Saturday, July 16, 2011

अतीत का साया


अतीत का साया

बस चल पड़ी कच्चे रास्ते,
धूल का गुबार अंदर आता,
कोई नाक में कपड़ा रखता,
पर मैं गहरे श्वास लेता हूँ,
अपनी माटी कीं महक को
अंतर तक जाने देता हूँ,
माटी की सोंधी सोंधी महक,
मन मे उठती एक कसक,
यादों से मचल उठा तनमन,
कैसा था धूल भरा बचपन,
सूखा पत्ता घुस आया हवा संग,
बन कर आया स्नेहिल आमंत्रण|
गली,खेत, स्कूल घर आँगन,
मानो सब बुला रहे अपने वतन,
पाकर बुलावा यह सहज सरल,
उमड़ घूमड़ कर मन के बादल,
 आए नयनो मे बन अश्रुजल,
अचानक वर्तमान पर आता हूँ,
विचारों दिशा बदलकर देखता हूँ,
मन तो बार बार जाता खोजने,
फिर वहीं मन की अल्हड़ता |
अभाओं के बीच जन्म लेती ,
 स्नेह भावों की अनगढ़ता |
इबारत गढ़ने की कोशिश करताहूं,
तुम तक पहुँचाने लिखते रहता हूँ|
शीघ्र बस से उतर, हलके पाँव आगे बढ़ता हूँ,
माँ का बहुत कर्ज़ है,और बोझ नही बनता हूँ|
ना इस माँ से ना उस माँ से कोई उऋण हुआकहाँ,
मैने बस यही एक है ,आजीवन अपराध बोध सहा|
दूर से पुराने घर की दरकती दीवारें दिखाई देती हैं,
फिर भीअपने अतीत काल को छुपा नही पाती हैं|


Thursday, July 7, 2011

लौट आए

..लौट आए
इस भीड़  भरे शहर मे रहता हूँ,
फिर भी खुद को अकेला पाता हूँ|
कांक्रीट के जंगल का हूँ मैं आदिवासी,
ईर्ष्या का सबब बन गया है वनवासी|
कोई खिड़की भयसे खोल नही पाता हूँ,
आप ही खुली हवाको तरसता रहता हूँ|
सड़कों पर दिखते हैंये हादसो के मंज़र,
कुत्तेकी मौत भी होतीहै इससे बेहतर|
कौनकितना गिरा इसका नही परिमाप है,
इसीलिए गिरे हुए को पशु कहना पाप है|
यह कैसी बनावटी ठंड, फेफड़ो को जलाती है,
फूफ़्फूस को बचाओ, तो गरमी कहर ढाती है|                                                                                                          
जीने के लिए आत्मा कोक्यों मारना पड़ता है,
आत्मा को  बचाओ तो पापी पेट कराहता है|
क्यों मृत्यु से भय ख़ाता, जिंदगी से दूर भागता,
क्या सही है क्या ग़लत यह समझ नही आता|
शहर छोड़ कभी जंगल की राह निकल पड़ता हूँ,
पर कोल्हू का बैल हूँ, शहर वापस लौट आता हूँ|
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