अनाम क्षण काविता
बहुत दूर नही , पर इतनी पास भी नही,
कोई नाम दे सके, एसी नज़दीकी भी नही|
दिल में दर्द ना हो, पर धड़कन तो थी ,
वहाँ ज्वार भाटा न था, पर लहरें तो थी|
सपने नही संजोए थे,पर एहसास तो था,
प्यारके नगमे ना थे,धून का नशा तो था|
हर पल ना सही, किसी पल बेचैन तो था,
साथ खाई कसम नही,पर इनकारभी न था|
रिश्ते अपरिभाषित हों,पर मौन की है भाषा,
पढ़ना आसां नही,पर बुझने की होतीअभिलाषा|
केवल खरोचे थे, कोई गहरा जख्म न था,
परवान न चढ़ा हो,पर उतरना आसान नथा|
समय बीततागया,खरोचे औरगहरे होते गये,
उसे पता ही न चला कब जख्म बन गये|
अमूर्त अहसासों का यही हश्र होता है,
जख़्मो को दिखा पाता है न छिपा पाता है|
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