक और रुद्राक्ष मिलेंगे। हम लोग इस्कान के मंदिर के दुकान पर पहुंचे। वहां का प्रमुख इस्कान का ही वालिएन्टर। उसकी वेशभूषा भी इसकान के डेडीकेटेड फॉलोअर जैसी थी। उसने बताया कि वह स्वयं रत्नों में पीएचडी है। उसने जिस प्रकार अपनी धीर गंभीर आवाज के साथ आध्यात्मिक पुट में रत्नों का, रुद्राक्ष का और स्फटिक का परिचय कराया, उनकी हमारे जीवन में अनिवार्यता का गंभीर बोध भी करा दिया, वह आध्यात्म और मार्केटिंग का अद्भुत मेल था। फल स्वरूप मेरे जैसा व्यक्ति जो मार्केटिंग के लटके झटके से शायद ही प्रभावित होता हो, प्रभावित हुए बिना ना रह सका। परिणामतः 10000 के लिए पर्स खाली हो गई।
दोपहर हम लोग़ हरिद्वार वापस गए। शाम को श्री गंगाजी के किनारे हर की पौड़ी पर हमे जाना था। हम लोग इस मानसिकता के साथ गये थे कि गंगाजी का पानी जिस हालत में था उसमें नहाना ठीक नही है। थोड़ा पानी शरीर पर छिटक लेंगे । वहां जाने के बाद देखा कि भारत के कोने कोने से लोग आये हुए हैं। वहाँ रोज शाम को लघु भारत के दर्शन होते हैं। विभिन्न भाषा पहनावे के बावजूद बिना किसी भेदभाव के पूरी श्रद्धा के साथ गंगाजी की आरती में सम्मिलित सैकड़ो लोगों को देख कर भारत की सांस्कृतिक एकता के सहज दर्शन यहां रोज किये जा सकते हैं। ये सभी अबाल वृद्ध गंगाजी में डुबकी लगाकर नहा रहे थे। हमें भी लगने लगा कि इतनी दूर आने के बाद हरद्वार की गंगा जी के स्नान से वंचित रहना ठीक नही है। नानुकुर के बाद हमने गंगाजी में डुबकी लगा ही ली। इस स्नान का अनुभव छोटे बच्चे जैसा था, जो नहाने के पहले बहुत भाव खाता है , रोता और चिल्लाता है। परंतु नहाने बाद खुद नवाब की तरह इतराता है।
वहां आने वाले सैकड़ो लोग गंगाजी में दीपक छोड़ते है । बडी बड़ी बाती वाले दीपको के साथ गंगाजी की आरती का अलग दिव्य अनुभव था। जिसे शब्दों बयाँ नही किया जा सकता। इस परालौकिक अनुभवक साथ हम होटल में लौटे।
दूसरे दिन यानी 18 तारीख को हमे रेनचेट्टी के लिए रवाना होना था। यमुनेत्री के प्रवास का यह पूर्व पड़ाव था। अब वास्तव में चार धाम की दुरूह यात्रा शुरू होना था। संकरे रास्ते के एक ओर ऊँचें पर्वत और दूसरी ओर गहरी खाई वाले ये रास्ते अब लगातार हमारे साथ चलेंगे। हम सुबह रेनचेट्टी के लिए रवाना हुए। 15 , 20 किलोमीटर के बाद ही पहाड़ी रास्ते शुरू हो गए। इन रास्तो पर बस 20 किमी से अधिक गति से नही चल सकती। कुछ घंटों के प्रवास के बाद पहली बार दूर से ही क्यों न हो, हमे हिमाच्छादित हिमालय के दर्शन हुए। हिमालय का यह पहला दर्शन गुदगुदाने वाला था।
यात्रा की सार्थकता का एहसास शुरू हो गया। उसके बाद तो पूरी यात्रा तक यह सिलसिला बना रहा। अलग अलग यात्राओ में अलग अलग समय मे भिन्न भिन्न कोण से हिमालय के कई अलौकिक रूपों के दर्शन हुए।
धीरे धीरे यात्रियों के साथ बढ़ते परिचय के साथ अनौपचारिकता भी बढ़ती गई। किसी बच्चे के हाथ कितना भी महंगा खिलौना दे दो, उसको तब तक संतुष्टि नही होती जब तक कि वह अपने बाल मित्रों को खिलौना न दिखा दे। यही बात क्या वयस्कों पर भी लागू नही होती? वयस्क भी तो अपने पास होने वाली कार , बंगला, हवाई यात्रा, विदेश यात्रा, आदि बड़प्पन वाली जानकारियां अवसर मिलने पर दुसरो को देने से नही चूकते। यदि ऐसा अवसर न आये तो अवसर पैदा कर लेते हैं। आजकल बहुत से मराठी परिवारों के बच्चे विदेश में है। यह भी एक गर्व की बात है। किसी ने बताया कि उसका लड़का गल्फ में है। एक दूसरा यह बताने से नही चुकेगा कि उसका बच्चा अमेरिका या इंग्लैंड में है("गल्फ की क्या बात करते हो" यह साइलेंट रहता है। ) बातचीत में सहयात्रियों के बीच इस विषय को बड़े चाव से बताया जाता। इसमे कुछ बुरा भी नही है, सब अपनी औकात का जो जिसके पास है, बखान करता ही है। यह मनुष्य जन्य कमजोरी है। इससे निजात पाना संभव भी नही है।
दूसरे दिन सुबह बेस कैम्प से यमुनेत्री के लिए रवाना होना था। प्रातः हम लोग बेस कैम्प में पहुंच गए। बेस कैम्प से यमुनेत्री 8 की मि दूर है। बर्फीली पहाड़ की सीधी चढ़ाई है। एक तरफ नुकीले पत्थर बाहर निकले ऊंचे पर्वत थे , एक भी पत्थर से सिर टकराने का मतलब मृत्यु, पूरे उत्तराखण्ड खंड की यात्रा में एक भय हमेशा बना रहता कि पहाड़ से कभी भी पत्थर सिर पर गिर सकता है। पर्वत के किनारे संकरे रास्ते की दुसरी ओर गहरी खाई, जिसमे झांकने मात्र से भी भय लगता था। इस संकरे 8 की मि रास्ते को पार करने के लिए पैदल के अलावा टट्टू, पालकी, पिट्ठू की सवारी उपलब्ध थी। इसमे सबसे सस्ती सवारी पिट्ठू की थी। जिसमे एक मजदूर अपनी पीठ पर कुरसी नुमा बांध कर स्वयं सवारी को ढोता था। हमारे जैसे कथित मानवता वादी यात्री यह कहने से नही चूक रहे होते कि यह अमानवीय यात्रा नही कर सकते । जबकि वास्तविकता यह थी कि पिट्ठु की सवारी कष्टप्रद थी। चूंकि हमारे पास इतनी क्षमता थी कि हम अधिक महंगा और आराम दायक विकल्प अफोर्ड कर सकते थे। मैं सोच रहा था कि जो लोग हैसियत न होने के कारण ही क्यों न हो पिट्ठू का विकल्प चुन रहे है, वे गरीब आदमी को सहयोग ही कर रहे है, कोई पाप नही।
इस पुरे मानस बकवास के बाद हमने पालकी से ही यमुनेत्री की ओर प्रस्थान किया।
नाम के लिए पालकी थी , कुल मिलाकर एक लकडी की कष्टमय कुर्सिनुमा वस्तु को चार लोग ढो रहे थे। भय लग रहा था कि कहीं एक का भी पैर फिसला तो सीधे खाई में। उबड़ खाबड़ रास्ते पर कथित पालकी जैसे हिचकोले ले रही थी, उससे शरीर कब किस कोण पर कितना घूमेगा यह बताना मुश्किल था। उस समय भी मेरी आयु 62 वर्ष थी और पत्नी वात रोग से पीड़ित। कष्ट मय और भयावह सफर पूरे दो घंटे चला।
यमुनेत्रि की यात्रा के पहले भी बस की यात्रा में हमे यमुनाजी के दर्शन हुए ।
परन्तु यमुनेत्री में जो यमुनाजी का प्रवाह था। वह शब्दो मे कहा नही जा सकता। कड़कड़ाती ठंड और 8 घंटे के थका देने वाले सफर की सारी थकावट यमुनाजी की कल कल धारा को देख कर तिरोहित हो गई। वहां इतनी कड़कड़ाती ठंड के भी गर्म पानी का स्त्रोत प्रकृति की अद्भुत माया थी। वहां का पानी इतना गरम था कि एक सेकण्ड भी हाथ पानी को छूकर नही रख सकते। वहां का पानी एक कुंड मे जमा होता जहां ठंडा पानी भी मिला रहता। उस कुंड में हम लोगों ने स्नान किया। यथा शक्ति पूजा पाठ भी सम्पन्न हुई। बेस कैम्प में वापस आ गए। वापसी की यात्रा में नीचे की ओर जाना था, अतएव यह यात्रा अपेक्षाकृत कम कष्ट दाई थी, साथ मे "अब तो वापस जाना है" वाला मनोविज्ञान भी काम कर रहा था। वहां से0 भोजन के बाद बस से रवाना हुए।
यमुनेत्री तिब्बत की सीमा 15 / 20की मि है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री भी चीन की सीमा से लगे हुए है।अन्य धाम अर्थात द्वारिका पूरी, पूरी, और रामेश्वरम भी समुद्र किनारे स्थित हैं। सीमाओ पर बने इन धामो की कल्पना के पीछे सामाजिक , साँस्कृतिक, और राजनीतिक एकता का भाव रहा होगा। इन यात्राओं को केवल धर्मिक द्दिष्टि से देखना हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता की अवमानना होगी। इन्ही विचारो के बीच झपकी लग गई। हालांकि पहाड़ी रास्तों पर लंबी झपकी लेना भी संभव नही है।
हमारे बगल की सीटों में से एक पर बैठी महिला की कडक आवाज से मेरी झपकी खुल गई। वह महिला बस वाले लड़के पर नाराज हो रही थी कि उसके सीट के नीचे समान क्यो रखा है। वास्तव वे मिनरल वाटर के छोटे छोटे डिब्बे थे जो यात्रीयों के उपयोग के लिए ही रखे थे। लड़के ने भी यात्री के स्वभाव की नजाकत को भांप कर डिब्बे हटा दिए । जबकि अन्य यात्रियों के सीट के निचे भी ऐसे सामान रखे थे परंतु किसी ने आपत्ति नही की थी। कुछ लोगों का स्वभाव होता है, कुछ अलग करके अपनी बोल्ड उपस्थिति का हर जगह एहसास करा देना। इनके साथ भी यही समस्या थी, सफर में भी महंगी साड़ी पहनना, जरा अधिक ही आभूषण पहने रहना, अलग थलग रहकर पर्चेसिंग करना। ऐसा नकारात्मक व्यवहार भीड़ में अलग पहचान तो देता है, पर समूह से अलगभी कर देता है। सकारात्मक व्यवहार भी आपको अलग पहचान देता है, वह भी समूह की अधिक स्वीकृति के साथ।
कल्पनाओ की लंबी दौड़ भी यात्रा के उबाउपन को कम कर देती है। लंबे सफर के बाद कब उत्तर काशी पहुंच गये पता ही नही चला। उत्तर काशी पहाड़ो की ऊंचाइयों पर बसा उत्त्तराखंड का बड़ा शहर है। यहां के बंगलो, बड़ी बड़ी होटलों को देख कर मानव शक्ति पर गर्व होता है। हिमालय की गोदी में बसे इस शहर को बसाना आसान नही है। इमारतों के लिए आवश्यक कच्चा माल नीचे मैदान से लाना । आय के सीमित साधन। इस इलाके में जहाँ बाढ़ और भूस्खलन आम बात हो वहाँ यह आर्थिक रूप से जोखिम भरा निवेश है। इसके बावजूद यह शहर इतनी भव्यता के साथ बसाया गया। उत्तरकाशी का धार्मिक, पौराणिकन और ऐतिहासिक महत्व है। सनातन संस्कृति की कई घटनाये और आख्यान इस स्थान के साथ जुड़े है। यह पूरा गढ़वाल क्षेत्र अपनी साहित्यिक प्रतिभा के लिए भी प्रसिद्ध है। मैं स्वयं शिवानी को कभी बहुत पढता रहा।
पूरे उत्तराखंड में कहीं भी जाइए आपको गंगा, जमुना, भागीरथी और अलकनंदा नदी की कल कल छल छल सुनाई देगी। इन्ही नदियों के किनारे बसे हैं हिंदुओं के पवित्र धर्मस्थान जिनके साथ कोई ना कोई पौराणिक कथा शिव से लेकर पांडवों तक और विष्णु से लेकर कृष्ण तक जुड़ी हुई है। सुदूर उत्तराखंड से, जो हिमालय की गोद में बसा है, दक्षिण के अंतिम छोर रामेश्वरम तक जो समुद्र के किनारे बसा हुआ है, इन पौराणिक कथाओं में आपसे में तारतम्य भी है और तर्कसंगतता भी है, धर्म भी है, अध्यात्म भी है, इतिहास भी है और भूगोल सीखने का अपना एक तरीका भी है। एं कथाएं भारतीय जनमानस में ईतनी गहरी बैठी है की कोई विज्ञान भी इसे अलग नहीं कर सकता। जिन लोगों ने इसे अलग करने की कोशिश की वह स्वयं समाज से अलग हो गए। हमारे पूर्वजों का ज्ञान विज्ञान और मनोविज्ञान समझने और समझाने का यह कथाएं या आख्यान एक सरल सहज माध्यम है।
दूसरे दिन हमें गंगोत्री के लिए रवाना होना था। गंगोत्री का प्रवास अपेक्षाकृत सरल है, क्योंकि गंगोत्री तक सीधी बस जाती है। परंतु पहाड़ी रास्ते तो आखिर पहाड़ी रास्ते हैं। जिनको हम सरल समझते हैं वह इतने सरल भी नहीं है। अब गंगोत्री के प्रवास में हमें प्रारंभ में ही पता चला की रास्ते में भूस्खलन हो गया है। बस जा पाएगी या नहीं कहना कठिन है। यह भूस्खलन हमारे लिए आश्चर्य हो सकता है, परंतु पहाड़ों पर रहने वाले निवासियों के लिए यह रोजमर्रा की घटना है। हम लोगों के लिए तो एक दिन तो क्या एक-एक घंटा भी कठिन रहता है। भूस्खलन के स्थान पर जाकर पता चला कि इस भूस्खलन वाले हिस्से में कोई 100 मीटर तक ही पैदल जाना पड़ेगा। परंतु यह भी आश्चर्य की बात है की भूस्खलन के बाद भी इन रास्तों को तत्काल इतना साफ कर दिया गया की पैदल यात्री निकल सकते हैं। वास्तव में यह रास्ते सड़क सीमा सुरक्षा दाल के अधीन देखरेख में रहते हैं। इसलिए यहां तत्काल कार्रवाई शुरू हो जाती है। भूस्खलन के स्थान के उस पार गंगोत्री तक जाने के लिए जीप और कार और की हमारे ट्रैवल एजेंट ने व्यवस्था कर दी थी। हम लोग जीप और कार में गंगोत्री तक पहुंच गए। गंगा जी का वास्तविक उद्गम तो 18 किलोमीटर और अंदर हिमालय पर है। जहां जाने के लिए विशेष अनुमति और वाहन करना पड़ता है। समय के साथ-साथ गंगा जी का वास्तविक उद्गम का स्थान बदलता रहता है। परंतु जिसे हम गंगोत्री कहते हैं वही धार्मिक रूप से उद्गम माना जाता है। और वहीं पर सब प्रकार के की पूजा पाठ और धार्मिक विधान होता है। यहां भागीरथ का मंदिर भी है। मैदान में बहने वाली गंगा और यमुना लगभग शांत रहती हैं। परंतु उत्तराखंड में बहने वाली गंगा, यमुना और अलकनंदा आदि नदिया बच्चों की भांति कल कल छल छल करते, उछल कूद करते पूरे उत्तराखंड में दिखाई देती है। ऐसा क्यों भी ना हो क्योंकि यही से तो उनकी बाल्यावस्था प्रारंभ होती है। जो उछाल कूद करने की आयु होती है।
यहां एक बात अनोखी है की गंगा जी गंगोत्री से निकलती है तो कुछ दूर तक तो गंगा ही कहलाती है परंतु आगे चलकर इसे भागीरथी कहा जाता है। और जब परवतों से आगे मैदान में पहुंचकर भागीरथी पुनः गंगा हो जाती है। शायद इसीलिए कभी भागीरथ ने गंगा जी को मैदान तक ले जाने के लिए जो भी उपक्रम किए होंगे वह पर्वतों के बीच बहती गंगा जी को मैदान तक लाने में ही किया गया होगा क्योंकि गंगोत्री के बाद जिस प्रकार गंगा जी का कठिन प्रवाह है उसको पूरा करने में निश्चित रूप से मानवीय शक्ति भी लगी होगी। हमारे यहां की सांस्कृतिक विशेषता है की ज्ञानी चहे इंजीनियर हो,डॉक्टर हो, आयुर्वेद का ज्ञाता हो, दार्शनिक हो, चाहे शास्त्रों का ज्ञाता हो; सभी ज्ञानियों को ऋषि ही कहा गया। क्योंकि ज्ञान को विभाजित ना करके केवलमानव हित में इसका उपयोग हो, शायद यही ज्ञान को एकीकृत दृष्टि देने का कारण रहा होगा।
उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा का आधा हिस्सा पूरा हो चुका था। यद्यपि यात्रा कठिन थी। बस जिन रास्तों पर चलती थी। उसकी एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर गहरी खाई देखकर लगातार जीवन की क्षण भंगुरता का अनुभव होता रहता है। हमारे साथ यात्रा में 72,74 साल की दो महिलाएं अकेली आई हुई थी। एक परिवार का मुखिया 84,85 वर्ष का रहा होगा। एक ऐसा यात्री भी था जिसकी ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी थी और स्वयं कैंसर का मरीज भी था। उसके साथ उसकी पत्नी भी थी। उन सब लोगों का उत्साह देखकर मेरे जैसा अरसिक और कुछ हद तक नास्तिक व्यक्ति के मन में भी भक्ति और उत्साह का लगातार भाग जागृत होते रहता था।
अब हमें गुप्तकाशी जाना था। जहां से सुबह केदारनाथ जी के दर्शन के लिए रवाना होना था। केदारनाथ जी की यात्रा यमुनेत्री से अधिक कठिन है और लंबी भी। इसलिए केदारनाथ में एक रात रुकना पड़ेगा। यह 18 किलोमीटर का रास्ता भी पैदल घोड़े या पालकी से ही पर करना था। परंतु अब यहां हेलीकॉप्टर भी उपलब्ध होता है। हेलीकाप्टर से जाना बहुत महंगा था। इसलिए हम सोच रहे थे की पालकी से ही जाया जाए। परंतु रात को केदारनाथ में रुकना होगा जहां कड़कड़ाती बर्फीली ठंड में रात बितानी होगी। इसी उपापोह में हम थे की मेरे पुत्र सागर का फोन आया। उसने गूगल में सर्च करके देखा था की केदारनाथ में हेलीकॉप्टर की व्यवस्था है। उसने बताया की आवश्यक राशि ट्रैवल एजेंसी के खाते में ट्रांसफर कर दी है और वे लोग हेलीकॉप्टर से ले जाने की व्यवस्था करेंगे। हम लोग हेलीकॉप्टर से ही केदारनाथ गए जहां हमने बहुत व्यवस्थित ढंग से केदारनाथ जी के दर्शन किए। पूजा पाठ की । वहां आदिशंकराचार्य जी के आश्रम में भी गए, जहां शंकराचार्य जी की समाधि थी। मैं बहुत शांत चित्त से समाधि के सामने 10 मिनट तक बैठा रहा। मुझे दो व्यक्तियों ने बहुत प्रभावित किया एक आदिशंकराचार्य जी है और दूसरे स्वामी विवेकानंद। इन दोनों ही व्यक्तियों ने जिस प्रकार सनातन को बचाने का कठिन समय मे प्रयास किया वह कल्पनातीत है। एक तो इन दोनों को ईश्वर ने छोटी आयु दी थी। उस संक्षिप्त आयु में भी बिना किसी राज आश्रय के इस प्रकार का ऐतिहासिक काम करना, यह किसी ईश्वरीय शक्ति से संपन्न व्यक्ति के द्वारा ही संभव है। 10, 12 यात्रियों को छोड़कर बाकी सब यात्री पैदल रास्ते से केदारनाथ गए थे। उनको वहां रात भर रुकना था और दूसरे दिन शाम को आना था। हेलीकॉप्टर से यात्रा का एक लाभ यह हुआ के हमें 8 ,10 रोज की थका देने वाली यात्रा के बाद एक दिन का आराम मिला।
हमारा अगला पड़ाव अब बद्रीनाथ था जो हमारा हमारी चार धाम यात्रा का अंतिम धाम था किसके लिए हमें गुप्त काशी से पीपल कोट जाना था। पीपल कोट के पास एक स्थान है चोपड़ा। जिसे उत्तराखंड का स्वीटजरलैंड कहा जाता है। इस स्थान पर हमें दोपहर का भोजन कर पूरी दोपहर वही बिताना था। निश्चित रूप से वह हरियाली से भरा हुआ मैदान, ऊंची , पहाड़ियां और छोटी-छोटी खाई, रमणीय स्थान था। यह यह प्रकृति को फोटोग्राफी में कैद करने के लिए के लिए भी बहुत ही उपयुक्त स्थान है।
यहाँ प्रकृति अवलोकन करते हुए विचार कर रहा था की इन चार धाम की यात्रा में हम लोग कई मंदिरों में पवित्र स्थलों में गए हमारे साथ के कई यात्री दर्शन के समय बहुत भाव विभोर हो जाते थे। कई लोगों की आंखों में मैंने आंसू भी देखें। मुझे इन लोगों से बड़ी ईर्ष्या होती थी, क्योंकि मैं चाह कर भी ईश्वर से इतना भावपूर्ण तादात्म्य नहीं बना पाया। मुझे लगता है यह तादात्म्य बनाने के लिए हृदय की विशालता चाहिए, सरलता चाहिए जो मेरे पास नहीं है। इसका कारण यह भी हो के मेरा बुद्धिजीवी और तर्कशील होने का अहंकार मुझे भावप्रवण नहीं होने देता। यद्यपि में कोशिश करता हूं की इस अहंकार से मुक्ति मिले। व्यवहार में इसमें सफल भी हो जाता हूं। जिसके कारण मेरे संपर्क में आए व्यक्तियों को मेरा अहंकार दिखाई नहीं देता। परंतु जब तक अवचेतन मन से अहंकार निकल न जाए तब तक यह भावुकता की स्थिति पैदा नहीं हो सकती। मुझे और एक बात लगती है की के जो लोग सहज और सरल होते हैं वे कई बार ऐसी बातें बोल देते हैं जो समान्य रूप से नहीं बोलना चाहिए, परंतु उनके बोलने को दूसरे व्यक्ति अन्यथा भी नहीं लेते। यही हृदय की पवित्रता है, सहजता है, सरलता है। खैर सरल बनने की कोशिश मैं जारी रखेगा रखूंगा।
बद्रीनाथ में रात को रुकना था। सुबह 5:00 बजे उठकर हमने हिमराज के अद्भुत रंगीन छटा के दर्शन किए। हिमालय के क्षण प्रतिक्षण बदलते रंगों का एहसास निश्चित रूप से एक आसमानी अनुभूति थी। हमने पहुंचते ही पहले दिन ही शाम को बद्रीनाथ जी के दर्शन कर लिए थे। सुबह भी आरती के समय दर्शन किये। सुबह बद्रीनाथ जी के दर्शन के बाद सरस्वती गुफा, गणेश गुफा और व्यास गुफा के दर्शन किए। व्यास गुफा में पुरानी पोथियों जैसी आकृति के चट्टान को देखना प्रकृति का अनोखा रूप था। सरस्वती नदी का उद्गम और उसका विलोपित होना दोनों के भी वहां दर्शन हुए। रात को जब हम बद्रीनाथ में आराम करने के लिए गए हुए थे। वहाँ आश्रम में पुजारी ने शंकराचार्य जी के यात्रा के विषय में संस्मरण सुनाएं। उन्होंने बताया की शंकराचार्य जिस मार्ग से बद्रीनाथ आए थे, बद्रीनाथ के पहले चुंग गांव और चुग नदी पड़ती है। वहां भी शंकराचार्य जी ने प्रवास किया।
बद्रीनाथ से हरिद्वार होते हुए हम लोग ट्रैवल वालों की बस से दिल्ली वापस आए। दिल्ली से सुबह 4:00 बजे रायपुर के लिए हमारी ट्रेन थी। हम लोगों ने होटल का एक कमरा बुक करके वही आराम किया। हमारे साथ एक इंदौर का परिवार भी था जिसे उसी दिन रात की ट्रेन से निकलना था। हमने उनको भी होटल में रात तक के लिए रोक लिया। इसके पहले हरिद्वार में सारे यात्री भोजन के बाद जमा हुए थे। उन्होंने अपने-अपने संस्मरण सुनाएं थे। मैं केवल सुनने का काम करता रहा। परंतु दिल्ली में होटल में हमारे पास पर्याप्त समय था। मैंने इंदौर के उसे परिवार को अपना लिखा हुआ यात्रा संस्मरण सुनाया। वे लोग बहुत प्रभावित हुए उनका कहना था "आपने इतना अच्छा लिखा है, हरिद्वार में रात को आपको यह संस्मरण सुनाना चाहिए था।" खैर मुझे इंदौर के परिवार की जो आत्मीय प्रशंसा सुनने को मिली, उससे मेरे लिखने की मेहनत सफल हो गई। ऐसा मुझे लगा। सुबह की ट्रेन में बैठ कर लगभग 24 घंटे में हम रायपुर पहुंच गए। चार धाम की यात्रा सकुशल और आनंददायक वातावरण में सम्पन्न हुई, इसके लिए प्रभु के चरणों प्रणाम करते हुए वृत्त समाप्त करता हूँ। प्रभु रुद्र आप सब पर कृपा करें।
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