अतीत का साया
बस चल पड़ी कच्चे रास्ते,
धूल का गुबार अंदर आता,
कोई नाक में कपड़ा रखता,
पर मैं गहरे श्वास लेता हूँ,
अपनी माटी कीं महक को
अंतर तक जाने देता हूँ,
माटी की सोंधी सोंधी महक,
मन मे उठती एक कसक,
यादों से मचल उठा तनमन,
कैसा था धूल भरा बचपन,
सूखा पत्ता घुस आया हवा संग,
बन कर आया स्नेहिल आमंत्रण|
गली,खेत, स्कूल घर आँगन,
मानो सब बुला रहे अपने वतन,
पाकर बुलावा यह सहज सरल,
उमड़ घूमड़ कर मन के बादल,
आए नयनो मे बन अश्रुजल,
अचानक वर्तमान पर आता हूँ,
विचारों दिशा बदलकर देखता हूँ,
मन तो बार बार जाता खोजने,
फिर वहीं मन की अल्हड़ता |
अभाओं के बीच जन्म लेती ,
स्नेह भावों की अनगढ़ता |
इबारत गढ़ने की कोशिश करताहूं,
तुम तक पहुँचाने लिखते रहता हूँ|
शीघ्र बस से उतर, हलके पाँव आगे बढ़ता हूँ,
माँ का बहुत कर्ज़ है,और बोझ नही बनता हूँ|
ना इस माँ से ना उस माँ से कोई उऋण हुआकहाँ,
मैने बस यही एक है ,आजीवन अपराध बोध सहा|
दूर से पुराने घर की दरकती दीवारें दिखाई देती हैं,
फिर भीअपने अतीत काल को छुपा नही पाती हैं|
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